मुंबई के मुजरिम को जेल, आतंकियों के खिलाफ ताबड़तोड़ एक्शन के पीछे क्या है पाकिस्तान का खेल?

  •  अभिनय आकाश
  •  जनवरी 9, 2021   18:02
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मुंबई के मुजरिम को जेल, आतंकियों के खिलाफ ताबड़तोड़ एक्शन के पीछे क्या है पाकिस्तान का खेल?

पाकिस्तान के हुक्मरानों का प्यारा और 26/11 का हत्यारा, आतंक का आका और 26/11 का मुंबई आतंकी हमले का सरगना जकीर उर रहमान लखवी को पाकिस्तान की अपराध विरोध कोर्ट ने तीन अलग-अलग मामलों में पांच-पांच साल की सजा सुनाई है। ये तीनों सजाएं एक साथ चलेंगी। यानी लखवी पांच साल ही जेल में रहेगा।

मसूद अजहर के खिलाफ वारंट जारी, अंतरराष्ट्रीय आतंकी हाफिज सईद सलाखों के पीछे और अब मुंबई हमले का मास्टरमाइंड जकीर उर रहमान लखवी की बारी। आतंक की पनहगाह पाकिस्तान इन दिनों अपने कुख्यात सरगनाओं के खिलाफ धड़ाधड़ एक्शन लेता नजर आ रहा है। आतंक के खिलाफ एक-एक कर इमरान सरकार की सक्रियता कई तरह की शंकाओं को बल दे रही है। आखिर इतना दिखावा क्यों कर रहा है पाकिस्तान? आतंकियों के खिलाफ एक्शन या फिर एफएटीएफ के लिए चल रहा है अलग ही प्लान। 

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अपने आप को हमने बचाना है, एक बंदा है जो हमेशा वहां पर है, जहां आपको मूवमेंट नजर आती है बंदा कोई छत पर चल रहा है। आ जा रहा है फायर ठोको, उसे पता लगे यहां क्या हो रहा है। ये इंटरनेशनल आतंकी जकीर उर रहमान लखवी के शब्द हैं। वो मुंबई पर हमला करने वाले आतंकियों को बता रहा था कि मुंबई में कैसे हमला करना है। पकड़े जाने पर क्या कहना है और कैसे आतंक का खेल खेलना है। 26/11 हमले के इसी मास्टरमाइंड लश्कर-ए-तैयेबा के कमांडर जकीर उर रहमान लखवी को पाकिस्तान की एक अदालत ने सजा सुनाई है। 

पाकिस्तान के हुक्मरानों का प्यारा और 26/11 का हत्यारा, आतंक का आका और 26/11 का मुंबई आतंकी हमले का सरगना जकीर उर रहमान लखवी को पाकिस्तान की अपराध विरोध कोर्ट ने तीन अलग-अलग मामलों में पांच-पांच साल की सजा सुनाई है। ये तीनों सजाएं एक साथ चलेंगी। यानी लखवी पांच साल ही जेल में रहेगा। पाकिस्तान के अपराध विरोधक विभाग ने लखवी को गिरफ्तार किया था। हालांकि पाकिस्तान का ये कदम दिखावा ज्यादा लगता है क्योंकि अगले महीने एफएटीएफ की मीटिंग होने वाली है। पाकिस्तान लंबे वक्त से एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में है। माना जा रहा है कि लखवी की कार्यवाई इसी दवाब के चलते और एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट से बाहर आने के लिए की गई है। 

लखवी को किस बात की सजा हुई

पंजाब के आतंकवाद निरोधक विभाग (सीटीडी) ने अतंकियों को धन मुहैया कराने के मामले में लखवी को गिरफ्तार किया है। लखवी पर दवाखाना चलाने के लिए जुटाए पैसे का उपयोग आतंकवाद के फलने फूलने मे किया। जिसके बाद लाहौर की आतंकवाद निरोधक अदालत में लखवी के खिलाफ मुकदमा चलाया गया। अदालत ने लखवी को तीन अलग-अलग मामलों में पांच साल की सजा सुनाई और साथ ही तीन लाख का जुर्माना भी लगाया। 

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पहले भी हुई थी सजा फिर छोड़ा

पाकिस्तान के पेशावर में हुए आतंकी हमले के दो दिन भी नहीं बीते थे कि 2015 में पाकिस्तान की कोर्ट ने सबूतों के आभाव में लखवी को पांच लाख के मुचलके पर जमानत दे दिया था। 

डेढ़ लाख खर्च की मंजूरी

आतंकवादियों की लिस्ट में नाम आने के बाद लखवी की संपत्ति और बैंक खाते सीज कर दिए गए थे। पाकिस्तान की सरकार ने उसके खाते से मासिक भुगतान किए जाने का विचार करने का अनुरोध यूएनएससी से किया था। जिसपर सूएनएससी ने लखवी को हर महीने खर्च के लिए डेढ़ लाख रुपए देने पर अपनी सहमति दे दी थी। इसमें खाने के 50 हजार, दवाइयों के 45 हजार, वकील की फीस 20 हजार, सार्वजनिक उपयोगिता शुल्क के लिए 20 हजार और आने-जाने के लिए 15 हजार रुपये शामिल थे। 

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जेल में रहते हुए बना एक बच्चे का पिता

पाकिस्तान के लखवी पर कार्रवाई  दिखावा इसलिए लगती है कि इससे पहले भी जेल में रहते हुए हर सुविधाओं का इस्तेमाल करता रहा है। बैठकें करता रहा है और भारत विरोधी गतिविधियों को बी अंजाम देता रहा है। सबसे चौंकाने वाला मामला तो तब सामने आया जब वह रावलपिंडी की जेल में रहते हुए एक बच्चे का पिता भी बन गया। 

आतंकियों के खिलाफ एक्शन का खेल क्यों?

