मालदीव में चलाया जा रहा है भारत विरोधी अभियान, क्या है इसकी वजह

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दरअसल मालदीव को चीन को एक बड़े कर्ज का भुगतान करना है। मालदीव के संसद के मौजूदा स्पीकर मोहम्मद नशीद ने 11 दिसंबर 2020 को एक ट्वीट किया था,और कहा था कि मालदीव को चीनी बैंकों को 1.5 करोड़ डॉलर का भुगतान करना है। जो सरकार की कुल आय का 50 फ़ीसदी के बराबर है।

मालदीव और भारत के रिश्ते फिलहाल बहुत अच्छे हैं। लेकिन मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की ओर से एक भारत विरोधी अभियान की अगुवाई की जा रही है। यह विरोध और इसकी मांग यह है कि मालदीव से भारत की मौजूदगी खत्म होनी चाहिए। मालदीव में चल रहा भारत विरोधी अभियान वहां की सरकार के लिए भी चिंता का सबब बना हुआ है। इसी को लेकर 19 दिसंबर को मालदीव के विदेश मंत्रालय की ओर से बयान भी आया, बयान में कहा गया कि भारत को लेकर फैलाए जा रहे झूठ और नफरत को लेकर सरकार चिंतित है, मालदीव के विदेश मंत्रालय की ओर से जो बयान जारी किया गया है। उसमें कहा गया है कि भारत और मालदीव सबसे करीब के द्विपक्षीय साझेदार हैं, लेकिन कुछ छोटे समूह और कुछ नेता प्रॉपेगेंडा फैलाने में लगे हैं।

 मालदीव के एक सांसद अहमद शियाम ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की प्रेस कांफ्रेंस का एक वीडियो 19 दिसंबर को ट्वीट करते हुए लिखा कि, भारत की मौजूदा सरकार से हम यह आस नहीं कर सकते कि वह हमारे संविधान और आंतरिक मामलों का आदर करेगी। क्योंकि वह अपने ही कानून और नागरिकों का सम्मान नहीं करती। खास करके अल्पसंख्यकों का। उन्होंने कहा कि हम अपनी आजादी नहीं खो सकते। कहा जा रहा है कि भारत में जो कुछ भी होता है उसका असर मालदीव के मुसलमानों पर पड़ता है। मालदीव के सांसद अहमद शियाम इसी ओर इशारा कर रहे हैं।

क्यों चलाया जा रहा है भारत विरोधी अभियान

 भारत विरोधी इस कैंपेन की शुरुआत 2018 में हुई थी तब मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन थे। अब्दुल्ला यामीन ने भारत को अपने दो हेलीकॉप्टरों और डॉर्नियर एयरक्राफ्ट ले जाने को कहा था। ये हेलीकॉप्टर और एयरक्राफ्ट भारत ने मालदीव में खोजी और राहत बचाव अभियान के लिए लगा रखे थे। तब मालदीप का कहना था अगर यह भारत की ओर से तोहफा है तो इसमें पायलट मालदीव के होने चाहिए ना कि भारत के। इसी मुद्दे ने तूल पकड़ा और लोग सड़कों पर उतरने लगे। मालदीव के इस कैंपेन में मुख्य मांग यही है कि भारत के सैनिकों और उपकरणों को यहां से हटाया जाए। प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव उससे जुड़ी पार्टियों का कहना है कि, भारतीय सैनिकों को मालदीव से चले जाना चाहिए। इसी सिलसिले में मालदीव के पूर्व मंत्री लुबना जाहिर ने 6 दिसंबर को एक ट्वीट में कहा, मैं भारतीय व्यंजनों, उत्पादों, और दवाइयों को बेहद पसंद करता हूं लेकिन अपनी जमीन पर भारतीय सैनिकों को नहीं।

 चीन के साथ नजदीकी

 सितंबर में मालदीव की सत्ताधारी मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी के एक विरोधी धड़े ने इस मामले पर मोटर बाइक रैली निकाली थी। अब्दुल्ला यामीन भी यह मांग कर रहे हैं कि मालदीव से भारतीय सैनिकों की वापसी हो। विशेषज्ञ मानते हैं कि यामीन की शिकायत यह है कि राष्ट्रपति चुनाव में हार के बाद उन्हें भारत ने गिरफ्तार होने से बचाया नहीं था। लेकिन राजनयिकों का मानना है कि भारत के पास इसकी वजह मौजूद नहीं थी की वह मालदीव की नई सरकार को यामीन को जेल में डालने से रोकता। इसके पीछे कारण यह है कि राष्ट्रपति रहते हुए अब्दुल्ला यामीन ने ही चीन की मौजूदगी को मालदीव में मजबूती दी।

 2018 में इब्राहिम सोलिह मालदीव के राष्ट्रपति बने थे। इनकी नीतियां इंडिया फर्स्ट की रही हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए थे और कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे। मालदीव पड़ोसी होने के नाते जरूरी चीजों की आपूर्ति के लिए भारत पर निर्भर है। दूसरी ओर मालदीव को चीन के  कर्ज को लेकर भी चिंता बनी रहती है। दरअसल मालदीव को चीन को एक बड़े कर्ज का भुगतान करना है। मालदीव के संसद के मौजूदा स्पीकर मोहम्मद नशीद ने 11 दिसंबर 2020 को एक ट्वीट किया था,और कहा था कि मालदीव को चीनी बैंकों को 1.5 करोड़ डॉलर का भुगतान करना है। जो सरकार की कुल आय का 50 फ़ीसदी के बराबर है।

 भारत के लिए अहम है मालदीव

 चीन के लिए मालदीव सामरिक रूप से काफी अहम माना जाता है। दरअसल मालदीव रणनीतिक रूप से जिस समुद्र पर बसा है वह काफी अहम है। चीन की मालदीव में मौजूदगी हिंद महासागर में उसकी रणनीति का एक हिस्सा है। 2016 में मालदीव ने अपना एक द्वीप चीनी कंपनी को 50 सालों के लीज पर बस 40,00000 डॉलर में दे दिया था। वहीं दूसरी ओर भारत के लिए भी मालदीव बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह बिल्कुल भारत के पास है और अगर चीन यहां पांव पसारने की कोशिश करता है तो ऐसे में भारत का चिंता करना बिल्कुल लाजमी है। भारत के लक्षद्वीप से मालदीव बस 700 किलोमीटर दूर है और भारत के भूभाग से यह दूरी महज 1200 किलोमीटर की है। मालदीव ने चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किया है। जिससे पता चलता है कि मालदीव भारत से दूर हुआ है और चीन के नजदीक। 

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