1992 Scam का पूरा सच, कौन था स्टॉक मार्केट का 'बच्चन'

  •  अभिनय आकाश
  •  अक्टूबर 10, 2020   20:55
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1992 Scam का पूरा सच, कौन था स्टॉक मार्केट का 'बच्चन'

हर्षद मेहता इंडियन स्टॉक मार्केट का बड़ा नाम था। कहा जाता था कि हर्षद मेहता जिस चीज को छू देता था, वो सोना बन जाता था। उसे ‘स्टॉक मार्केट का अमिताभ बच्चन’ और ‘बिग बुल’ भी कहा जाता था। बैंकिंग सिस्टम की कमियों का फायदा उठाकर हर्षद मेहता ने बैंकिंग लेनदेन में गोलमाल किया था। पत्रकार सुचेता दलाल ने इस राज का पर्दाफाश किया।

सोनी लिव पर 9 अक्टूबर को रिलीज हुई वेब सीरिज जिसका की घोषणा के बाद से ही लंबे समय से इंतजार किया जा रहा था। हम बात कर रहे हैं, हर्षद मेहता की असल ज़िंदगी पर आधारित वेब सीरीज़ 'स्कैम 1992: द हर्षद मेहता स्टोरी' की। जिसकी कहानी 1980 और 90 के मुंबई की है। शुरुआत होती है 1992 में बॉम्बे के सेटअप से जहां एक पत्रकार ये बताने की कोशिश करता है कि बैंक से 4000 करोड़ का घोटाला हुआ है। हर्षद मेहता का नाम उन दिनों कितना बड़ा रहा होगा इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पत्रकार उसका नाम लेने से पहले पसीना-पसीना हो चुका है। स्कैम 1992 एक स्टॉक ब्रोकर हर्षद मेहता की ज़िंदगी को फॉलो करती है, जिसने अकेले स्टॉक मार्केट को ऊंचाई दी और फिर भयावह गिरावट भी।

आज बात हर्षद मेहता की करेंगे, 4 हजार करोड़ के घोटाले की करेंगे, तत्कालीन प्रधानमंत्री पर लगाए उसके आरोपों की करेंगे और साथ ही उसके रहस्यमई मौत की भी करेंगे।  

दलाल स्ट्रीट ये नाम पड़ा यहां होने वाले सबसे पुराने बिजनेस की वजह से 'दलाली'। एक ऐसी सड़क जहां दुनिया के ईमान को बदलने वाली ताकत यानी पैसे का राज चलता है। पर ये सड़क ईमानदारी के अनलिखे कायदों पर चलता है। यहां मुनाफा भी है और नुकसान भी। 

1954 में गुजराती परिवार में जन्में हर्षद मेहता ने अपना ज्यादातर समय छत्तीसगढ़ के रायपुर में बिताया। रायपुर से स्कूल की पढ़ाई करने के बाद वो वापस मुंबई लौट आया और लाजपत राय कॉलेज से बीकॉम की पढ़ाई की। पढ़ाई के बाद वो हॉजरी बेचने से लेकर डायमंड चुनने का काम करने लगा।

स्टॉक मार्केट में मेहता की एंट्री तब हुई जब उसने द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी में नौकरी शुरू की। यहीं से उसकी स्टॉक मार्केट में दिलचस्पी बढ़ी और नौकरी छोड़कर उसने 1981 में ब्रोकरेज फर्म ज्वाइन कर ली। 1984 में खुद की ग्रो मोर रीसर्स एंड असेट मैनेजमेंट नाम की कंपनी की शुरुआत की और और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में बतौर ब्रोकर मेंबरशिप ली। 1990 तक, हर्षद मेहता इंडियन स्टॉक मार्केट का बड़ा नाम बन चुका था। कहा जाता था कि हर्षद मेहता जिस चीज को छू देता था, वो सोना बन जाता था। उसे ‘स्टॉक मार्केट का अमिताभ बच्चन’ और ‘बिग बुल’ भी कहा जाता था।

कैसे होता था गोलमाल ?

बैंकिंग सिस्टम की कमियों का फायदा उठाकर हर्षद मेहता ने बैंकिंग लेनदेन में गोलमाल किया था। सुचेता दलाल ने उस वक्त के अपने लेख में बताया था कि हर्षद मेहता का यह फर्जीवाड़ा कैसे काम करता है। हर्षद मेहता रेडी फॉरवर्ड (आरएफ) डील के जरिए बैंकों से फंड उठाते थे। आरएफ डील का मतलब शॉर्ट टर्म लोन से है। बैंकों को जब शॉर्ट टर्म फंड की जरूरत पड़ती है तो वे इस तरह का लोन लेते हैं। इस तरह का लोन कम से कम 15 दिनों के लिए होता है।

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इसमें एक बैंक सरकारी बॉन्ड गिरवी रखकर दूसरे बैंकों को उधार देते हैं। रकम वापस करने के बाद बैंक अपना बॉन्ड दोबारा खरीद सकते हैं। इस तरह के लेनदेन में बैंक असल में सरकारी बॉन्ड का लेनदेन नहीं करते हैं। बल्कि बैंक रसीद जारी करते थे। इसमें होता ये है कि जिस बैंक को कैश की जरूरत होती है वह बैंक रसीद जारी करता था। यह हुंडी की तरह होता था। इसके बदले में बैंक लोन देते हैं। दो बैंकों के बीच की इस लेनदेन को बिचौलियों के जरिए किया जाता। हर्षद मेहता को इस तरह के लेनदेन की बारीकियों की जानकारी थी। बस फिर क्या! हर्षद मेहता ने अपनी पहचान का फायदा उठाते हुए हेरफेर करके पैसे लिए। फिर इसी पैसे को बाजार में लगाकर जबरदस्त मुनाफा कमाया।

उस दौरान शेयर बाजार में हर दिन चढ़ रहा था। कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि तब आंख बंद करके किसी भी शेयर में पैसा लगाने का मतलब प्रॉफिट ही होता था। बाजार की इस तेजी का फायदा उठाने के लिए ही हर्षद मेहता ने हेरफेर किया।

स्टॉक्स में लगाने के लिए कहां से आता था पैसा?

