लाल किला: सिख सेना के दिल्ली फतेह और गुरुद्वारे से लेकर सिख रेजीमेंट तक दिखने वाले 'निशान साहिब' की कहानी

लाल किला: सिख सेना के दिल्ली फतेह और गुरुद्वारे से लेकर सिख रेजीमेंट तक दिखने वाले 'निशान साहिब' की कहानी

इतिहास गवाह है कि दिल्ली के लाल किले पर हमेशा मुस्लिम शासकों ने राज किया था। लेकिन सन 1783 में ऐसा पहली बार हुआ जब सिख सेना ने मुगल बादशाह शाह आलम को घुटनों पर ला दिया और लाल किले पर केसरी निशान साहिब (झंडा) लहराया था।

दिल्ली का मशहूर किला जिसने अपने हर दरवाजे, हर दीवार, हर मेहराब. हर मीनार पर इतिहास को संजोया हुआ है। जिसकी बुनियाद में आज भी हिन्दुस्तान के मजदूरों के खून-पसीने घुले-मिले हैं। जिसकी प्राचीर से देश के सुल्तान का संबोधन होता है। जहां कि ईंट-ईंट सैलानियों को ललचाती है और नेताओं में सत्ता का ख़्वाब भी जगाती है। बीते 74 बरस से बार-बार हर प्रधानमंत्री ने लाल किले से समूचे देश को सपना दिखाया, समूची दुनिया में इस बात का संदेश दिया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। भारत के प्रथाम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने देश को पूर्ण आजादी मिलने पर 14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को ऐतिहासिक भाषण दिया था। इस भाषण का शीर्षक था- 'ट्रिस्ट विद डेस्टनी' यानी 'भाग्य के साथा वादा' वर्षों पहले हमने नियति को मिलने का एक वचन दिया था और अब समय आ गया है कि हम अपने वचन को निभाएं, पूरी तरह न सही पर बहुत हद तक तो निभाएं। आधी रात को जब पूरी दुनिया सो रही है। भारत जीवन और स्वतंत्रता की नई सुबह के साथ उठेगा। एक ऐसा क्षण जो इतिहास में एक बार ही आता है। 

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जिसके बाद से हिन्दुस्तान का वक्त बदलता रहा और उस वक्त की गवाही देता रहा लालकिला। लेकिन आज आजाद भारत की ऊंगली पकड़कर आपको इतिहास की उन गलियों में लिए चलचे हैं जहां लाल किला एक ख्वाब जैसा था। कहानी लाल किला की।

 दिल्ली में पहला किला 11वीं शताब्दी के दौरान तोमर वंश के राजा अनंगपाल द्वारा बनवाया गया था। महाराज अनंगपाल तोमर और कोई नहीं बल्कि महाभारत के अभिमन्यु के वंशज तथा महाराजा पृथ्वीराज चौहान के नाना थे। इस किले को लाल कोट के नाम से जाना जाता था। किले की सुरक्षा के लिए बुर्ज और गेट बनवाए थे। जिनके नाम गजनी गेट, सोहन गेट, रंजीत गेट। एएसआई के अनुसंधान के दौरान इन दरवाजो का पता चला था। बाद में पृथ्वीराज चौहान ने इसे फिर से बनवाया। लाल कोट से 24 किलोमीटर की दूरी पर मुगल बादशाह शाहजहां से लाल किले का निर्माण करवाया। 

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मुगल बादशाह शाहजहां उन दिनों आगरा से अपनी सल्तनत चला रहे थे। लेकिन आगरा के गर्म मौसम और सैनिकों के किले में कमी को देखकर उन्हें लगा दिल्ली से राज चलाया जाए। इसलिए 1618 ई में इस किले की पहली ईंट रखी गई। इस लाल किले की बुनियाद खड़ी करने में ही 21 साल लग गए और फिर लाल किला बनने में लगे पूरे 9 साल। 1639 से 1648 तक चला था लाल किले के निर्माण का कार्य। करीब डेढ़ किलोमीटर के दायरे में फैले इस भुजाकर इमारत में आने के दो रास्ते रखे गए लाहौरी गेट और दिल्ली गेट। 

