Diwali पर Delhi की सड़कें Traffic Jam से बेहाल, Cab Fares आसमान पर, Rekha Gupta Govt. के सारे दावे धड़ाम

दिल्ली के लगभग सभी इलाकों में ट्रैफिक का ऐसा दबाव देखने को मिल रहा है कि लोगों की मिनटों वाली यात्राएं घंटों में पूरी हो रही हैं। धौला कुआं, विकास मार्ग, सरदार पटेल मार्ग, रिंग रोड और आउटर रिंग रोड पर गाड़ियों की लंबी कतारें लगी हैं।
दिवाली का त्योहार है। बाजारों में रौनक है, दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ है, घरों में रोशनी और खुशियों की तैयारी चल रही है। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में इस बार त्योहार की चमक के साथ एक ऐसी तस्वीर भी सामने आई है, जिसने सरकार और प्रशासन के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दिल्ली की सड़कों पर गाड़ियां दौड़ नहीं रहीं, रेंग रही हैं। बाजारों तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है और अगर किसी ने कैब बुक करने की गलती कर दी तो उसकी जेब पर भी दिवाली का महंगाई वाला पटाखा फूट रहा है।
दिल्ली के लगभग सभी इलाकों में ट्रैफिक का ऐसा दबाव देखने को मिल रहा है कि लोगों की मिनटों वाली यात्राएं घंटों में पूरी हो रही हैं। धौला कुआं, विकास मार्ग, सरदार पटेल मार्ग, रिंग रोड और आउटर रिंग रोड पर गाड़ियों की लंबी कतारें लगी हैं। दिल्ली से नोएडा जाने वाले यात्रियों का सफर दो से तीन घंटे तक खिंच रहा है। चांदनी चौक, लाजपत नगर और साउथ एक्सटेंशन जैसे प्रमुख बाजारों के आसपास तो हालात और भी खराब हैं। बारापुला फ्लाईओवर पर भी लोगों को घंटों तक जूझना पड़ रहा है।
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लेकिन इस बार दिल्लीवालों की परेशानी सिर्फ जाम तक सीमित नहीं रही। कैब बुकिंग ने भी लोगों को बड़ा झटका दिया। जो सफर आम दिनों में 450 रुपये में पूरा होता था, उसके लिए यात्रियों को 700 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। नोएडा सेक्टर-15 से गाजियाबाद के शालीमार गार्डन तक करीब 25 किलोमीटर की यात्रा के लिए कैब का किराया 1,600 से 2,500 रुपये तक दिखने की शिकायत सामने आई। यानी त्योहार पर खरीदारी करने निकले लोगों को रास्ते में ही अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ा।
दिल्ली की इस तस्वीर का राजनीतिक पहलू भी कम दिलचस्प नहीं है। राजधानी में सत्ता बदलने के बाद दिल्ली की नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि वह बुनियादी शहरी सुविधाओं के मोर्चे पर लोगों को राहत दे। चुनावों में बेहतर सड़कें, सुगम यातायात, प्रदूषण से राहत और व्यवस्थित राजधानी जैसे मुद्दे लगातार उठते रहे हैं। लेकिन त्योहार के ठीक पहले सड़कों पर जो हालात दिखाई दिए, उन्होंने इन वादों की जमीन पर परीक्षा ले ली है।
सवाल यह है कि जब सरकार को पहले से पता था कि दिवाली पर बाजारों में भीड़ बढ़ेगी, लोग खरीदारी के लिए निकलेंगे और दूसरे राज्यों से आने-जाने वालों की संख्या भी बढ़ेगी, तो ट्रैफिक मैनेजमेंट की तैयारी इतनी कमजोर क्यों रही? सवाल उठता है कि क्या दिल्ली में प्रशासन केवल ट्रैफिक एडवाइजरी जारी करने और लोगों को वैकल्पिक रास्ते बताने तक सीमित रह गया है?