हर्षद मेहता बाजार में ज्यादा से ज्यादा पैसा लगाकर मुनाफा कमाना चाहते थे। लिहाजा उन्होंने जाली बैंकिंग रसीद जारी करवाई। इसके लिए उन्होंने दो छोटे-छोटे बैंकों को हथियार बनाया। बैंक ऑफ कराड और मेट्रोपॉलिटन को-ऑपरेटिव बैंक में अपनी अच्छी जानपहचान का फायदा उठाकर हर्षद मेहता बैंक रसीद जारी करवाते थे। इन्ही रसीद के बदले पैसा उठाकर वह शेयर बाजार में लगाते थे। इससे वह इंट्रा डे में प्रॉफिट कमाकर बैंकों को उनका पैसा लौटा देते थे। जब तक शेयर बाजार चढ़ता रहा, किसी को इसकी भनक नहीं पड़ी। लेकिन बाजार में गिरावट के बाद जब वह बैंकों का पैसा 15 दिन के भीतर नहीं लौटा पाए, उनकी पोल खुल गई। हर्षद मेहता के करतूतों का खुलासा होने के बाद ही शेयर बाजार के लिए रेगुलेटर की कमी महसूस हुई। इसी के बाद मार्केट रेगुलेटर सेबी का गठन हुआ।

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कैसे हुआ पर्दाफाश

1990 के दशक में हर्षद मेहता की कंपनी में बड़े इवेस्टर पैसा लगाने लगे थे, मगर जिस वजह से हर्षद मेहता का नाम स्टॉक मार्केट में छाया वो एसीसी यानी एसोसिएटेड सीमेंट कंपनी में उनका पैसा लगाना शुरू किया। हर्षद मेहता के एसीसी के पैसा लगाने के बाद मानो एसीसी के भाग्य ही बदल गए, क्योंकी एसीसी का जो शेयर 200 रुपये का था उसकी कीमत कुछ ही समय में 9000 हो गई। हर्षद मेहता के 1550 स्कॉवर फीट के सी फेसिंग पेंट हाउस से लेकर उनकी मंहगी गाड़ियों के शौक तक सबने उन्हें एक सेलिब्रिटी बना दिया था। ऐसा पहली बार हो रहा था कि कोई छोटा सा ब्रोकर लगातार इतना इंवेस्ट कर रहा है और हर इवेस्टमेंट के साथ करोड़ों कमा रहा है। बस इसी सवाल ने हर्षद मेहता के अच्छे दिनों को बुरे दिनों में तब्दील कर दिया। 

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1992 में हर्षद मेहता के इस राज से टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार सुचेता दलाल ने इस राज का पर्दाफाश किया। सुचेता दलाल ने बताया कि हर्षद मेहता बैंक से 15 दिन का लोन लेता था और उसे स्टॉक मार्केट में लगा देता था। साथ ही 15 दिन के भीतर वो बैंक को मुनाफे के साथ पैसा लौटा देता था। मगर कोई भी 15 दिन के लिए लोन नहीं देता, मगर हर्षद मेहता बैंक से 15 दिन का लोन लेता था। हर्षद मेहता एक बैंक से फेक बीआर बनावाता जिसके बाद उसे दूसरे बैंक से भी आराम से पैसा मिल जाता था। हालांकि इसका खुलासा होने के बाद सभी बैंक ने उससे अपने पैसे वापस मागने शुरू कर दिए। खुलासा होने के बाद मेहता के ऊपर 72 क्रमिनर चार्ज लगाए गए और सिविल केस फाइल हुए।

कैसे करता था घोटाला

हालांकि इन सब के बावजूद हर्षद मेहता का मन नहीं माना, वो अखबारों में एडवाइजरी कॉलम्स लिखने लगा कि आप इस कंपनी में इंवेस्ट करे आपको फायदा होगा या इस कंपनी में ना करें इससे नुकसान होगा। बाद में पता चला कि मेहता सिर्फ उस कंपनी में पैसा लगाने कि एडवाइस देता था जिसमें उसका खुद का पैसा लगा हुआ है।

