Prabhasakshi NewsRoom: America को हरा चुके देश के राष्ट्रपति आ रहे हैं India, शुरू होगा China-Pakistan की घेराबंदी का नया अध्याय

माना जा रहा है कि तो लाम का भारत दौरा न केवल दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई देगा, बल्कि एशिया की सामरिक राजनीति में भी हलचल मचाने वाला है। पांच से सात मई तक होने वाली यह यात्रा ऐसे समय पर हो रही है जब भारत और वियतनाम के रिश्ते अपने सबसे मजबूत दौर में हैं।
वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम पांच मई को अपनी तीन दिवसीय यात्रा के तहत भारत आएंगे और यहां रक्षा, व्यापार तथा महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती पर चर्चा की जाएगी। भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रपति तो लाम के साथ द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं के साथ-साथ पारस्परिक हित के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर व्यापक चर्चा करेंगे। खास बात यह है कि राष्ट्रपति चुने जाने के बाद लाम की यह भारत की पहली यात्रा होगी।
माना जा रहा है कि तो लाम का भारत दौरा न केवल दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई देगा, बल्कि एशिया की सामरिक राजनीति में भी हलचल मचाने वाला है। पांच से सात मई तक होने वाली यह यात्रा ऐसे समय पर हो रही है जब भारत और वियतनाम के रिश्ते अपने सबसे मजबूत दौर में हैं। हम आपको बता दें कि भारत और वियतनाम के रिश्ते कोई आज के नहीं हैं। ये ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव की मजबूत नींव पर खड़े हैं। साल 2016 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वियतनाम गए थे, तब दोनों देशों ने अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया था। अब इस साझेदारी के दस साल पूरे होने जा रहे हैं और यह यात्रा उसी का प्रतीक है।
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दोनों देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है और यह करीब सोलह अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। लक्ष्य है इसे पच्चीस अरब डॉलर और आगे चलकर पचास अरब डॉलर तक ले जाना। ऊर्जा, डिजिटल ढांचा और महत्वपूर्ण खनिज जैसे क्षेत्रों में सहयोग तेजी से बढ़ रहा है।
खास बात यह भी है कि भारत और वियतनाम के रिश्तों का सबसे धारदार पहलू है रक्षा सहयोग। यह अब सहयोग रणनीतिक संतुलन का हथियार भी बन चुका है। वियतनाम भारत से सात सौ मिलियन डॉलर की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल खरीदने की तैयारी में है। यह सौदा हिंद प्रशांत क्षेत्र में ताकत के समीकरण बदल सकता है। भारत पहले ही वियतनाम को गश्ती नौकाएं दे चुका है और नई ऋण सहायता भी दी जा रही है। दोनों देश पनडुब्बी बचाव, सैन्य प्रशिक्षण और संयुक्त अभ्यास जैसे क्षेत्रों में भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। 2030 तक की संयुक्त दृष्टि में तकनीकी हस्तांतरण और संयुक्त उत्पादन पर जोर दिया गया है।
इसके अलावा, भारत वियतनाम रक्षा सहयोग को केवल द्विपक्षीय संबंधों के रूप में देखना भूल होगी। यह चीन और पाकिस्तान के गठजोड़ के खिलाफ एक संतुलित जवाब है। दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामकता के बीच वियतनाम को ब्रह्मोस जैसी मिसाइल मिलना बीजिंग के लिए सीधी चेतावनी है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे चीन को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ेगा। वहीं पाकिस्तान भी इस साझेदारी पर नजर बनाए हुए है। उसे यह डर सता रहा है कि भारत जिस तरह चीन के पड़ोस में मजबूत साझेदार बना रहा है, वह उसकी रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अगर भारत वियतनाम की समुद्री ताकत को और मजबूत करता है तो चीन पाकिस्तान को और उन्नत हथियार दे सकता है, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है।
हम आपको यह भी याद दिला दें कि वियतनाम वही देश है जिसने कभी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमेरिका को झुकने पर मजबूर कर दिया था। वियतनाम युद्ध में अमेरिका राजनीतिक रूप से हार गया था। गुरिल्ला युद्ध, जन समर्थन और अदम्य इच्छाशक्ति ने वियतनाम को जीत दिलाई थी। उसी देश के राष्ट्रपति का भारत आना दुनिया को भी बड़ा संदेश दे रहा है। यह संदेश है कि वैश्विक ताकतें अब केवल पश्चिम तक सीमित नहीं हैं। एशिया अपनी नई धुरी बना रहा है और भारत इसमें केंद्रीय भूमिका निभा रहा है।
हम आपको बता दें कि इस यात्रा के दौरान राष्ट्रपति तो लाम का भव्य स्वागत किया जाएगा। वे बोध गया भी जाएंगे, जो बौद्ध विरासत का प्रतीक है और मुंबई भी जाएंगे जो भारत की आर्थिक ताकत का केंद्र है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति तो लाम के बीच व्यापक बातचीत होगी जिसमें रक्षा, व्यापार, तकनीक और वैश्विक मुद्दे शामिल होंगे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु भी उनसे मुलाकात करेंगी।
बहरहाल, यह यात्रा केवल एक औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं है। यह एशिया की नई शक्ति संरचना का संकेत है। भारत और वियतनाम मिलकर एक ऐसा संतुलन बना रहे हैं जो चीन और पाकिस्तान जैसे गठजोड़ को चुनौती देता है। अमेरिका को कभी झुकाने वाला वियतनाम आज भारत के साथ खड़ा है। यह केवल दो देशों की दोस्ती नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था का एलान है।
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