22 मई की वो दोपहर, बंग भवन का सन्नाटा... और सिर्फ 13 दिनों में बिखर गई पूरी पार्टी! TMC में दो फाड़ की इनसाइड स्टोरी

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अभिनय आकाश । Jun 4 2026 1:54PM

बंगाल के चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने एक दावा किया था कि पहले बंगाल में बीजेपी को हराऊंगी और फिर 2029 में दिल्ली पहुंचकर बीजेपी को भगाऊंगी। लेकिन आज उनके सामने रास्ते बहुत कठिन है। बंगाल में टीएमसी की टूट की कहानी कुछ ना कुछ मिलती है महाराष्ट्र से भी। टीएमसी बीजेपी पर पार्टी तोड़ने का आरोप लगा रही है। बीजेपी कह रही है कि टीएमसी ने सालों साल जो उत्पात मचा रखा था उसके बाद अब पार्टी में बगावत हो रही है।

दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी में, चाणक्यपुरी इलाके में स्थित 'बंग भवन' के भीतर एक अलग ही सियासी तपिश महसूस की जा रही थी। यह पश्चिम बंगाल सरकार का वही आलीशान ऑफिशियल स्टेट गेस्ट हाउस है, जो दिल्ली आने वाले सूबे के मंत्रियों, अफसरों और रसूखदार नेताओं का ठिकाना बनता है। अभी कुछ ही दिन पहले मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद, शुभेंदु अधिकारी अपने पहले आधिकारिक दिल्ली दौरे पर थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से होने वाली उनकी अहम मुलाकात में अभी कुछ वक्त बाकी था, इसलिए उनका काफिला सीधे बंग भवन आकर रुका। शुभेंदु जैसे ही भीतर दाखिल हुए, वहां का माहौल अचानक भारी हो गया। सामने खड़े थे तृणमूल कांग्रेस के  विधायक ऋतब्रत बनर्जी। सियासत के दो अलग-अलग किनारों पर खड़े इन दो दिग्गजों की नजरें जब एक-दूसरे से मिलीं, तो बंग भवन के उस कमरे में सन्नाटा पसर गया। वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों और स्टाफ को भी अंदाजा नहीं था कि बंद दरवाजे के पीछे चल रही इस मुलाकात की स्क्रिप्ट क्या रंग लाने वाली है। यह कोई साधारण शिष्टाचार भेंट नहीं थी। दिखने में यह महज दो नेताओं की औपचारिकता लग रही थी, लेकिन इस एक मुलाकात ने बंगाल से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में वो बारूद बिछा दिया था, जिसका धमाका ठीक 13 दिन बाद होने वाला था। यहीं कुछ ऐसी बात हुई जिसकी कहानी आज हिंदुस्तान के सामने है कि कैसे टीएमसी महीने भर में ही टूट गई वो टीएमसी और वो ममता बनर्जी 15 सालों तक जिनकी बंगाल में सरकार थी। बंगाल के चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने एक दावा किया था कि पहले बंगाल में बीजेपी को हराऊंगी और फिर 2029 में दिल्ली पहुंचकर बीजेपी को भगाऊंगी। लेकिन आज उनके सामने रास्ते बहुत कठिन है। बंगाल में टीएमसी की टूट की कहानी कुछ ना कुछ मिलती है महाराष्ट्र से भी। टीएमसी बीजेपी पर पार्टी तोड़ने का आरोप लगा रही है। बीजेपी कह रही है कि टीएमसी ने सालों साल जो उत्पात मचा रखा था उसके बाद अब पार्टी में बगावत हो रही है। 

बंगाल का इतिहास क्या कहता है?

बंगाल का इतिहास जो कहता है कि यहां जो पार्टी सत्ता से बाहर होती है फिर उसकी वापसी बड़ी मुश्किल होती है। इतिहास पलट कर देखिए। कांग्रेस गई तो फिर पहले जैसी कभी नहीं बन पाई। 34 सालों तक राज करने वाली सीपीएम जब बाहर हुई तो आज तक अपने पैरों पर दोबारा नहीं खड़ी हो पाई। इस बार टीएमसी जो बीजेपी की 208 सीटों के सामने सिर्फ 80 सीटें पाती है। जब ममता बनर्जी खुद अपनी सीट भवानीपुर से हार जाती हैं तो सवाल टीएमसी के भविष्य को लेकर उठ रहा है। ममता बनर्जी जो एक उम्र के दायरे में जा चुकी हैं। क्या वह टीएमसी को बचा पाएंगी? क्या अभिषेक बनर्जी की लीडरशिप में वो करिश्माई नेतृत्व है जो टीएमसी को रोक सकता है? अभी हाल ही में एक वाक्या सामने आया था जब अभिषेक बनर्जी को अंडे पड़ रहे थे। पत्थर मारे जा रहे थे। टीएमसी इसे बीजेपी के साजिश कह रही थी। लेकिन बीजेपी और टीएमसी के विरोधी कह रहे थे कि अभिषेक बनर्जी के कुकर्मों का नतीजा है। जो सालों साल उन्होंने बंगाल में उत्पात मचा रखा था।  वो टीएमसी जो 15 सालों बाद सरकार से बाहर होती है। अब जिसके सांसद इस्तीफा दे रहे हैं। विधायक बैठकों से गायब है। बगावत की चर्चाएं तेज हैं। ममता बनर्जी को सड़क पर उतर कर पार्टी की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। 

