कौन थीं गौरी लंकेश, जिनके एक रिपोर्ट ने मचा दिया तहलका और फिर खो दिए अपने प्राण

कौन थीं गौरी लंकेश, जिनके एक रिपोर्ट ने मचा दिया तहलका और फिर खो दिए अपने प्राण

गौरी लंकेश की हत्या के बाद हेडलाइन क्या होनी चाहिए। आम पत्रकार की भाषा में कहें तो, बेंगलूरू में एक पत्रकार की गोली मारकर हत्या। लेकिन घटना को इस अंदाज में पेश करने की कोशिश की गई कि बेंगलूरू में बीजेपी विरोधी पत्रकार की हत्या हुई। किसी ने भी राज्य की कानून व्यवस्था को लेकर कोई सवाल नहीं उठाए।

उसने कलम उठाई थी सच के लिए, उसने बात की थी सच के लिए। लेकिन इस दौर में यही जुर्म हो गया। हत्यारों ने तीन गोलियां दाग दीं वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश के शरीर पर। कलम चलाने वाली महिला पत्रकार गौरी लंकेश का कसूर था कि वो लिखती थीं, बोलती थीं। लेकिन कुछ लोगों को उनका लिखना रास नहीं आया। लिहाजा कलम चलाने का खामियाजा उन्हें अपनी जान देकर चुकाना पड़ा था। 55 साल की दुबली पतली गौरी की शाम अपने ही घर में थी। जब हत्यारों ने उन पर गोलियां बरसा दी। सात गोलियां चली जिनमें से तीन गोलियां गौरी को लगी और कलम चलाने वाले हाथ कि जुंबिश खत्म हो गई। 

सबसे पहले आपको एक कार्टून दिखाते हैं। गौरी लंकेश की फेसबुक वाल पर पांच सितंबर 2017 को एक कार्टून पोस्ट किया गया। यानी हत्या से कुछ घंटे पहले ही। इस कार्टून में राजा के कपड़े पहना एक शख्स जनेऊ पहने दूसरे शख्स को लटका रखा है। दूसरा शख्स जो ब्राह्मण की वेशभूषा में है वो उसके नीचे कूड़ादान रखा है। देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि राजा के कपड़े पहने शख्स उस ब्राहम्ण को कूड़ेदान में डालने जा रहा है। साथ में एक लाइन भी ऊपर लिखी है- स्वच्छ केरल, हैप्पी ओनम। जिसके बाद ये कहा जाने लगा कि गौरी केरल में आरएसएस के लोगों के साथ हुई हिंसा का माखौल उड़ा रही थीं और असवंदेनशीलता बरत रही थीं और संघ के कार्यकर्ताओं की हत्या पर 'स्वच्छ केरल' का संदेश प्रसारित कर रही थी। इसके बाद इसके समर्थन में भी कुछ पोस्ट किए गए औऱ कहा गया कि ये जातिवाद प्रथा पर चोट करने वाला पोस्ट था न कि संघ कार्यकर्ताओं से जुड़ा। लेकिन इसके कुछ ही घंटे बाद बेंगलुरु में आधी रात को ‘फायर ब्रांड’ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी गयी। उनकी हत्या उनके आवास के बाहर हुई।

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गौरी लंकेश की हत्या के बाद हेडलाइन क्या होनी चाहिए। आम पत्रकार की भाषा में कहें तो, बेंगलूरू में एक पत्रकार की गोली मारकर हत्या। लेकिन घटना को इस अंदाज में पेश करने की कोशिश की गई कि बेंगलूरू में बीजेपी विरोधी पत्रकार की हत्या हुई। किसी ने भी राज्य की कानून व्यवस्था को लेकर कोई सवाल नहीं उठाए। हत्या पूरी तरह से कानून-व्यवस्था का मामला होता है। लेकिन किसी ने भी कांग्रेस की तत्तकालीन सरकार पर सवाल उठाने की जरूरत नहीं समझी। बल्कि गौरी लंकेश की विचारधारा को आधार बनाकर सवाल उठाए गए। जिसमें नेता और कुछ पत्रकार सबसे आगे रहे। इन लोगों ने गौरी लंकेश की हत्या के आधे घंटे के अंदर ही ये तय कर लिया था कि हत्या के पीछे हिन्दूवादी संगठनों का हाथ है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तो हत्या के कुछ ही देर बाद ट्वीट कर दिया कि बीजेपी और आरएसएस के खिलाफ बोलने की कीमत जान देकर चुकानी पड़ेगी। 

