उत्तर प्रदेश में फिर एक नेता पुत्र को पार्टी की कमान सौंपने की तैयारी

उत्तर प्रदेश में फिर एक नेता पुत्र को पार्टी की कमान सौंपने की तैयारी

बहरहाल, 18 मई को अजित सिंह की मृत्यु की एक रस्म के बाद उनके पुत्र जयंत चैधरी को राष्ट्रीय लोकदल की कमान विधिवत सौंप दी जाएगी। वंशवास की सियासत का यह भी एक चेहरा है, जहां बाप की सियासी वारिस का हकदार बेटे को ही समझा जाता है।

लखनऊ। मृत्युलोक में कुछ भी स्थायी नहीं है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नर-नारी सबका अंत तय है, लेकिन कुछ लोग अपने किए गए कार्यो से मरने के बाद भी अमर रहते हैं। इसमें  नेतानगरी, फिल्मी दुनिया, व्यापार, रोजगार, वैज्ञानिक, डाक्टर, इंजीनियर तमाम क्षेत्रों के लोग शामिल हैं, जिन्होंने अपने साथ-साथ देश का भी मान सम्मान बढ़ाने मे भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसमें से कई अभी जिंदा है तो तमाम ऐसे भी हैं जो अब हमारे बीच नहीं हैं। क्योंकि पीढ़ी दर पीढ़ी सब कुछ बदलता रहता है। कुदरत के इसी खेल के चलते कई राजा फकीर हो जाते हैं तो कई फकीरों के सिर पर ‘ताज’ सज जाता है। ऐसे लोग बिरले होते हैं जो आमजन के दिलोदिमाग पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम जनमानस के लिए ऐसे लोग हमेशा अमर रहते हैं। इसी लिए तो कभी कोई दूसरा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, धीरूभाई अंबानी, टाटा-बिरला, अब्दुल कलाम, अमिताभ बच्चन, किशोर कुमार, मुकेश, मो. रफी, सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर आदि नहीं पैदा होता है। इन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में विशेष योगदान दिया। यह लोग जननायक होते हैं तो इनके नाम के सहारे इनकी कई पीढ़िया अपना जीवन संवारने और रोजी-रोटी कमाने में कामयाब रहती है। खासकर राजनीति में यह परम्परा कुछ ज्यादा ही देखने को मिलती है। पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी से लेकर जम्मू कश्मीर का अब्दुला परिवार, उत्तर प्रदेश का मुलायम सिंह यादव, बिहार का लालू यादव, राम विलास पासवान तमिलनाडु में करूणानिधि आदि तमाम नेताओं का परिवार इसकी जिंदा मिसाल हैं। जिन्होंने अपने बाप-दादा के नाम का फायदा उठाकर सियासत में वो मुकाम हासिल कर लिया, जिसको पाने के लिए आम आदमी की पूरी जिंदगी गुजर जाती है, तब भी उनमें से कई को अपनी मंजिल नसीब नहीं होती है, जबकि देश या समाज सेवा के लिए किए गए इनके कार्य नहीं के बराबर होते हैं। कांग्रेस का इंदिरा परिवार तो इससे भी कई कदम आगे निकला उसने तो बड़े ही शातिराना तरीके से अपने साथ ‘गांधी’ का ही टाइटिल जोड़ लिया। इसके पीछे की इस परिवार की मंशा सिर्फ महात्मा गांधी के नाम को भुनाना ही था, जिसमें यह सफल भी रहा। इस कड़ी में अब एक नया नाम राष्ट्रीय लोकदल के प्रमुख नेता और चौधरी चरण सिंह के पौत्र जयंत चौधरी का जुड़ने जा रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र और किसानों के मसीहा पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण के पौत्र जयंत चौधरी 18 मई से पार्टी की कमान संभालने जा रहे हैं। चौधरी परिवार की विरासत के नये अधिकारी जयंत चौधरी के लिए रालोद का अध्यक्ष बन जाना भले ही आसान हो लेकिन पार्टी का जनाधार बढ़ाने की बड़ी चुनौती से निपटना उनके लिए आसान नहीं होगा। क्योंकि पिछले कुछ वर्षो में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत का रंग काफी बदल गया है। अब यहां जाट राजनीति के कई सिरमौर हौ गए हैं। पिछले दो लोकसभा चुनावों और एक विधान सभा चुनाव के नतीजों के आधार पर कहा जाए तो पश्चिमी यूपी में आज की तारीख में भाजपा का ‘सिक्का चलता है। भाजपा का दबदबा है, जबकि इससे पहले के चुनावों में सपा-बसपा यहां अपनी ताकत दिखा चुके थे, चौधरी अजित सिंह यहां कभी इस स्थिति में नहीं रहे कि बिना किसी दल के समर्थन के अपनी पार्टी की साख बचा पाते। इसलिए जयंत के लिए भी चुनौती कम नहीं है। फिर अबकी पीढ़ी ने चौधरी चरण सिंह का नाम जरूर सुन रखा है, परंतु देश के लिए चरण सिंह के योगदान की जानकारी कम लोगों के पास ही है।

