आयुष्मान खुराना की 'आर्टिकल 15' जातिवाद की क्रूरता का सिनेमाई दस्तावेज है

By रेनू तिवारी | Publish Date: Jun 28 2019 6:37PM
आयुष्मान खुराना की 'आर्टिकल 15' जातिवाद की क्रूरता का सिनेमाई दस्तावेज है
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बदलती व्यवस्था को देख कर लगता है भारत ऊंचाई पर जा रहा है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर भारत की सच्चाई कुछ और है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो समता के अधिकार और आर्टिकल 15 की धज्जियां उड़ी हुई हैं।

भारतीय संविधान के आर्टिकल 15 में हर व्यक्ति को समता का अधिकार दिया गया है। समता का अधिकार का मतलब होता है कि समाज में बिना किसी जाति, धर्म, वर्ग, समुदाय आदि के आधार पर बिना भेदभाव के समाज में रहने का अधिकार। समता का अधिकार वैश्विक मानवाधिकार के लक्ष्यों के प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र के अनुसार विश्व के सभी लोग विधि के समक्ष समान हैं अतः वे बिना किसी भेदभाव के विधि के समक्ष न्यायिक सुरक्षा पाने के हक़दार हैं। 

 
बदलती व्यवस्था को देख कर लगता है भारत ऊंचाई पर जा रहा है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर भारत की सच्चाई कुछ और है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो समता के अधिकार और आर्टिकल 15 की धज्जियां उड़ी हुई हैं। कुछ उच्च जातियों का इस कदर दबदबा है कि वे दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों को इंसान तक नहीं समझते। इसी जातिवाद के मुद्दे को सिनेमाई दस्तावेज के रूप में अनुभव सिन्हा ने आर्टिकल 15 को निर्देशित किया है। इस फिल्म की खासियत ये नहीं है कि इस फिल्म ने भारत की बरसों पुरानी समस्या जातिवाद को उठाया है, बल्कि इस फिल्म की खासियत ये है कि आर्टिकल 15 के कुछ सवालों ने दर्शकों को अंदर तक झकझोर कर रख दिया है। फिल्म की कहानी 2014 में हुए बदायूं कांड पर आधारित है। बदायूं में दो नाबालिग लड़कियों के साथ कुछ लोगों ने बालात्कार किया और उनको गांव के बाहर मार कर पेड़ पर लटका दिया गया था। इस घटना से पूरे देश में आक्रोश था।



फिल्म की कहानी
अयान (आयुष्मान खुराना) विदेश में पढ़ाई करके भारत आता है और अपने पिता के कहने पर वह आईपीएस ऑफिसर बनता है। आईपीएस ऑफिसर बनने के बाद अयान की पोस्टिंग उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले में होती है, जहां जाति को लेकर बड़े पैमाने पर भेदभाव किया जाता है। एक दिन आयान के सामने गांव की एक ऐसी वारदात आती है जिसके सुन कर वो दंग रह जाता है। गांव में महज तीन रुपये ज्यादा दिहाड़ी मजदूरी की मांग करने पर लड़कियों के साथ सामूहिक बालात्कार करके मार डालते है और उनकी लाशों को गांव के बाहर पेड़ पर लटका देते हैं, इतनी दुर्दशा इस लिए की जाती है क्योंकि वह पिछड़ी जाति की होती हैं। इस वारदात के बात तमाम सवाल खड़े होते हैं। इस केस की जांच और भेदभाव को खत्म करने के लिए आयुष्मान जंग लड़ते है। इस लड़ाई के दौरान उनके साथ क्या-क्या होता है इसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।
फिल्म आर्टिकल 15 रिव्यु
'आर्टिकल 15' में जातिवाद जैसी सदियों पुरानी समस्या पर खुलकर बात की गई है। इल फिल्म में बिना किसी दबाव के जो होता है उसे दिखाया गया है। भारतीय समाज की सच्चाई आज भी यही है कि जन्म लेते ही आपका जातीय वर्गीकरण हो जाता है। परिवार के जरिए हिंदू, मुस्लिम दलित, ऊंच-नीच सभी बातें बच्चों के दिमाग में डाल दी जाती हैं। आज भी हमारे समाज में अगड़ी जातियों के द्वारा दलित और पिछड़ी पर तरह-तरह के अमानवीय बर्ताव किये जाते हैं। इस समस्या के साथ ही कई कड़े सवाल पूछती है आयुष्मान खुराना की आर्टिकल 15। फिल्म का निर्देशन अनुभव सिन्हा ने किया है, और फिल्म का लेखन गौरव सोलंकी ने... यही इस फिल्म की जान है। गौरव सोलंकी एक शानदार लेखक हैं और अनुभव सिन्हा मंझे हुए डायरेक्टर। आर्टिकल 15 में कैमियो रोल में मोहम्मद जीशान अय्यूब नजर आये हैं। अय्यूब का रोल इस कदर बेहतर लगता है कि काश! अय्यूब कुछ देर और स्क्रीन पर ठहर जाएं।

किरदारों की कलाकारी
आयुष्मान खुराना का फिल्म में लीड रोल है। इस फिल्म में आयुष्मान खुराना ने जिस तरह का किरदार निभाया है वो काबिले तारीफ है। आयुष्मान खुराना ने फिल्म में जो किरदार निभाया है वो अपना प्रभाव भी छोड़ जाता है। मनोज पाहवा, कुमुद मिश्रा, सयानी गुप्ता ने भी अपनी दमदार कलाकारी दिखाई है। नरेटर के रूप‌ में भी मोहम्मद जीशान अय्यूब की कमेंटरी ने फिल्म को और बेहतरीन बना दिया। 'आर्टिकल 15' को मुख्यधारा की हिंदी सिनेमा के इतिहास में अब तक की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक माना जाना चाहिए।
 
फिल्म: आर्टिकल 15
कलाकार: आयुष्मान खुराना, कुमुद मिश्रा, मनोज पाहवा, जीशान अयूब, सयानी गुप्ता, ईशा तलवार आदि
कहानी: गौरव सोलंकी, अनुभव सिन्हा
निर्देशक: अनुभव सिन्हा
निर्माता: जी स्टूडियोज और बनारस मीडिया वर्क्स
स्टार: 4****

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