अशोक सिंघल से नजदीकी, इंदिरा ने भेजा जेल, रामलला के पटवारी की अनसुनी कहानी, जिसे देना पड़ा अपने पद से इस्तीफा

Champat Rai
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अभिनय आकाश । Jun 26 2026 2:26PM

एसआईटी की शुरुआती रिपोर्ट में कठोर संस्तुति के बाद यह बड़ा फैसला लिया गया। आखिर कौन है चंपत राय? कैसे एक केमिस्ट्री प्रोफेसर राम मंदिर आंदोलन का सबसे प्रभावशाली चेहरा बन गया और अब जब चढ़ावे की कथित चोरी पर सवाल उठ रहे हैं तो उनके खिलाफ आवाजें क्यों तेज हो रही हैं?

रामचरितमानस में कहा गया है कि होइ है सोई जो राम रचराखा। अयोध्या के जिस राम मंदिर को बनवाने के लिए 550 साल की लड़ाई राम भक्तों ने लड़ी जिसके लिए ना जाने कितने लोग जेल गए, कितनों ने प्राण दे दिए, कितनों की आंखें इंतजार में दुनिया छोड़कर चली गई। कितने मांओं ने अपने बच्चों को न्योछावर कर दिया। जब वो राम मंदिर भव्य बनकर तैयार हुआ तो लगा कि अब राजा राम की भक्ति में कोई कोर कसर नहीं रखी जाएगी। लेकिन क्या हमारे अपने राम भक्तों ने रामलला के मंदिर में लालच को नहीं छोड़ा, करप्शन कर दिया, पैसा लूट लिया भक्तों का। हां आरोप यही लग रहा है कि करोड़ों राम भक्त जो रामलला के दर्शन करने जाते हैं और अपनी औकात के हिसाब से ₹1, ₹100, सोना-चांदी, गहना मंदिर में चढ़ा कर आते हैं। यह आरोप लग रहा है कि उस पैसे में लूट घसोट हुई है। अयोध्या के राम मंदिर दान चोरी मामले की जांच कर रही एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी और इसके बाद एक्शन का दौर भी शुरू हुआ। एफआईआर हुई, गिरफ्तारियां शुरू हुई और पूछताछ अभी भी जारी है। इस पूरे विवाद के बीच एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। वह हैं चंपत राय। राम जन्मभूमि ट्रस्ट के दो सदस्य चंपत राय और अनिल मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया है। एसआईटी की शुरुआती रिपोर्ट में कठोर संस्तुति के बाद यह बड़ा फैसला लिया गया। आखिर कौन है चंपत राय? कैसे एक केमिस्ट्री प्रोफेसर राम मंदिर आंदोलन का सबसे प्रभावशाली चेहरा बन गया और अब जब चढ़ावे की कथित चोरी पर सवाल उठ रहे हैं तो उनके खिलाफ आवाजें क्यों तेज हो रही हैं?

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कौन हैं चंपत राय

चंपत राय का जन्म 1946 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में हुआ था। कम उम्र में ही उनका जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस से हो गया। उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने धामपुर के आश्रम डिग्री कॉलेज में केमिस्ट्री के प्रोफेसर के रूप में नौकरी शुरू की। लेकिन उनकी जिंदगी का रास्ता बदलने वाला था। 1975 में  इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी का ऐलान कर दिया था। विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी होने लगी। जब देश में विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी हो रही थी। तब चंपत राय बिजनौर के डिग्री कॉलेज में बच्चों को कैमेस्ट्री पढ़ा रहे थे। तभी अचानक कॉलेज के कॉरिडोर में शोर होने लगा। उन्होंने देखा तो गेट पर कुछ पुलिसकर्मी खड़े थे। फिर पुलिसवाले कॉलेज के प्रिंसिपल के पास चले गए। थोड़ी देर बाद कॉलेज का चपरासी चंपत राय की क्लास में आया और बोला कि आपको प्रिसिंपल बुला रहे हैं। वो प्रिसिंपल के पास पहुंचे तब पुलिस वाले ने चंपत राय से कहा कि वो उन्हें गिरफ्तार करने आए हैं। तो चंपत राय ने कहा कि मैं अभी छात्रों को पढ़ा रहा हूं। आप अभी जाइए मैं अपनी क्लास खत्म करके खुद थाने आ जाऊंगा। चंपत राय सुनने के बाद पुलिसवाले वहां से चले गए। क्लास खत्म होने के बाद चंपत राय थाने पहुंचे जहां पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। वो 18 महीने जेल में रहे। चंपत राय की ये गिरफ्तारी इमरजेंसी के दौरान ही हुई थी। 1980 में जेल से रिहा होने के बाद चंपत राय ने नौकरी से इस्तीफा दिया। वो संघ के प्रचारक बन गए। संघ में उनके काम को देखते हुए तत्कालीन सरसंघचालक रज्जू भैय्या प्रभावित हो गए। उसके बाद उन्होंने राम मंदिर की लड़ाई लड़ने के लिए 

