सुप्रीम कटघरे में अब CEC को मुकदमों से बचाने वाला 'अभयदान', क्या है धारा-16 का 'कवच' जिस पर SC करेगा सुनवाई?

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अभिनय आकाश । Oct 13 2026 3:40PM

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को सिविल व आपराधिक मामलों से छूट देने वाली 2023 के कानून की धारा 16 के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया है। एडीआर द्वारा दायर इस याचिका में अधिकारियों को मिली इस कानूनी सुरक्षा की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और भारत के चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की उस याचिका पर जारी किया गया है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन के दौरान किए गए कार्यों के लिए दी गई कानूनी छूट (सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा) को चुनौती दी गई है। इस मामले को कोर्ट में पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया गया है और 29 अक्टूबर को उन याचिकाओं के साथ ही इस पर भी सुनवाई होनी है। इस चुनौती का मुख्य आधार 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 16 है। इस प्रावधान के अनुसार, अदालतें किसी मौजूदा या पूर्व CEC या चुनाव आयुक्त के खिलाफ़ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन (या पालन करने के दावे) के दौरान किए गए किसी काम या कही गई किसी बात के लिए दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रख सकतीं। इस चुनौती से देश के शीर्ष चुनाव अधिकारियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा के दायरे पर सवाल उठते हैं और यह भी कि क्या ऐसी छूट जवाबदेही और कानून के शासन के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है।

विरोध से संशोधन तक: कैसे बनी धारा 16?


जब सरकार ने 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा में 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) विधेयक, 2023' पेश किया, तो इस कानून की चारों ओर आलोचना हुई। इस विधेयक से नियुक्तियों के मामले में सरकार को जो बेहिसाब दबदबा मिलने वाला था, उसके अलावा एक बात पर ज़ोरदार बहस हुई: यह विधेयक CEC और ECs को वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों के मामले में कैबिनेट सेक्रेटरी के बराबर लाने की कोशिश कर रहा था; जबकि पहले वे सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर के स्तर पर थे। विपक्षी दलों ने उस बराबरी के दर्जे का मुद्दा उठाया जो CEC और ECs को सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर मिला हुआ था, और जिसे प्रस्तावित कानून खत्म करना चाहता था। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने 16 सितंबर 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक संयुक्त पत्र लिखकर चिंता जताई कि इस कदम से "EC की प्रतिष्ठा और अधिकार कम होंगे" और यह संकेत जाएगा कि CEC और ECs "सिर्फ़ नौकरशाहों के बराबर हैं, उनसे बेहतर नहीं", जिससे नौकरशाही से उनके स्वतंत्र होने की धारणा पर बुरा असर पड़ेगा। आलोचना के बाद, सरकार ने बिल को कुछ समय के लिए रोक दिया और 2023 के शीतकालीन सत्र में कुछ अहम बदलावों के साथ इसे चर्चा और पास कराने के लिए पेश किया। 12 दिसंबर 2023 को, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में बिल पर बहस शुरू करते हुए कहा कि सरकार बिल की धारा 15 में एक संशोधन ला रही है। इसका मकसद CEC और ECs को सैलरी और सर्विस की शर्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर लाना है। उन्होंने सदन को बिल में एक और संशोधन के बारे में भी बताया, जो धारा 15A को जोड़ना था। इससे उन्हें "बिना किसी रुकावट और आज़ादी से अपने काम करने" में मदद मिलेगी। यह बिल 12 दिसंबर 2023 को राज्यसभा से और 21 दिसंबर 2023 को लोकसभा से पास हुआ। इसे 28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। धारा 15A, 2023 के कानून में धारा 16 के तौर पर शामिल हुई। यह धारा अभी चर्चा में है, खासकर उस बड़े विवाद की वजह से जो CEC ज्ञानेश कुमार के कथित तौर पर एकतरफा फैसलों को लेकर खड़ा हुआ है। ये फैसले चुनावी रोल के बहुत विवादित 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) को कराने से जुड़े थे।