पाकिस्तान फरवरी में होने वाली फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की बैठक में ग्रे लिस्ट से बाहर आना चाह रहा है। इसलिए आकंत के खिलाफ एक्शन लेने का दिखावा इमरान सरकार की ओर से किया जा रहा है। लखवी से पहले पाकिस्तान सरकार ने अंतरराष्ट्रीय आतंकी हाफिज सईद, जैश प्रमुख मसूद अजहर और अंडरवर्ल्ड डाॅन दाऊद इब्राहिम पर प्रतिबंधों की घोषणा की थी।

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FATF क्या है?

फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानी एफएटीएफ। यह विभिन्न देशों की एक अन्तरसरकारी संस्था है जो काले धन को वैध बनाने (मनी लांड्रिंग) को रोकने से सम्बन्धित नीतियां बनाने के लिए 1989 में हुई थी। साल 2001 में इसका कार्यक्षेत्र विस्तारित करते हुए आतंकवाद को धन मुहैया कराने के विरुद्ध नीतियां बनाने को भी सम्मलित किया गया। एफएटीएफ में 39 सदस्य हैं और इसमें 37 देश और दो रीजनल ऑर्गेनाइजेशन हैं। भारत भी इसका सदस्य है। 

FATF का क्या काम है?

एफएटीएफ कई देशों पर मनी लांड्रिंग और टेरर फंडिंग पर नजर रख उसे लिए नियम बनाता है। आतंकवादी वित्तपोषण जैसे खतरों से निपटना और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली की अखंडता के लिये अन्य कानूनी, विनियामक और परिचालन उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन को बढ़ावा देना है। जब भी कोई देश आतंकी संगठनों को पनाह देकर या आतंकी गलिविधियों को बढ़ावा देते हुए आर्थिक मजबूत करता है तो इसे टेरर फंडिंग कहते हैं। 

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ग्रे और ब्लैक लिस्ट

एफएटीएफ ग्रे और ब्लैक लिस्ट जारी करता है। ग्रे लिस्ट में उन देशों को रखा जाता है जो मनी लाॅन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग के मामलों की तरफ बढ़ रहा हो। इस लिस्ट में नाम करके एक तरह से इन देशों को चेतावनी दी जाती है कि वो समय रहते अपनी स्थिति को काबू कर लें। वहीं किसी भी देश का एफएटीएफ की ब्लैक लिस्ट में शामिल होने का अर्थ होता है कि उस देश को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा वित्तीय सहायता मिलनी बंद हो जाएगी। 

विदेश मंत्रालय का बयान

भारत ने मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड एवं लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर जकी-उर-रहमान लखवी को आतंकवाद के वित्तपोषण के मामले में पाकिस्तानी अदालत द्वारा कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद पाकिस्तान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय बैठकों से पहले ‘आडंबर करना’ पाकिस्तान के लिए आम बात हो गई है।विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि ये कदम साफ दिखाते हैं कि इनका मकसद फरवरी 2021 में एफएटीएफ (वित्तीय कार्रवाई कार्य बल) की पूर्ण बैठक और एपीजेजी (एशिया प्रशांत संयुक्त समूह) की बैठक से पहले अनुपालन की भावना को दर्शाना है।

बहरहाल, आतंक के आकाओं पर पाकिस्तान की कार्यवाई महज दिखावा मात्र है। पाकिस्तानी कोर्ट के सजा देने या गिरफ्तारी वारंट जारी करने का असर इन आतंकियों पर कितना पड़ने वाला है, ये तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन पाकिस्तान के पुराने रवैये को देखकर तो इतना साफ ही है कि जल्द ही नजरबंदी वाले नाटक का खेल खत्म हो जाएगा और इनकी संपत्ति भी लौटा दी जाएगी। - अभिनय आकाश







जानें कौन हैं एलेक्सी नवालनी, जिसे दो बार जहर देकर मारने की साजिश रचने के आरोप रूस के राष्ट्रपति पर लगे

  •  अभिनय आकाश
  •  जनवरी 19, 2021   18:10
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जानें कौन हैं एलेक्सी नवालनी, जिसे दो बार जहर देकर मारने की साजिश रचने के आरोप रूस के राष्ट्रपति पर लगे

