कोरोना टीकाकरण को लेकर फैलाई जा रही अफवाह, नीति आयोग में सभी मिथकों को किया दूर

कोरोना टीकाकरण को लेकर फैलाई जा रही अफवाह, नीति आयोग में सभी मिथकों को किया दूर

पॉल ने कहा कि भारत की टीकाकरण प्रक्रिया पर मिथक और तथ्य’ पर एक बयान में कहा कि वैश्विक स्तर पर टीके की आपूर्ति सीमित है। कंपनियों की अपनी प्राथमिकताएं, योजनाएं और बाध्यताएं हैं। उसी के हिसाब से वे टीके का आवंटन करती हैं।

भारत में कोरोना टीकाकरण को लेकर तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। लगातार सरकार से सवाल पूछे जा रहे हैं। केंद्र सरकार पर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि राज्यों को जिम्मेदारी सौंपकर केंद्र ने अपना पल्ला झाड़ लिया है। हालांकि भारत में अभी भी कोरोना संकट गंभीर बना हुआ है। लेकिन अफवाहें लगातार फैलाई जा रही हैं। इन्हीं बातों को लेकर नीति आयोग की ओर से जवाब दिया गया है। नीति आयोग के सदस्य वी के पॉल ने कहा है कि फाइजर की ओर से टीके की उपलब्धता का संकेत मिलने के साथ ही सरकार और कंपनी इसके जल्द से जल्द आयात को मिलकर काम कर रहे हैं। पॉल ने कहा कि भारत की टीकाकरण प्रक्रिया पर मिथक और तथ्य’ पर एक बयान में कहा कि वैश्विक स्तर पर टीके की आपूर्ति सीमित है। कंपनियों की अपनी प्राथमिकताएं, योजनाएं और बाध्यताएं हैं। उसी के हिसाब से वे टीके का आवंटन करती हैं। पॉल भारत में कोविड-19 कार्यबल के प्रमुख भी हैं।

मिथक 1: केंद्र विदेशों से टीके खरीदने के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं कर रहा है

तथ्य: केंद्र सरकार 2020 के मध्य से ही सभी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय वैक्सीन निर्माताओं के साथ लगातार संपर्क में है। फाइजर, जॉनसन एंड जॉनसन तथा मॉडर्ना के साथ कई दौर की चर्चा हो चुकी है। सरकार ने उन्हें भारत में उनके टीकों की आपूर्ति और/या निर्माण करने के लिए सभी सहायता की पेशकश की है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि उनके टीके मुफ्त में उपलब्ध हैं। हमें यह समझने की जरूरत है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टीके खरीदना 'ऑफ द शेल्फ' आइटम खरीदने के बराबर नहीं है। विश्व स्तर पर टीके सीमित आपूर्ति में हैं, और सीमित स्टॉक आवंटित करने में कंपनियों की अपनी प्राथमिकताएं, गेम-प्लान और मजबूरियां हैं। वे अपने मूल देशों को तरजीह देते हैं जैसे हमारे अपने वैक्सीन निर्माताओं ने हमारे लिए बिना किसी हिचकिचाहट के किया है। फाइजर ने जैसे ही वैक्सीन की उपलब्धता का संकेत दिया, केंद्र सरकार और कंपनी वैक्सीन के जल्द से जल्द आयात के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। भारत सरकार के प्रयासों के परिणामस्वरूप, स्पुतनिक वैक्सीन परीक्षणों में तेजी आई और समय पर अनुमोदन के साथ, रूस ने हमारी कंपनियों को टीके और निपुण तकनीक-हस्तांतरण के दो किश्त पहले ही भेज दिए हैं जो बहुत जल्द निर्माण शुरू कर देंगे। हम सभी अंतरराष्ट्रीय वैक्सीन निर्माताओं से अनुरोध कर रहे हैं कि वे भारत आए और देश तथा विश्व के लिए मेक इन इंडिया के तहत वैक्सीन का निर्मान करें। 

मिथक 2: केंद्र ने विश्व स्तर पर उपलब्ध टीकों को मंजूरी नहीं दी है

तथ्य: केंद्र सरकार ने अप्रैल में भारत में यूएस के एफडीए तथा ईएमए, यूके के एमएचआरए और जापान के पीएमडीए और डब्ल्यूएचओ की इमरजेंसी यूज लिस्टिंग द्वारा अनुमोदित टीकों के प्रवेश को आसान बना दिया है। इन टीकों को पूर्व ब्रिजिंग परीक्षणों से गुजरने की आवश्यकता नहीं होगी। अन्य देशों में निर्मित अच्छी तरह से स्थापित टीकों के लिए परीक्षण आवश्यकता को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए प्रावधान में अब और संशोधन किया गया है। औषधि नियंत्रक के पास अनुमोदन के लिए किसी विदेशी विनिर्माता का कोई आवेदन लंबित नहीं है। 

मिथक 3: केंद्र टीकों के घरेलू उत्पादन में तेजी लाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर रहा है