प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव पर लगाया घोटाले का आरोप

हर्षद मेहता ने 1993 में पूर्व प्रधानमंत्री और उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष पीवी नरसिम्हा राव पर केस से बचाने के लिए 1 करोड़ घूस लेने का आरोप लगाया था। उसने दावा किया कि पीएम को उसने एक सूटकेस में घूस की रकम दी थी। हर्षद मेहता ने इस बारे में एक कॉन्फ्रेंस में खुलासा किया था और इसमें उनका साथ देने बैठे थे राम जेठमलानी। हर्षद मेहता ने कहा कि वह अपने साथ प्रधानमंत्री आवास एक सूटकेस ले गया था। उसमें 67 लाख रुपये थे। प्रेस कांफ्रेंस में मेहता ने कहा कि उसने सूटकेस राव के पर्सनल सेक्रेट्री राम खांडेकर को दे दिया। ऐसा उसने प्रधानमंत्री के कहने पर किया। एक करोड़ देने की बात थी, पर उस दिन सुबह तक 67 लाख का ही इंतजाम कर सका था। दूसरे दिन बाकी रकम पहुंचा दी। हर्षद ने उस प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि उसने प्रधानमंत्री को यह भी बताया था कि शेयर बाजार में पैसे कमाना कितना आसान है। उसने कहा कि वह शपथ पत्र दाखिल कर प्रधानमंत्री को पैसे देने की बात कही है। बहरहाल पीएम पर रिश्वत लेने का आरोप साबित नहीं हो सका। लेकिन न तो झूठा आरोप लगाने के आरोप में हर्षद मेहता को सजा हुई और न ही घूस लेने के आरोप में नरसिंह राव को। नरसिंह राव पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने आंध्र के नांदियाल लोकसभा उपचुनाव में खर्च करने के लिए हर्षद मेहता से पैसे लिए थे। हालांकि कांग्रेस द्वारा इसे सिरे से खारिज कर दिया गया था। 

रहस्यमई मौत

हर्षद मेहता पर कई सारे केस चल रहे थे मगर उसे मात्र 1 केस में दोषी पाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उसे दोषी पाते हुए 5 साल की सजा और 25000 रुपये का जुर्माना ठोका था। मेहता थाणे जेल मनें बंद था। 31 दिसंबर 2001 को देर रात सीने में दर्द की शिकायत हुई जिसके बाद उसे ठाणे सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उसकी मौत हो गई।- अभिनय आकाश







फेसबुक और ऑस्ट्रेलिया के बीच विवाद और समझौते के बारे में सबकुछ

  •  अभिनय आकाश
  •  फरवरी 24, 2021   18:59
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फेसबुक और ऑस्ट्रेलिया के बीच विवाद और समझौते के बारे में सबकुछ

फेसबुक ने बीते हफ्ते ऑस्ट्रेलिया में सभी मीडिया कंटेंट को ब्लॉक कर दिया। ऑस्टेलिया के लोगों ने जब खबरें पढ़ने या अन्य जरूरी जानकारियों के लिए अपने-अपने फेसबुक अकाउंट खोले तो उन्हें कुछ नहीं मिला। सुबह से ही ऑस्ट्रेलिया में आम लोग इस प्लेटफॉर्म पर खबरें नहीं देख पा रहे थे।

वे दुनिया को बदल रहे हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वे अब दुनिया को चलाएंगे भी। हम बड़ी टेक कंपनियों के धमकियों से डरने वाले नहीं है। वे हमारी संसद पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ये ऑस्टेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन का बयान है। आखिर कौन दे रहा था ऑस्ट्रेलिया को धमकी, और वो भी ऐसी की देश के प्रधानमंत्री को इस तरह के बयान देने की जरूरत आन पड़ी। देश और दुनिया की खबरे जानने के लिए बहुत सारे प्लेटफॉर्म मौजूद हैं। टीवी चैनल और मैगजीन के अलावा मीडिया हाउस अपनी बेवसाइट और ऐप के जरिये भी खबरें आप तक पहुंचाते हैं। वर्तमान दौर में गूगल और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म खबर तक पहुंचने या पढ़ने का एक बहुत बड़ा अड्डा बन चुके हैं। लेकिन क्या हो अगर आप एक सुबह उठे और फेसबुक अकाउंट ओपन करने पर आपको खबरें नजर ही न आए। फेसबुक ने बीते हफ्ते ऑस्ट्रेलिया में सभी मीडिया कंटेंट को ब्लॉक कर दिया। ऑस्टेलिया के लोगों ने जब खबरें पढ़ने या अन्य जरूरी जानकारियों के लिए अपने-अपने फेसबुक अकाउंट खोले तो उन्हें कुछ नहीं मिला। सुबह से ही ऑस्ट्रेलिया में आम लोग इस प्लेटफॉर्म पर खबरें नहीं देख पा रहे थे। इसके साथ ही उन्हें आधिकारिक हेल्थ पेज, आपातकालीन सुरक्षा चेतावनी आदि से जुड़ी अपडेट मिल पा रही थी। मीडिया आउटलेट्स के पेजों को ब्लॉक करते हुए फेसबुक ने कई गैर सरकारी संस्थानों के पेजों को भी ब्लॉक कर दिया। 

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दरअसल, ऑस्टेलिया में मीडिया बारगेनिंग कोड यानी एमबीसी नाम का एक कानून लाया गया है। इसके तहत मीडिया कंटेंट के लिए फेसबुक और अल्फाबेट जैसी कंपनियों को भुगतान करने को कहा गया। जिसके बाद फेसबुक और गूगल ने इसका विरोध किया। फेसबुक ने न्यूज कंटेंट देने वाले संस्थानों के पेजों को ब्लॉक कर दिया। जिस कोड के विरोध में फेसबुक ने कंटेंट पेज को ब्लॉक किया है उसे ऑस्ट्रेलिया की संसद ने अभी तक पारित भी नहीं किया। सोशल मीडिया की इस कंपनी के रवैये पर प्रतिक्रिया देते हुए ऑस्ट्रेलिया संसद के सदस्य और एनबीसी को लेकर बातचीत कर रहे सरकार के प्रतिनिधि ट्रेजर जॉश फेडनबर्ग ने कहा कि फेसबुक ने ये गलत किया है। उसका ये कदम गैर जरूरी था। उन्होंने तानाशाही दिखाई है और वे ऑस्ट्रेलिया में अपनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाएंगे। 

