ब्राजील-अमेरिका-थाइलैंड ने जिस Ethanol से किया कमाल, भारत में उस पर क्यों मचा बवाल? जटिल सवालों का सरल जवाब 10 लाइन में समझें

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अभिनय आकाश । Jul 14 2026 3:43PM

बहुत सारे यूजर्स नितिन गडकरी को भला-बुरा कह रहे हैं और कह रहे हैं कि एथनॉल डालकहमारी 12 लाख, 13 लाख, 14 लाख की गाड़ी को बर्बाद कर दिया। लोग वीडियो बना रहे हैं। कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या एथनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियां खराब हो रही हैं। क्या एथनॉल की वजह से गाड़ियों के इंजन फेल हो रहे हैं। क्या एथनॉल से गाड़ियों में जंग लग रही है। पार्ट-पुर्जे बेकार हो रहे हैं। क्या एथनॉल की वजह से गाड़ियों का माइलेज कम हो रहा है। आज तमाम सवालों का एमआरआई स्कैन करेंगे।

90 के दशक का दौर, पैदाइश बिहार की, जहां नए-नए जुगाड़ और देसी तिकड़म से हर नामुमकिन काम को मुमकिन बना दिया जाता था। यह वह दौर था जब अभाव ही आविष्कार की असली जननी हुआ करती थी। उस ज़माने में जब पेट्रोल के दाम बढ़ने लगते या उसकी किल्लत होती, तो लोग गैरेज में अपनी पुरानी याज़्दी, राजदूत या बुलेट खड़ी नहीं करते थे, बल्कि उसमें किरोसीन (मिट्टी का तेल) डालकर सड़कों पर धुआं उड़ाते निकल पड़ते थे। हालांकि इंजन खटखटाने लगता था और गाड़ी से सफेद धुएं का गुबार निकलता था, लेकिन गाड़ी चल पड़ती थी। इसी तिकड़मी माहौल में अक्सर यह कौतूहल और चर्चा भी गर्म रहती थी कि अगर महुआ की दारू से इंसान झूम सकता है, तो भला उससे मोटरसाइकिल कैसे चल सकती है? लोग हंसी-मजाक या गंभीर चौपालों में यह कयास लगाते थे कि जिस तरह स्पिरिट या किरोसीन से गाड़ियां रेंग सकती हैं, क्या पता आने वाले वक्त में यह महुआ की शराब भी गाड़ियों का ईंधन बन जाए! अपने देश में 2026 में कुछ वैसा ही हो रहा है। एक तरफ सोशल मीडिया पर वीडियो की बाढ़ है और हर कोई एक बोतल लिए हुए है और कह रहा है कि यह देखिए यह ऊपर रहा पेट्रोल और यह नीचे रहा इथेनॉल। नितिन गडकरी ने तो इथेनॉल इस्तेमाल करके सारी गाड़ियों का बांटाधार कर दिया। बहुत सारे यूजर्स नितिन गडकरी को भला-बुरा कह रहे हैं और कह रहे हैं कि एथनॉल डालकहमारी 12 लाख, 13 लाख, 14 लाख की गाड़ी को बर्बाद कर दिया। लोग वीडियो बना रहे हैं। कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या एथनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियां खराब हो रही हैं। क्या एथनॉल की वजह से गाड़ियों के इंजन फेल हो रहे हैं। क्या एथनॉल से गाड़ियों में जंग लग रही है। पार्ट-पुर्जे बेकार हो रहे हैं। क्या एथनॉल की वजह से गाड़ियों का माइलेज कम हो रहा है। आज तमाम सवालों का एमआरआई स्कैन करेंगे। 

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1. सोशल मीडिया पर ई-20 पेट्रोल को लेकर क्या दावे किए जा रहे हैं?

कुछ लोगों ने तो यहां तक दावा किया कि पेट्रोल में चींटी लग रही है। उन लोगों ने सोचा होगा कि गन्ने से इथेनॉल बनता है तो चींटी यहां भी लग सकती है। इन्हें कौन समझाए कि एथनॉल को पहले डिस्टलरी प्लांट में लिया जाता है। वहां फर्मेंट होता है, मिक्स होता है। उसमें चींटी नहीं लग सकती। ठीक उसी तरह जैसे दारू भले ही अंगूर के रस से बनती हो या जौ से बनती हो पर दारू में कभी चींटी लगते सुना है? तो जिस तरह दारू में चींटी नहीं लगती उसी तरह पेट्रोल में मिलाए गए एथनॉल में भी चींटी नहीं लगती। यह भ्रामक है। इसके अलावा बहुत सारे लोग वो पानी वाला बोतल ले घूम रहे हैं। ये कह रहे हैं कि ऊपर पेट्रोल है नीचे इथेनॉल है। तो जो बेसिक भी साइंस का स्टूडेंट है वो जानता है कि एथनॉल घुलनशील है। वो अलग-अलग नहीं हो सकता। जैसे दूध में हम कितना भी पानी मिला दें तो पानी अलग और दूध अलग बोतल में आप नहीं दिखा सकते उसी तरह इथेनॉल अलग और पेट्रोल अलग नहीं दिखा सकते तो यह खबर भी भ्रामक है। 

