The Kerala Story 2 Movie Review | 'द केरल स्टोरी 2'- नफरत की नई परतें या कड़वी सच्चाई का आईना?

जहाँ पहली फिल्म कुछ युवतियों के धर्मांतरण और ISIS में शामिल होने की व्यक्तिगत कहानियों तक सीमित थी, वहीं 'द केरला स्टोरी 2' एक बड़े 'डेमोग्राफिक पैटर्न' (जनसांख्यिकीय पैटर्न) को स्थापित करने की कोशिश करती है।
जब आप द केरला स्टोरी 2 जैसी फ़िल्म देखने जाते हैं, तो आपके अंदर थोड़ी उम्मीद तो होनी ही चाहिए। शायद बारीकियों की उम्मीद करना समझदारी नहीं होगी, लेकिन हो सकता है कि कट्टरता और नफ़रत फैलाने वाली बातें सिर्फ़ नफ़रत भरी हों, गुस्सा दिलाने वाली न हों - कम से कम आप तो यही उम्मीद करते हैं। लेकिन फिर, आप ऐसी फ़िल्म से सेंसिटिविटी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं जो ज़ुल्म पर आधारित एक फ़्रैंचाइज़ी बनाना चाहती है?
2023 में आई फिल्म 'द केरल स्टोरी' ने भारतीय बॉक्स ऑफिस और राजनीतिक गलियारों में जो तूफान खड़ा किया था, उसका दूसरा अध्याय यानी 'द केरल स्टोरी 2' अब सिनेमाघरों में है। विपुल अमृतलाल शाह द्वारा लिखित और कामाख्या नारायण सिंह द्वारा निर्देशित यह सीक्वल पिछले भाग की तुलना में अधिक आक्रामक, व्यापक और एक निश्चित एजेंडे की ओर झुका हुआ प्रतीत होता है।
कहानी और कथानक: व्यक्ति से समुदाय तक का सफर
जहाँ पहली फिल्म कुछ युवतियों के धर्मांतरण और ISIS में शामिल होने की व्यक्तिगत कहानियों तक सीमित थी, वहीं 'द केरला स्टोरी 2' एक बड़े 'डेमोग्राफिक पैटर्न' (जनसांख्यिकीय पैटर्न) को स्थापित करने की कोशिश करती है। फिल्म तीन अलग-अलग शहरों- कोच्चि, जोधपुर और ग्वालियर-की तीन लड़कियों की कहानी बुनती है, जो मुस्लिम पुरुषों के प्रेम जाल में फँसती हैं। फिल्म का नैरेटिव स्पष्ट रूप से यह संदेश देता है कि यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति है। फिल्म में दिखाए गए सभी मुस्लिम किरदार- चाहे वह उदारवादी दिखने वाला पत्रकार हो या वह पति जो अपनी पत्नी को परिवार से अलग कर देता है- अंततः धोखेबाज और कट्टरपंथी ही साबित होते हैं।
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नफरत और डर का चित्रण
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और विजुअल्स दर्शकों के मन में डर पैदा करने के लिए डिजाइन किए गए हैं: हिंदू घरों को रोशनी, सुरक्षा और शांति से भरा दिखाया गया है, जबकि मुस्लिम बस्तियों को तंग, डरावनी और रहस्यमयी छायाओं में फिल्माया गया है। फिल्म में दिखाया गया है कि धर्मांतरित महिलाओं को अपमानित किया जाता है, उन्हें जबरन गौमांस खिलाया जाता है और उनके शरीर को एक 'मिशन' के उपकरण के रूप में पेश किया जाता है। फिल्म में एक मौलवी को यह कहते दिखाया गया है कि 25 सालों में भारत की आबादी बदलकर धार्मिक कानून स्थापित करना ही अंतिम लक्ष्य है। '2047' का यह डर पूरी फिल्म में एक बैकग्राउंड थ्रेट की तरह बना रहता है।
तकनीकी पक्ष और अभिनय
मनोज मुंतशिर के लिखे गीत और 'हर-हर शंभू' के बैकग्राउंड चैंट्स फिल्म के राजनीतिक झुकाव को और स्पष्ट करते हैं। जहाँ तक अभिनय की बात है, इस तरह की फिल्मों में कलाकारों के लिए 'लेयर्ड परफॉर्मेंस' की गुंजाइश कम होती है। किरदार यहाँ हाड़-मांस के इंसान नहीं, बल्कि एक चेतावनी या 'प्रोपेगेंडा' के उदाहरण के तौर पर लिखे गए हैं। अदा शर्मा और अन्य अभिनेत्रियों ने अपने हिस्से का दर्द पर्दे पर उतारने की कोशिश की है, लेकिन स्क्रीनप्ले की एकतरफा सोच अभिनय पर हावी रहती है।
आंकड़े और विवाद: वास्तविकता बनाम फिक्शन
फिल्म 'लव जिहाद' और 'जनसांख्यिकीय बदलाव' के दावों पर टिकी है। हालांकि, आधिकारिक आंकड़े अक्सर इन दावों से अलग कहानी कहते हैं: भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार, हिंदू आबादी 79.8% और मुस्लिम आबादी 14.2% थी। प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research) की 2021 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में सभी समुदायों की प्रजनन दर (Fertility Rate) में भारी गिरावट आई है। मुस्लिम प्रजनन दर जो 1992 में 4.4 थी, वह 2015 तक गिरकर 2.6 पर आ गई, जो हिंदू दर (2.1) के काफी करीब है। फिल्म 32,000 जैसी बड़ी संख्याओं का संकेत देती है, लेकिन कानूनी और पुलिस रिकॉर्ड्स में इतने बड़े पैमाने पर संगठित धर्मांतरण के पुख्ता सबूत अब तक बहस का विषय रहे हैं।
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सिनेमा या प्रोपेगेंडा?
'द केरला स्टोरी 2' कोई ऐसी फिल्म नहीं है जो केरल की संस्कृति, साक्षरता या वहां के सुहाद्रपूर्ण इतिहास पर बात करे। यह एक ऐसी फिल्म है जो केवल 'अविश्वास' (Distrust) पैदा करने के उद्देश्य से बनाई गई लगती है। यह दर्शकों से सवाल करने की क्षमता छीनकर उन्हें एक निष्कर्ष पर पहुँचाने की जल्दी में दिखती है।
बड़ा सवाल: जब सिनेमा एक पूरे समुदाय को केवल एक 'खतरे' के रूप में पेश करता है, तो थिएटर से बाहर निकलने वाले समाज पर इसका क्या असर होगा? क्या यह फिल्म सुरक्षा का अहसास कराती है या केवल विभाजन की लकीरों को और गहरा करती है?
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