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साहित्य जगत

हिन्दी का महीना संस्कार हीना (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Publish Date: Sep 13 2018 11:56AM

हिन्दी का महीना संस्कार हीना (व्यंग्य)
Image Source: Google
देश के कई हिस्सों में अपनी अपनी भाषा का तंबू गाड़ देने के लिए अपने राष्ट्रप्रेमी अभी भी कम बेताब नहीं हैं। ऐसे सांस्कृतिक माहौल के बीच शहर की हिन्दी समिति ने राष्ट्रभाषा के सम्मान में हर वर्ष की तरह  हिन्दी माह मनाया। कितने ही विभागों व संस्थाओं ने हिन्दी से जुड़े आयोजन किए। यह आयोजन अभी खूब चलेंगे। कविता प्रतियोगिता का जिम्मा ऊँची बिल्डिंग में स्थित हज़ूरदर्शन केन्द्र को लेना पड़ा। पिछले साल भी उन्होंने टाल दिया था कि स्टाफ नहीं है। मगर इस बार एक दबंग, बड़े सरकारी अफसर की पत्नी जो सरकारी विभाग में नौकरी करती थी सरकारी गाड़ी में मायके, किट्टी व मार्किट जाती थी ने दबाव डलवा दिया कि वे टीवी पर कविता सुनाएंगी ही सो आयोजन हुआ, क्योंकि ये तो होना ही था।
 
हज़ूरदर्शन ने सोचा रिकार्डिंग भी कर लेते हैं मुफ्त में एक कार्यक्रम हाथ लगा है। डेढ़ बजे का समय दिया। कई कवियों को बिना सिफारिश अवसर मिल रहा था सो बेचारे सबसे अच्छे कपड़ों में, बिना ज्यादा भूख के एडवांस खाना खा कर समय पर पहुंचे। उनकी आत्मा ने उन्हें एहसास दिला दिया था कि खाना वहां तो नहीं मिलेगा। वे पहुंचे तो कर्मचारी खाना खा रहे थे। उन्हें कम काम की थकावट के कारण खाना खाकर आराम भी करना पड़ता है और हमारे देश के कवि भी समय पर पहुंचने को बाध्य नहीं। बुटिक व ब्यूटी सैलून गई स्टार कवयित्री समेत, हज़ूरदर्शन के निर्देशक की पहचान की निर्णायक महोदया के इंतज़ार में तीन बज गए। इंतज़ार में कवियों ने सरकारी चाय की चुस्कियां लेते हुए लेटलतीफी, सिफारिश, सरकारी टीवी व सरकारी प्रबन्धों पर खूब लतीफेबाज़ी कर लघुहास्य सम्मेलन कर डाला। साढ़े तीन बजे स्टुडियो में प्रवेश मिला। कुछ लोग कैमरों व लाइटों को देख आत्ममुग्ध हो गए। होते भी क्यूं न पहली बार उनकी पत्नी, बच्चे व पड़ोसी उन्हें कविता के माध्यम से टीवी पर देखने जा रहे थे। बड़े चाव से कुर्सियों की अगली पंक्ति में कुछ उत्साही कम अनुभवी कवि विराज गए। पच्चीस पैंतीस मिनट तक लाइट व कैमरा एंगल सैट होते सुस्ती फैलने लगी। चाय की इंतजार में सब थे मगर कोई चाय को कोई नहीं पूछ रहा था।
 
अचानक टीवी प्रोड्यूसर ने प्रवेश किया हैल्पर से पूछा यह फ्रंट लाइन में कौन लोग हैं। कवि स्वयं बोले हम कवि लोग हैं। आप प्लीज़ सिट इन सैकिंड रो। दिस इज फार गैस्टस एंड आफिसर्ज़। एक तेज़नुमा युवा कवि को बुरा लगा, हमको कविता पढ़ने बुलाया गया है क्या हम पहली लाइन में नहीं बैठ सकते। एक समझदार कवि जो पहले किसी की सिफारिश से यहां आकर रवि हो चुके थे बोले प्लीज़ शांत रहिए। उन्होंने इशारे से ही समझा दिया कि मुस्कुराकर चुप रहिए, चाहे मन मसोसकर, वरना आपको कविता समेत एडिट कर देंगे। कवियों में सरकारी कर्मचारी भी थे सो बड़ी सौम्यपूर्ण सहजता से दूसरी पंक्ति में सिमट लिए। पहले वॉयस टैस्ट हुआ कुछ कवियों के शरीर पर मुस्कुराहटें फैलीं। सरकारी मेहमान व अफसरों ने सामने की कुर्सियों को इज्ज़त बख्शी पर खाली कुर्सियां कैमरे को मुंह चिढ़ा रही थीं तो हमेशा की तरह स्टाफ की महिलाओं को आगे और बाकियों को पीछे फिट किया।
 
कविता प्रतियोगिता ने जान पकड़ी तब तक साढ़े चार बज चुके थे। कैमरामैन ने अफसर पत्नी कवियत्री को स्टार परफारमर बनाया व अपने जानपहचान के चेहरों को खूब दिखाया। निर्णायकों ने पहला पुरस्कार जिन्हें मिलना था उन्हें देकर अपना सिक्का जमाया। उनका वहां आने का निर्णायकों समेत सब ने तन से शुक्रिया किया। प्रोगाम एग्ज़ीक्यूटिव ने उनका मोबाइल नंबर लिया शीघ्र अगले आयोजन में बुलाने के लिए। एक दो अन्य साधारण कवियों ने जब कार्यक्रम में बुलाने के लिए उनसे निवेदन किया तो उन्होंने कहा ज़रूर ज़रूर बुलाएंगे। कार्यक्रम के बाद स्टुडियो से निकल रहे थे तो प्रसारण विभाग से आए एक थोड़े बड़े कवि ने कैमरामैन से कहा कि आपने हमें कवर नहीं किया तो वह कहने लगे आप ने हाथ हिला दिया होता हम ऐसी गलती नहीं करते।
 
बाद में कई बार गर्म होकर परेशान हो चुकी चाय के साथ ठंडे समोसे व बिस्कुट कवियों को निगलने को झूठी मुस्कुराहटों के साथ दिए गए। अच्छे किस्म के मेहमानों ने हज़ूरदर्शन के अफसरों के साथ उनके बड़े कमरे में सोफे पर बैठ कर चायपान किया। कवियों ने पूछा कि यह कार्यक्रम कब टेलीकास्ट होगा तो बताया बाद में पता करना पड़ेगा। कई बार फोन करने पर पता लगा कि उस दिन किसी ज्यादा प्रभावशाली कार्यक्रम ने कवि प्रतियोगिता की जगह लूट ली। जिस दिन टेलीकास्ट हुआ अधूरा हुआ और जिस दिन रिपीट होना था उस दिन हमारे मोहल्ले में लाइट नहीं थी। दोबारा हम वहां जा नहीं सके क्यूंकि हमारी सिफारिश नहीं थी।
 
-संतोष उत्सुक

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