बिहार में एक बार फिर दिखेगी लव-कुश की जोड़ी, कुशवाहा को साधने की कोशिश में नीतीश

उपेंद्र कुशवाहा के एक करीबी नेता ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि हाल के दिनों में उनकी दोस्ती नीतीश कुमार से बढ़ी है जिसका आने वाले समय में ठोस असर भी देखने को मिलगा।
वह कहते है ना कि रिश्ते तभी अच्छे होते है जब उनमें टकराव और मिठास दोनों की गुंजाइश हो। फिलहाल बिहार की राजनीति में यही देखने को मिल रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद से जदयू खुद को मजबूत करने की कोशिश में है। इसके लिए पार्टी की ओर से तमाम पुराने नेताओं को एक बार फिर साथ लाने की कोशिश की जा रही है। इसी का नतीजा हमने देखा कि पिछले दिनों उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार से मुलाकात की थी। हालांकि हालिया घटनाक्रमों को देखें तो ऐसा लगेगा कि दोनों नेता एक दूसरे के धुर विरोधी हैं, पर ऐसा नहीं है। यह दोनों नेता कभी दोस्त रहे हैं तो कभी इनकी दुश्मनी चरम पर देखने को मिली है।
इसे भी पढ़ें: बिहार में लगेगा कोरोना का फ्री टीका, 20 लाख युवाओं को रोजगार देगी नीतीश सरकार
उपेंद्र कुशवाहा के एक करीबी नेता ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि हाल के दिनों में उनकी दोस्ती नीतीश कुमार से बढ़ी है जिसका आने वाले समय में ठोस असर भी देखने को मिलगा। उधर, जदयू के भी एक वरिष्ठ नेता ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि कुशवाहा के साथ आने से बिहार की राजनीति में एक नया प्रयोग देखने को मिल सकता है। इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी कह दिया कि एक बार फिर लव-कुश की जोड़ी बिहार में एक साथ हो सकती है। कुशवाहा को साधने के पीछे नीतीश का सबसे बड़ा तर्क यह है कि वह खुद को मजबूत करना चाहते हैं। विधानसभा चुनाव से पहले रालोसपा छोड़ने वाले माधव आनंद ने भी हाल में ही उपेंद्र कुशवाहा से बातचीत के बाद अपनी वापसी पार्टी में कर ली है।
इसे भी पढ़ें: बिहार में युवा नेताओं को आगे करने की कोशिश में भाजपा, टूटा दिग्गज नेताओं का मंत्री बनने का सपना
महागठबंधन में कुछ ज्यादा महत्व ना मिलने के बाद माधव आनंद चाहते थे कि कुशवाहा एक बार फिर से एनडीए में वापसी कर ले। हालांकि यह संभव नहीं हो पाया और यही कारण था कि उन्होंने रालोसपा से दूरी बना ली। माना जा रहा है कि नीतीश और उपेंद्र कुशवाहा की दूरियां कम करने में माधव आनंद का बड़ा योगदान है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि कुशवाहा को साथ लेना सिर्फ और सिर्फ नीतीश कुमार की ही मजबूरी है। दरअसल, कुशवाहा ने भी बिहार की राजनीति में सभी विकल्पों को आजमा लिया। महागठबंधन में उन्हें कुछ खास महत्व नहीं मिला। बसपा और ओवैसी के साथ गठबंधन करने के बावजूद उनकी पार्टी बिहार विधानसभा चुनाव में कुछ खास नहीं कर पाई। ऐसे में उनके लिए एनडीए में वापसी करना ही एकमात्र विकल्प बचा हुआ है।
इसे भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल की 75 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी जदयू !
इतना ही नहीं, जदयू की ओर से नाराज नेताओं को भी मनाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे तमाम नेताओं से बातचीत की जा रही है जो कभी ना कभी जदयू के हिस्सा रह चुके है। इसके अलावा जदयू उन बागी नेताओं पर भी डोरे डाल रही है जिन्होंने विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी का दामन छोड़ दिया था। साथ ही साथ जदयू कांग्रेस विधायकों पर भी नजर जमाए हुए है। जदयू पूरे प्रयास में है कि कांग्रेस के विधायक टूटते हैं तो वह उन्हें अपने पार्टी में शामिल करा सकें। आपको बता दें कि पिछले महीने संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू 243 में से सिर्फ 43 सीटें ही ला सकी। हालांकि नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ रही एनडीए गठबंधन ने एक बार फिर से चुनावी बाजी मारी और नीतीश के ही नेतृत्व में बिहार में एक बार फिर से सरकार बना पाई।
अन्य न्यूज़