एलेक्सी नवालनी को जर्मनी से मास्को आने पर हिरासत में ले लिया गया है और फिर अदालत ने उन्हें 30 दिन के लिए जेल भेज दिया है। संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, यूरोपियन काउंसिल और ब्रिटेन सहित पश्चिम देशों ने इस मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है।

2011 का साल और दिल्ली के रामलीला मैदान का वो शोर। जब गांधी की टोपी पहले अन्ना हजारे रघुपति राघव राजा राम के बोल के साथ अनशन पर बैठे थे। पूरा देश उस वक्त मैं भी अन्ना तू भी अन्ना अब तो सारा देश है अन्ना के नारे के साथ अन्नामय हो गया था। लेकिन ठीक उसी वक्त दिल्ली से 4195 किलोमीटर दूर रूस में एक संगठन की नींव रखी जा रही थी। नाम- एंटी करप्शन फाउंडेशन। मकसद- रूस की ब्लादिमीर पुतिन सरकार के कथित भ्रष्टाचार को उजागर करना। आज की कहानी है एक ऐसे नेता कि जिसके पोस्टर 2017 में पुतिन विरोधी आंदोलन में दिखे। उसी राजनेता को दो बार जहर देकर मारने की कोशिश की गई और आरोप रूस के राष्ट्रपति पर लगे। वो नेता जिसके इलाज की पेशकश फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने की। वो नेता जिसके बारे में अमेरिकी अखबार के एक बार लिखा कि The Man vladimir Putin fears most यानी वो आदमी जिससे ब्लादिमीर पुतिन को सबसे ज्यादा डर लगता है। ये कहानी है पुतिन के खिलाफ प्रदर्शन के लिए 3 बार जेल जाने वाले और चुनाव लड़ने की कोशिश में ईसी द्वारा अयोग्य करार दिए जाने वाले पुतिन विरोधी रूस के सबसे बड़े नेता एलेक्सी नवालनी की।

सबसे पहले बात वर्तमान की करते हैं। एलेक्सी नवालनी को जर्मनी से मास्को आने पर हिरासत में ले लिया गया है और फिर अदालत ने उन्हें 30 दिन के लिए जेल भेज दिया है। संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका. यूरोपियन काउंसिल और ब्रिटेन सहित पश्चिम देशों ने इस मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। मास्को कोर्ट द्वारा नवलनी को निलंबित जेल की शर्तों के उल्लंघन का दोषी मानते हुए 15 फरवरी तक जेल में रखने का आदेश दिया। नवालनी को गबन के आरोप में यह सजा सुनाई गई थी और उनके खिलाफ तीन और आपराधिक मामले दर्ज हैं। 

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रूस के कई दशकों से राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के जन्मदिन वाले दिन यानी सात अक्टूबर 2017 की बात है। रूस की राजधानी मास्को के पुश्किन स्क्वायर पर सैकड़ों लड़के-लड़कियां इकट्ठे हुए। पुतिन के विरोध वाली तख्तियां हाथों में लिए ये लोग जिसमें लिखा था पुतिन इज ए थीफ, पुतिन को राष्ट्रपति पद से हटाओ। पुतिन और उनकी सरकार के खिलाफ 20 से ज्यादा रूस के शहरों में हो रहा था। उन प्रदर्शनकारियों के पास एक पोस्टर में युवा चेहरे वाला पोस्टर भी लहराया जा रहा था और उसकी जिंदाबाद के नारे भी लगाया जा रहा था। 

पेश से वकील एलेक्सी नवालनी का रूस की राजनीति में उभार 2008 से दिखता है । जब वो रूस सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बोलना शुरू करते हैं। राष्ट्रवादी नेता के तौर पर उनकी छवि बन जाती है। सरकारी कांट्रैक्ट में भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाते हैं। ब्लाॅगिंग और यूट्यूब के जरिये इन तमाम मुद्दों को उठाते हुए रूस में लोकप्रिय हो जाते हैं। एलेक्सी ने एंटी करप्शन फाउंडेशन नाम का संगठन बनाया। और इसके जरिये भ्रष्टाचार पर पुतिन सरकार को सीधे ललकारने लगे। आलम ये हुआ कि साल 2012 में अमेरिकी अखबार वाल स्ट्रीट जर्नल ने अपने खबर की शीर्षक में एलेक्सी का परिचय देते हुए एक खबर प्रकाशित की The Man vladimir Putin fears most यानी वो आदमी जिससे ब्लादिमीर पुतिन को सबसे ज्यादा डर लगता है। इस लेख के मुताबिक सरकार के समर्थक टीवी और अखबार एलेक्सी को सीआईए का एजेंट बताते हैं। हिटलर से उसकी तुलना करते हैं। रूस के सरकारी चैनलों पर तो एलेक्सी को दिखाने पर भी पाबंदी है। 2013 में उन्होंने मास्को में मेयर का चुनाव लड़ने का ऐलान किया। वो लड़े लेकिन पुतिन के उम्मीदवार से हार गए। एलेक्सी ने चुनाव में धांधली का इल्जाम लगाया। उसके बाद उनपर कई केस लगाए। एक में एलेक्सी को पांच साल की सजा हुई और दूसरे में साढ़े तीन साल की। कुछ साल जेल में रहने के बाद एलेक्सी नजरबंद कर दिए गए। 2016 में बाहर आए तो फिर प्रदर्शन जारी कर दिया। 2017 में उन्हें पुतिन के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए 3 बार जेल हुई। साल 2017 में ही उन पर हमला हुआ और इस हमले की वजह से एलेक्सी की दाहिनी आंख केमिकल बर्न से प्रभावित हुई। 2018 में रूस के राष्ट्रपति के चुनाव के वक्त एलेक्सी के पुतिन को तगड़ी चुनौती देने के कयास लगाए जा रहे थे। तभी चुनाव आयोग ने एलेक्सी को अयोग्य घोषित कर दिया गय। लेकिन जुलाई 2019 में रूस में विरोध प्रदर्शन का आह्वान करने की वजह से उन्हें 30 दिन की जेल हुई। जेल में ही उनकी तबीयत बिगड़ी और आरोप लगे कि एलेक्सी को जहर देने की कोशिश हुई है। 20 अगस्त 2020 को रूस के साइबेरिया से एक विमान मास्को के लिए उड़ान भरता है।

