Ravindra Kaushik India Greatest Spy | कैसे PAK में पकड़ा गया भारत का सबसे बड़ा जासूस?| Matrubhoomi

पाकिस्तान की युद्ध योजनाओं को विफल कर दिया। ऐसा जासूस जिसने 20 हजार से ऊपर जिंदगियां बचाई। लेकिन वो जासूस कभी हीरो नहीं बन पाया। वो कभी सैनिक नहीं बन पाया। कभी तमगों का हकदार नहीं बना। कभी उसकी वीरता के किस्से गाएं नहीं गए। वो अदृश्य वजूद रहा, जिसने देश की खातिर अपनी पूरी जिंदगी, अपनी पहचान, अपने परिवार, अपने मां-बाप सबको देश के लिए कुर्बान कर दिया।
वो साया जो कभी तिरंगे में नहीं लिपटा, मगर जिसकी हर धड़कन तिरंगे के लिए धड़कती रही। वो साया जिसने देश के लिए अपने हिंदू पहचान को राख कर दिया और ऊर्दू को अपनी जुबान बनाया। इस्लाम को जिया और ऐसा पाकिस्तानी बना कि दुश्मन मुल्क पाकिस्तान में लोगों की आंखें धोखा खा गईं। वो भारत का सबसे बड़ा जासूस था। एक ऐसा खतरनाक जासूस जो पाकिस्तान की सेना में जाकर मेजर बन गया। जिसकी खुफिया जानकारियों के चलते भारत कई बार पाकिस्तान के हमलों से बचा। पाकिस्तान की युद्ध योजनाओं को विफल कर दिया। ऐसा जासूस जिसने 20 हजार से ऊपर जिंदगियां बचाई। लेकिन वो जासूस कभी हीरो नहीं बन पाया। वो कभी सैनिक नहीं बन पाया। कभी तमगों का हकदार नहीं बना। कभी उसकी वीरता के किस्से गाएं नहीं गए। वो अदृश्य वजूद रहा, जिसने देश की खातिर अपनी पूरी जिंदगी, अपनी पहचान, अपने परिवार, अपने मां-बाप सबको देश के लिए कुर्बान कर दिया। लेकिन इतनी कुर्बानी के बाद भी गुमनामी के अंधेरे में खो गया। ये कहानी रविंद्र कौशिक की है, जिसे इंदिरा गांधी ने ब्लैक टाइगर के नाम से नवाजा था। ये खतरे, धोखा, प्यार और बलिदान की ऐसी गाथा है जो आपके खून में उबाल और आंखों में आंसू ले आएंगे। ब्लैक टाइगर की कहानी जानकार आपका सीना गर्व से फूल जाएगा। दिल उस सपूत के लिए रोएगा। लेकिन मन में एक सवाल भी आएगा कि क्या हम अपने नायकों को वो सम्मान नहीं दे पाते। ये कहानी उस अनसुनी दास्तां की है, जो सुनने पर देशवासियों को गर्व और अफसोस दोनों से भर देगी। ब्लैक टाइगर एक नाम एक रहस्य एक अनसुनी कहानी जो 1952 में श्री गंगा नगर राजस्थान से शुरू होती है।
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नाटक के शौक ने इंटेलिजेंस अफसरों का ध्यान खींचा
अमला देवी राजस्थान के श्री गंगानगर जिले में रहा करती थी। 11 अप्रैल 1952 की तारीख को अमला देवी को एक औलाद हुई नाम रविंद्र रखा। बचपन से रविंद्र का इंटरेस्ट अभिनय और मिमिक्री में था। स्कूल कॉलेज में खूब नाटक खेले। 21 साल की उम्र में उन्होंने लखनऊ में नेशनल थिएटर फेस्टिवल में हिस्सा लिया। नाटक खेलते हुए एक रोज कुछ ऐसा हुआ कि रविंद्र की खुद की जिंदगी ने एक बड़ा नाटकीय मोड़ ले लिया। रविंद्र के छोटे भाई राजेश्वर नाथ कौशिक हिंदुस्तान टाइम से बातचीत में बताते हैं कॉलेज में एक एक्ट में रविंद्र ने एक इंडियन आर्मी ऑफिसर का किरदार निभाया था। ऐसा ऑफिसर जो चीन को खुफिया जानकारी देने से इंकार कर देता है। शायद रविंद्र के इसी एकल अभिनय की ही वजह से इंटेलिजेंस अफसरों का ध्यान उन पर पड़ा। दरअसल रविंद्र जहां रहते थे वो इलाका पाकिस्तान की सीमा से काफी नजदीक था यहां का कल्चर सीमापार से मिलता जुलता था और लोगों के नाक नक्शे भी सीमापार वालों जैसे ही थे इसलिए भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसीज को जब भी जासूसों की जरूरत पड़ती वो इस इलाके के लोगों की पहचान करके उन्हें रिक्रूट करने की कोशिश करती।
