विज्ञापन पर टंगा बाज़ार (व्यंग्य)

विज्ञापन पर टंगा बाज़ार (व्यंग्य)

हमने अनेक उत्पाद, ‘दुनिया में नंबर वन’ की कुर्सी पर बिठा दिए हैं। लक्की ड्रा आपकी उँगलियों पर है। पिछले उत्सव पर प्रदूषण की बुराई कम हुई या नहीं यह जांच समय बर्बाद करेगी लेकिन बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म, अन्याय पर न्याय की विजय के विज्ञापन खूब आए।

पिछले दिनों एक विज्ञापन ने ध्यान को खूब खींचा। कुछ यूं था विज्ञापन, अशुद्धता पर शुद्धता की विजय, नकली अगरबती, धूपबत्ती व पूजन सामग्री बनाना और बेचना कानूनी के साथ धार्मिक अपराध भी है। त्योहारों के मौसम में स्वाभाविक है विज्ञापन के सहारे बाज़ार उठाया जा रहा है। हमारी ज़िंदगी में किस्मत का भी बहुत सशक्त रोल है तभी ज्योतिष का व्यवसाय भी खूब चलता है। कविता की किताब बिके न बिके ज्योतिष पर लिखी किताब बेस्ट सेलर्स में शामिल हो जाती है। उसके कई संस्करण छप जाते हैं।

इसे भी पढ़ें: नेताजी द्वारा गड्ढों का निरीक्षण (व्यंग्य)

बाज़ार में  सभी अपने सामान की सौ प्रतिशत शुद्धता का वायदा कर रहे हैं। पैनेडैमिक के फेल हो जाने के बाद अकैडेमिक प्रवीणता पास हो रही है। कण कण में पवित्रता जैसी शुद्धता का आश्वासन है। बता रहे हैं कि उत्पाद यानी विद्यार्थी कितने टेस्ट पास कर आया है वैसे भी फेल होना आजकल किसी को भाता नहीं। आदमी बढ़ रहे हैं आदमीयत कम होती जा रही है। उत्पाद बनाने वाली कंपनी का अनुभव भी घोषित किया जा रहा है वह दीगर बात है कि लगभग हर कम्पनी ने सामान की मात्रा घटाई है और कीमत बढ़ाई है। प्रदूषण कम हो न हो स्वादिष्ट व्यंजनों का धुंआ हरने के लिए चिमनी में सिक्स वे सक्शन सिस्टम आ गया है। पकाने का सारा धुंआ घर से बाहर कुदरत के हवाले। कितनी ही चीज़ों पर रोजाना व साप्ताहिक ऑफर है। स्वास्थ्य नियमों का पालन करते हुए चीज़ें खरीदने के लिए बाज़ार जाने की ज़रूरत नहीं है, आपके क़दमों में हाज़िर है और तीन के साथ एक मुफ्त है।

हमने अनेक उत्पाद, ‘दुनिया में नंबर वन’ की कुर्सी पर बिठा दिए हैं। लक्की ड्रा आपकी उँगलियों पर है। पिछले उत्सव पर प्रदूषण की बुराई कम हुई या नहीं यह जांच समय बर्बाद करेगी लेकिन बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म, अन्याय पर न्याय की विजय के विज्ञापन खूब आए। हमने इन सबकी परिभाषा कहीं बदल तो नहीं दी। बुराई पर अच्छाई का डंका खूब बजाया। एक विज्ञापन रहा, बुराई पर अच्छाई की जीत बनाए सफ़र को आसान। सरकारें भी बुराई पर अच्छाई की जीत का विज्ञापन देती रही। बुराई को हराकर बड़े उपहार और इनाम पाने का विज्ञापन एप डाउनलोड करने के बदले मुफ्त पैसे मिलते रहे। यह तो वही जियो जियो वाली शैली हुई, पहले मुफ्त फिर चुस्त। आकर्षक फायनांस स्कीमें नाच रही हैं। पसंदीदा कार पर हज़ारों की बचत बिना चुटकी बजाए हो सकती है। रक्षा करते भगवानजी का चित्र भी विज्ञापन का अहम हिस्सा है। उनके आशीर्वाद से अस्सी प्रतिशत तक छूट भी दी जा रही है। इसी सच्चे झूठ को कम्पनियां लुटाए जा रही हैं।

इसे भी पढ़ें: सबसे बड़ी परेशानी है अनुशासन (व्यंग्य)

विज्ञापन में ही ग्राहकों के विशवास को ही वास्तविक कमाई बताया गया। इसी के साथ अनेक उत्पादों के साथ आश्वासन और आश्चर्य उगा देने वाला सुनिश्चित उपहार भी विज्ञापित किया गया। सामान के साथ चीनी, दाल, देसी घी और डिटरजेंट पावडर मुफ्त दिया जा रहा है। रोजाना एक ओएलईडी, पांच साल का अशोरेन्स, कैश बैक, फिक्स्ड ईएमआई, एक ईएम्आई सचमुच मुफ्त है। ज़्यादा खरीदें ज़्यादा मुफ्त पाएं की धारणा विकसित कर दी गई है। खूबसूरत पैकिंग वाले उपहार पैक देखकर लगा किस्मत बहुत ज़रूरी वस्तु होती है। क्या यह बदकिस्मती है जो असत्य पर सत्य जैसी अच्छी क्रिया को होने नहीं देती। पिछले दिनों फिर से एक नेता ने कहा जीत आखिर में सत्य की ही होती है। दो गज की दूरी तो कब से मनमानी उचित दूरी हो गई है। गहने खरीदने के लिए बाहर से आने वाले ग्राहकों के लिए आने जाने, ठहरने, नाश्ता व पार्किंग की सुविधा भी दी जा रही है। 

विज्ञापन का सहारा लीजिए और अपनी किस्मत की राह पर चलते हुए मनचाही वस्तुएं खरीदिए। बुराई खत्म हो न हो, सत्य की जीत हो न हो, उत्पादों में शुद्धता आए न आए इसकी चिंता करने के लिए राजनीति है न।

- संतोष उत्सुक