Yes Milord: ब्रेस्ट दबाना, सलवार उतारना...रेप की कोशिश नहीं, HC के इतना कहते ही भड़क गए CJI

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने हैरानी जताते हुए नाराजगी जाहिर की। चीफ जस्टिस ने कहा कि जजों को संवेदनशील होना चाहिए और सर्च करनी चाहिए। जज कानूनी पड़ताल के बिना फैसले दिए जा रहे हैं। हम पटना हाईकोर्ट के फैसले की विस्तार से समीक्षा करके विस्तृत आदेश जारी करेंगे।
महिला के ब्रेस्ट दबाना, सलवार उतारना, रेप की कोशिश नहीं। पटना हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले ने रेप की कोशिश की। कानूनी परिभाषा को लेकर देश भर में नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने कहा कि किसी महिला को कमरे में बंद करना, उसकी छाती दबाना और सलवार उतारने की कोशिश करना अपने आप में आईपीसी की धारा 376/51 के तहत बलात्कार का प्रयास साबित नहीं करता। जब तक यह साबित ना हो जाए कि आरोपी ने बलात्कार को अंजाम देने की दिशा में स्पष्ट और प्रत्यक्ष कदम उठाया था। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ कहा कि आरोपी का व्यवहार गंभीर था और यह महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य है जो आईपीसी की धारा 354 के दायरे में आता है। 9 जुलाई को फैसला सुनाते हुए बांका के हिमांशु उर्फ मिथिया पाठक को बरी कर दिया। पटना हाई कोर्ट के इस फैसले पर अब सुप्रीम कोर्ट खफा हो गया है। पटना हाई कोर्ट के इस फैसले को 14 जुलाई को सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में उठाया। जिस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने हैरानी जताते हुए नाराजगी जाहिर की। चीफ जस्टिस ने कहा कि जजों को संवेदनशील होना चाहिए और सर्च करनी चाहिए। जज कानूनी पड़ताल के बिना फैसले दिए जा रहे हैं। हम पटना हाईकोर्ट के फैसले की विस्तार से समीक्षा करके विस्तृत आदेश जारी करेंगे।
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नाराज हुए सीजेआई
13 साल बाद 9 जुलाई 2026 को फैसला सुनाते हुए पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्ण सिंह ने कहा कि इसकी इस मामले में मेडिकल एविडेंस नहीं है। रेप करने की कोशिश की दिशा में भी स्पष्ट शारीरिक प्रयास के प्रमाण नहीं है। इसलिए आरोपी को बरी किया जाता है। अब सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के फ़ैसले पर गंभीर चिंता जताई। इस फ़ैसले में कहा गया था कि किसी महिला के ब्रेस्ट दबाना और उसकी सलवार उतारने की कोशिश करना रेप की कोशिश नहीं माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले के पीछे की कानूनी सोच पर सवाल उठाए। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि ऐसे फ़ैसले सुनाने से पहले जजों को भी कुछ रिसर्च करनी चाहिए। ये टिप्पणियाँ सुप्रीम कोर्ट के उस स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान की गईं, जो इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 मार्च, 2025 के उस आदेश से जुड़ा था जिसमें कहा गया था कि किसी लड़की के पजामे की डोरी खींचना और उसके स्तनों को पकड़ना बलात्कार की कोशिश नहीं माना जाएगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे, पटना हाई कोर्ट के फैसले पर तब ध्यान दिया जब सीनियर वकील शोभा गुप्ता और एच.एस. फूलका ने इसे कोर्ट के सामने रखा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी कमेटी की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट की वेबसाइटों पर अपलोड की जाए। बेंच ने आदेश दियाकि सभी अदालतें हैंडबुक में दी गई बातों का पालन करें। राज्य सभी पुलिस स्टेशनों को निर्देश जारी करें कि वे FIR दर्ज करते समय और चार्जशीट दाखिल करते समय हैंडबुक का पालन करें।
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आरोपी पर क्या आरोप थे?
बांका ज़िले के अमरपुर में 'छाया स्टूडियो' में एक दिन पहले हुई घटना के संबंध में 20 जनवरी, 2008 को FIR दर्ज की गई थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि स्टूडियो के मालिक पाठक ने पीड़िता को फ़ोटोग्राफ़ी के लिए अंदर बुलाया और उसके पिता से कहा कि वे कंप्यूटर मॉनिटर पर तस्वीर देखने के लिए बाहर इंतज़ार करें। इसके बाद आरोपी ने स्टूडियो का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। पीड़िता ने बयान दिया कि आरोपी ने अपने कपड़े उतारे, उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और रेप करने के इरादे से उसकी छाती दबाकर ज़बरदस्ती छेड़छाड़ की। उसकी चीखें सुनकर पीड़िता के पिता ने ज़ोर लगाकर दरवाज़ा खोला; तब आरोपी ने उन्हें ज़ोर से धक्का दिया और भाग गया। 2013 में एक ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 376 के साथ धारा 511 (रेप की कोशिश) और धारा 342 (गलत तरीके से कैद में रखना) के तहत दोषी ठहराया और उसे तीन साल की कठोर कैद की सज़ा सुनाई। सबूतों की दोबारा जांच करने पर, हाई कोर्ट को प्रक्रिया में बड़ी कमियां मिलीं। कोर्ट ने देखा कि पांच गवाहों में से एकमात्र स्वतंत्र स्थानीय गवाह अपने बयान से मुकर गया था, और जांच करने वाले अधिकारी, जिन्होंने जांच पूरी की थी और चार्ज-शीट दाखिल की थी, उनसे ट्रायल के दौरान पूछताछ नहीं की गई थी। इसके अलावा, किसी मेडिकल ऑफिसर से भी पूछताछ नहीं की गई, जिसके बारे में कोर्ट ने कहा कि इससे रेप की कोशिश के आरोप को साबित करने के लिए कोई मेडिकल सबूत नहीं मिल पाया। कोर्ट ने कहा कि चूंकि पीड़िता के माता-पिता "इंटरेस्टेड विटनेस" (मामले में दिलचस्पी रखने वाले गवाह) थे, इसलिए उनके बयानों की बारीकी से जांच और स्वतंत्र पुष्टि की ज़रूरत थी, लेकिन ये दोनों ही चीज़ें नहीं की गई थीं। हाई कोर्ट ने माना कि आरोपी ने आपराधिक बल का इस्तेमाल किया था क्योंकि उसने पीड़िता को बंधक बनाया, दरवाज़ा बंद किया, उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाकर उसके साथ छेड़छाड़ की। हालाँकि, ये हरकतें रेप की कोशिश के बजाय महिला की मर्यादा भंग करने के अपराध के दायरे में आती हैं। कोर्ट ने कहा, अगर पेनिट्रेशन का ज़रा भी सबूत न हो, या रेप की कोशिश साबित करने वाली कोई साफ़ हरकत न दिखे, और न ही कोई मेडिकल पुष्टि हो, तो IPC की धारा 375 और उसके साथ पढ़ी जाने वाली IPC की धारा 376 और 511 के तहत अपराध नहीं बनता है। कोर्ट का मानना था कि अगर अभियोजन पक्ष की बात को पूरी तरह मान भी लिया जाए, तो भी FIR में बताए गए और पीड़िता के बयान में कही गई बातें, रेप की कोशिश का अपराध साबित करने के लिए साफ़ तौर पर काफ़ी नहीं हैं।
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