अशोक सिंघल के 'अदृश्य सारथी'

राम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास में चंपत राय का नाम एक ऐसे रणनीतिकार के रूप में दर्ज है, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर पूरी पटकथा लिखी। राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव बनने से पहले तक आम जनता में उनकी पहचान भले ही सीमित रही हो, लेकिन संघ और आंदोलन के भीतर उनका कद बेहद मजबूत था। चंपत राय की सबसे बड़ी खूबी उनका समावेशी दृष्टिकोण था। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन को किसी एक वर्ग विशेष तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि सवर्ण समाज से आगे ले जाकर समाज के हर तबके तक इसकी पहुंच बनाई। देश भर में चले ऐतिहासिक 'शिला पूजन' और घर-घर से ईंटें जुटाने के अभियान के पीछे चंपत राय का ही दिमाग था। राम काज मिलने के बाद चंपत राय अवध के गांव गांव घूमे। अगर अशोक सिंघल विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस का मुखर चेहरा थे, तो चंपत राय इसके मूक शिल्पकार थे, जो हमेशा लो-प्रोफाइल रहकर आंदोलन को धरातल पर आकार दे रहे थे।

अवध से आंदोलन की कमान और जनता में जगाया भरोसा

अशोक सिंघल के बेहद करीबी रहे एक प्रचारक के मुताबिक, चंपत राय को 1991 में अवध प्रांत के क्षेत्रीय मंत्री की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उस दौर में अयोध्या और आसपास के स्थानीय लोगों में मंदिर को लेकर चल रही लंबी कानूनी लड़ाई की वजह से एक तरह की निराशा घर कर गई थी। चंपत राय ने न सिर्फ इस निराशा को दूर किया, बल्कि स्थानीय समाज को सीधे आंदोलन से जोड़कर उनमें यह विश्वास जगाया कि कानूनी लड़ाई में हिंदू पक्ष की जीत निश्चित है। 

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क्यों कहा जाने लगा रामलला का पटवारी

राम जन्मभूमि से जुड़े तमाम कानूनी दस्तावेज, साक्ष्य और अदालती मुकदमों की बारीकियां चंपत राय की देखरेख में ही थीं। केस के हर पहलू पर उनकी सीधी पकड़ थी। अदालत की सुनवाई के दौरान वकीलों और आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच समन्वय को जिम्मेदारी से संभाला। उनकी इसी मेहनत और समर्पण के कारण लोग उन्हें रामलला का पटवारी भी कहने लगे। जब 2019 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ तब बने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में चंपत राय को महासचिव की जिम्मेदारी दी गई। यहीं से उनकी ताकत और प्रभाव दोनों बढ़े। मंदिर निर्माण, ट्रस्ट का प्रशासन, मीडिया से संवाद, व्यवस्थाएं, बड़े फैसलों पर चंपत राय सबसे प्रमुख चेहरे बनते गए। ट्रस्ट में कई बड़े नाम मौजूद थे। लेकिन माना जाता रहा कि वास्तविक संचालन की कमान चंपत राय के हाथ में थी। 

कैसे शुरू हुआ पूरा मामला

मामले की शुरुआत 7 जून को हुई। तब पूर्व मंत्री और सपा नेता पवन पांडेय ने चढ़ावे में 5-7 करोड़ की चोरी का दावा किया। इसके बाद अखिलेश ने भी मुद्दे को उठाया और सरकार व ट्रस्ट की चुप्पी को संदिग्ध बताया। नौ जून को भाजपा नेता डॉ. रजनीश सिंह ने पीएम को पत्र लिखकर सीबीआई जांच की मांग की। इस बीच, मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र भी आयोध्या पहुंचे लेकिन उन्होंने इस पर कोई बात नहीं की। मंदिर के पूर्व अकाउंट इंचार्ज महिपाल सिंह ने दावा किया कि लंबे समय से गड़बड़ी हो रही थी। उन्होंने शीर्ष प्रबंधन से इसकी शिकायत की। कार्रवाई के बजाय उन्हें पद से हटा दिया गया। दरअसल खुद को पूर्व लेखा प्रभारी बताने वाले महिपाल सिंह ने मीडिया से बातचीत में एक दावा किया है। आरोप लगाया है कि जब वह मंदिर में तैनात थे तब चढ़ावे में आने वाले सोने चांदी के जेवर और बर्तनों का कहीं कोई रिकॉर्ड ही नहीं होता था। यह कहां जमा होते थे इसकी जानकारी सिर्फ चंपत राय और टिन्नू को होती थी। टिन्नू चंपत राय के नजदीकी हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक टिन्नू उर्फ रामशंकर यादव पहले चंपत राय के ड्राइवर अब उनके सहयोगी हैं।