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क्या है कानून में

कोरोना महामारी के दौर में मीडिया हाउसेसज को घाटा का सामना करना पड़ा और छंटनी के दौर से भी उसे रूबरू होना पड़ा वहीं फेसबुक और गूगल जैसी सोशल मीडिया कंपनियों ने न्यूज लिंक शेयर करके काफी मुनाफा कमाया। बीते वर्ष ऑस्ट्रेलिया प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता आयोग की एक जांच में ये पता चला कि फेसबुक-गूगल ने मीडिया क्षेत्र में राजस्व और मुनाफे का एक भारी हिस्सा एकट्टा किया है। डेढ़ वर्ष तक चले इस जांच के अनुसार ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में डिजिटल विज्ञापन पर खर्च किए गए प्रत्येक 100 डॉलर में से 81 डॉलर गूगल और फेसबुक की जेबों में जाता है। जिसमें फेसबुक का हिस्सा 28 डॉलर और गूगल के हिस्से 53 डॉलर आता है। जिसके बाद ऑस्ट्रेलिया सरकार ने कानून बनाया जिसके अनुसार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अगर न्यूज कंटेट शेयर करेंगे तो संबंधित कंपनी से प्रॉफिट शेयर करना होगा। ऑस्टेलिया की सरकार के अनुसार इस कानून का उद्देश्य टेक कंपनियों और न्यूज मीडिया के बीच समानता स्थापित करना है। फेसबुक और गूगल इसके लिए तैयार नहीं हुए और अपनी सर्विस बंद करने की धमकी भी देने लगे। 

काम आया प्रेसर पॉलिक्स

फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने ऑस्ट्रेलिया के अफसरों से प्रस्तावित कानून के बारे में बातचीत की थी। ऑस्ट्रेलिया के पीएम ने दो टूक शब्दों में ये साफ कर दिया था कि फेसबुक की धमकियों के सामने झुकने का सवाल ही नहीं उठता। हम अपने देश और यहां कि कंपनियों के हित जरूर देखेंगे। इसके बाद मॉरिसन ने  दुनिया के कई राष्ट्रध्यक्षों से बात भी की।  

पीएम मोदी से की बात 

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन फेसबुक के कदम के खिलाफ दुनिया के नेताओं का समर्थन जुटाने की कोशिश में जुट गए। फेसबुक के फैसले के खिलाफ ऑस्टेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कड़ा रुख अपनाते हुए भारत और कनाडा के प्रधानमंत्रियों से बात की। इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि अन्य देश भी न्यूज शेयर करने के एवज में डिजिटल कंपनियों से शुल्क वसूलने के उनकी सरकार के फैसलों का अनुसरण कर सकते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात की। फेसबुक को चुनी हुई सरकारों को इस तरह से धमकाने की कोशिश बंद करनी चाहिए। मॉरिसन ने फेसबुक द्वारा लगाई रोक का मसला पीएम मोदी के सामने उठाया। 

ऑस्ट्रेलिया सरकार और फेसबुक के बीच हुई सहमति

इस्टन ने बताया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और पब्लिशर्स के बीच इनोवेशन और सहयोग को बढ़ाने वाले फ्रेमवर्क को हमने अपना समर्थन दिया है. उन्होंने बताया कि बातचीत के माध्यम से ऑस्ट्रेलिया की सरकार कई बदलावों के लिए सहमत हुई है. इन बदलावों के तहत अब पब्लिक जर्नलिज्म में निवेश का दायरा बढ़ेगा और आने वाले दिनों में ऑस्ट्रेलिया में न्यूज शेयरिंग पर लगा बैन भी फेसबुक हटाएगा.

न्यूज शेयरिंग समझौता

ऑस्ट्रेलिया सरकार के सख्त रुख और मसौदा कानून में कुछ बदलाव के ऐलान के बाद फेसबुक ने कहा कि वह अपने यूजर्स को आने वाले दिनों में धीरे-धीरे न्यूज प्रकाशित करने की अनुमति देगा। माना जा रहा है कि फेसबुक ने ऑस्ट्रेलिया सरकार के साथ एक समझौते के तहत यह बैन हटाने का फैसला लिया। माना जा रहा है कि फेसबुक और ऑस्ट्रेलिया के साथ एक समझौते के तहत यह बैन हटाने का फैसला किया है। 

क्या भारत में भी बनेंगे ऐसे कानून

ऑस्ट्रेलिया के बाद क्या भारत में भी ऐसे कानून बनेंगे। ये एक बड़ा सवाल है। कानून की जरूरतों पर ऑस्ट्रेलियाई पीएम ने भारत समते अन्य देशों से बात भी की। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार फेसबुक की ओर से अपने पाटर्नरों को इंस्टेंट आर्टिकल द्वारा और फेसबुक वॉच पर प्रकाशित वीडियो कंटेंट के बदले मीडिया वालों को पैसे देता है। गूगल और फेसबुक दोनों वीडियो विज्ञापन से होने वाली कमाई से भी भारतीय मीडिया कंपनियों को थोड़े पैसे देते हैं। लेकिन कमाई का कितना हिस्सा भारतीय कंपनियों को दिया जाता है इसका खुलासा नहीं हो पाया। अभी तक भारतीय मीडिया कंपनी ने औपचारिक रूप से अपने हिस्से की कमाई में बढ़ोत्तरी की मांग नहीं की है और ना ही भारत सरकार ने ऑस्टेलिया जैसे कानून लाने का कोई संकेत दिया है।- अभिनय आकाश