दिल्ली फतेह दिवस

इतिहास गवाह है कि दिल्ली के लाल किले पर हमेशा मुस्लिम शासकों ने राज किया था। लेकिन सन 1783 में ऐसा पहली बार हुआ जब सिख सेना ने मुगल बादशाह शाह आलम को घुटनों पर ला दिया और लाल किले पर केसरी निशान साहिब (झंडा) लहराया था। सिख पंथ के महान योद्धा बाबा बघेल सिंह, बाबा जस्सा सिंह रामगढ़िया और जस्सा सिंह अहलूवालिया द्वारा 1783 में लाल किले पर केसरी निशान फहराकर मुगलराज का तख्ता पलट किया था। इतिहास के जानकारों के अनुसार बाबा बघेल सिंह की सेना में उस वक्त 12 हजार से भी अधिक घुड़सवार सैनिक शामिल थे। सिख इतिहास के अनुसार 1783 की शुरुआत में सिखों ने किला ए मुअल्ला (लाल किले) पर कब्जे की रणनीति बनाकर हजारों सैनिकों के साथ दिल्ली कूच किया था। इतिहास की कई किताबों में उल्लेखित है ति शाहजहां ने लाल किले को दो नाम दिये थे। किला ए मुअल्ला और किला ए मुबारक। किला बाहर से लाल दिखता था इसलिए आम लोगों ने इसे लाल किला बोलना शुरु कर दिया। औरंगजेब के जमाने से ही हिन्दुओं और सिखों के धर्म परिवर्तन कराने की रवायत चल पड़ी। सिखों के बहादुर योद्धा बाबा बंदा सिंह बहादुर को 740 सिखों के साथ मौत के घाट उतारने का फरमान सुनाया गया। सिखों पर अत्याचार के बाद बाबा बघेल सिंह की अगुवाई में जत्थेदार जस्सा सिंह आहलुवालिया और जस्सा सिंह रामगढ़िया ने मुगलों पर आक्रमण कर दिया। यूं तो यह तीनों अलग-अलग क्षेत्र से थे, इसलिए तीन रास्तों से आकर यह तीनों एक हो गए और दिल्ली के आसपास के इलाके जीतने के बाद सिख योद्धओं की सेना 11 मार्च को लाहौरी गेट और मीना बाजार को पार करती हुई लाल किले के दीवान ए आम पहुंच गई और वहां कब्जा कर लिया। दीवान ए आम पर कब्जा करने के बाद सिख सेना ने लाल किले के मुख्य द्वार पर खालसा पंथ का केसरी निशान साहिब फहराया। ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ था जब सिख सेना ने लाल किले पर कब्जा किया था। इसके बाद मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की ओर से सिख सेना से समझौता कर उन्हें तीन लाख रुपये नजराना पेश किया। कोतवाली क्षेत्र को सिखों की संपत्ति रहने दिया गया और बघेल सिंह को सिख इतिहास से संबंधित स्थानों पर गुरुद्वारा बनाने की अनुमति दी गई। 

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ब्रिटिश राज में लाल किला

अंग्रेजों ने लाल किले को एक राजमहल से आर्मी छावनी में तब्दील कर दिया। दीवान ए आम को सैनिकों के लिए अस्पताल में बदल दिया गया और दीवान ए खास को एक आवासीय भवन में तब्दील कर दिया गया। भारत की आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले पर तिरंगा फहराया। साल 2003 के दिसंबर तक लाल किले को भारतीय सेना के कैंप के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। बाद में इसकी देख रेख का जिम्मा भारतीय पुरातत्व विभाग के पास आ गया। 

