कहानी हैदराबाद के निजाम, इस्लामिक देश की चाहत वाले रजाकारों और ऑपरेशन पोलो की

  •  अभिनय आकाश
  •  दिसंबर 1, 2020   16:24
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कहानी हैदराबाद के निजाम, इस्लामिक देश की चाहत वाले रजाकारों और ऑपरेशन पोलो की

हैदराबाद ग्रेट ब्रिटेन जितनी बड़ी एक रियासत थी। इसमें आज के आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई जिले शामिल थे। इस रियासत पर हुकूमत करने वाले निजाम दुनिया के सबसे अमीर शख्स में से थे और निजाम हैदराबाद को आजाद मुल्क बनाना चाहते थे।

हैदराबाद का स्थानीय निकाय चुनाव है। अमूमन किसी भी निकाय चुनाव पर उसी राज्य के लोग नज़र रखते हैं। लेकिन हैदराबाद में हो रहे निकाय चुनाव पर पूरे भारत की नज़रें जा टिकी हैं। चुनाव दिलचस्प भी होता जा रहा है औऱ इसकी वजह है केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी और उसके सभी बड़े नेता अपने उम्मीदवारों के प्रचार के लिए चुनावी मैदान में कूद पड़े। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को छोड़ दिया जाए तो पार्टी के शीर्ष के नेता अमित शाह, जेपी नडडा, स्मृति ईरानी, योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडणवीस समेत सभी दिग्गज लोग हैदराबाद की यात्रा कर चुके। आमतौर पर कम ही देखा जाता है कि निकाय चुनाव में शीर्ष स्तर के नेता रैली करने पहुंचे हों। निकाय चुनावों में तो प्रदेश का अध्यक्ष ही रैली करने पहुंच जाए तो बड़ी बात होती है लेकिन भाजपा ने निकाय चुनाव में अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष तक को उतार दिया है। यह गौर करने की बात है कि भाजपा के निशाने पर तेलंगाना राष्ट्र समिति के बजाय ओवैसी की एआइएमआइएम है। केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी ने ‘एआईएमआईएम को रजाकारों का समर्थन करने वाली पार्टी बताया।

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जिसके जवाब में सफाई देते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि ‘उनकी पार्टी रजाकारों की नहीं ‘रजाकार देश छोड़कर पाकिस्तान चले गए हैं और केवल वे लोग जो भारत के प्रति वफादार हैं, वापस रह गए।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘मजलिस पार्टी कासिम रिज़वी की नहीं, बल्कि उन राष्ट्रवादियों की है जो राष्ट्र के प्रति वफादार हैं।’दरअसल, आजादी के बाद हिंदू प्रजा की बहुलता वाली हैदराबाद रियासत के नवाब ने पाकिस्तान में मिलने की कोशिश की थी। उनके रजाकारों ने हिंदू जनता पर अत्याचार भी किया था। ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम पर भले राज्य में सत्तारूढ़ टीआरएस का कब्जा है, पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलिमीन यानी एआइएमआइएम का सिक्का यहां खूब चलता है। ऐसे में आज के इस विश्लेषण में बात करेंगे हैदराबाद के निजाम की और उसकी निजी सेना की और एमआईएम के वसीम रिजवी की जिसको लेकर अक्सर ओवैसी बंधुओं पर निशाना साधा जाता है।

एक ऐसा नवाब जिसने ठीक आजादी के दिन ही कुछ ऐसा कर दिया जिसकी कल्पना हम आज भी नहीं कर सकते हैं। 15 अगस्त 1947, जगह- गुजरात में जूनागढ़। जूनागढ़ के नवाब ने जो किया उसकी सूचना दो दिन बाद अखबारों में छपी। जिसके बाद चारों तरफ हंगामा मच गया। खबर थी कि जूनागढ़ के नवाब ने अपनी रियासत को पाकिस्तान के साथ मिलाने का फैसला किया है। 

''जूनागढ़ की सरकार ने सभी पहलुओं पर ध्यान से विचार के बाद पकिस्तान में मिलने का फैसला किया है। साथ ही पाकिस्तान से मिलने का ऐलान भी कर रही है।''

भारत सरकार को अखबरा से पता चला कि गुजरात का जूनागढ़ पाकिस्तान का हिस्सा बन गया है और अब जूनागढ़ की 3137 स्कावयर मील जमीन पर पाकिस्तान का कब्जा होगा। इसी के साथ ही जूनागढ़ रियासत की 6 लाख 70 हजार की आबादी पाकिस्तान के हाथों का मोहरा बन गई थी। इस सारी कहानी के लेखक और किरदार थे जूनागढ़ के नवाब मोहम्मद महाबत खान जी नागढ़ के नवाब ने कई चालें चलीं। हर चाल उलटी पड़ी।  बाद में वो जिन्ना से एक समझौता करके पाकिस्तान भाग गया। जूनागढ़ का तो मामला सुलझ गया लेकिन हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली बहादुर ने ये ऐलान कर दिया कि वो किसी भी हालात में हैदराबाद को हिन्दुस्तान के साथ जोड़ने में राजी नहीं होंगे और उनके साथ थे कासिम रिजवी। दिल्ली के औरंगजेब रोड पर नवंबर 1947 की सर्द दोपहरी में सरदार पटले से रिजवी ने कहा कि हैदराबाद में हजारों सालों से आसफजयी झंडा बुलंद है और दुनिया की कोई ताकत उसे नीचे नहीं उतार सकती। सरदार पटले को चुनौती देने वाले इस शख्स के सिर पर निजाम मीर उस्मानी का हाथ था। हैदराबाद ग्रेट ब्रिटेन जितनी बड़ी एक रियासत थी। इसमें आज के आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई जिले शामिल थे। इस रियासत पर हुकूमत करने वाले निजाम दुनिया के सबसे अमीर शख्स में से थे और निजाम हैदराबाद को आजाद मुल्क बनाना चाहते थे। उसका ऐलान 12 जून 1947 को ही कर दिया था। इस रियासत को मिलाए बगैर संयुक्त भारत महज एक कल्पना होती, एक सपना होता। 15 अगस्त 1947 को हैदराबाद उन रियासतों में से एक था जिनका भारत में शामिल होना तो दूर वो इस बारे में बातचीत को भी तैयार नहीं थे। निजाम के खास रिजवी दिल्ली में सरदार पटले को तल्ख तेवर दिखा रहे थे और सरदार साहब शौम्यता के साथ उनकी बात सुन रहे थे। अब बारी थी सरदार साहब के बोलने की और उन्होंने अपने अंदाज में ये बता दिया कि हैदराबाद हमेशा हिन्दुस्तान का रियासत रहा है और अब अंग्रेज हिन्दुस्तान छोड़कर चले गए वैसे ही हैदराबाद को अपना निजाम आवाम के हाथ में देना होगा इसी में आपकी और आपके निजाम की भलाई है। कासिम रिजवी की सरदार पटेल से यह पहली और आखरी मुलाकात थी। 