महाराष्ट्र से क्यों जोड़ा जा रहा

महाराष्ट्र में शिवसेना हारती है, शिवसेना टूट जाती है। शरद पवार की एनसीपी टूट जाती है। यानी बीजेपी जहां जीतती है वहां पर विरोधी पार्टियों में बगावत का इतिहास रहा है। टीएमसी ने भी कभी 34 साल पुरानी सीपीएम सरकार को जो सत्ता से उखाड़ा था तो उसको खत्म कर दिया था। अब यही चिंता टीएमसी को सता रही है। चुनाव हारने के बाद टीएमसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती आज बीजेपी नहीं है बल्कि अपनी ही पार्टी को संभाल कर रखने की दिखाई पड़ रही है। पिछले कुछ दिनों में जो घटनाएं हुई उसने यह साफ कर दिया कि चुनावी हार का असर सिर्फ विधानसभा की सीटों तक सीमित नहीं है बल्कि पार्टी के भीतर महसूस किया जा रहा है। सबसे बड़ा झटका टीएमसी को तब लगा जब 1998 में टीएमसी बनने के समय से ममता बनर्जी के साथ रही सांसद काकोली घोष ने पार्टी के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया। अब काकोली का इस्तीफा इसलिए इंपॉर्टेंट माना जा रहा है क्योंकि वह टीएमसी के शुरुआती दौर से ममता बनर्जी के बड़े पुराने और भरोसेमंद चेहरों में रही। इस्तीफों के साथ उन्होंने चुनावी रणनीतिकार संस्था आईपैक की भूमिका पर सवाल उठाए। जिसने पार्टी के भीतर चल रही बहस को नई हवा दी। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वह पार्टी नहीं छोड़ रही है लेकिन इस्तीफा दिया है। उनके अलावा पूर्व राज्यसभा सांसद शांतनुन हुसैन, प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती, पूर्व विधायक राज चक्रवर्ती ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने जिम्मेदारियों से दूरियां बनाई है। इसी दौरान पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के चयन को लेकर फर्जी हस्ताक्षरों का विवाद भी सामने आया। दो विधायक ऐसे थे जिन्होंने आरोप लगाया कि बिना उनकी इजाजत के उनके हस्ताक्षर दिखा दिए गए। यह मामला इतना बढ़ गया कि ऋत बनर्जी और संदीपन साह को पार्टी से बाहर कर दिया गया और पूरे विवाद की जांच सीआईडी तक पहुंच गई। वहीं दूसरी तरफ ममता बनर्जी ने जो पार्टी की बैठक बुलाई थी उसमें 60 में से कहा जा रहा है करीब 20 विधायक ही पहुंचे और यहां पर भी बहुत सारे सवाल खड़े हो गए। 

ढलती शाम की तरह डूबके वाम कमबैक कर बीजेपी को देंगे चुनौती?

