Pellet Gun के समर्थन में उतरीं Mehbooba Mufti ! Omar Abdullah ने भड़कते हुए साध दिया तगड़ा निशाना

हम आपको बता दें कि विवाद की शुरुआत उस बयान से हुई जिसमें महबूबा मुफ्ती ने कहा कि दिल्ली और कश्मीर की परिस्थितियां अलग थीं। उनका तर्क था कि कश्मीर में सुरक्षा बल आतंकवाद से जूझ रहे थे, इसलिए वहां की स्थिति को दिल्ली के छात्र आंदोलनों से नहीं जोड़ा जा सकता।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन चलाए जाने के मुद्दे पर सियासत पहले ही गरमाई हुई है। इसी बीच जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती के एक बयान ने घाटी की राजनीति में भी नया भूचाल ला दिया है। हम आपको बता दें कि दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई का विरोध करने वाली महबूबा ने कश्मीर में सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग को आतंकवाद से लड़ाई का हवाला देकर उचित ठहराया, जिसके बाद उन पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगने लगे। उनके इस बयान ने न सिर्फ राजनीतिक विवाद को हवा दी, बल्कि 2016 में पैलेट गन के इस्तेमाल और उनके चर्चित "दूध और टॉफी" वाले बयान की यादें भी एक बार फिर ताज़ा कर दीं।
हम आपको बता दें कि विवाद की शुरुआत उस बयान से हुई जिसमें महबूबा मुफ्ती ने कहा कि दिल्ली और कश्मीर की परिस्थितियां अलग थीं। उनका तर्क था कि कश्मीर में सुरक्षा बल आतंकवाद से जूझ रहे थे, इसलिए वहां की स्थिति को दिल्ली के छात्र आंदोलनों से नहीं जोड़ा जा सकता। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि यदि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन हर नागरिक का अधिकार है, तो क्या कश्मीर के युवाओं के अधिकारों की परिभाषा अलग थी? क्या विरोध की आवाज़ उठाने वाला हर कश्मीरी स्वतः आतंकवाद के दायरे में आ जाता है?
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सत्तारुढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) ने इसी सवाल को सबसे तीखे अंदाज में उठाया। पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट में तंज कसते हुए लिखा, "अगर आप कश्मीरी हैं और अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं, तो आप पर बल प्रयोग करना तो बनता है। वाह!" यह टिप्पणी सीधे तौर पर महबूबा के कथित दोहरे मापदंड पर निशाना थी। नेकां के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने तो और भी कड़ा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि महबूबा मुफ्ती ने हर कश्मीरी प्रदर्शनकारी को "आतंकवादी" की तरह पेश करने की कोशिश की। डार ने कहा कि उनके बयान से ऐसा प्रतीत होता है मानो बच्चे, छात्र, लड़कियां, सभी को एक ही नजर से देखा गया। उन्होंने इसे "शर्मनाक" बताते हुए कहा कि यह किसी पूर्व मुख्यमंत्री के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण सोच है।
नेकां के वरिष्ठ नेता और विधायक तनवीर सादिक ने भी महबूबा मुफ्ती से सार्वजनिक माफी की मांग की। उन्होंने सवाल किया कि क्या अब आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले, बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग करने वाले या शांतिपूर्ण विरोध करने वाले सभी लोग भी आतंकवादी कहलाएंगे? उनका कहना था कि लोकतांत्रिक विरोध और आतंकवाद के बीच की रेखा मिटाना बेहद खतरनाक सोच है।