देखा जाये तो दिल्ली की समस्या यह है कि यहां सड़कें, फ्लाईओवर और एक्सप्रेसवे तो बन रहे हैं, लेकिन उनके साथ यातायात की पूरी व्यवस्था का तालमेल नहीं बैठ पा रहा। बारापुला इसका ताजा उदाहरण है। 30 सितंबर को बारापुला फेज-3 शुरू हुआ, लेकिन इसके बाद सराय काले खां के आसपास ट्रैफिक का दबाव बढ़ने और अलग-अलग दिशाओं से आने वाले वाहनों के एक ही जगह मिलने के कारण नया जाम संकट पैदा हो गया। इस परियोजना की डिजाइनिंग को लेकर भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप सामने आए। दिल्ली के पीडब्ल्यूडी मंत्री प्रवेश साहिब सिंह ने इसके लिए पिछली आम आदमी पार्टी सरकार को जिम्मेदार ठहराया, जबकि आप ने परियोजना के खर्च और योजना पर सवाल उठाए। यानी सड़क पर जनता फंसी है और राजनीति में जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने का खेल जारी है।
देखा जाये तो दिल्ली की मौजूदा सरकार के सामने यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की सरकार ने प्रदूषण और ट्रैफिक को लेकर कई बड़े कदमों की घोषणा की है। एक नवंबर से लागू शीतकालीन कार्ययोजना में निजी वाहनों पर पाबंदियां, पार्किंग शुल्क दोगुना करना और सरकारी तथा निजी कार्यालयों में 50 प्रतिशत वर्क फ्रॉम होम जैसे प्रावधान शामिल हैं। लेकिन इन प्रतिबंधों के बावजूद सड़कों पर वाहनों का दबाव कम होता नहीं दिख रहा। उलटे, दिल्ली की सीमाओं पर प्रदूषण जांच और वाहनों की रोक-टोक के कारण भी लंबी कतारें लगीं।
दिलचस्प बात यह है कि 30 सितंबर को ही केंद्र सरकार ने दिल्ली के लिए 1,789.52 करोड़ रुपये की इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम परियोजना को मंजूरी दी थी। इसके तहत 42 प्रमुख ट्रैफिक कॉरिडोर में एआई आधारित सिग्नल, रियल टाइम मॉनिटरिंग और आधुनिक नियंत्रण व्यवस्था विकसित की जानी है। लेकिन यह परियोजना 24 महीने में तीन चरणों में लागू होगी। सवाल यही है कि जब तक यह व्यवस्था जमीन पर उतरेगी, तब तक दिल्ली के करोड़ों यात्रियों को कितने और त्योहार जाम के हवाले करने पड़ेंगे?
इस पूरे मामले में एक और राजनीतिक विरोधाभास सामने आता है। दिल्ली सरकार सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की बात करती है, लेकिन बसों की उपलब्धता, मेट्रो में भीड़ और लास्ट माइल कनेक्टिविटी की समस्याएं पहले से मौजूद हैं। ऐसे में निजी वाहन छोड़कर सार्वजनिक परिवहन अपनाने की अपील करना आसान है, लेकिन उसके लिए पर्याप्त और सुविधाजनक विकल्प उपलब्ध कराना असली चुनौती है।
साथ ही अब दिल्ली में दिवाली के बाद भाई दूज और छठ पूजा तक यात्रियों की आवाजाही का दबाव बना रहेगा। आनंद विहार आईएसबीटी और आसपास के परिवहन केंद्रों के लिए 5 से 15 नवंबर तक विशेष ट्रैफिक व्यवस्था भी लागू की गई है।
बहरहाल, दिल्ली की दिवाली इस बार सिर्फ रोशनी, मिठाई और खरीदारी की तस्वीर नहीं दिखा रही, बल्कि राजधानी के शहरी प्रबंधन की कमजोरियों को भी उजागर कर रही है। एक तरफ विकास की बड़ी परियोजनाओं और स्मार्ट ट्रैफिक व्यवस्था के दावे हैं, दूसरी तरफ सड़कों पर घंटों फंसे लोग और आसमान छूते कैब किराये हैं।
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