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ट्रस्ट का गठन कैसे हुआ

नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इसके बाद केंद्र सरकार को राम मंदिर के निर्माण और उसके प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया गया। इसी के बाद 5 फरवरी 2020 को केंद्र सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन की घोषणा की। यही ट्रस्ट आज राम मंदिर के निर्माण, उसके रखरखाव, मंदिर में आने वाले दान और पूरे राम जन्मभूमि परिसर के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल रहा है। ट्रस्ट बनने के कुछ दिनों बाद इसकी पहली बैठक हुई। इसमें महंत नृत्य गोपाल दास को ट्रस्ट का अध्यक्ष चुना गया। जबकि चंपत राय को महासचिव बनाया गया। इसके बाद राम मंदिर निर्माण का काम तेजी से आगे बढ़ने  लगा। देश भर के लोगों ने खुलकर दान दिया। किसी ने ₹100 दिए, किसी ने हजारों और लाखों रुपए दिए। बड़े उद्योगपति से लेकर आम श्रद्धालुओं तक लाखों लोगों ने मंदिर निर्माण में योगदान दिया। फिर 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई। इसके बाद अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली।

राम मंदिर में कितना दान आता है

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 204-25 में ट्रस्ट को कुल ₹327 करोड़ मिले। यह डाटा राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्टकी सालाना रिपोर्ट में बताया गया है। ₹327 करोड़ में से 153 करोड़ श्रद्धालुओं के दान से आए। जबकि लगभग ₹173 करोड़ बैंक में जमा रकम और निवेश पर मिले ब्याज के थे। सिर्फ दान की बात करें तो मंदिर में रोजाना औसतन करीब 42 लाख का चढ़ावा आता है। यानी हर घंटे लगभग ₹175000 और हर मिनट करीब ₹2900 से भी ज्यादा और जब त्यौहार हो या कोई खास मौका हो, बड़ा मौका हो तो यह आंकड़ा और भी बढ़ जाता है। मंदिर के उद्घाटन वाले दिन ही लगभग 3 करोड़ 17 लाख का दान आया था। इस बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यहां कितनी बड़ी मात्रा में दान आता है, नकदी आती है। राम जन्मभूमि परिसर में अलग-अलग जगहों पर करीब 40 दान पेटियां रखी गई हैं। इसके अलावा ऑनलाइन दान की भी व्यवस्था है। दान पेटियों से निकली नगदी को तय प्रोसीजर के तहत एक सुरक्षित और गोपनीय कक्ष में ले जाया जाता है। वहां सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में इसकी गिनती होती है। इस काम में ट्रस्ट के प्रतिनिधि और बैंक से जुड़े कर्मचारी शामिल रहते हैं। जानकारी के मुताबिक दान की गिनती की जिम्मेदारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को दी गई है। बैंक ने इसके लिए एक निजी एजेंसी के कर्मचारियों को भी नियुक्त किया हुआ है। नोट गिनने की मशीनों और सिक्कों की मैनुअल गिनती के जरिए पूरी रकम का हिसाब किया जाता है। कई बार गिनती या नगदी इतनी ज्यादा होती है कि गिनती का काम 24 घंटे तक भी चलता रहता है। गिनती पूरी होने के बाद रकम को सुरक्षा के बीच बैंक में जमा करा दिया जाता है।

