यूपी में ओवैसी की राह कितनी आसान? आखिर क्यों उठा रहें मुस्लिम नेतृत्‍व तैयार करने का मुद्दा?

यूपी में ओवैसी की राह कितनी आसान? आखिर क्यों उठा रहें मुस्लिम नेतृत्‍व तैयार करने का मुद्दा?

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार उत्तर प्रदेश में चुनावी सभा को आयोजित कर रहे हैं और मुसलमानों को गोलबंद करने की कोशिश कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने है। इसको लेकर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी अपनी तैयारियां शुरू कर दी है। इसी के साथ ही एआईएमआईएम ने भी उत्तर प्रदेश चुनाव में 100 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार उत्तर प्रदेश में चुनावी सभा को आयोजित कर रहे हैं और मुसलमानों को गोलबंद करने की कोशिश कर रहे हैं। इन सबके बीच असदुद्दीन ओवैसी ने कानपुर में एक सभा को संबोधित किया जिसमें उन्होंने मुसलमानों को लेकर एक ऐसा बयान दिया जिसके मायने निकाले जा रहे। ओवैसी लगातार मुसलमानों को नेतृत्‍व देने की बात कर रहे हैं तो वहीं इस कौम को अपना सियासी गुलाम समझने वाली पार्टियों में खलबली मच गयी है। 

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ओवैसी ने क्या कहा

कानपुर में आयोजित अपनी जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने कहा कि मुसलमानों की स्थिति बारात में बैंड बजाने वालों जैसी हो गई है। इसके साथ ही ओवैसी ने कहा कि उन्हें पहले तो संगीत बजाने के लिए कहा जाता है लेकिन विवाह स्थल पर पहुंचने पर उन्हें बाहर खड़ा कर दिया जाता है। इसके साथ ही ओवैसी ने यह भी आरोप लगाया कि चाहे मुसलमानों के सबसे ज्यादा वोट हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी रही हो या फिर सामाजिक न्याय के लिए दलित-मुस्लिम एकता की बात करने वाली बहुजन समाज पार्टी, लेकिन दोनों दलों ने अपने-अपने सरकार के दौरान मुसलमानों को नेतृत्व नहीं दिया।

यूपी में मुसलमानों की आबादी

आपको बता दें कि ओवैसी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को गोलबंद करने की कोशिश में है। इसका सबसे बड़ा कारण राज्य में उनकी जनसंख्या और वोट बैंक है। उत्तर प्रदेश में 2011 के जनगणना के मुताबिक मुसलमानों की आबादी 19.26% है। साथ ही साथ राज्य की 403 में से 82 विधानसभा सीट ऐसी है जहां पर मुसलमान मतदाता निर्णायक भूमिका में होते हैं। ओवैसी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में 38 सीटों पर अपने उम्मीदवार जरूर उतारे थे लेकिन एक सीट भी नहीं मिल सकी थी। हालांकि ओवैसी का इस बार आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है क्योंकि उन्होंने पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे थे और सीमांचल क्षेत्र में 5 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल हुई है। हालांकि मुसलमानों को नेतृत्‍व देने की कोशिश पहले भी हो चुकी हैं, लेकिन सवाल यह है कि मुखर हिंदुत्‍ववादी राजनीति के उभार के बाद क्‍या मुसलमान इतने जागरुक हो चुके हैं कि वे अपना सर्वमान्‍य नेतृत्‍व तैयार कर सकें।

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विश्‍लेषक का दावा

राजनीतिक विश्‍लेषक परवेज अहमद ने कहा, ‘‘ओवैसी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नहीं, बल्कि उन पार्टियों के निशाने पर हैं जो अभी तक मुसलमानों को भाजपा का डर दिखाकर उनका वोट हासिल करती रही हैं। उन्होंने कहा कि ये पार्टियां प्रचार कर रही हैं कि ओवैसी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट काटकर भाजपा को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।’’ जनगणना 2011 के आंकड़ों के मुताबिक उत्‍तर प्रदेश की आबादी में मुसलमानों की हिस्‍सेदारी 19.26 प्रतिशत है। ऐसा माना जाता है कि राज्‍य की 403 में से 82 विधानसभा क्षेत्रों में मुसलमान मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। राजनीतिक विश्‍लेषक रशीद किदवाई का मानना था कि ओवैसी को बिहार में कामयाबी इसलिये मिली क्‍योंकि उनके पास कुछ अच्‍छे प्रत्‍याशी आ गये थे, जिनका अपना जनाधार था। उन्होंने कहा, ‘‘उत्‍तर प्रदेश में ऐसा नहीं लगता कि ओवैसी को कुछ खास कामयाबी मिलेगी, क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश में ज्‍यादातर मुसलमान उसी पार्टी को वोट देते रहे हैं जो भाजपा को हराने में सक्षम हो।’’ 





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