उर्दू सीखी, खतना कराया
रवेंद्र का अभिनय देखकर उन्हें लगा कि एक उम्दा जासूस बन सकते हैं रविंद्र के पिता एयरफोर्स में अधिकारी थे। आर्मी बैकग्राउंड के चलते देशभक्ति का जज्बा उनमें पहले से था। इसे जब इंटेलिजेंस अधिकारियों ने उनके आगे जासूसी की पेशकश रखी। रविंद्र तुरंत तैयार हो गए इसके बाद ट्रेनिंग का दौर शुरू हुआ। 1983 में ग्रेजुएशन पूरा हुआ कौशिक ने अपने पिता से कहा कि उनकी नौकरी लग गई है। इसलिए वो दिल्ली जा रहे रहे हैं। नौकरी क्या थी? इसके बारे में रविंद्र ने अपने परिवार वालों को नहीं बताया। असलियत में रविंद्र रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ में ट्रेनिंग लेने जा रहे थे, तब उनकी उम्र लगभग 23 साल थी। दिल्ली में रविंद्र ने रॉ के साथ 2 साल की कड़ी ट्रेनिंग ली इस दौरान उन्होंने उर्दू सीखी मुस्लिम धर्म से जुड़े रीति रिवाज सीखे उन्हें पाकिस्तान का इतिहास और भूगोल रटा गया यानी वो सब सिखाया गया जो एक पाकिस्तानी बनने के लिए जरूरी था। रविंद्र की ट्रेनिंग जब पूरी हो गई तब उनका एक नया नामकरण हुआ नबी अहमद शाकिर। यह रविंद्र का नया नाम था। साल 1975 तक रविंद्र जासूस के तौर पर तैयार किए जा चुके थे। यहां तक कि पहचान को पुख्ता करने के लिए खतना भी करवा लिया था। अब बस उन्हें पाकिस्तान भेजे जाने की जरूरत थी। पाकिस्तान भेजने से पहले रविंद्र के सभी पुराने रिकॉर्ड्स नष्ट कर दिए गए। उन्हें पहले दुबई भेजा गया। दुबई में कुछ वक्त गुजारने के बाद रविंद्र अबू धाबी गए। अबू धाबी में कुछ पाकिस्तानी लोगों से पहचान बनाने के बाद रविंद्र पाकिस्तान चले गए।
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पाकिस्तान में क्या हुआ?
सबसे पहले रविंद्र कौशिक उर्फ नबी अहमद शाकिर ने कराची यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई की और डिग्री पूरी की जासूसी के लिए जरूरी था। रविंद्र पाकिस्तानी फौज के नजदीक रहे। इसलिए उन्होंने फौज में भर्ती की तैयारी शुरू कर दी। बाकायदा फौज का इम्तिहान निकाला। सेना में अकाउंट्स डिपार्टमेंट में बतौर कमिश्नर अधिकारी शामिल हुए और तरक्की हासिल कर मेजर रैंक तक पहुंच गए। पाकिस्तान में रहकर ही उन्होंने शादी भी की। उनकी पत्नी का नाम अमानत था। अमानत के पिता आर्मी की एक यूनिट में दर्जी का काम करते थे। दोनों में पहले इश्क हुआ फिर शादी अपने काम के प्रति रविंद्र का डेडिकेशन जबरदस्त था। उन्होंने अपनी पत्नी को तक अपनी असली पहचान का पता नहीं लगने दिया। यहां तक कि अमानत आखिरी वक्त तक उन्हें सिर्फ नबी अहमद शाकिर के नाम से जानती थी। रविंद्र ने पाकिस्तान में रहते हुए जासूसी को बखूबी अंजाम दिया। सेना में रहते हुए रविंद्र कौशिक ने तमाम ऐसे गोपनीय और संवेदनशील जानकारियां भारत को भेजी जो भारत के बेहद काम आए। ये वो वक्त था जब दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर था। 1971 युद्ध के बाद पाकिस्तान बदले की आग से जल रहा था। पाकिस्तान ने एक तरफ परमाणु कार्यक्रम में तेजी ला दी थी। वहीं वो कश्मीर और पंजाब में अलगाववाद की आग भड़काने की भी भरपूर कोशिश कर रहा था। रविंद्र ने पाकिस्तानी फौज के मंसूबों से जुड़ी जानकारियां भारत को भेजी। कौशिक ने जो जानकारी भेजी और उसकी बदौलत भारत ने जो एक्शन लिया। ये सब टॉप सीक्रेट जानकारी का हिस्सा है।