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गौरी लंकेश की हत्या को लेकर मीडिया जगत स्तब्ध हो गया। गौरी की विचारधारा को लेकर मीडिया दो हिस्सों में बंटा दिखा। पत्रकारों की एक जमात गौरी की हत्या को विचारधारा की हत्या करार देती रही तो और उन्हें इसके पीछे उसे भगवा ब्रिगेड का हाथ नजर आ रहा था तो वहीं एक धड़ा ऐसा भी था जिनका मानना था कि गौरी की हत्या के पीछे नक्सली या फिर भ्रष्टाचारी ताकतें भी हो सकती हैं, जिनकी वह लम्बे समय से मुखालफत कर रही थीं।  आज हम आपको बताएंगे कि कौन थी गौरी लंकेश जिनकी एक रिपोर्ट ने मचा दिया तहलका और खो दिए प्राण साथ ही आज हम महिला पत्रकार की हत्या पर चले एजेंडे का भी विश्लेषण करेंगे।

वर्ष 1962 में जन्मीं गौरी लंकेश कन्नड़ पत्रकार और कन्नड़ साप्ताहिक टैबलॉयड 'लंकेश पत्रिका ' के संस्थापक पी लंकेश की बेटी थीं। उनकी बहन कविता और भाई इंद्रजीत लंकेश फिल्म और थियेटर में काम करते हैं। पत्रकारिता से जुड़ी होने के कारण गौरी की कन्नड़ और अंग्रेजी भाषाओं पर अच्छी पकड़ थी। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'संडे' मैग्जीन में संवाददाता के रूप में काम करने के बाद उन्होंने बेंगलूरू में रहकर मुख्यतः कन्नड़ में पत्रकारिता करने का निर्णय किया। साल 2000 में जब उनके पिता पी. लंकेश की मृत्यु हुई तो उन्होंने अपने भाई इंद्रजीत के साथ मिलकर, पिता की पत्रिका 'लंकेश पत्रिका' का कार्यभार संभाला। जल्द ही इस मैग्जीन से जुड़े विवाद भी सामने आने लगे।

 

साल 2005 में इस मैग्जीन में गौरी की सहमति से पुलिस पर नक्सलवादियों के हमला करने से संबंधित एक रिर्पोट छपी। बाद में 13 फरवरी 2005 को पत्रिका के मुद्रक प्रकाशक इंद्रजीत ने नक्सलियों का समर्थन करने का आरोप लगाकर वो रिर्पोट वापस ले ली। इसके बाद 15 फरवरी को इंद्रजीत ने पत्रकार वार्ता बुलाकर गौरी पर पत्रिका के जरिए नक्सलवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। अपने भाई और पत्रिका के प्रोपराइटर तथा प्रकाशक इंद्रजीत से मतभेद के बाद उन्होंने लंकेश पत्रिका के संपादक पद को छोड़कर 2005 में कन्नड टैबलॉयड 'गौरी लंकेश पत्रिका' की। 

गौरी ने साल 2017 में भाजपा के नेताओं के खिलाफ एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसके बाद से उन्हें काफी परेशान होना पड़ा। नेताओं ने गौरी के खिलाफ मान हानि का केस दर्ज किया और उन्हें 6 महीने की जेल भी हुई।

गौरी लंकेश और नक्सली कनेक्शन

बताया जाता है कि 2015 और 2016 में चार से अधिक बार गौरी लंकेश बस्तर के जंगलों में दाखिल हुई थीं। वहां वह किनसे मिलीं इसकी पुष्ट जानकारी नहीं है। हालांकि गौरी लंकेश आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार और मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर बस्तर गई थीं। बताया जा रहा है कि गौरी लंकेश आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में नक्सलियों से मिलने के लिए बस्तर जाती थीं। हर दौरे पर गौरी लंकेश ने तीन से चार दिन जंगल के भीतर बिताए थे। इस दौरान वह स्थानीय पुलिस और सामाजिक कार्यकार्ताओं से दूर ही रहती थीं। आत्मसमर्पण को लेकर नक्सलियों की सेंट्रल कमिटी ने कई बार गौरी लंकेश से चर्चा की थी। शीर्ष नक्सली नेताओं को शक था कि गौरी लंकेश नक्सलियों को आत्मसमर्पण के लिए न केवल उकसाती थीं, बल्कि पुलिस और नक्सलियों के बीच आत्मसमर्पण को लेकर माहौल भी तैयार करती थीं। तेलंगाना के गठन के बाद आधा दर्जन से ज्यादा नक्सलियों के आत्मसमर्पण को लेकर नक्सलियों की सेंट्रल कमिटी गौरी लंकेश से नाराज चल रही थे ऐसी भी खबर थी। 