1971 युद्ध के सहारे डूबती नैया पार लगाएगी कांग्रेस

  •  अभिनय आकाश
  •  फरवरी 23, 2021   18:13
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1971 युद्ध के सहारे डूबती नैया पार लगाएगी कांग्रेस

कांग्रेस द्वारा 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध की 50वीं वर्षगांठ मनाने के लिए एक समिति का गठन किया। जिसकी अध्यक्षता पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी करेंगे। एंटनी इस दौरान पार्टी की गतिविधियों की योजना और समन्वय की निगरानी करेंगे।

तारीख 25 अप्रैल 1971 तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक बड़ी मीटिंग में देश के थल सेना अध्यक्ष से कहा कि पाकिस्तान को सबक सिखाना होगा। 71 की वो जंग जब हिन्दुस्तान ने दुनिया का नक्शा बदल दिया था। जब हिन्दुस्तान ने 13 दिनों में पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। जब पाकिस्तान के 93 हजार सैनिक लाचार युद्ध बंदी बने। जब हिन्दुस्तान को बांटने का मंसूबा रखने वाला पाकिस्तान खुद टुकड़े-टुकड़े हो गया। इस युद्ध के पांच दशक बाद कांग्रेस पार्टी अपनी छवि सुधारने और जमीन मजबूत करने के लिए 1971 युद्ध का सहारा लेने की तैयारी में है। कांग्रेस द्वारा 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध की 50वीं वर्षगांठ मनाने के लिए एक समिति का गठन किया। जिसकी अध्यक्षता पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी करेंगे। एंटनी इस दौरान पार्टी की गतिविधियों की योजना और समन्वय की निगरानी करेंगे। इस समिति में पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह, पूर्व स्पीकर मीरा कुमार और संयोजक प्रवीण डावर जैसे दिग्गज शामिल है जो अपने स्तर पर योजना बनाएंगे। इसके अलावा कमेटी में मीरा कुमार का नाम इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि 1971 के युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल में जगजीवन राम ही रक्षा मंत्री हुआ करते थे। मीरा कुमार बाबू जगजीवन राम की पुत्री हैं। 

कांग्रेस ने उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में पूर्व सैनिकों के साथ ब्लॉक स्तर पर सम्मेलन आयोजित करने का फैसला किया है। 2014 में सत्ता से बेदखल होने और सत्तारूढ़ भाजपा के राजनीतिक हमले का सामना करती कांग्रेस राष्ट्रीवाद की भावना पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए संघर्ष कर रही है। पार्टी के लिए 1971 के युद्ध के सहारे अपने जमीनी स्तर पर मजबूती और खुद को पुनर्जीवित करने के इरादे से ऐसा करने का सोचा। यह अक्टूबर में है कि राज्य स्तरीय सम्मेलनों के रूप में हाई-प्रोफाइल कार्यक्रम होंगे। कार्यक्रम में बांग्लादेश के निर्माण पर सेमिनार, व्याख्यान और राष्ट्रीय सुरक्षा में इसका महत्व शामिल होगा। साथ ही पार्टी युवा पीढ़ी को सेमिनल इवेंट से परिचित कराने के लिए निबंध और क्विज प्रतियोगिताओं का आयोजन करेगी। 16 दिसंबर, 2021 यानी विजय दिवस की स्वर्ण जयंती पर राजधानी में एक राष्ट्रीय बैठक में इसका समापन होगा। दिसंबर 1971 में भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तानी सेना पर एक निर्णायक और ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। जिसके परिणामस्वरूप एक राष्ट्र-बांग्लादेश का निर्माण हुआ और दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण भी हुआ। 16 दिसंबर को भारत में विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन पाकिस्तान के खिलाफ 1971 में भारत को जीत मिली थी, जिसके फलस्वरूप एक देश के रूप में बांग्लादेश अस्तित्व में आया था। 

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एंटोनी कमेटी की रिपोर्ट और कांग्रेस की छवि 

साल 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी का हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद पर जोर रहा। वहीं कांग्रेस पार्टी बीजेपी के निशाने पर रही और उसकी छवि एंटी हिंदू की बनती रही। अपनी छवि और हार की समीक्षा के लिए कांग्रेस ने एक कमेटी बनाई थी जिसके अध्यक्ष कांग्रेस के वही दिग्गज नेता एके एंटनी हैं जिन्हें 1971 युद्ध वर्षगांव मनाने वाली समिति की कमान सौंपी गई है। 2014 के चुनाव में कांग्रेस के 44 सीटों पर सिमटने के बाद इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में माना की यूपीए 1 और 2 की सरकार के दौरान पार्टी के नेताओं के बयान ने पार्टी की छवि एंटी हिंदू बना दी थी। बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद दिग्विजय सिंह सरीखे नेताओं के बयान हो या पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों वाले बोल। जिससे उबरने के लिए ही राहुल गांधी ने गुजरात चुनाव से पूर्व मंदिर प्लान बनाया, जनेऊधारी हिन्दू भी बने और भगवान शिव के अन्नय भक्त भी। लेकिन जेएनयू में जब भारत के टुकड़े वाले नारे लगने के आरोप लगे तो जेएनयू में जाकर राहुल गांधी का खड़ा होना और 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगना। और तो और बालाकोट एयर स्ट्राइक पर भी सवाल उठाना जिसका खामियाजा 2019 के चुनाव में सभी ने देखा। 