क्या था ऑपरेशन पोलो

13 सितंबर 1948। ये वो तारीख है जब भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो को अंजाम दिया। इस आपरेशन का खेल से कोई लेना देना नहीं था बल्कि ये भारतीय सेना की हैदराबाद में विलय के लिए सैन्य कार्रवाई थी। ऑपरेशन पोलो उस सैनिक अभियान को कहा जाता है जिसके बाद हैदराबाद और बराड़ की रियासत भारतीय संघ में शामिल हुई। इसकी ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि हैदराबाद के निज़ाम उस्मान अली ख़ान आसिफ़ जाह सातवें ने देश के बंटवारे के बाद स्वतंत्र रहने का फ़ैसला किया। सरदार पटेल ने गुप्त तरीके से योजना को अंजाम देते हुए भारतीय सेना को हैदराबाद भेज दिया। जब नेहरू और राजगोपालाचारी को भारतीय सेना के हैदराबाद में प्रवेश कर जाने की सूचना दी गई तो वो चिंतित हो गए। पटेल ने घोषणा की कि भारतीय सेना हैदराबाद में घुस चुकी है। इसे रोकने के लिए अब कुछ नहीं किया जा सकता। दरअसल नेहरू की चिंता ये थी कि कहीं पाकिस्तान कोई जवाबी कार्रवाई न कर बैठे। भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज्यादा 17 पोलो के मैदान थे। भारतीय सेना की कार्रवाई हैदराबाद में पांच दिनों तक चली, इसमें 1373 रज़ाकार मारे गए। हैदराबाद स्टेट के 807 जवान भी मारे गए। भारतीय सेना ने 66 जवान खोए जबकि 96 जवान घायल हुए। सरदार पटेल ने दुनिया को बताया कि ये ‘पुलिस एक्शन’ था। 

रजाकार, कासिम रिजवी और एमआईएम

हैदराबाद में पहले से ही धार्मिक तनाव था। इसी के साथ तेलंगाना को लेकर विरोध था। उसी वक़्त मुसलमानों का एक ग्रुप बना था मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमी जिसके मुखिया थे नवाब बहादुर यार जंग। इनके मरने के बाद मुखिया बने कासिम रिजवी। कासिम रजाकारों के नेता थे। इन लोगों का उद्देश्य था इस्लामिक राज्य बनाना। कासिम रजाकार नाम के हथियारबंद हिंसक संगठन के सरगना भी थे। एमआईएम को खड़ा करने में इन रजाकारों की अहम भूमिका थी। जो भी इनके खिलाफ था, इनका दुश्मन था। कम्युनिस्ट और मुसलमान जो इनसे अलग थे, वो भी इनके निशाने पर थे, लेकिन मुख्यत: हिन्दू। नतीजन हजारों लोगों को मारा जाने लगा, औरतों का रेप हुआ। इनको लगा कि ऐसा करने से इनका महान राज्य बन जायेगा। जिसके बाद भारत सरकार ने रजाकारों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया। उस पर 1948 में हैदराबाद स्टेट के भारत में विलय के बाद भारत सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया था।  कासिम राजवी ने, जो हैदराबाद राज्य के विरुद्ध भारत सरकार की कारवाई के समय मजलिस के अध्यक्ष थे और गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में कासिम को जेल से निकलने पर दो दिन का टाइम दिया गया पाकिस्तान जाने के लिए। जब कासिम को दो दिन का वक्त मिल गया, तो उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि अब एमआईएम का क्या होगा। पाकिस्तान चले जाने से पहले इस पार्टी की बागडोर उस समय के एक मशहूर वकील अब्दुल वहाद ओवैसी के हवाले कर गए थे। 1957 में इस पार्टी की बहाली के बाद शुरू हुआ जब उस ने अपने नाम में "ऑल इंडिया" जोड़ा और साथ ही अपने संविधान को बदला। उसके बाद से यह पार्टी इसी परिवार के हाथ में रही है। अब्दुल वाहेद के बाद सलाहुद्दीन ओवैसी उसके अध्यक्ष बने और अब उनके पुत्र असदुद्दीन ओवैसी उस के अध्यक्ष और सांसद हैं जब उनके छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी विधान सभा में पार्टी के नेता हैं।- अभिनय आकाश







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