1. CEC एक्ट की धारा 16 ज्ञानेश कुमार को क्या सुरक्षा देती है?


धारा 16 मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक काम करते समय किए गए, या कथित तौर पर किए गए कामों के लिए सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा देती है। यह सुरक्षा उनके पद छोड़ने के बाद भी बनी रहती है।
2. क्या CEC के तौर पर लिए गए फैसलों के लिए ज्ञानेश कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है?
धारा 16 अदालतों को किसी सरकारी काम से जुड़ी सिविल या आपराधिक कार्यवाही पर विचार करने या उसे जारी रखने से रोकती है। सुप्रीम कोर्ट इस सुरक्षा के दायरे पर विचार कर रहा था; इस लेख में इस बात पर कोई अंतिम फैसला नहीं बताया गया है कि क्या कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है।
3. विपक्षी पार्टियां ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई क्यों चाहती हैं?
विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि उन्होंने मतदाता सूची के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (विशेष गहन संशोधन) के संबंध में एकतरफा फैसले लिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अन्य चुनाव आयुक्तों ने उन फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई थी, जिनके बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी।
4. क्या CEC एक्ट चुनाव आयुक्तों को जजों की तुलना में ज़्यादा सुरक्षा देता है?
सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि धारा 16 के तहत जजों को मिलने वाली सुरक्षा से ज़्यादा कानूनी सुरक्षा मिल सकती है। लेख में बताया गया है कि जजेज़ (प्रोटेक्शन) एक्ट के तहत सरकार या कोर्ट के पास जजों के खिलाफ़ कुछ कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रहता है, जबकि CEC एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
5. क्या सुप्रीम कोर्ट ने धारा 16 की वैधता पर कोई फ़ैसला सुनाया है?
कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC और दूसरे चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है। इसमें धारा 16 पर किसी अंतिम फ़ैसले की बात नहीं कही गई है। इससे पहले 5 अक्तूबर 2026 को सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने 2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की मिली कानूनी सुरक्षा को लेकर कहा कि यह तो संवैधानिक कोर्ट के जजों को भी प्राप्त नहीं है। सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर)को लेकर कथित मनमाने फैसले को लेकर डाली गई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच की तरफ से ये गंभीर मौखिक टिप्पणी की गई थी। 


न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 (The Judges (Protection) Act, 1985) क्या है?


केंद्र सरकार, राज्य सरकार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय, किसी उच्च न्यायालय या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी को उस समय लागू किसी भी कानून के तहत किसी व्यक्ति (जो न्यायाधीश रहा हो या वर्तमान में न्यायाधीश हो) के खिलाफ उचित कार्रवाई (चाहे वह दीवानी, आपराधिक, विभागीय कार्यवाही या किसी अन्य रूप में हो) करने का अधिकार बना रहेगा। यह प्रावधान (कार्रवाई की छूट देने वाली यह धारा) CEC अधिनियम (मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम) में मौजूद नहीं है।

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CEC और ECs की नियुक्ति कैसे होती है?


संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की ज़िम्मेदारी भारत के चुनाव आयोग (ECI) को सौंपता है। अनुच्छेद 324(2) के अनुसार, संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। कई दशकों तक, संसद ने इन नियुक्तियों की प्रक्रिया तय करने वाला कोई कानून नहीं बनाया था। इसके कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल उठा कि जब ECI के सदस्यों की नियुक्ति कार्यपालिका (सरकार) करती है, तो ECI की आज़ादी को कैसे बचाया जा सकता है। मार्च 2023 में, सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संविधान पीठ ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में अपना फ़ैसला सुनाया।

अनूप बरनवाल मामला क्या था?


जनवरी 2015 में अनूप बरनवाल ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। उनका तर्क था कि ECI के सदस्यों की नियुक्ति की व्यवस्था असंवैधानिक है। उस समय, नियुक्तियाँ करने का अधिकार कार्यपालिका के पास था। PIL में कहा गया था कि समय के साथ ECI की आज़ादी कम हुई है। इसमें कोर्ट से अपील की गई कि वह ECI में नियुक्तियों के लिए एक स्वतंत्र, कॉलेजियम जैसी व्यवस्था बनाने का निर्देश दे। संविधान पीठ ने कहा कि जब तक संसद अनुच्छेद 324(2) के तहत कोई कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयोग में नियुक्तियां तीन सदस्यों वाली एक समिति की सिफारिश पर की जाएंगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बना लेती।


CEC को कैसे हटाया जा सकता है?