गौरी लंकेश को कर्नाटक में पत्रकारिता में साहस की आवाज माना जाता था। खुलकर अपनी कलम चलाने वाली लंकेश की मौत से पत्रकारिता जगत सन्न रह गया। उनकी हत्या के विरोध में पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण सभी पत्रकार सरकार पर आ गए। देशभर के पत्रकारों के जुबान पर बस यही बात थी कि गौरी लंकेश की हत्या अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा-सीधा हमला है। 

कब क्या हुआ...

  • 5 सितंबर 2017 को गौरी लंकेश की हत्या के बाद सिद्धरमैया सरकार ने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए और एसआईटी का गठित किया।
  • तेजतर्रार पुलिस अधिकारी अतिरिक्त पुलिस आयुक्त बीके सिंह और उपायुक्त एमएन अनुचेत को इस हत्याकांड की जांच का जिम्मा सौंपा गया। उन्होंने नक्सल और दक्षिणपंथी हिंदुत्व वाले एंगल पर मामले की जांच की।
  • फरवरी 2018 में इस केस में पहला सुराग मिला। पुलिस ने नवीन कुमार उर्फ हॉटी मंजा नामक एक बदमाश को गिरफ्तार किया। पूछताछ के बाद उसने गौरी लंकेश के हत्यारों की मदद करने की बात कुबूल की।
  • पुलिस अधिकारी एमबी सिंह और अनुचेता की टीम ने 25 वर्षीय परशुराम वाघमारे को उत्तरी कर्नाटक के बीजापुर से पकड़ा।
  • अगस्त 2019 में कर्नाटक सरकार ने गौरी लंकेश जांच से जुड़ी एसआईटी को उम्दा जांच के लिए 25 लाख रुपए का सम्मान दिया।
  • 10 जनवरी 2020 को पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के एक और आरोपी ऋषिकेश देवडीकर को झारखंड के धनबाद से गिरफ्तार कर लिया गया।
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बहुत से लोग गौरी लंकेश पर नक्सलियों की हमदर्द होने का आरोप भी लगाते थे। 

पत्रकार की सस्ती जान

1990-2015 के बीच इराक में 309, पाकिस्तान में 116 भारत में 96 पत्रकारों की हत्या। 

1990-2015 के बीच अफगानिस्तान में 46, अमेरिका में 30, नेपाल में 21 पत्रकारों की हत्या। 

अब आते हैं भारत पर

भारत में 2016 में 2, 2015 में 1, 2014 में 2, 2013 में 4, 2012 में 2 पत्रकारों की हत्या हुई। 

क्या आपने हेमंत यादव, राजदेव रंजन, जगेंद्र सिंह, बृजेश कुमार और संजय पाठक का नाम सुना है। अगर आपने नहीं सुना तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ये भी पत्रकार ही थे और इनकी भी ऐसे ही हत्या कर दी गई थी। लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि इतनी हत्या किसी न किसी संवेदनशील खबर की वजह से हुई थी। इन पत्रकारों ने किसी न किसी बाहुबली के खिलाफ आवाज उठाई थी और उन्हें अपनी खबरों से एक्सपोज किया था। लेकिन ये पत्रकार किसी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा से जुडे़ हुए नहीं थे और इसलिए इन पत्रकारों के लिए इतने बड़े पैमाने पर आवाज उठाने की जरूरत किसी ने नहीं समझी। न ही पत्रकारों द्वारा किसी भी प्रकार का एजेंडा चलाने कि कोशिश हुई। विडंबना  ये है कि हमारे देश के तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार तब हंगामा नहीं करते जब उनका ही कोई साथी किसी खबर की वजह से मारा जाता है। तब कोई हंगामा नहीं होता जब किसी पत्रकार को कोई माफिया, कोई गुंडा या कोई दबंग मरवा देता है। तब उनके लिए न तो कोई राजनीतिक पार्टी शर्मिंदगी जताती है और न ऐसे लोगों के लिए कोई आंसू बहाता है। 


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