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विमान के उड़ान भरने के दौरान ही उसमें बैठे पैसेंजर एलेक्सी नवालनी बीमार हो गए। मामला गंभीर हुआ तो प्लेन की इमरजेंसी लैंडिग करनी पड़ी और नवालनी को अस्पताल में भर्ती कराया गया। पता चला कि नवालनी को जहर दिया गया। जिसके बाद शक जताया गया कि एयरपोर्ट पर जिस कैफे में एलेक्सी नवालनी ने चाय पी थी उसमें जहर मिला थ। एलेक्सी की प्रेस सेक्रेटरी ने ट्वीट करके बताया कि एलेक्सी को जहर दिया गया है। लेकिन डक्टर कहते हैं कि एलेक्सी को जहर नहीं दिया गया है। जर्मनी ने तो अपना एक एयर एंबुलेंस भी रूस के साइबेरिया में भेज दिया। जिसके बाद उन्हें जर्मनी लाया गया। जहां वे कोमा में रहे। वहीं जर्मनी ने रूस पर आरोप लगाया कि रूस ने एलेक्सी को नोविचोक नाम का जहर दिया। 

वैसे रूस की राजनीति में विरोधियों को जहर देकर मारने जैसे कई तथ्य और रिपोर्ट समय-समय पर सामने आते रहते हैं। विकीपीडिया में भी List of soviet and Russian Assassinations लिखने पर उन नामों का उल्लेख मिलता है जिन्हें कथित तौर पर सत्ता पार्टी द्वारा जहर देकर मारने की कोशिश हुई। साल 2006 में अलेक्जेंडर लिटनिवेनको को रेडियो एक्टिव त्तव पोलोनियम 210 देकर मारने जैसी खबरें स्काई न्यूज की एक रिपोर्ट मं प्रकाशित की गई। वहीं 1978 में जाॅर्जी मार्कोव नाम के लेखक की मौत हो गई, जिसके सालों बाद ये खुलाया हुआ कि रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी ने जहर देकर जाॅर्जी की हत्या करवाई थी।- अभिनय आकाश







WhatsApp प्राइवेसी पॉलिसी के बारे में सब कुछ जो आप जानना चाहते हैं

  •  अभिनय आकाश
  •  जनवरी 18, 2021   19:04
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WhatsApp प्राइवेसी पॉलिसी के बारे में सब कुछ जो आप जानना चाहते हैं

व्हाट्सएप की नई पाॅलिसी आने के बाद लोग खफा चल रहे थे और दूसरे प्लेफार्म पर जाना भी शुरू कर दिया। निगेटिव इम्पैक्ट देखकर व्हाट्सएप डैमेज कंट्रोल में जुट गया। ट्वीटर पर पोस्ट डालकर और अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन देकर व्हाट्सएप लोगों को समझा रहा है कि आपकी चैट अभी भी सुरक्षित हैं।

पहले निबंध की शुरूआत एक लाइन के जरिये हुआ करती थी ''भारत एक कृषि प्रधान देश है''। मोबाइल क्रांति के बाद से स्थिति थोड़ी बदल सी गई। अब भारत व्हाट्सएप प्रधान देश भी बन चुका है। If you are not paying for it, you become the product ये अंग्रेजी की एक कहावत है। जिसका मतलब है कि अगर आप कोई प्रोडक्ट मुफ्त में ले रहे है तो इसका मतलब है कि आप खुद ही प्रोडक्ट हैं। व्हाट्सएप पर आए एक नोटिफिकेशन से ये बात जरूर साबित हो गई है। पिछले कुछ दिनों में दुनियाभर के करीब दो सौ करोड़ लोगों को व्हाट्सएप पर एक नोटिफिकेशन मिला। 

इस नोटिफिकेशन में कहा गया कि 8 फरवरी 2021 तक आपको जो शर्तें लिखीं हैं उसे स्वीकार करना होगा। अगर आप ये शर्तें स्वीकार नहीं करते तो आपका व्हाट्सएप एकाउंट बंद कर दिया जाएगा। 