2. ब्राजील ने 50 साल पहले क्यों और कैसे बदला पूरा फ्यूल सिस्टम

 आज से करीब 50 साल पहले तक ब्राजील भी बाकी देशों की तरह ही पेट्रोल पर ही चलता था। लेकिन उसके पास अपनी जरूरत के हिसाब से पर्याप्त तेल मौजूद नहीं था। यही वजह थी कि वह भी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से ही आयात करता था। लेकिन फिर आया साल 1973 जब दुनिया में तेल की किल्लत शुरू हुई। मिडिल ईस्ट में युद्ध छिड़ गया और ऑयल एक्सपोर्ट करने वाले देशों ने सप्लाई घटा दी और देखते ही देखते क्रूड ऑयल की कीमतों में कई गुना तक बढ़ोतरी हो गई। इसका सीधा असर ब्राजील की अर्थव्यवस्था पर पड़ने लगा। सरकार का इंपोर्ट बिल तेजी से बढ़ने लगा। इसी बीच ब्राजील को समझ आ गया कि अगर वह विदेशों के तेल पर ही निर्भर रहेगा तो भविष्य का हर संकट उसकी अर्थव्यवस्था को हिला सकता है। वहीं से ब्राजील की सबसे बड़ी एनर्जी रिवॉल्यूशन की शुरुआत हुई। साल 1975 में ब्राजील सरकार ने एक पूरा प्रोग्राम ल्च किया जिसका मकसद था पेट्रोल का विकल्प तैयार करना और इसके लिए सरकार ने इथेनॉल को चुना। दरअसल साल 1975 में भी इथेनॉल कोई नया फ्यूल नहीं था। इसका इस्तेमाल पहली बार 19वीं सदी में किया गया था। जब इंटरनल कंबस्शन इंजंस पर इसका प्रयोग किया गया। तब इथेनॉल को पहली बार फ्यूल के तौर पर देखा गया और तब से ही इसकी गाड़ियों का इस्तेमाल करने का भी प्रयास शुरू हो गया था। यहां तक कि हेनरी फोर्ड की पहली मॉडल टी कार भी पेट्रोल के साथ-साथ इथेनॉल पर भी चल सकती थी। लेकिन उस समय दुनिया में सस्ता क्रूड ऑयल आसानी से मिल जाता था। जिसकी वजह से ज्यादातर देशों ने पेट्रोल को अपना मुख्य फ्यूल बना लिया। लेकिन 1973 के दौरान जब ऑयल क्राइसिस के बाद ब्राजील ने इस पुराने विकल्प को एक बार फिर दोबारा से देखा क्योंकि इथेनॉल शुगरकेन यानी कि गन्ने से बनता है और तब ब्राजील के पास भरपूर मात्रा में गन्ना भी मौजूद था। सरकार ने सोचा तो फिर विदेशों से ऑयल मंगवाने की बजाय क्यों ना अपने ही खेतों से फ्यूल तैयार किया जाए और यहीं से पूरी कहानी बदल गई। सरकार ने किसानों को गन्ने उगाने के लिए सब्सिडी देना भी शुरू कर दिया। नई ईथेनॉल फैक्ट्रीज भी लगाई गई और कार कंपनियों को ऐसे इंजन बनाने के लिए खासकर की बढ़ावा दिया गया जो इथेनॉल पर चल सके। इतना ही नहीं सरकार ने इथेनॉल को देश भर में पहुंचाने के लिए स्टोरेज और सप्लाई नेटवर्क पर भी काफी काम किया और फ्यूल स्टेशन पर भी इसकी उपलब्धता बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी गई। यानी कि ब्राजील सिर्फ नया फ्यूल बनाने पर ही नहीं जुटा था बल्कि उसे तैयार करने, देश भर में पहुंचाने और गाड़ियों तक उपलब्ध कराने का भी पूरा इकोसिस्टम वह खड़ा कर रहा था।  साल 2003 और यहीं से ब्राजील के इथनॉल प्रोग्राम को उसकी सबसे बड़ी ताकत मिल गई। क्योंकि इसी साल ब्राजील में पहली बार फ्लेक्स फ्यूल कार लॉन्च हुई। दरअसल इससे पहले लोग ऐसी गाड़ियां खरीद रहे थे जो सिर्फ इथेनॉल पर ही चलती थी। ऐसे में जब इथेनॉल की कमी हुई तो उनके पास कोई दूसरा विकल्प बचा ही नहीं और उनकी गाड़ी खड़ी हो गई। 

