पानी की कमियां और गुस्ताखियां (व्यंग्य)

पानी ने यह भी नहीं सोचा कि यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जगह है। यहां की मिटटी ही कितनी महंगी है। करोड़ों रूपए की शानदार गाड़ियां आकर यहां पार्क होने वाली हैं। वह सीमेंट में भी प्रवेश कर गया। इंतजाम का मौका नहीं दिया और निर्माण की गुणवत्ता को सवालों की बारिश से पहले तैरा दिया।
कमियां तो सभी में होती हैं लेकिन कमियों के साथ गुस्ताखियां भी बढ़ती जाएं तो नाराज़गी जायज़ है। पानी अब ऐसा ही कर रहा है। गांव, गलियां और बाज़ारों में तो घुस ही जाता है इसने तो महासमझदारी से बनाए एक्सप्रेस वे नहीं छोड़े। बारिश का मौसम आया और जनाब सड़क पर आराम से तैरने लगते हैं। अब तो हद कर दी, उधर पहाड़ों में धुंध छाई हुई थी। पर्यटक दूर दूर से रोमांटिक मौसम का मज़ा लेने आए हुए थे। पिछले दिनों इस गुस्ताख़ ने ग्यारह हज़ार करोड़ रुपयों की भी परवाह नहीं और बिना किसी को सूचित किए प्रवेश कर गए सीना चौड़ा किए हुए। नियमानुसार कहीं भी खड़े गार्ड से अनुमति लेनी चाहिए थी। अगर वहां सुरक्षा कर्मी नहीं था तो सम्बंधित विभाग से अग्रिम स्वीकृति लिखित में लेनी चाहिए थी। कुछ लोग हर कहीं बिना पूछे घुस जाते हैं और चुपचाप उत्पात मचाने लगते हैं, अगर पूछो तो कुटिल मुस्कुराहट के साथ कहते हैं आपने हमें पहचाना नहीं। हमें कौन रोक सकता है या कह सकते हैं आज तक किसी ने हमें रोकने की कोशिश नहीं की जिसने की हमने उसे बख्शा नहीं। पानी ऐसा कर रहा है।
छोटे मोटे शहर और गांवों में पानी ने पिछले कई दशकों से परेशान कर रखा है। दर्जनों सड़कें उखाड़ दी, लोहे के पाइप तोड़ दिए, बड़े बड़े पत्थर लुढका दिए, मिटटी के तोंदे सड़कों पर ला दिए। इतना भी क्या गुस्सा। इंसान ने जहां रोका इसने वहीँ पंगा लिया, वहीँ रास्ता बना लिया। किसी आभूषण जैसी लगने वाली खुबसूरत ईमारत का उदघाटन होना होता है, उसमें हज़ारों रूपए के नलके लाखों रूपए में लगाए जाते है। आम आदमी उन्हें खोलकर पानी को आने देना चाहता है लेकिन इतनी गुस्ताख़ी कि उदघाटन से पहले वहां तालाब बना दिया।
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पानी ने यह भी नहीं सोचा कि यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जगह है। यहां की मिटटी ही कितनी महंगी है। करोड़ों रूपए की शानदार गाड़ियां आकर यहां पार्क होने वाली हैं। वह सीमेंट में भी प्रवेश कर गया। इंतजाम का मौका नहीं दिया और निर्माण की गुणवत्ता को सवालों की बारिश से पहले तैरा दिया। पानी तो सहयोगी माना जाता है इसलिए इंसान को बख्श देना चाहिए क्यूंकि अब वह नैसर्गिक बुद्धि से नहीं, नकली बुद्धि से काम चला रहा है । उसका प्रबंधन राजनीति की गिरफ्त में आ चुका है।
समझदारी में भ्रष्टाचार का कीचड़ घुस गया है लेकिन पानी तो कुदरत का हिस्सा है फिर भी उसने करुणा, सदभावना, सहयोग सब बहा दिया और प्रकृति की अदभुत रचना इंसान को परेशान करता रहता है। पानी को वहां जाना चाहिए जहां घर घर में नलके लगे हैं और उसका इंतज़ार कर रहे हैं। वह अनधिकृत निर्माण गिराने में भी सहयोग कर सकता है वह बात दीगर है कि वहां प्रशासन के प्रबंधन का सीमेंट ज़रूर लगा है।
पानी की विशेषताएं अब उसकी कमियां बन चुकी हैं। खाने पीने के जिस सामान में प्रवेश करता है अपने जैसा दूषित कर देता है। कहते हैं रंग, गंध और स्वाद हीन होता है लेकिन अब तो उसमें यह तीनों गुण हैं। पानी की कमियां और गुस्ताखियां बढ़ती जा रही हैं।
- संतोष उत्सुक
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