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नोटिफेकेशन की शर्तें क्या थी- व्हाट्सएप आपके डेटा को फेसबुक के साथ शेयर करेगा।  जिसके लिया वो ग्रीन बटन के जरिये आपसे एग्री यानी इजाजत की मांग कर रहा है। फेसबुक ही व्हाट्सएप की पैरेंट कंपनी है। डेटा का मतलब है आपका फोन नंबर, आपके कांन्ट्रैक्ट्स और आपको व्हाट्सएप स्टेटस जैसी तमाम जानकारियां। ये डेटा व्हाट्सएप लेकर फेसबुक के साथ शेयर करना चाह रहा है। मतलब व्हाट्सएप आपकी कुछ चीजों की निगरानी करेगा और उसे थर्ड पार्टी के साथ शेयर भी करेगा। व्हाट्सएप ये गौर करगेा कि आप कितनी देर आनलाइन रहते हैं, आनलाइन रहकर क्या करते हैं। कौन सा फोन इस्तेमाल करते हैं और किस तरह के कंटेट व्हाट्सएप पर पसंद करते हैं। क्या सबसे अधिक देखते हैं। सबसे अधिक जो कंटेट आप देखते होंगे वह बेसिक डेटा व्हाट्सएप थर्ड पार्टी यानी फेसबुक, इंस्टाग्राम को शेयर करेगा और फिर उसी से मिलता-जुलता कंटेट आपको दिखाया जाएगा। 

दरअसल, व्हाट्सएप पर भेजे गए मैसेज इंड टू इंड इंक्रिप्शन की मदद से स्कियोर होते हैं। मान लीजिए कि दो लोग हैं जिन्होंने एक दूसरे को भेजा हो। जैसे ही आप मैसेज भेजते हैं एक प्रोग्राम आपके मैसेज को एक जटिल कोड में बदल देता है। जिसे मैसेज भेजा गया है उसके फोन में वो कोड जाता है दोबारा मैसेज में बदल जाता है और जिसने वो मैसेज पढ़ा उसे समझ में आ जाता है कि सामने वाले ने मैसेज क्या भेजा। इस दौरान कोई भी मैसेज कहीं भी स्टोर नहीं होता। 

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व्हाट्सएप की नई पाॅलिसी आने के बाद लोग खफा चल रहे थे और दूसरे प्लेफार्म पर जाना भी शुरू कर दिया। निगेटिव इम्पैक्ट देखकर व्हाट्सएप डैमेज कंट्रोल में जुट गया। ट्वीटर पर पोस्ट डालकर और अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन देकर व्हाट्सएप लोगों को समझा रहा है कि आपकी चैट अभी भी सुरक्षित हैं। 

व्हाट्सएप के विज्ञापन के अनुसार उनकी पाॅलिसी में बदलाव आपकी निजी चैट को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करते हैं। ये अपडेट सिर्फ बिजनेस अकाउंट से बात करने को लेकर है और वो भी वैकल्पिक है। आप चाहे तो व्हाट्सएप पर किसी भी बिजनेस से बात न करे और अगर ऐसा करते हैं तो व्हाट्सएप इस बातचीत को फेसबुक से साझा कर सकता है। फिर इसे आपकी जानकारी से जोड़कर आपके हिसाब से विज्ञापन दिखा सकता है। व्हाट्सएप का कहना है कि बाकी सारी चीजें पहले जैसी हैं। व्हाट्सएप ने ट्वीटर और विज्ञापन के जरिये ये बाते भी कहीं। व्हाट्सएप और फेसबुक न तो आपके प्राइवेट मैसेज देख सकता है न ही आपकी काॅल सुन सकते हैं। व्हाट्सएप इस बात रिकाॅर्ड नहीं रखता कि आप किसी चैट या काॅल कर रहे हैं। आप व्हाट्सएप पर जो लोकेशन दूसरे के साथ साझा करते हैं उसे न तो व्हाट्सएप देख सकता है और न ही फेसबुक। व्हाट्सएप आपको फोन में मौजूद कांट्रैक्ट्स को फेसबुक के साथ शेयर नहीं करता है। व्हाट्सएप पर बने हुए ग्रुप प्राइवेट ही रहेंगे।

अब आते हैं प्राइवेट पाॅलिसी पर। व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम तीनों का प्रभुत्व मार्क जुकरबर्ग के पास है। वहीं उसके प्रतियोगी कहे या प्रतिद्वंद्वी गूगल के ही लोकेशन,क्लाउड, ड्राइव, जीमेल, यूट्यूब, गूगल एडसेंस हैं। गूगल को टक्कर देने या उसे पछाड़ने के लिए फेसबुक के द्वारा इस तरह की कवायदों को किया जा रहा है। साल 2009 में जब व्हाट्सएप मार्केट में आई तो उस वक्त किसी को भी टेक्सट मैसेज भेजने के लिए कम से कम एक रुपये की शुल्क देनी होती थी। उस वक्त फ्री मैसेज की सुविधा के साथ व्हाट्सएप आया। जिसकी मैसेज और काॅल को कोई रिकार्ड भी नहीं कर सकता तो प्राइवेसी के मामले में भी सही था। साल 2014 में फेसबुक ने 9 बिलियन डाॅलर में व्हाट्सएप को खरीद लिया। लेकिन जिस प्लानिंग के तहत व्हाट्सएप को फेसबुक ने खरीदा था वो मनचाहा रिजल्ट नहीं मिल पा रहा था। जिसके बाद व्हाट्सएप और फेसबुक का ये पाॅलिसी वाला चक्कर सामने आया। 

