Ali Khamenei के जनाजे में उमड़ा जनसैलाब, ताबूत पर लाल झंडे ने खींचा दुनिया का ध्यान, बेटे Mojtaba Khamenei की अनपुस्थिति भी चर्चा का विषय

समारोह स्थल पर सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं। मुख्य प्रवेश द्वारों पर भारी संख्या में सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। आने वाले वाहनों की गहन जांच की जा रही है और परिसर में प्रवेश के लिए विशेष अनुमति पत्र अनिवार्य किया गया है।
ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार का बहुचर्चित और बहुदिवसीय कार्यक्रम तेहरान में शुरू हो गया है। लगभग चार महीने पहले अमेरिकी और इजरायली संयुक्त हमलों में मारे गए खामेनेई को अब पूरे राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी जा रही है। इस अंतिम संस्कार को केवल एक धार्मिक या राष्ट्रीय आयोजन नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पश्चिम एशिया की राजनीति, शिया पहचान और ईरान की भविष्य की दिशा से जुड़ी एक ऐतिहासिक घटना के रूप में देखा जा रहा है। दुनिया भर की निगाहें इस समारोह पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह ऐसे समय में हो रहा है जब ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच संघर्षविराम जैसी स्थिति तो बनी हुई है, लेकिन तनाव अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
हम आपको याद दिला दें कि अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए संयुक्त सटीक हवाई हमलों में हुई थी। इन हमलों में उनके परिवार के कई सदस्य भी मारे गए थे। युद्ध और सुरक्षा परिस्थितियों के कारण उनका राजकीय अंतिम संस्कार तत्काल नहीं हो सका। ईरान ने औपचारिक रूप से 1 मार्च को उनकी मृत्यु की पुष्टि की थी, लेकिन सक्रिय युद्ध की स्थिति के कारण अंतिम संस्कार कार्यक्रम को टाल दिया गया था।
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अब तेहरान के ग्रैंड मोसाला में उनके ताबूत को विशेष मंच पर रखा गया है। परिसर को काले और लाल रंग के बैनरों तथा खामेनेई की विशाल तस्वीरों से सजाया गया है। उनके ताबूत पर मशहद स्थित इमाम रजा दरगाह का प्रसिद्ध लाल झंडा रखा गया है, जिसने पूरे समारोह को धार्मिक और राजनीतिक प्रतीकों से भर दिया है। विश्लेषकों के अनुसार यह लाल झंडा केवल शोक का प्रतीक नहीं, बल्कि शहादत और प्रतिशोध का संदेश भी देता है। शिया परंपरा में लाल झंडे को बदले और बलिदान से जोड़ा जाता है, जबकि काला रंग शोक का प्रतीक माना जाता है।
अमेरिका की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में पश्चिम एशिया और इस्लामिक राजनीति के विशेषज्ञ नादेर हाशमी ने कहा है कि यह लाल झंडा सातवीं सदी की कर्बला की लड़ाई में पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन की शहादत का प्रतीक है। शिया समुदाय इमाम हुसैन को नैतिक साहस और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की सर्वोच्च मिसाल मानता है। विश्लेषकों का कहना है कि ईरानी शासन खामेनेई की मृत्यु को उसी ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भ से जोड़ने का प्रयास कर रहा है, ताकि जनता में भावनात्मक और वैचारिक एकजुटता बनी रहे।
समारोह स्थल पर सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं। मुख्य प्रवेश द्वारों पर भारी संख्या में सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। आने वाले वाहनों की गहन जांच की जा रही है और परिसर में प्रवेश के लिए विशेष अनुमति पत्र अनिवार्य किया गया है। इजरायल और अमेरिका के साथ हालिया संघर्ष तथा संभावित सुरक्षा खतरों को देखते हुए ईरानी प्रशासन किसी प्रकार की चूक नहीं चाहता।
ईरान सरकार के अनुसार अंतिम विदाई कार्यक्रम 4 और 5 जुलाई को तेहरान में आयोजित किया जा रहा है। इसके बाद 6 जुलाई को राजधानी में विशाल जन जुलूस निकाला जाएगा। 7 जुलाई को पवित्र शहर कुम में शोक यात्रा होगी और अंतिम चरण में 9 जुलाई को मशहद में अंतिम जुलूस निकलेगा, जहां इमाम रजा की दरगाह के निकट अली खामेनेई को दफनाया जाएगा। उनके साथ उनकी बेटी, दामाद, पोती तथा नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई की पत्नी के ताबूत भी ले जाए जाएंगे, जिनकी मृत्यु उसी हमले में हुई थी।
इस अंतिम संस्कार में लगभग 30 देशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से बड़ी संख्या में लोग ईरान पहुंच रहे हैं। हालांकि ईरानी प्रशासन ने अतिथियों की पूरी सूची सार्वजनिक नहीं की है, फिर भी कई प्रमुख नेताओं की उपस्थिति की पुष्टि हो चुकी है।
भारत की ओर से बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन, विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा, पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, सांसद पवन खेड़ा, जम्मू कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती तथा जम्मू-कश्मीर अंजुमन ए शरिया शियान के अध्यक्ष आगा सैयद हसन मोसवी अल सफवी शामिल हो रहे हैं। ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमाली रहमान, रूस की सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव, चीन की शीर्ष विधायी संस्था के उपनेता हे वेई तथा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी समारोह में शामिल होने वाले प्रमुख नेताओं में हैं।
वहीं ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई की उपस्थिति को लेकर अब भी संशय बना हुआ है। उनके भारतीय प्रतिनिधि अयातुल्ला हकीम इलाही के अनुसार सुरक्षा कारणों और इजरायली निगरानी के खतरे को देखते हुए उनका सार्वजनिक रूप से शामिल होना खतरनाक माना जा रहा है। हम आपको बता दें कि पिता की मृत्यु के बाद से मोजतबा सार्वजनिक रूप से बहुत कम दिखाई दिए हैं, जिससे उनकी स्थिति और स्वास्थ्य को लेकर अटकलें लगातार जारी हैं।
इस बीच, ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए शांति समझौते के बावजूद क्षेत्र में तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। पिछले महीने दोनों देशों ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन उसके बाद भी कई सैन्य घटनाएं हुईं। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में एक व्यावसायिक जहाज को निशाना बनाया था, जबकि अमेरिकी सेना ने दस ईरानी सैन्य ठिकानों पर हमले का दावा किया। इसके जवाब में ईरान ने कुवैत और बहरीन स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया था। हालांकि हाल के दिनों में तनाव कुछ कम होता दिखाई दे रहा है। दोहा में कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधियों के बीच हुई बैठकों में सकारात्मक प्रगति की बात कही गई है।
हम आपको यह भी बता दें कि ईरान में लाखों लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं। देश भर में खामेनेई के विशाल पोस्टर और होर्डिंग लगाए गए हैं। देखा जाये तो यह अंतिम संस्कार केवल एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि ईरान की राजनीतिक और धार्मिक चेतना को फिर से परिभाषित करने वाला क्षण माना जा रहा है।
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