ईरान मारेगा! ताबड़तोड़ मिलाइल हमलों से डरकर कहां भागे अमेरिका के ये 2 जहाज?

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अभिनय आकाश । Mar 18 2026 11:51AM

ऐसे में इनका युद्ध क्षेत्र से इतनी दूर जाना अमेरिका की सैन्य रणनीति और सुरक्षा चिंताओं पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। रक्षा गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि अमेरिका ने इन कीमती जहाजों को ईरान की जवाबी कार्रवाही से बचने के लिए जानबूझकर एक क्षेत्र से बाहर निकाला है।

मिडिल ईस्ट में चल रहे ईरान और इजरायल के युद्ध के बीच एक ऐसी आहट, एक ऐसी सैन्य हलचल सामने आई है जिसने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। अमेरिकी नौसेना के सबसे आधुनिक माइंड काउंटर मेजर जहाजों में से दो यूएसएस तुलसा और यूएसएस सा बरबरा अचानक अपने बेस बहरीन से 3500 मील दूर मलेशिया के पेनांग में देखे गए हैं। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब हुर्म जलडमरू मध्य में समुद्री बारूदी सुरंगों का खतरा चरम पर है। इन जहाजों का प्राथमिक काम ही समुद्र से बारूदी सुरंगों को खोजकर नष्ट करना है ताकि तेल के टैंकरों और मालवाहक जहाज सुरक्षित निकल सके। ऐसे में इनका युद्ध क्षेत्र से इतनी दूर जाना अमेरिका की सैन्य रणनीति और सुरक्षा चिंताओं पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। रक्षा गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि अमेरिका ने इन कीमती जहाजों को ईरान की जवाबी कार्रवाही से बचने के लिए जानबूझकर एक क्षेत्र से बाहर निकाला है। 

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फरवरी 2026 के अंत में ईरान और अमेरिका के बीच शुरू हुई प्रत्यक्ष सैन्य झड़पों के बाद बहरीन स्थित अमेरिकी फिफ्थ फ्लट का मुख्यालय ईरान की बैलेस्टिक मिसाइलों और कामिकाजे ड्रस की सीधी रेंज में आ गया। विशेषज्ञों का तर्क है कि इंडिपेंडेंस क्लास के यह जहाज एलुमिनियम से बने हैं। हालांकि ये तकनीक में बेजोड़ हैं, लेकिन संरचनात्मक रूप से यह पुराने लकड़ी के माइन वेपर्स की तुलना में अधिक नाजुक हैं। अगर ईरान अपनी एंटीशिप मिसाइलों या विस्फोटक नावों से इन पर हमला करता है, तो इनके डूबने या भारी नुकसान पहुंचने का खतरा बहुत ज्यादा है। अमेरिका संभवत अपने इन महंगे युद्धपोतों को सॉफ्ट टारगेट बनने से बचाना चाहता है। अमेरिका की रणनीतिक चूक या सोची समझी चाल। यूएसएस टुलसा और यूएसएस सा बरवरा को मलेशिया के नॉर्थ बटरवर्थ कंटेनर टर्मिनल पर खड़ा देखा जाना यह संकेत है कि अमेरिका फिलहाल मिडिल ईस्ट के समुद्री रास्तों की सुरक्षा को लेकर बैकफुट पर है। हुरमुस की खारी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की जीवन रेखा है। यहां से वैश्विक तेल का करीब 20% हिस्सा गुजरता है। 

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अगर ईरान ने इस संगीन समुद्री रास्ते में माइंस बिछा दी तो उन्हें हटाने की जिम्मेदारी इन्हीं जहाजों की थी। इनकी गैर मौजूदगी होने से अब तेल के टैंकरों और अन्य व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा दोगुना हो गया है। हालांकि अमेरिकी नौसेना ने इसे केवल एक लॉजिस्टिक स्टॉप बताया है लेकिन 3500 मील की यह दूरी महज रसद आपूर्ति के तर्क से मेल नहीं खाती। एक अन्य पहलू यह भी है कि अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे मिडिल ईस्ट से हटाकर इंडोपेसिफिक की ओर स्थानांतरित कर रहा है। ट्रांसफर कर रहा है। चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए इन जहाजों की मलेशिया में मौजूदगी को एक नए सैन्य तालमेल के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन सवाल वही है कि क्या इस बदलाव की कीमत मिडिल ईस्ट में असुरक्षित होते समुद्री मार्ग होंगे। वर्तमान में मिडिल ईस्ट में केवल एक माइन हंटर जहाज यूएस कैनबरा तैनात बताया जा रहा है। अकेले एक जहाज के भरोसे दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री रास्ते को सुरक्षित रखना असंभव है।  

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इस घटना ने सहयोगी देशों, विशेष तौर पर खाड़ी देशों और इसराइल के बीच भी चिंता पैदा कर दी है जो समुद्र में अमेरिकी सुरक्षा कवच पर निर्भर है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि क्या अमेरिका इन जहाजों को वापस मिडिल ईस्ट भेजता है या जापान में तैनात अपने अन्य माइनपर्स को इस कमी को पूरा करने के लिए बुलाता है। फिलहाल मलेशिया के तट पर खड़े यह जहाज वाशिंगटन की डिफेंसिव मोड़ यानी रक्षात्मक मुद्रा की गवाही दे रहे हैं। अमेरिका आपका वफादार नहीं है और इजराइल आपका दुश्मन है। यह कभी आपके अपने नहीं होंगे। यह लोग सिर्फ एक दूसरे के इंटरेस्ट में काम करेंगे। अब मुसलमानों को तय करना होगा कि मुस्तकबिल या भविष्य क्या हो। यह बातें कहते हुए ईरान की सुप्रीम सिक्योरिटी काउंसिल के चीफ अली लारीजानी ने दुनिया भर के अरब और मुस्लिम बहुल देशों को झकझोरा है। 

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