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सेल्फी विद तिरंगा अभियान 

5 अगस्त 2020 को जब अयोध्या में राम मंदिर के लिए भूमि पूजन का कार्यक्रम चल रहा था तो ट्विटर के जरिये हिंदुत्व से भी मजबूती से जुड़ने की काफी कोशिश की। लेकिन सारी कोशिशें नाकाफी साबित होने के बाद तय हुआ कि एक बार वो फॉर्मूला अपना कर देखा जाये जिसके बूते भारतीय जनता पार्टी पहले लोकसभा और फिर पंचायत स्तर तक पर सफलता प्राप्त करने हुए स्वर्णिम काल के सपने की तरफ तेजी से कदम बढ़ा रही है। कांग्रेस ने अपनी डूबती नैया को पार लगाने के लिए सेल्फी विद तिरंगा अभियान की शुरुआत की थी। 28 दिसंबर को कांग्रेस के 136वें स्थापना दिवस के अवसर पर ऑनलाइन कैंपेन चलाया गया। गौरतलब है कि बीजेपी भी कई मौकों पर तिरंगा यात्रा जैसे अभियान करती रही है। 

सर्जिकल स्ट्राइक पर बीजेपी का कार्यक्रम 

सर्जिकल स्ट्राइक की वर्षगांठ पर बीजेपी की तरफ से कई कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। सरकार ने इसे पराक्रम पर्व के रूप में मनाया छा। देशभर में कार्यक्रम आयोजित कर भारतीय जवानों की वीरगाथा सुनाई गई। बीजेपी ने सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो जारी कर प्रधानमंत्री मोदी का पाकिस्तान को सख्त लहजे में दिए जा रहे संदेश भी शामिल थे। इसके साथ ही जगह-जगह पोस्टर और होर्डिग्स भी लगवाए गए थे। 

कांग्रेस के लिए इसे विडंबना ही कहा जाएघा कि जिस पाकिस्तान के खिलाफ जंग लड़कर कांग्रेस की इंदिरा गांधी सरकार ने बांग्लादेश को अलग राष्ट्र की मान्यता दी और पूरी दुनिया से दिलायी भी। वो कांग्रेस राजनीति के उस छोर पर खड़े-खड़े लगातार कोशिश कर रही है कि कैसे वो लोगों को समझा पाये कि कांग्रेस पार्टी कभी पाकिस्तान के फायदे की बात नहीं करती। बीते 16 दिसंबर को पाकिस्तान के खिलाफ जंग में जीत का जश्न विजय दिवस के रूप में मनाया गया था। लेकिन इस वर्ष युद्ध जीतने के 50 साल पूरे हो रहे हैं और कांग्रेस विजय दिवस की स्वर्ण जयंती व्यापक पैमाने पर करने की तैयारी में है। कांग्रेस की चाह लोगों को यह समझाने की है कि बीजेपी की मोदी सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक से बरसों पहले कांग्रेस की इंदिरा सरकार ने पाकिस्तान को सबसे बड़ा सबक सिखाया था। 

बहरहाल, राष्ट्रवाद के सहारे अपनी खोई जमीन पाने की आस लगाए कांग्रेस को इसका लाभ मिलता है या नहीं? क्योंकि कभी सेना पर सवाल तो कभी हिन्दुओं के खिलाफ प्रोपेगेंडा जैसी करतूतों को अंजाम देकर कांग्रेस नेताओं ने राष्ट्रीय फलक पर अपनी फजीहत ही कराई है।- अभिनय आकाश







धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ फ्रांस का नया कानून, अब डर पाला बदलेगा

  •  अभिनय आकाश
  •  फरवरी 22, 2021   19:12
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धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ फ्रांस का नया कानून, अब डर पाला बदलेगा

दुनियाभर के लोकतांत्रिक देश इस समस्या से परेशान हो रहे हैं। चाहे वो भारत जैसा देश हो या फिर दूसरे ऐसे देश हो जहां लोकतंत्र इस समय चल रहा है। भारत बड़ी मुस्लिम आबादी वाला लोकतांत्रिक देश है। भारत में आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है। भारत भी कमोबेश कट्टरता की समस्या से जूझ रहा है।

अगर आप किसी पर तरस खाकर उसे अपने घर में शरण दे देते हैं। शरण पाने पर फिर वो कहे कि ये घर मेरे हिसाब से चलेगा। नहीं चलने पर वो आपके परिवार के लोगों का सिर काट दे। तो फिर क्या आप ताउम्र किसी को अपने घर में शरण देने की हिम्मत कर पाएंगे। अपको इस बात का भी अफसोस रहेगा कि आखिर मैंने इसको शरण क्यों दे दी। आगे से कोई आपके घर में न घुस पाए और अगर घुस चुका है तो आपके हिसाब से ही रहे। इसको लेकर कानून भी बनाएंगे। दरअसल ये कहानी आज तमाम यूरोपीय देशों की है। जिन्होंने मानवता के आधार पर शरण दे दी। देशहित से ऊपर देश को रखा और बदले में उन्हें मिले दंगे और गला काट कट्टरता। तुम मुझे शरण दो मैं तुम्हें दंगा दूंगा। लेकिन अब फ्रांस इसी कट्टरता के खिलाफ कानून बना रहा है। जहां मस्जिदों पर ताला भी लगा, मस्जिदों पर निगरानी भी होगी। सेक्युलरिज्म की पढ़ाई होगी। ऐसे में आज हम बात करेंगे कि क्या है ये बिल और क्यों विवादों में है। इसका फ्रांस और यूरोप पर क्या असर होगा। 