किन धाराओं में केस हुआ और कितनी सजा का प्रावधान है

 धारा कब लगती है अधिकतम सजा का प्रावधान
धारा 305 BNS सुरक्षित स्थान (जैसे आवासीय घर, पूजा स्थल या वाहन/परिवहन साधन) में चोरी करना। सजा: 7 साल तक की जेल और जुर्माना।
धारा 306 BNS कर्मचारी/सेवक द्वारा चोरी। 7 साल तक की जेल और जुर्माना।
धारा 316(5) BNSगंभीर विश्वासघात (सौंपी गई संपत्ति का गलत इस्तेमाल)। उम्रकैद या 10 साल तक की जेल और जुर्माना। 
धारा 317(4) BNS चोरी की संपत्ति को बार-बार रखना या उसका कारोबार करना। उम्रकैद या 10 साल तक की जेल और जुर्माना।
धारा 317(5) BNS चोरी की संपत्ति छिपाने या ठिकाने लगाने में मदद करना। 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों।
धारा 61 BNS आपराधिक साजिश।साजिश में शामिल अपराध के अनुसार सजा तय होती है।
 धारा 3(5) BNS संयुक्त जिम्मेदारी (कई लोगों द्वारा मिलकर अपराध करना)।सभी आरोपियों पर समान रूप से जिम्मेदारी और सजा लागू होती है।
 धारा 13(1)(a), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियमकिसी सरकारी कर्मचारी (Public Servant) द्वारा पैसों या पद का दुरुपयोग/भ्रष्टाचार करना। कम से कम 4 साल और अधिकतम 10 साल की जेल तथा जुर्माना।

 एसआईटी रिपोर्ट के बाद बड़ा एक्शन

राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में करीब 18 दिनों बाद श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने आखिरकार गुरुवार को एफआईआर दर्ज करा दी। इसमें ट्रस्ट महासचिव चंपत राय के ड्राइवर समेत 8 आरोपी बनाए गए हैं। हालांकि FIR में चंपत राय, डॉ. अनिल मिश्रा समेत अन्य बड़े पदाधिकारियों के नाम नहीं हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर प्रकरण की जांच के लिए ट्रस्ट का गठन हुआ था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि SIT की निष्पक्ष जांच से 'दूध का दूध और पानी का पानी' होकर रहेगा और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। ट्रस्ट के अनुरोध पर सरकार ने जांच के लिए 13 जून को SIT बनाई थी। 23 जून को इसने अपनी शुरुआती रिपोर्ट सरकार को सौंपी। एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद 3 आरोपी टिन्नू, लवकुश और अनुकल्प को अरेस्ट कर लिया गया है। बाकी 5 आरोपियों को पुलिस ने हिरासत में लिया है। 

किन 8 आरोपियों पर हुई एफआईआर

नाम: लवकुश मिश्रा

मंदिर में जिम्मेदारी: चढ़ावे और नकदी की काउंटिंग स्टाफ का सदस्य था।

आरोप: चढ़ावा चोरी करके करोड़ों की संपत्ति बनाई।

बरामदगी: घर से ₹12 लाख रुपये बरामद हुए।

नाम: रामशंकर यादव (टिंटू)

मंदिर में जिम्मेदारी: दानपात्रों की देखरेख और उन्हें बेसमेंट तक पहुंचाना।

आरोप: दानपात्र से करोड़ों रुपये गबन किए।

आरोप: अयोध्या और आसपास के जिलों में संपत्तियां बनाई।

नाम: अनुकल्प मिश्रा

मंदिर में जिम्मेदारी: गणना कक्ष में रुपयों की गिनती में शामिल रहता था।

आरोप: मंदिर के गणना कक्ष से रुपये चोरी करके बाथरूम में छिपाता था।

आरोप: इस तरह लाखों की संपत्ति बनाई।

नाम: सुभाष चंद्र श्रीवास्तव

मंदिर में जिम्मेदारी: कैश काउंटिंग स्टाफ के प्रभारी, स्टाफ को संभालता था।

आरोप: निगरानी में लापरवाही बरती।

आरोप: दान में आए रुपयों की चोरी में शामिल रहा।

नाम: करुणेश पांडेय

मंदिर में जिम्मेदारी: दान के रुपये गणना कक्ष तक लेकर आना और उनकी गणना करना।

आरोप: दान में आए रुपयों की चोरी करता था।

आरोप: अयोध्या के आसपास संपत्तियां खरीदीं।

नाम: मनीष यादव

मंदिर में जिम्मेदारी: दानपात्रों में आने वाले चढ़ावे की गिनती करना।

आरोप: मंदिर के चढ़ावे की चोरी।

बरामदगी: पुलिस ने उसके घर से ₹36 लाख रुपये बरामद किए।

नाम: अविनाश शुक्ला

मंदिर में जिम्मेदारी: दान के रुपये गणना कक्ष तक लेकर आना और उनकी गणना करना।

आरोप: दान में आए रुपये चोरी करता था।

आरोप: अयोध्या के आसपास संपत्तियां खरीदीं।

नाम: रामशंकर मिश्रा

मंदिर में जिम्मेदारी: दानपात्रों को गणना कक्ष तक लेकर आना और उनकी निगरानी करना।

आरोप: अन्य आरोपियों के साथ मिलकर दान में आए रुपयों में हेराफेरी करता था।

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