3. सरकार का क्या कहना है

10 जुलाई को नरेंद्र मोदी सरकार ने एफएक्यू में यही दलीलें दी है। साफ कहा ई20 पेट्रोल ही अब स्टैंडर्ड है क्योंकि यह ज्यादा साफ है। कम प्रदूषण फैलाता है। इसकी ऑक्टेन रेटिंग ज्यादा है। एंटीनॉक प्रॉपर्टी बेहतर है। बेहतर पिकअप और एक्सीलरेशन देता है। इंजन बढ़िया तरीके से चलता है। 

4.  अमेरिका में ई15

अमेरिका में सबसे आम ईंधन E10 है। इसी के साथ कई राज्यों में इसके अनुकूल गाड़ियों के लिए E15 भी मौजूद है। फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियां E85 का भी इस्तेमाल कर सकती हैं। जर्मनी, फ्रांस और फिनलैंड जैसे कई यूरोपीय देश बड़े पैमाने पर E10 पेट्रोल का इस्तेमाल करते हैं। इसी के साथ पुरानी गाड़ियों के लिए E5 भी उपलब्ध है। चीन ने वायु प्रदूषण से निपटने, ईंधन सुरक्षा को बेहतर करने और साफ-सुथरे ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए कई प्रांतों और बड़े शहरों में E10 पेट्रोल को शुरू किया है।

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5. दुनिया के इन देशों में भी बिकता है एथेनॉल वाला पेट्रोल

 देश ब्लीडिंग %कब से शुरुआत हुई  मुख्य स्रोत
ब्राजील E27.5 से E30  1931 में 5% अनिवार्य किया। आधुनिक अभियान 1975 (Pro-Álcool कार्यक्रम) से शुरू हुआ। गन्ना
अमेरिका E10 (मानक) और E15 1970 के दशक के अंत से (गैसोहोल के रूप में) और 2005 के ऊर्जा नीति अधिनियम के बाद अनिवार्य हुआ। मक्का
भारतE20 2001-2003 में पायलट प्रोजेक्ट। 2014 में 1.5% था, जो अप्रैल 2025 तक पूरी तरह 20% तक पहुँच गया। गन्ना, मक्का और अनाज
पराग्वेE30 2000 के दशक के मध्य से धीरे-धीरे प्रतिशत बढ़ाते हुए अब 30% पर है। गन्ना और अनाज
कनाडा E10 2010 से संघीय स्तर पर 5% अनिवार्य था, जो अब स्वच्छ ईंधन नियमों के तहत बढ़ रहा है। मक्का, गेंहू
यूरोपीय संघ E5 से E10 (फ्रांस, जर्मनी में अधिक) 2009 के 'रिन्यूएबल एनर्जी डायरेक्टिव' के बाद से यूरोपीय देशों में तेजी आई। चुकंदर, अनाज
 चीन E10 2002 में पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ, 2017 से राष्ट्रव्यापी विस्तार की नीति बनी। मक्का और पुराना अनाज
 थाइलैंड E20 मुख्य ईंधन 2005-2008 के दौरान व्यावसायिक रूप से बड़े पैमाने पर रोलआउट किया गया।गन्ना और कसावा

6. मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान भी एथनॉल वाला पेट्रोल

देश में E5 2003 से पहली बार लागू की गई। E5 मतलब होता है कि पेट्रोल में 5% एथनॉल मिलाना। तो 2005 से पेट्रोल में एथनॉल मिलाया जा रहा है। 2004 में आई मनमोहन सिंह की सरकार ने भी इसे जारी रखा और E10 कर दिया। फिर अब गडकरी  आए तो E20 कर दिया नहीं।

7. एथनॉल ब्लेंडिंग की इतनी जल्दी क्यों है?

