'भगवान भी नहीं हरा सकते' का दावा करने वाले राजनेता को एक पार्षद ने इस तरह दी मात

'भगवान भी नहीं हरा सकते' का दावा करने वाले राजनेता को एक पार्षद ने इस तरह दी मात

एसके पाटिल जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक की सरकार में मंत्री पद संभाल चुके थे। लगातार तीन बार के सांसद एसके पाटिल अपनी जीत चुनाव में सुनिश्चित मान कर चल रहे थे। चुनाव में जाॅर्ज ने 42 हजार वोटों से एसके पाटिल को हरा दिया।

कोई खिलाड़ी जो अप्रत्याशित रूप से एक अधिक मजबूत प्रतिद्वंद्वी को हरा देता है तो उसे जायंट किलर कहलाता है। राजनीति में भी ऐसे ही नाम हैं। वर्तमान के संदर्भ में बात करें तो सुब्रत पाठक कन्नौज में डिंपल यादव को हराया। स्मृति ईरानी जिन्होंने राहुल गांधी को अमेठी में हराया। केपी यादव ने गुणा में ज्योतिरादित्य सिंधिया को मात दी। 70 के दशक में एक जायंट किलर बने थे जार्ज फर्नांडीज जिन्होंने उस वक्त के कांग्रेस के कद्दावर नेता एसके पाटिल को बंबई दक्षिण लोकसभा सीट से हराया था। उस जमाने में जाॅर्ज म्युनिसिपल काउंसलर हुआ करते थे। एसके पाटिल जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक की सरकार में मंत्री पद संभाल चुके थे। लगातार तीन बार के सांसद एसके पाटिल अपनी जीत चुनाव में सुनिश्चित मान कर चल रहे थे। तभी तो एक पत्रकार वार्ता में उन्होंने कहा कुछ ऐसा कि अगले दिन अखबार की हेडलाइन बनी थी- ''मुझे भगवान भी नहीं हरा सकता: एसके पाटिल''

बस फिर क्या था जाॅर्ज ने इस बात को ही चिन्हित करते हुए इसके काउंटर में नारा दिया उन्हें भगवान नहीं हरा सकते लेकिन आप उन्हें हरा सकते हैं। मतलब साफ था अभी तक एकतरफा मुकाबला माना जाने वाला चुनाव पलभर में हाई फ्रोफाइल कद्दावर नेता बनाम आम बन गया। जिसके बाद तो शुरुआत हुई कद्दावर नेता के पतन की और आम इंसान के उदय की। इस चुनाव में जाॅर्ज ने 42 हजार वोटों से एसके पाटिल को हरा दिया। जाॅर्ज फर्नांडिस को दूसरी बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तब मिली जब उनके एक आह्नवाहन पर थम गया था पूरा देश।

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1974 में थम गया पूरा देश

बात 1973 की है और इस समय से पहले और आजादी के बाद तक तब तीन वेतन आयोग आ चुके थे, लेकिन रेल कर्मचारियों की सैलरी को लेकर कोई ठोस बढ़ोतरी नहीं हुई थी। इस बीच जॉर्ज फर्नांडिस नवंबर 1973 को आल इंडिया रेलवेमैन्स फेडरेशन (AIRF) के अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में यह फैसला लिया गया कि वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल की जाए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोऑर्डिनेशन कमिटी बनाई गई और 8 मई 1974 को बॉम्बे में हड़ताल शुरू हो गई और इस हड़ताल से न सिर्फ पूरी मुंबई थम सी गई बल्कि पूरा देश थम सा गया था। इस हड़ताल में करीब 15 लाख लोगों ने हिस्सा लिया था। 





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