यूट्यूब में विज्ञापन के जरिये जो भी पैसा आता है वो गूगल एडसेंस के जरिये। फेसबुक की भी चाहत इसी तरह के तरीके को अपनाने की है। मतलब विज्ञापन फेसबुक पर चलेगा लेकिन यूजर को व्हाट्सएप के जरिये लाया जाएगा। यूट्यूब पर कैटेगराइजेशन ज्य़ादा बेहतर है। जिस पर फेसबुक के रिसर्च किया।  यूट्यूब ने टाइटल, डिस्क्रिप्शन, टैग, थंबनेल आदि के माध्यम से पहले ही वीडियो से संबंधित सारी जानकारी पा ली। फिर ये डेटा के आधार पर गूगल एड सेंस कौन सा विज्ञापन दिखाना है तय करती है। ऐसी ही कुछ सोच फेसबुक की भी है। आप जो भी व्हाट्सएप पर कर रहे हैं वो इसकी जानकारी फेसबुक को देगा और फिर फेसबुक उसी हिसाब से विज्ञापन दिखाएगा। ताकि फेसबुक का विज्ञापन भी रिलेवेंट हो सके।

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यूजर्स के विरोध पर फैसला टला

व्हाट्सएप के पाॅलिसी अपडेट से जुड़े फैसले के बाद लोग इसका भारी विरोध देखने को मिला। जिसके बाद व्हाट्सएप ने अपनी अपडेट पाॅलिसी को मई तक पोस्टपोन करने का फैसला किया। व्हाट्सएप का कहना है कि इससे यूजर्स को पाॅलिसी को समझने, इससे जुड़े कन्फ्यूजन दूर करने और इसे स्वीकार करने का मौका मिलेगा। कंपनी की तरफ से ब्लाॅग पोस्ट में यह बात कही गई। 

व्हाट्सएप की प्राइवेसी पॉलिसी पर हाईकोर्ट 

व्हाट्सएप की प्राइवेट पाॅलिसी को लेकर याचिकाकर्ता द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की गई। याचिका में कहा गया कि पाॅलिसी पर सरकार को एक्शम लेना चाहिए। साथ ही याचिकाकर्ता ने इसे निजता का उल्लंघन बताया। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पर विस्तृत सुनवाई की बात करे हुई कोई नोटिस जारी नहीं किया। इसके साथ ही हाईकोर्टने कहा कि व्हाट्सएप एक प्राइवेट एप है। अगर आपकी निजता प्रभावित हो रही है तो आप इसे डिलीट कर दें। कोर्ट ने कहा क्या आप मैप या ब्राउजर इस्तेमाल करते है? उसमें भी आपका डाटा शेयर किया जाता है। 

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गूगल सर्च में व्हाट्सएप यूजर्स के नंबर 

तमाम तरह के विवाद चल ही रहे थे कि व्हाट्सएप को लेकर एक और विवाद सामने आया। कहा जा रहा है कि व्हाट्सएप यूजर्स के फोन नंबर इंडेक्सिंग के जरिये गूगल सर्च पर एक्सपोज कर दिए हैं। इससे पहले एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि व्हाट्सएप ग्रुप के लिंक भी गूगल पर सर्च किए गए थे। समाचार एजेंसी आईएएनएस के अनुसार गूगल सर्च में व्हाट्सएप यूजर्स के नंबर देखे गए हैं। गौरतलब है कि व्हाट्सएप को मोबाइल के अलावा लैपटाॅप और कंप्यूटर पर भी चलाया जाता है। यूजर्स के नंबर व्हाट्सएप वेब के जरिये लीक हुए हैं। मतलब साफ है कि अगर आप व्हाट्सएप को कंप्यूटर या लैपटाॅप पर इस्तेमाल करते हैं तो आपका कान्टैक्ट पब्लिकली गूगल सर्च स्क्राॅल में आ सकता है। जिससे यूजर्स के स्पैम और साइबर अटैक जैले जोखिम हो जाते हैं। 

कोरोड़ों की संख्या में भारतीय फेसबुक, व्हाट्सएप जैसी प्लेटफार्म्स का यूज करते हैं। अगर ऐसे में अगर ऐसे ही चलता रहा तो लोगों का भरोसा व्हाट्सएप से घटता दिखाई देगा। प्राइवेसी वाले मसले के बाद तो कई लोगों ने व्हाट्सएर छोड़ टेलीग्राम और सिग्नल जैसे एप्स का भी रुख किया था। बीते कुछ दिनों से जो भी हुआ उससे साफ प्रतीत होता है कि यूजर्स ने व्हाट्सएप को ये बता दिया कि आपकी मोनोपाॅली नहीं चलेगी। - अभिनय आकाश







नरम से गरम हुए सुशासन बाबू, क्यों बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं...