फ्रांस की आबादी 6 करोड़ 70 लाख के आसपास है। फ्रांस बहुत ही नीटो पॉवर कंपनी और न्यूकिल्यर का मेंबर और यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में परमानेंट सीट। धार्मिक रुप स देखे तो फ्रांस रोमन कैथलिक और 40 प्रतिशत लोग किसी धर्म को नहीं मानते हैं वहीं। इस्लाम को मानने वाले 5 प्रतिशत लोग फ्रांस में हैं। बताया ये जा रहा है कि आने वाले सालों में फ्रांस की 12 से 13 प्रतिशत आबादी इस्लाम को मानने वाली होगी। कुल मिलाकर कहे तो फ्रांस में किश्चन धर्म के बाद सबसे ज्यादा इस्लाम को मानने वाले हैं। 

सपोर्टिंग रेसपेक्ट फॉर द प्रिंसिपल्स ऑफ द रिपब्लिक इस कानून का नाम है और ये कानून फ्रांस के निचले सदन में पास हो चुका है और इसे एंटी सेप्रेटिज्म लॉ भी कहा जा रहा है। 

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फ्रांस के नए कानून की 10 बड़ी बातें

अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी या बच्ची की मेडिकल जांच किसी पुरुष डॉक्टर से कराने से इंकार करता है या शादी के लिए किसी लड़की को मजबूर किया जाता है। एक से अधिक शादियां की जाती है तो करीब 13 लाख रुपये का जुर्मना लगाया जाएगा। बता दें कि शरिया कानून के अनुसार मुसलमान चार शादी कर सकता है। लेकिन फ्रांस में नए कानून  आने के बाद अब ऐसा मुमकिन नहीं है।

फ्रांस में बीते वर्ष हाई स्कूल शिक्षक सैमुएल पैटी की हत्या की गई। पैटी पर आरोप था कि उन्होंने कक्षा में पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाया था। उसके बाद घर लौटते वक्त उनकी हत्या कर दी गई। पैटी की हत्या एक छात्र द्वारा ही किए जाने की बात सामने आई। जिसके बाद से ही स्कूली शिक्षक क्लास में ऐसी बातें कहने से डरने लगे जिससे मुस्लिम छात्र कहीं नाराज न हो जाए। लेकिन फ्रांस में सैमुएल पैटी नाम से इस कानून में प्रावधान जोड़ा गया। जिसेक तहत कोई भी व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी और अधिकारी के खिलाफ उससे जुड़ी निजी जानकारियों को सोशल मीडिया पर शेयर करता है तो उस पर 40 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा और तीन साल की जेल भी होगी। 

इस कानून में तीसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि सभी नागरिकों को फ्रांस की धर्मनिरपेक्षता का सम्मान करना होगा। 

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कोई व्यक्ति फ्रांस के किसी सरकारी अधिकारी या जनप्रतिनिधि को डराता है और उसे फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ जाने के लिए मजबूर करता है तो उसे 5 साल तक जेल होगी और करीब 65 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया जाएगा। 

अपने बच्चों को घर पर ही पढ़ाने की चाह रखने वाले लोगों को फ्रांस की सरकार से इस बात की इजाजत लेनी होगी और इसके पीछे के ठोस वजह को भी बताना होगा। 

सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा ये सुनिश्चित किया जाएगा कि खेल-कूद में किसी भी तरह का लिंग भेदभाव न हो। लड़कियों के लिए अलग स्विमिंग पूल और लड़कों के लिए अलग इस बात की अनुमति फ्रांस की सरकार की तरफ से नहीं होगी। 

नए कानून के तहत फ्रांस के सभी धार्मिक संस्थानों को विदेशों से मिलने वाले चंदे की जानकारी सरकार को देनी होगी। अगर फंडिग 8 लाख से ज्यादा है तो सरकार को इसकी सूचना देनी होगी। ऐसा नहीं करने की स्थिति में फ्रांस की सरकार द्वारा ऐसे धार्मिक संस्थानों को देश से मिलने वाली आर्थिक मदद को बंद कर दिया जाएगा। 

विभिन्न समूहों और संस्थाों को सरकार से विशेष सहायता मिलती है। उन्हें एक समझौते पर हस्ताक्षर करने होंगे। इस समझौते के तहत फ्रांस के संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का सम्मान अनिवार्य होगा। 

धार्मिक संस्थानों में दो समुदायों के बीच टकराव और वैमनस्य पैदा हो इस तरह के भाषण नहीं दिए जा सकेंगे।

जिल लोगों पर फ्रांस में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप होगा, ऐसे लोगों पर धार्मिक संस्थानों में हिस्सा लेने पर 10 साल के लिए बैन लगा दिया जाएगा। 

बिल को लेकर फ्रांस का रूख

1905 से सेक्युलर विचार अपनाने वाले फ्रांस ने पिछले कुछ समय से इस्लाम के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया। फ्रांस के मुस्लिमों को 'काउंटर सोसायटी' कहा जाता है और यह भी तथ्य है कि यूरोप में फ्रांस वह देश था, जिसने 2004 में हिजाब पर प्रतिबंध लगाया।

