मुसलमानों के पहले जिहाद की कहानी, हिन्दुओं के खून से लिखी गई क्रूरता की कलंकित कहानी, जिसे कांग्रेस और वामपंथी 'विद्रोह' के रूप में करते रहे चिन्हित

मुसलमानों के पहले जिहाद की कहानी, हिन्दुओं के खून से लिखी गई क्रूरता की कलंकित कहानी, जिसे कांग्रेस और वामपंथी 'विद्रोह' के रूप में करते रहे चिन्हित

ये तो आपको ज्ञात है कि मोपला विद्रोह का देश के स्वतंत्रता संग्राम से कोई लेना देना नहीं था। लेकिन कहा जाता है कि मोपला मुस्लिमों को कट्टरपंथी मौलवियों और केरल में राजनीति की जमीन खोज रहे वामपंथियों ने उकसाया था।

इतिहास अक्सर विकृतियों से भरा होता है और अधिकांश मामलों में कुछ लोगों के अनुरूप उसे फिर से लिखा जाता है। इसमें 1921 का मालाबार विद्रोह या मोपला दंगे कोई अपवाद नहीं हैं। इसे कांग्रेस अब तक विद्रोह और कम्युनिस्ट एक कृषि विद्रोह के रूप में चित्रित करते आए हैं वो वास्तविक में इतिहास की एक ऐसी त्रासदी है जिसके बारे में उतनी चर्चा नहीं हुई है जितनी होनी चाहिए। झूठे आख्यानों से परे इसे वास्तविक रूप में देखना और समझना महत्वपूर्ण है कि 1921 में आखिर हुआ क्या था।

मोपला विद्रोह की हकीकत

ये तो आपको ज्ञात है कि मोपला विद्रोह का देश के स्वतंत्रता संग्राम से कोई लेना देना नहीं था। लेकिन कहा जाता है कि मोपला मुस्लिमों को कट्टरपंथी मौलवियों और केरल में राजनीति की जमीन खोज रहे वामपंथियों ने उकसाया था। इसके पीछे दो वजहे थी। पहली ये कि मालाबार में ज्यादातर जमींदार हिन्दू थे। दूसरी ये कि ज्यादातर मोपला मुस्लिम उनके यहां बटाईदार या काश्तकार थे। कॉम्युनिज्म और कॉम्युलिज्म के कॉकटेल ने अपना काम किया। मोपला मुस्लिमों को हिन्दू भू मालिकों के खिलाफ जमकर भड़काया गया। नतीजा ये हुआ कि मोपला विद्रोह के कारण हजारों हिन्दू मारे गए। हजारों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करवाया गया। हालांकि बाद में आर्य समाज की तरफ से उनका शुद्धिकरण आंदोलन भी चला। जिन हिन्दुओं को मुस्लिम बना दिया गया था उन्हें वापस हिन्दू बनाया गया। इसी आंदोलन के दौरान आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानंद को उनके आश्रम में ही 23 दिसंबर 1926 को गोली मार दी गई थी। 

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आरएसएस से जुड़े थिंक टैंक की मांग, केंद्र 25 सितंबर को मनाए 'मालाबार हिंदू नरसंहार दिवस'

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध एक ‘थिंक-टैंक’ कहा कि 1921 के मोपला विद्रोह को “जनसंहार के तौर पर याद किया जाना चाहिए और एक स्मारक का निर्माण भी किया जाना चाहिए।” प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार ने कहा कि केरल में मलप्पुरम में सौ साल पहले हुई 1921 की मालाबार हत्याओं की याद में सरकार को एक “जनसंहार स्मारक” बनवाना चाहिए और 25 सितंबर को “मालाबार हिन्दू जनसंहार दिवस” के रूप में मनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मालाबार हत्याओं को अंग्रेजों या जमींदारों के विरुद्ध लड़ाई के रूप में मान्यता दिए जाने का संघ विरोध करता रहा है। नंदकुमार ने कहा कि यह हिन्दुओं को लक्षित कर किया गया जनसंहार था। उन्होंने 25 सितंबर की एक क्रूरत हत्याकांड को याद किया, जहाँ मल्ल्पुरम और कालीकट के बीच एक स्थान पर एक कुएँ के सामने 50 से ज्यादा हिन्दुओं को बांध कर रख दिया। एक चट्टान के ऊपर बैठ कर उनके ‘गुनाहों’ की बात की गई और तिलक-चोटी-जनेऊ पर आपत्ति जताते हुए मंदिर में जाने को भी ‘गुनाह’ बताया गया और कहा गया कि शरीयत के शासन में ये ठीक नहीं है। हिन्दुओं के गले काट-काट कर कुएँ में धकेल दिया गया।

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योगी बोले- सांप्रदायिक नरसंहार में 10,000 से अधिक हिंदुओं का बेरहमी से कत्ल किया गया

मोपला मुसलमानों द्वारा हिंदुओं के कुख्यात 1921 मालाबार नरसंहार के 100 साल पूरे होने पर, उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने पंचजन्य द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बात की। यूपी के सीएम ने याद किया कि कैसे भारतीय इतिहास के इतिहास में दर्ज सबसे खराब सांप्रदायिक नरसंहार में 10,000 से अधिक हिंदुओं का बेरहमी से कत्ल किया गया था। योगी आदित्यनाथ ने आगे कहा कि सांप्रदायिक नरसंहार मूल रूप से मार्क्सवादी और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा उनके वैचारिक आख्यानों और आवश्यकताओं के अनुरूप और वाम दलों के लिए एक बड़े संगठित वोट-बैंक को जीतने के लिए एक किसान विद्रोह के रूप में विनियोजित किया गया था। उन्होंने कहा कि विनायक दामोदर सावरकर अपनी पुस्तक के माध्यम से मालाबार नरसंहार को हिंदू विरोधी नरसंहार के रूप में वर्णित करने वाले पहले लोगों में से एक थे, जो 1924 में प्रकाशित होने पर बेहद लोकप्रिय हो गया था। यहां तक ​​कि डॉ बीआर अम्बेडकर ने Pakistan or The Partition of India' में घटना का विस्तृत विवरण प्रदान किया है और हिंदुओं पर मोपला द्वारा स्वतंत्र रूप से किए गए क्रूर और अनर्गल बर्बरता की कड़ी निंदा की है। 





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