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बहरहाल, 18 मई को अजित सिंह की मृत्यु की एक रस्म के बाद उनके पुत्र जयंत चौधरी को राष्ट्रीय लोकदल की कमान विधिवत सौंप दी जाएगी। वंशवाद की सियासत का यह भी एक चेहरा है, जहां बाप की सियासी वारिस का हकदार बेटे को ही समझा जाता है। जयंत की ताजपोशी तो तय है, लेकिन इसके साथ ही उनको यह भी पता है कि पार्टी की हालत बेहद खराब है। वर्ष 2014 के बाद से रालोद का प्रतिनिधित्व न लोकसभा में है और न उत्तर प्रदेश विधानसभा में है, जो पार्टी की कर्म स्थली वाला प्रदेश है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में रालोद का एकमात्र विधायक छपरौली क्षेत्र से चुना जरूर गया था, लेकिन बाद में यह भी दलबदल कर भाजपा में शामिल हो गया था। मोदी लहर के चलते अजित सिंह व जयंत चौधरी गत दो लोकसभा चुनावों से सांसद की सीढ़ियां नहीं चढ़ पा रहे हैं। ऐसे में रालोद में फिर से जान डालना जयंत की पहली बड़ी परीक्षा होगी। 

हालिया पंचायत चुनावों के नतीजे रालोद के लिए शुभ संकेत भले ही माने जाएं परंतु इसी माहौल को अगले वर्ष तक बचाए रखना जयंत के लिए आसान नहीं है। वैसे भी पंचायत चुनावों के आधार पर कभी भी विधानसभा चुनाव के नतीजों का पता नहीं चल पाता है। कई बार देखा गया है कि पंचायत चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने वाले दल विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित हो जाते हैं। इसीलिए तो 2016 के पंचायत चुनाव में एक हजार से अधिक सीटों पर जीत दर्ज करने वाली समाजवादी पार्टी 2017 के विधान सभा चुनाव में तीन अंकों तक भी नहीं पहुंच पाई थी। सपा को सत्ता से हाथ छोना पड़ गया, जबकि पंचायत चुनाव में कोई खास प्रदर्शन नहीं करने वाली भाजपा ने विधानसभा चुनाव में शानदार जी हासिल करके सरकार बना ली।

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दरअसल, पिछले सात-आठ वर्षों में पश्चिमी यूपी की सियासी बयार काफी बदल चुकी है। यहां भगवा रंग काफी चटक हो गया है। इसके अलावा अब पश्चिमी यूपी की जाट राजनीति का केन्द्र भी अब बागवत नहीं रह गया है। जहां से पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और उसके बाद उनके पुत्र चौधरी अजित सिंह कभी जाट राजनीति की दिशा तय किया करते थे। आजादी के बाद से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट राजनीति का केंद्र छपरौली बागपत माना जाता रहा था परंतु भारतीय जनता पार्टी के उभार के बाद हालात तेजी से बदले हैं। वहीं भाजपा भी सतपाल सिंह व संजीव बालियान जैसे जाट नेताओं को स्थापित करने में सफल रही। मुजफ्फरनगर क्षेत्र में संजीव बालियान ने जिस तरह संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी बने अजित सिंह को पराजित किया, वह जाट राजनीति में किसी टर्निंग प्वांइट से कम नहीं रहा। इसके अलावा भारतीय किसान यूनियन प्रमुख महेंद्र सिंह टिकैत भी किसान राजनीति की धारा बदलने में सफल रहे। वहीं भाजपा भी सतपाल सिंह व संजीव बालियान जैसे जाट नेताओं को स्थापित करने में सफल रही। मुजफ्फरनगर क्षेत्र में संजीव बालियान ने जिस तरह संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी बने अजित सिंह को पराजित किया। उधर कृषि कानून विरोधी आंदोलन से राकेश टिकैत की बढ़ती लोकप्रियता के आगे भी जयंत को जाटों में अपनी पकड़ सिद्ध करना आसान नहीं होगा। क्योंकि जयंत राजनीति में कोई नये नहीं हैं। भले ही चौधरी अजित सिंह के हाथों में पार्टी की कमान थी, परंतु वह इधर काफी समय से निष्क्रय चल रहे थे और सारे फैसले जयंत ही ले रहे थे, इसके बाद भी रालोद की तस्वीर नहीं बदल पाई है। छोटे चौधरी अजित सिंह इस दुनिया से चले जरूर गए हैं, लेकिन वह कुछ सियासी मुद्दे भी छोड़ गए हैं, जो अभी तक पूरे नहीं हो पाए हैं। इसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों को मिलाकर एक पृथक हरित प्रदेश का सपना व पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच स्थापना की मांग प्रमुख है। जयंत को यह भी तय करना होगा कि उनको सियासी सफर अकेला तय करना है या फिर किसी दल के साथ मिलकर आगे बढ़ना चाहेंगे। बहरहाल, जयंत सिंह तीसरे ऐसे नेता है जो पिता की सियासी विरासत संभालने जा रहे हैं। इससे अखिलेश यादव पुत्र समाजवादी पार्टी, अपना दल की अनुप्रिय पटेल पुत्री सोनेलाल पटेल अपना दल की कमान संभाल चुकी हैं।





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