  •  अभिनय आकाश
  •  जनवरी 16, 2021   15:49
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नरम से गरम हुए सुशासन बाबू, क्यों बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं...

सुशासन बाबू को इतने ही गुस्से में रैलियां के दौरान देखा गया। उस वक्त का तनाव समझ में आ रहा था कि डर था कि चुनाव में जीत होगी या नहीं। लेकिन अब सत्ता मिल गई। फिर नीतीश बात-बात पर इतना गुस्सा क्यों हो रहे हैं। ये सवाल बिहार से लेकर दिल्ली तक पूछा जा रहा है।

32 दांतो के बीच में जीभ कैसे रहती होगी। ये बहुत पुरानी कहावत है। जब इंसान बेबसी में काम करता है तो ऐसी कई मिसालें दी जाती है। बिहार के मुख्यमंत्री, पीएम मैटेरियल वाले मुख्यमंत्री, सुशासन बाबू के उपनाम वाले मुख्यमंत्री, बिहार में बहार हो का नारा देने वाली पार्टी के मुख्यमंत्री। नाम- नीतीश कुमार। इन दिनों पहचान एंग्री मैन के रूप में हो रही है। सुशासन बाबू को शायद ही इससे पहले इतने गुस्से में देखा गया हो। लेकिन बीते कुछ महीने से चाहे वो चुनावी रैलियों की बात हो या पत्रकारों के सवाल नीतीश बात-बात पर भड़क जाते हैं। कमियों को दूर करने की बजाए सवाल पूछने वालों को ही पार्टी विशेष का समर्थक करार दे देते हैं। डीजीपी को सबके सामने फोन पर फटकार लगाते हैं। विधानसभा सत्र के दौरान विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव पर फूट पड़ते हैं। इस बार छोटे भाई की भूमिका में आए नीतीश के तेवर पिछले कुछ वक्त से ही बदले-बदले नजर आ रहे हैं।

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अक्सर भाषण देते हुए अपनी बात शांति से रखने वाले नीतीश कुमार की सबसे बड़ी राजनीतिक खासियत यही मानी जाती थी कि वो बेहद ही नपा-तुला बोलते थे। कड़वी से कड़वी बात भी मुस्कुराते हुए इस अंदाज में बोल जाते कि विरोधी भी यह समझ नहीं पाते कि आखिर नीतीश पर निशाना साधे तो साधे कैसे? याद कीजिए 2015 का चुनाव जब एनडीए से बाहर होकर चुनाव मैदान में उतरी जेडीयू के सामने भव्य आभा कौशल वाले नरेंद्र मोदी खड़े थे। नरेंद्र मोदी उस चुनाव में नीतीश कुमार पर हमलावर रहते। लेकिन पीएम की रैली के बाद नीतीश बेहद ही सौम्यता के साथ एक घंटे की प्रेस कॉन्फ्रेंस कर तर्कों और तथ्यों के साथ उनकी कही हर बात को काटते थे। लेकिन पिछले कुछ समय से लोग एक अलग ही नीतीश कुमार को देख रहे हैं। जो बात-बात पर अपना आपा खो रहे हैं। कमियों को दूर करने की बजाये सवाल पूछने वालों पर ही सवाल उठाने लग रहे हैं। सुशासन बाबू को इतने ही गुस्से में तब देखा गया था जब वो रैलियां कर रहे थे। उस वक्त का तनाव तो समझ में आ रहा था कि डर था कि चुनाव में जीत होगी या नहीं। लेकिन अब सत्ता मिल गई। फिर आखिर क्यों नीतीश बात-बात पर इतना गुस्सा हो रहे हैं। ये सवाल बिहार से लेकर दिल्ली तक पूछा जा रहा है। 

कभी उन्हें इसकी आदत नहीं रही। साल 2005 से वो मुख्यमंत्री रहें वो और जो भी फैसले किए अपनी मर्जी से अपने दम पर किया। चाहे वो सीएम पद छोड़ जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाना हो या बीजेपी के लिए डिनर कैंसिल करना। लालू का साथ छोड़ बीजेपी के साथ आ जाना जो भी फैसला करते पूरे दमखम के साथ करते।

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नीतीश सुलझे हुए मुख्यमंत्री माने जाते रहे हैं और गुड गवर्नेंस के मामले में उनकी सानी नहीं रही है तभी तो एक वक्त ऐसा भी था जब प्रधानमंत्री मोदी ने एनडीए में नीतीश के नहीं होने के बावजूद उनके गुड गवर्नेंस की तारीफ की थी। जिस ला एंड ऑर्डर को लेकर घर के अंदर और बाहर नीतीश कुमार पर सवाल उठ रहे हैं। चाहे वो एनडीए हो या विपक्ष कानून व्यवस्था को लेकर उनपर सवाल उठ रहे हैं