वहीं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा, "महबूबा मुफ़्ती को कश्मीरियों के ख़िलाफ़ सत्ता के दुरुपयोग को सही ठहराने के लिए जंतर-मंतर जाने की बजाय घर पर ही रहना चाहिए था।" अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘जब एक पूर्व मुख्यमंत्री यह कहती हैं कि कश्मीर में आतंकवाद से लड़ने के लिए बल का इस्तेमाल सही है, तो अपने अधिकारों के लिए लड़ने कौन आगे आएगा? अच्छा होता वह जंतर-मंतर नहीं गई जातीं।'' उन्होंने कहा, ‘‘जब हम (नेता) केंद्र द्वारा किए जा रहे दमन और बल के इस्तेमाल का समर्थन करते हैं तो तो अगर लोग राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए विरोध प्रदर्शन करना चाहेंगे, तो हमारा समर्थन कौन करेगा? वे बाहर नहीं आएंगे, क्योंकि महबूबा जी ने कह दिया है कि ‘यह तो बनता है’ (यह सही है)।’’ मुख्यमंत्री ने कहा कि महबूबा जम्मू कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर नेकां के प्रदर्शन में शामिल होने जंतर-मंतर नहीं गई थीं बल्कि वह छात्रों के विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने वहां गई थीं। उन्होंने कहा, ‘‘वह जम्मू कश्मीर के लिए जंतर-मंतर नहीं गईं। लेकिन वह वहां गईं और आतंकवाद से लड़ने के बहाने सत्ता और बल के दुरुपयोग को सही ठहराया।’’ अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘वह इसे कैसे सही ठहराती हैं? क्या सिर्फ आतंकवाद की वजह से बच्चों को इंसाफ नहीं मिलना चाहिए? क्या आतंकवाद की वजह से पासपोर्ट रोक दिए जाने चाहिए? क्या आतंकवाद की वजह से कानून लागू नहीं होने चाहिए? मैं यह नहीं समझ पाया कि इसे कैसे उचित ठहराया जा सकता है।’’ उन्होंने कहा कि पीडीपी नेता की दिल्ली और जम्मू कश्मीर में अलग-अलग बातें कहने की पुरानी आदत है। उन्होंने कहा, ‘‘मान लीजिए कि वह कुछ देर के लिए वहां के कुछ लोगों को खुश करने की कोशिश कर रही थीं। वह अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग बातें कहने की अपनी पुरानी आदत भूली नहीं हैं।’’ अब्दुल्ला ने कहा कि महबूबा को अपने बयान के लिए माफी मांगनी चाहिए।
उधर, अपनी पार्टी के अध्यक्ष अल्ताफ बुखारी ने भी इसी मुद्दे को उठाते हुए कहा कि उन्हें महबूबा के ताजा बयान से कोई आश्चर्य नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि जिस नेता ने कभी कश्मीरी बच्चों की मौत और पैलेट गन के इस्तेमाल पर ऐसे बयान दिए हों, उससे अलग उम्मीद करना कठिन है। उन्होंने कहा कि 2016 की त्रासदी की पीड़ा आज भी हजारों परिवारों के दिलों में जिंदा है और राजनीतिक बयानबाजी उस दर्द को मिटा नहीं सकती।
हालांकि पीडीपी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पार्टी नेता वहीद परा ने दावा किया कि महबूबा मुफ्ती के बयान को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की मदद से संपादित कर संदर्भ से हटाकर पेश किया गया है। उन्होंने कहा कि महबूबा का आशय यह था कि जिन कठोर कानूनों और तरीकों का इस्तेमाल पहले जम्मू-कश्मीर में किया गया, वही अब देश के अन्य हिस्सों में भी लागू किए जा रहे हैं। वहीद परा ने कहा कि महबूबा दिल्ली में छात्र आंदोलन पर हुई कार्रवाई की आलोचना कर रही थीं और यह बता रही थीं कि कश्मीर में जो हुआ, वही अब पूरे देश में दोहराया जा रहा है। उन्होंने यूएपीए जैसे कानूनों का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन प्रावधानों का इस्तेमाल पहले घाटी में होता था, बाद में उनका प्रयोग दिल्ली के छात्र नेताओं शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे मामलों में भी किया गया।
बहरहाल, पीडीपी की यह सफाई भी कई सवाल छोड़ जाती है। यदि वास्तव में बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया, तो पूरा और बिना संपादित वीडियो सार्वजनिक करने में हिचक क्यों है?
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