लाल किले में मुकदमा

 बहादुर शाह जफर पर यहीं मुकदमा भी चला था। यहीं पर नवंबर 1945 में इण्डियन नेशनल आर्मी के तीन अफसरों का कोर्ट मार्शल किया गया था। हिन्दुस्तान की तारीख में लाल किला ट्रायल का अपना अलग ही स्थान है। लाल किला ट्रायल के नाम से प्रसिद्ध आजाद हिन्द फौज के ऐतिहासिक मुकदमे के दौरान उठे नारे लाल किले से आई आवाज- सहगल, दिल्लन, शाहनवाज ने उस समय हिन्दुस्तान की आजादी के हक के लिए लड़ रहे लाखों नौजवानों को एक सूत्र में बांध दिया था। वहीं महात्मा गांधी के हत्या के आरोप का मुकदमा नाथूराम गोडसे पर लाल किला में ही चला था और न्यायाधीश आत्मचरण की अदालत ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी की सज़ा सुनाई थी।

क्या इतिहास को दोहराया गया है ?

गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले की प्राचरी जहां हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर देश के प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं वहां धार्मिक झंडा लगा दिया। जिसके बाद से ही इसको लेकर तरह-तरह के दावे किए गए। आज आपको सिखों के पवित्र झंडे निशान साहिब के बारे में बताते हैं। 

निशान साहिब- निशान साहिब का मतलब ऊंची पताका या ऊंचा झंडा। सिख धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है। इसे सिख धर्म का धार्मिक झंडा कहा जाता है। गुरुद्वारे और सिखों के धार्मिक आयोजनों में निशान साहिब नजर आता है। हर साल बैसाखी के मौके पर पुराने झंडेको गुरुद्वारे से उतार कर नया निशान साहिब फहराया जाता है। गुरुद्वारों में इसे ऊंचाई पर फहराया जाता है। यह झंडा रेशम के कपड़ों का बना होता है जिसके सिरे पर रेशम की एक लटकन लगी होती है। निशान साहिब या खालसा पंत का झंडा अमूमन केसरिया रंग का होता है लेकिन निहंगों के गुरुद्वारों में इसका रंग नीला होता है। माना जाता है कि सन 1609 में पहली बार गुरु गोबिंद सिंह जी ने अकाल तख्त पर केसरिया निशान साहिब फहराया था। 

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गुरुद्वारे से लेकर सिख रेजीमेंट तक

इस झंडे के केंद्र में तलवार का चिन्ह होता है। इसके बारे में मान्यता है कि ये अच्छाई को बुराई से अलग करती है। एक चक्र होता है जिसे ईश्वर का प्रतीक माना जाता है। निशान साहिब को सिख समुदाय के ध्वज के रूप में जाना जाता है और यह भारतीय सेना की सिख रेजीमेंट के हर एक गुरुद्वारे में दिख जाएगा। जब भी सिख रेजीमेंट की कोई टुकड़ी मूव करती है तो वह इन गुरुद्वारों में ऐसे ही ध्वजों के साथ जाते हैं। सिख रेजीमेंट और सिख लाइट इंफ्रेंट्री की वाॅर क्राई 'जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल' को भी गुरु गोविंद सिंह के एक भजन से लिया गया है। सिख रेजीमेंट का आदर्श वाक्य है- निश्चय कर अपनी जीत करूं। 

देश की संप्रभुता का प्रतीक लाल किला

बताया जाता है कि प्रदर्शनकारियों ने जब लाल किले पर निशान साहिब फहराया उस वक्त भी जो बोले सो निहाल का नारा लगाते नजर आए थे। लेकिन जिस लाल किसे से शाहजहां से लेकर बहादुर शाह जफर तक 15 बादशाह देश पर हुकूमत चलाते रहे। इसी लाल किले की प्राचीर से 1911 में जार्ज पंचम और महारामी मैरी ने भारत की जनता को संबोधित किया था। आजादी के बाद से अब तक प्रधानमंत्री देश को यहीं से संबोधित करते रहे हैं। 21 तोपों की सलामी के साथ देश की शान तिरंगा फहराते रहे और देश के भविष्य का एजेंडा भी बताते रहे। लेकिन उसी प्राचीर इमारत पर अराजत और उन्मादी भीड़ का कब्जा बहुत गंभीर बात है। - अभिनय आकाश