मैक्रों 'इस्लाम में सुधार' संबंधी बयान दे चुके हैं, जिन पर काफी तीखी प्रतिक्रिया हो चुकी है। यह फैक्ट भी कुछ कहता है कि 2012 से फ्रांस में मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने करीब 36 हमले किए हैं।

इस्लाम के खिलाफ लामबंदी को 2022 चुनाव के मद्देनज़र मैक्रों की राजनीति भी माना जा रहा है। मैक्रों एक ऐसा कानून लाने की तैयारी में हैं, जिसके तहत विदेशी फंड से ट्रेंड इमाम फ्रांस में नहीं आ सकेंगे। यह भी प्रस्ताव है कि मस्जिदों को स्टेट फंडिंग मिले और टैक्स ब्रेक्स भी।

मैक्रों खुद 'इस्लाम के संकट' में होने संबंधी बयान देते रहे हैं, तो उनके मंत्री भी 'इस्लामी अलगाववाद' और इस्लाम को केंद्र में रखकर फ्रांस के सामने 'सिविल वॉर' के खतरे होने जैसे बयान देते रहे हैं।

बिल पर राजनीति

फ्रांस की सरकार का मानना है कि इस बिल के कानून का शक्ल लेने के बाद चरमपंथ से लड़ने की सरकार की कोशिशों को बल मिलेगा। हालांकि विरोध करने वालों की अपनी आशंकाएं हैं। उनका कहना है कि जिन उपायों की बात हो रही है वो मौजूदा कानूनों में शामिल हैं। विरोधी पक्ष बिल के पीछे राजनीतिक मंशा को तलाश रहे हैं। सरकार का मानना है कि होम स्कूल के माध्यम से बच्चों को धार्मिक विचारों की शिक्षा दी जाती है जिसे रोकने की मंशा है। किसी भी सरकारी कर्मचारी को धमकी देने वाले को जेल की सजा हो सकती है। इसे भी सैमुअल पैटी से जोड़ कर देखा जा रहा है। अगर किसी कर्मचारी को धमकी मिली है तो उसके बॉस को तुरंत इस पर कार्रवाई करनी होगी बर्शर्ते कर्मचारी इसके लिए सहमत हो। 

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फ्रांस को ऐसा करने की  नौबत क्यों आई

दूसरे देशों से आए शरमार्थी और फ्रांस में बढ़ती कट्टर इस्लामिक आतंकवाद की घटानाओं की वजह से फ्रांस ने अपनी जमीन से धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंक दिया है। फ्रांस में बॉर्डर एरिया से बड़ी संख्या में शरणार्थी अन्य देशों से आकर बस गए। 2012 में गृह युद्ध के मुहाने से सीरिया गुजर रहा था। उस दौर में फ्रांस में शरण लेने वाले मुसलमानों की गिनती एक लाख तक पहुंच गई थी।आतंकी संगठन आईएसाईएस के इराक, सीरिया और लीबिया के इलाकों को कब्जा करने के बाद यूरोप में शरण लेने वाले मुसलमानों की संख्या में बढोत्तरी हुई। 2017 में फ्रांस में रिकॉर्ड डेढ़ लाख लोगों ने शरण ली। 2019 आते-आते ये संख्या दो लाख हो चुकी थी। 13 नवंबर 2015 को फ्रांस में सुनियोजित तरीके से कई आतंकवादी हमले हुए जिसमें 130 लोग मारे गए थे। 14 जुलाई 2016 को फ्रांस के नीस शहर में एक आतंकवादी ने भीड़ पर ट्रक चढ़ा दिया था जिसमें 84 लोग मारे गए थे। 3 अक्टूबर 2019 को एक आतंकवादी ने तीन पुलिस अफसर और एक आम नागरिक को अपना निशाना बनाया। 16 अक्टूबर को सैमुएल पैटी की एक अलगाववादी द्वारा हत्या कर दी गई। 

भारत में कट्टरता की समस्या

दुनियाभर के लोकतांत्रिक देश इस समस्या से परेशान हो रहे हैं। चाहे वो भारत जैसा देश हो या फिर दूसरे ऐसे देश हो जहां लोकतंत्र इस समय चल रहा है। भारत बड़ी मुस्लिम आबादी वाला लोकतांत्रिक देश है। भारत में आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है। भारत भी कमोबेश कट्टरता की समस्या से जूझ रहा है। कुछ वक्त पूर्व ही गृह मंत्रालय ने भारत में कट्टरता की स्थिति पर अपनी तरह के पहले शोध अध्ययन को मंजूरी दी है, जिसके माध्यम से विधिक रूप से कट्टरता को परिभाषित करने का प्रयास किया जाएघा और उसी आधार पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम 1967 में संशोधन किया जाएगा। मंत्रालय का ये भी दावा है कि यह अध्ययन पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष होगा और भारत में अभी भी कट्टरता को कानूनी रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। जिसकी वजह से पुलिस और प्रशासन द्वारा इस स्थिति का दुरुपयोग किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार धार्मिक कट्टरता के संदर्भ में केरल और कर्नाटक में इस्लामिक स्टेट और अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों के सदस्यों के बढ़ते गतिविधियों के बारे में आगाह किया गया है। - अभिनय आकाश







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