Delhi Court का फैसला: गवाही से पहले पत्नी की मौत, Attempt to Murder केस में पति बरी

अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह मामला अप्रैल 2021 में रश्मि द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब उन्होंने आरोपी के कहने पर एक अनजान व्यक्ति से बात करने से इनकार कर दिया, तो उनके पति ने उनके साथ मारपीट की।
दिल्ली की एक अदालत ने 2021 के एक मामले में अपनी पत्नी की हत्या की कोशिश के आरोपी एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित नहीं कर सका क्योंकि सुनवाई के दौरान गवाही देने से पहले ही शिकायतकर्ता की मौत हो गई थी। अभिनेश त्रिपाठी उर्फ राहुल के खिलाफ मामले की सुनवाई कर रहे प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश संजय शर्मा ने 6 जुलाई के आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे अपना मामला साबित करने में विफल रहा। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता रश्मि ही एकमात्र मुख्य गवाह थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा इस मामले में, एकमात्र अहम गवाह यानी शिकायतकर्ता/पीड़िता रश्मि की मौत हो चुकी है और अभियोजन पक्ष ने किसी ऐसे दूसरे गवाह का ज़िक्र नहीं किया है, जो आरोपी द्वारा की गई किसी प्रत्यक्ष हरकत के बारे में गवाही दे सके।
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अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह मामला अप्रैल 2021 में रश्मि द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब उन्होंने आरोपी के कहने पर एक अनजान व्यक्ति से बात करने से इनकार कर दिया, तो उनके पति ने उनके साथ मारपीट की। शुरुआत में उन्होंने कहा कि पति ने हॉकी स्टिक से उन्हें पीटा और जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद त्रिपाठी के खिलाफ IPC की धाराओं 307, 323, 341 और 506 के तहत FIR दर्ज की गई। अस्पताल में इलाज के दौरान, रश्मि ने एक अतिरिक्त बयान दिया जिसमें आरोप लगाया गया कि आरोपी नशे की हालत में घर लौटा और जान से मारने की धमकी देते हुए उसे घर की तीसरी मंज़िल से नीचे फेंक दिया। इसके बाद, हत्या के प्रयास का आरोप भी जोड़ा गया।
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ट्रायल के दौरान, रश्मि को भेजे गए समन बिना तामील हुए वापस आ गए क्योंकि वह अपना किराए का घर छोड़कर चली गई थी। बाद में उसके पिता ने कोर्ट को बताया कि उसकी मौत हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि मरने से पहले उसने आरोपी के साथ सभी विवाद सुलझा लिए थे, आपसी सहमति से तलाक ले लिया था और 8 लाख रुपये का गुजारा-भत्ता (एलिमनी) भी ले लिया था। कोर्ट ने कहा कि रश्मि का बयान दर्ज नहीं किया जा सका और अभियोजन पक्ष के बाकी गवाह सिर्फ़ औपचारिक पुलिस गवाह थे। कोर्ट ने माना कि अगर उनके सबूतों को मान भी लिया जाए, तो भी वे आरोपों को साबित करने के लिए काफ़ी नहीं थे। यह देखते हुए कि जिस शिकायत के आधार पर केस चल रहा था, वह साबित नहीं हो पाई और आरोपी को अपराधों से जोड़ने वाला कोई ठोस सबूत नहीं मिला, कोर्ट ने त्रिपाठी को बरी कर दिया।
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