बिहार में विधानसभा चुनाव हुए, नीतीश कुमार के नेतृत्व में भाजपा ने चुनाव लड़ा और जनता दल यूनाइटेड के कम सीटों पर जीत हासिल करने के बावजूद भाजपा ने मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा ठोंकने की बजाय नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही सरकार बनाई। । आज नीतीश 43 विधायकों वाली छोटी पार्टी के अगुवा हैं। उनसे ज्यादा विधायक 74 सीटों की संख्या बीजेपी के पास है। यानी कि जो बड़ा भाई हुआ करता था वो अचानक से छोटा भाई हो गया। वो झुंझलाहट है मन में।  इसके साथ ही बीजेपी के विरोध के आगे विवश होकर नीतीश को 15 साल से गृह सचिव रहे आमिर सुबहानी को हटाना पड़ा। 

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू सहयोगी भाजपा से छोटी पार्टी बन गई है। दूसरे, भाजपा की आंतरिक संरचना भी बदल गई है। सीएम नीतीश के साथ आदर्श और भरोसेमंद सहयोगी की भूमिका निभाने वाले सुशील मोदी को भाजपा ने राज्यसभा सदस्य बनाकर दिल्ली भेज दिया है। उनकी जगह दो उप-मुख्यमंत्री बनाकर नीतीश को दोनों तरफ से घेरने की कोशिश की गई है। हालत यह हो गई है कि अब नीतीश कुमार को भाजपा के बिहार प्रभारी भूपेंद्र यादव के साथ डील करना पड़ रहा है। राज्य में भाजपा अब बिग बॉस की भूमिका में आना चाहती है लेकिन नीतीश उसे बिग बॉस मानने को तैयार नहीं और इसलिए छोटे दल के नेता के तौर पर मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से ही नीतीश लगातार अपना कद बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। जार्ज फर्नांडीज को हटाकर शरद यादव को जेडीयू का अध्यक्ष बनवा दिया था। फिर ठीक पांच साल पहले नीतीश कुमार ने जनता दल यूनाइटेड का अध्यक्ष पद शरद यादव से जबरन हासिल किया था। वहीं नीतीश कुमार कहते सुनाई पड़े की पार्टी का कामकाज किसी फुल टाइम अध्यक्ष के हाथों में होनी चाहिए। नीतीश ने इतनी आसानी से अपनी कुर्सी छोड़ पूर्व आईएएस अधिकारी आरसीपी सिंह को अध्यक्ष बना दिया। दरअसल, नीतीश के पास अब कोई रास्ता नहीं था कि वो पार्टी से ऐसा कोई नुमाइंदा चुने जो बीजेपी के नेताओं से बात करे। कहा तो ये भा जा रहा है कि नीतीश कुमार को भूपेंद्र यादव से बात करने के लिए इंतजार करना पड़ रहा था। नीतीश को ऐसे किसी शख्स की दरकार थी तो अधिकृत तौर पर बीजेपी से बात कर सके। नीतीश को बार-बार भूपेंद्र यादव या बीजेपी की दूसरी-तीसरी कतार के नेताओं से बात करने 

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नीतीश कुमार की एक खासियत और रही है कि वो मीडिया से बहुत कम बात करते रहे हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर विधानसभा तक, पत्रकार सवालों की झड़ी लगाते नजर आते थे लेकिन नीतीश मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर निकल जाया करते थे। लेकिन इस बार तो पटना का हर पत्रकार नीतीश कुमार के रवैये से काफी हैरत में नजर आ रहा है। पत्रकार जब भी कोई सवाल लेकर नीतीश का नाम लेते हैं तो नीतीश कुमार खुद ही रुक कर जवाब देना शुरू कर देते हैं। बीच में तो कई दिन ऐसे भी गुजरे जब दिनभर में नीतीश कुमार ने 4-5 बार पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए। साफ-साफ लग रहा है कि अपनी चुप्पी त्यागकर नीतीश खूब घूम रहे हैं, मीडिया से बात कर रहे हैं और हर सवाल का जवाब दे रहे हैं।

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नीतीश कुमार खुद को मजबूत करने की भी कवायद में लगे हैं। कभी वो मांझी को साथ लाते हैं। फिर रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा से नजदीकियां बढ़ाते हैं। यहां तक की रालोसपा और हम के जेडीयू में विलय की खबरें भी सामने आती है। कुल मिलाकर कहा जाए कि नीतीश बहुत दवाब में हैं। बिहार के नतीजों से नाखुश हैं। अपनों और विरोधियों के हमले से चितिंत हैं। लेकिन नीतीश को अपने सहयोगी भारतीय जनता पार्टी के महान नेता, भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पंत्तियों ''क्‍या हार में क्‍या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही'' को पढ़ते हुए अपने रास्ते में आगे बढ़ना होगा। नीतीश सोलह साल से मुख्यमंत्री हैं तो चाहे वो कानून व्यवस्था की बात हो या फिर बढ़ते अपराध की, सवाल तो उन्हीं से पूछे जाएंगे। इसमें झुंझलाना और बिफरना सेहत के लिए भी खराब है और कुर्सी के लिए भी। - अभिनय आकाश







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