संविधान CEC को पद से हटाने के मामले में काफी सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, CEC को पद से "उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।" इसका मतलब है कि CEC को केवल साबित हो चुके दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर और सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए तय संसदीय प्रक्रिया के ज़रिए ही हटाया जा सकता है। संसद के दोनों सदनों में ज़रूरी विशेष बहुमत से पास होना चाहिए। संसद द्वारा प्रस्ताव पास किए जाने के बाद ही राष्ट्रपति CEC को हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं। इसकी प्रक्रिया 'जजेज़ (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968' में बताई गई है। दूसरे चुनाव आयुक्तों को मिलने वाली सुरक्षा अलग है। आर्टिकल 324(5) के तहत, किसी चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को CEC की सिफ़ारिश के बिना उनके पद से नहीं हटाया जा सकता।

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क्या CEC को गिरफ़्तार किया जा सकता है?


इससे संबंधित प्रावधान 2023 के अधिनियम की धारा 16 है। यह धारा किसी भी ऐसे व्यक्ति को अदालत में दीवानी या आपराधिक कार्यवाहियों से सुरक्षा प्रदान करती है, जो CEC या चुनाव आयुक्त रहा हो या वर्तमान में हो। बशर्ते वह कृत्य, बात या शब्द उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान किया या कहा हो। यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सुरक्षा उन व्यक्तियों तक भी बढ़ाता है जो CEC या चुनाव आयुक्त "हैं या कभी रहे थे"।
हालांकि, धारा 16 स्पष्ट रूप से यह नहीं कहती कि CEC को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह केवल यह कहती है कि अदालतें इस धारा के दायरे में आने वाले आचरण के संबंध में कोई दीवानी या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार या जारी नहीं रखेंगी। इस धारा में गिरफ्तारी (Arrest), जांच (Investigation) या पुलिस हिरासत (Police Custody) जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसलिए, इसे गिरफ्तारी से सीधी या पूर्ण छूट नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा, यह सुरक्षा केवल उन्हीं कृत्यों से जुड़ी है जो आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों के निर्वहन के दौरान किए गए हों।


2023 से पहले क्या व्यवस्था थी?


पुराना कानून (1991 का एक्ट): 2023 से पहले चुनाव आयोग Act, 1991 से संचालित होता था। इस 1991 के कानून में आयुक्तों के खिलाफ कोर्ट केस या आपराधिक कार्रवाई पर रोक लगाने वाली ऐसी कोई 'धारा 16' या कोई इम्युनिटी क्लॉज नहीं था। सामान्य लोक सेवकों वाला नियम (CrPC धारा 197): पहले चुनाव आयुक्तों को अन्य सरकारी अफसरों  की तरह ही माना जाता था।उन पर आधिकारिक ड्यूटी से जुड़े मामले में केस चलाने के लिए CrPC की धारा 197 के तहत सरकार की पूर्व अनुमति की जरूरत होती थी। यानी कोर्ट जाने पर पूरी तरह कानूनी रोक नहीं थी, सिर्फ सरकार की मंजूरी की शर्त थी। 
संविधान (अनुच्छेद 324):सविधान ने CEC को केवल पद से हटाने की सुरक्षा दी थी कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह महाभियोग जैसी प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है।   लेकिन संविधान के तहत उन्हें राष्ट्रपति या राज्यपाल (अनुच्छेद 361) की तरह मुकदमों से कानूनी छूट नहीं दी गई थी।


2023 के कानून ने क्या बदल दिया?


2023 के नए एक्ट की धारा 16 में साफ लिख दिया गया कि CEC या ECs द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए किसी भी काम या फैसले के खिलाफ अदालत कोई भी सिविल या क्रिमिनल केस स्वीकार ही नहीं करेगी।

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