भाजपा के कुछ वर्गों को पश्चिम बंगाल में सीपीआई (एम) के नेतृत्व में कम्युनिस्ट दलों के पुनरुत्थान की चिंता है, लेकिन क्या वामपंथियों में वास्तव में ऐसा करने की क्षमता है? 2011 में टीएमसी द्वारा सत्ता से बेदखल किए जाने और 2019 के बाद भाजपा की ओर भारी संख्या में मतदाताओं के पलायन के बाद, वाम मोर्चा पश्चिम बंगाल में जमीनी स्तर पर अपने पुनरुत्थान के पहले बड़े संकेत दिखा रहा है। सीपीआई (एम) ने डोमकल विधानसभा सीट जीती और फाल्टा पुनर्चुनाव में 40,000 से अधिक वोट प्राप्त किए। यह सक्रिय रूप से अपने कार्यकर्ताओं को मजबूत कर रहा है और कार्यालयों को फिर से खोल रहा है। वाम दल जमीनी स्तर पर काफी सक्रिय हो गया है और सीआईटीयू जैसे संगठनों के माध्यम से रेलवे स्टेशन पर फेरीवालों को हटाने के विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहा है, जबकि टीएमसी लगभग निष्क्रिय रही है। जमीनी स्तर पर इस गति को बनाए रखना वामपंथ के लिए वास्तविक राजनीतिक प्रासंगिकता हासिल करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, खासकर तब जब टीएमसी आंतरिक दरारों से जूझ रही है जिससे जन आंदोलनों के लिए लोगों को लामबंद करने की उसकी क्षमता कमजोर हो गई है। हालांकि, इन स्थानीय लाभों को भाजपा के खिलाफ एक विश्वसनीय चुनौती में बदलने के लिए एक व्यापक रणनीतिक बदलाव की आवश्यकता होगी। प्रमुख विपक्षी दल बनने के लिए, वाम को टीएमसी के मतदाता आधार के एक महत्वपूर्ण हिस्से को सफलतापूर्वक अपने पक्ष में करना होगा, जैसा कि भाजपा ने हाल के चुनावों में किया था। भट्टाचार्य ने कहा कि हालांकि वाम-कांग्रेस गठबंधन दक्षिणी पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक और हिंदू मतदाताओं को विश्वसनीय रूप से अपनी ओर खींच सकता है, वाम मोर्चे को संभावित दलबदलुओं को नाराज करना बंद करना होगा। वाम ने अब तक अपनी अधिकांश ऊर्जा टीएमसी पर हमला करने में लगाई है। अब उसे अपनी ऊर्जा भाजपा पर केंद्रित करनी होगी। वाम को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि टीएमसी समर्थक उन पर हमला करते रहने से दल बदल लेंगे। अंततः, वामपंथ का पुनरुत्थान भगवा खेमे के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में खुद को स्थापित करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करता है। एक व्यापक गठबंधन बनाने के लिए, पार्टी को सभी दलों के आर्थिक और शारीरिक कठिनाइयों का सामना कर रहे लोगों की सक्रिय रूप से रक्षा करनी होगी। वामपंथ का पुनरुत्थान कोई निश्चित बात नहीं है। सीपीआई (एम) और उसके सहयोगियों को टीएमसी के मतदाता आधार के कुछ वर्गों को अपने पक्ष में करना होगा, भाजपा पर सीधा हमला करना होगा और अपने कभी व्यापक रहे राज्यव्यापी संगठन को फिर से मजबूत करना होगा। फिर भी, टीएमसी के पतन के कगार पर होने के कारण, भाजपा के कुछ लोग सीपीआई (एम) के प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरने और 4 मई के बाद पैदा हुए राजनीतिक शून्य को भरने को लेकर चिंतित हैं।

टीएमसी का चैप्टर क्लोज हो गया?

किसी भी पार्टी की वापसी चुनाव के दिन नहीं चुनाव हारने के बाद शुरू होती है। टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि ममता बनर्जी आज भी पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी नेताओं में से एक है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती भी वही है जो हमने कहा 76 साल की वो हो चुकी है। अभिषेक बनर्जी को आगे बढ़ाया जा रहा है। लेकिन क्या अभिषेक बनर्जी की स्वीकारिता वही है जो ममता बनर्जी की है? क्या अभिषेक बनर्जी का संघर्ष वही है? अभिषेक बनर्जी वो प्रिंस की तरह बड़े हुए हैं। और प्रिंस की तरह बड़े होने में डिसएडवांटेजेस भी होते हैं। इसीलिए सवाल है क्या अभिषेक टीएमसी को उस तरह साथ जोड़ पाएंगे जैसा ममता ने जोड़ा था। दूसरी तरफ बीजेपी के लिए रास्ता उतना आसान नहीं जितना दिख रहा है। सरकार बनाना एक बात लेकिन बंगाल जैसे राज्य को लंबे समय तक पकड़े रखना यह दूसरी बात है।  1998 में पार्टी बनने के बाद शायद पहली बार टीएमसी खुद को इतने बड़े राजनीतिक संकट के बीच खड़ी पाती है। एक तरफ चुनावी हार है। दूसरी तरफ नेताओं की नाराजगी, संगठन के भीतर उठ रहे सवाल, बगावत की चर्चा, भविष्य के नेतृत्व को लेकर बढ़ती अनिश्चितता। यही वजह है कि आज चर्चा सिर्फ ममता बनर्जी की नहीं बल्कि पूरी टीएमसी की हो रही है। इस पूरी कहानी में तीन सवाल बड़े हैं। पहला क्या टीएमसी चुनावी हार के बाद भी नेताओं, विधायकों, कार्यकर्ताओं को साथ रख पाएगी? 4 साल पुरानी सीपीएम सरकार को सत्ता से बाहर किया। कई बार अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर लगाए गए अनुमानों को गलत साबित किया। जेपी और मोरारजी देसाई के समय से लड़ती झगड़ती और जीतती हुई आ रही है। 

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