कैसे मिला ब्लैक टाइगर का उपनाम
किसी को नहीं पता लेकिन रविंद्र के काम का महत्व आप इस बात से जांच सकते हैं कि इंडियन डिफेंस सर्कल में कौशिक को द ब्लैक टाइगर कहा जाने लगा। कहते हैं ये नाम उन्होंने खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिया था। आईबी के जॉइंट डायरेक्टर रह चुके मलय कृष्ण धर ने कुछ साल पहले एक किताब लिखी थी मिशन टू पाकिस्तान एंड इंटेलिजेंस एजेंट इन पाकिस्तान मलय की ये किताब ब्लैक टाइगर के कारनामों पर बेस्ड थी कौशिक की कहानी को बॉलीवुड ने भी काफी बनाया सलमान खान की फिल्म एक था टाइगर भी रविंद्र कौशिक की कहानी से प्रेरित बताई जाती है वहीं जॉन इब्राहम की फिल्म रोमियो अकबर वाल्टर भी ब्लैक टाइगर की कहानी जैसी ही है। रविंद्र ने लगभग 8 साल तक भारत के लिए जासूसी की इतने समय कभी कि किसी को उन पर शक नहीं हुआ।
रविंद्र कौशिक पकड़े कैसे गए?
इसमें भी रविंद्र की खुद की गलती नहीं थी। हुआ कुछ यूं कि इनायत मसीह नाम का एक एजेंट पाकिस्तान भेजा गया। मसीह को कौशिक से संपर्क करने के लिए कहा गया था। लेकिन इस कवायद में मसीह पाकिस्तानी अधिकारियों के हाथ आ गया। मसीह को खूब टॉर्चर किया गया और अंत में उसने मेजर नबी अहमद शाकर का नाम ले लिया। इसके बाद पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों ने रविंद्र के लिए फील्डिंग बिठाई। मसीहा से कहा गया कि वो रविंद्र को एक पार्क में मिलने के लिए बुलाए। रविंद्र एन मौके पर पार्क में पहुंच गए और एक बेंच में बैठकर मसीह का इंतजार करने लगे पाकिस्तानी जवान वहां पहले से छुपे हुए थे उन्होंने रविंद्र को गिरफ्तार कर लिया रविंद्र की उम्र तब महज 29 साल थी उन्हें जेल में डाल दिया गया मुकदमा चला 2 साल तक भयंकर टॉर्चर किया गया रविंद्र को लालच दिया गया कि अगर वह भारतीय फौज से जुड़ी जानकारी दे दें तो उन्हें आजाद कर दिया जाएगा रविंद्र टूटे नहीं डटे रहे। 1985 में जासूसी के आरोप में उन्हें मौत की सजा मिली जिसे बाद में आजीवन कारावास के रूप में बदल दिया गया। सियालकोट के एक इंटरोगेशन सेंटर में उनसे दो साल सख्ती से पूछताछ की गई। बाद में 16 साल तक के लिए उन्हें एक दूसरी जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया। 2001 में उनकी मौत हो गई। देश के सपूत ने जन्मभूमि का कर्ज उतारने के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया।
विडंबना ये थी कि रविंद्र का शव भी भारत तक नहीं लाया जा सका मौत के बाद उन्हें मुल्तान के सेंट्रल जेल में दफना दिया गया। भारत सरकार ने कभी आधिकारिक रूप से माना नहीं कि रविंद भारतीय नागरिक था। लेकिन दुनिया का यही कड़वा सच है पकड़े जाने के बाद उसका कोई वतन नहीं होता। पूरी दुनिया में यही दस्तूर है रविंद्र को भारत की मिट्टी भी नहीं नसीब हुई। लेकिन जब भी भारत के लिए मर मिटने वाले जांबाज का नाम लिया जाएगा। ब्लैक टाइगर का नाम उसी लिस्ट में लिखा जाएगा।
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