सरकार इसके लिए इतनी जल्दी में इसलिए है क्योंकि भारत इस समय एक ट्रांजिशन फेज से गुजर रहा है। भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव (जैसे हाल के वर्षों में मध्य पूर्व के संकट) भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव डालते हैं। एथनॉल तुरंत राहत देने वाला एकमात्र विकल्प है। इसके लिए देश को 10-15 साल इंतजार नहीं करना है। मौजूदा गाड़ियों में ही 20% तक एथनॉल बिना किसी बड़े इंजन बदलाव के इस्तेमाल किया जा सकता है।

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8. ईवी (EV) बनाम भारत का कोल-बेस्ड पावर ग्रिड

इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी को पूरी तरह क्लीन कहना अभी भारत के संदर्भ में एक भ्रम है, जैसा कि आपने बिल्कुल सही पकड़ा। भारत में आज भी लगभग 60-65% बिजली का उत्पादन कोयले को जलाकर होता है। अगर कोई व्यक्ति ईवी चला रहा है, तो उसकी गाड़ी की टेलपाइप से धुआं नहीं निकल रहा, लेकिन उस गाड़ी को चार्ज करने के लिए जो बिजली आ रही है, वह थर्मल पावर प्लांट में कोयला जलाकर ही बन रही है। यानी प्रदूषण सिर्फ शहर से हटकर पावर प्लांट वाले इलाके में शिफ्ट हो रहा है। इसलिए जब तक हमारा पावर ग्रिड पूरी तरह सोलर या विंड एनर्जी पर शिफ्ट नहीं होता, तब तक ईवी पूरी तरह ग्रीन नहीं है।

9. EV का कुल कार्बन फुटप्रिंट

इलेक्ट्रिक वाहन (EV) का कुल कार्बन फुटप्रिंट समझने के लिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि गाड़ी चलाते समय धुआं निकलता है या नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवन चक्र को देखना होता है। ईवी का सबसे बड़ा शुरुआती कार्बन उत्सर्जन उसकी बैटरी बनाने की प्रक्रिया से आता है, क्योंकि लिथियम, निकेल, कोबाल्ट जैसी धातुओं के खनन, प्रोसेसिंग और बैटरी निर्माण में काफी ऊर्जा खर्च होती है। इसके अलावा वाहन निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उत्पादन से भी उत्सर्जन जुड़ा होता है। हालांकि, पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में EV को चलाने के दौरान टेलपाइप से कोई CO₂ या जहरीली गैस नहीं निकलती, जिससे लंबे समय में इसका कुल उत्सर्जन कम हो सकता है। भारत जैसे देश में ईवी का कार्बन फुटप्रिंट काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि उसे चार्ज करने वाली बिजली किस स्रोत से आ रही है। क्योंकि भारत की बिजली व्यवस्था अभी भी काफी हद तक कोयले पर आधारित है, इसलिए ईवी पूरी तरह शून्य-उत्सर्जन वाहन नहीं कहा जा सकता। यहां प्रदूषण सड़क से हटकर बिजली उत्पादन केंद्रों तक पहुंच जाता है। लेकिन जैसे-जैसे भारत सोलर, विंड और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी बढ़ाएगा, ईवी का कार्बन फुटप्रिंट भी लगातार कम होता जाएगा। साथ ही बैटरी रीसाइक्लिंग और स्वच्छ बैटरी निर्माण तकनीक विकसित होने से ईवी भविष्य में और ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल बन सकते हैं। इसलिए ईवी को पूरी तरह ग्रीन नहीं बल्कि पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में कम उत्सर्जन वाला विकल्प कहना ज्यादा सही होगा।

10. पूरी तरह एथनॉल पर शिफ्ट क्यों नहीं हो सकते?

एथनॉल एक सप्लीमेंट है, रिप्लेसमेंट नहीं। हम 100% एथनॉल पर इसलिए शिफ्ट नहीं हो सकते क्योंकि अगर देश की सारी गाड़ियों को 100% एथनॉल से चलाना हो, तो हमें इतनी खेती करनी पड़ेगी कि खाने की फसलों (गेहूं, धान) के लिए जमीन ही नहीं बचेगी। यह 'फूड बनाम फ्यूल'का एक खतरनाक संकट खड़ा कर देगा। सामान्य पेट्रोल इंजन 100% एथनॉल नहीं झेल सकते। उसके लिए फ्लेक्स-फ्यूल इंजन की जरूरत होगी, जिसमें समय लगेगा।

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