तथ्य: केंद्र सरकार 2020 की शुरुआत से अधिक कंपनियों को टीके का उत्पादन करने में सक्षम बनाने के लिए एक प्रभावी सूत्रधार की भूमिका निभा रही है। केवल 1 भारतीय कंपनी (भारत बायोटेक) है जिसके पास आईपी है। भारत सरकार ने सुनिश्चित किया है कि भारत बायोटेक के अपने संयंत्रों को बढ़ाने के अलावा 3 अन्य कंपनियां/संयंत्र कोवैक्सिन का उत्पादन शुरू करेंगे, जो 1 से बढ़कर 4 हो गए हैं। भारत बायोटेक द्वारा कोवैक्सिन का उत्पादन अक्टूबर तक 1 करोड़ प्रति माह से बढ़ाकर 10 करोड़ माह किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, तीनों सार्वजनिक उपक्रमों का लक्ष्य दिसंबर तक 4.0 करोड़ खुराक तक उत्पादन करने का होगा। सरकार के निरंतर प्रोत्साहन से, सीरम इंस्टीट्यूट प्रति माह 6.5 करोड़ खुराक के कोविशील्ड उत्पादन को बढ़ाकर 11.0 करोड़ खुराक प्रति माह कर रहा है। भारत सरकार रूस के साथ साझेदारी में यह भी सुनिश्चित कर रही है कि स्पुतनिक का निर्माण डॉ रेड्डीज द्वारा समन्वित 6 कंपनियों द्वारा किया जाएगा। केंद्र सरकार जायडस कैडिला, BioE के साथ-साथ जेनोवा के अपने-अपने स्वदेशी टीकों के लिए कोविड सुरक्षा योजना के तहत उदार वित्त पोषण के साथ-साथ राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में तकनीकी सहायता के प्रयासों का समर्थन कर रही है। भारत बायोटेक की एकल खुराक इंट्रानेसल वैक्सीन का विकास भारत सरकार के वित्त पोषण के साथ अच्छी तरह से आगे बढ़ रहा है, और यह दुनिया के लिए एक गेम-चेंजर हो सकता है। हमारे वैक्सीन उद्योग द्वारा 2021 के अंत तक 200 करोड़ से अधिक खुराक के उत्पादन का अनुमान ऐसे ही प्रयासों और निरंतर समर्थन और साझेदारी का परिणाम है। भारत सरकार और वैक्सीन निर्माताओं ने दैनिक आधार पर निर्बाध जुड़ाव के साथ इस मिशन में टीम इंडिया के रूप में काम किया है।

मिथक 4: केंद्र को अनिवार्य लाइसेंसिंग लागू करनी चाहिए

तथ्य: अनिवार्य लाइसेंसिंग एक बहुत ही आकर्षक विकल्प नहीं है क्योंकि यह एक 'फॉर्मूला' नहीं है। यहां सक्रिय भागीदारी, मानव संसाधनों का प्रशिक्षण, कच्चे माल की सोर्सिंग और जैव-सुरक्षा प्रयोगशालाओं के उच्चतम स्तर की आवश्यकता है। तकनीक ट्रांसफर कुंजी है और यह उस कंपनी के हाथों में रहता है जिसने आर एंड डी किया है। वास्तव में, हम अनिवार्य लाइसेंसिंग से एक कदम आगे बढ़ गए हैं और कोवैक्सिन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए भारत बायोटेक और 3 अन्य संस्थाओं के बीच सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर रहे हैं। स्पुतनिक के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था का पालन किया जा रहा है। इस बारे में सोचें: मॉडर्ना ने अक्टूबर 2020 में कहा था कि वह अपनी वैक्सीन बनाने वाली किसी भी अन्य कंपनी पर मुकदमा नहीं करेगी, लेकिन फिर भी एक भी कंपनी ने ऐसा नहीं किया है, जिससे पता चलता है कि लाइसेंसिंग सबसे कम समस्या है। अगर वैक्सीन बनाना इतना आसान होता, तो विकसित दुनिया में भी वैक्सीन की खुराक की इतनी कमी क्यों होती?

मिथक 5: केंद्र ने राज्यों के प्रति अपनी जिम्मेदारी छोड़ी है

तथ्य: केंद्र सरकार वैक्सीन निर्माताओं को फंडिंग से लेकर उन्हें भारत में विदेशी टीके लाने और उनके उत्पादन बढ़ाने के लिए त्वरित मंजूरी देने जैसी भारी-भरकम काम कर रही है। केंद्र द्वारा खरीदा गया टीका लोगों को मुफ्त में लगाने के लिए राज्यों को आपूर्ति की जाती है। यह सब राज्यों के जानकारी में है। केंद्र सरकार यह कोशिश कर रही है कि राज्य सरकार अब स्वयं वैक्सीन खरीद सकें। देश में उत्पादन क्षमता और विदेशों से सीधे टीके प्राप्त करने में क्या कठिनाइयाँ हैं, यह राज्यों को अच्छी तरह से पता था। वास्तव में, भारत सरकार ने जनवरी से अप्रैल तक संपूर्ण टीका कार्यक्रम चलाया और मई की स्थिति की तुलना में यह काफी अच्छा रहा। लेकिन जिन राज्यों ने 3 महीने में स्वास्थ्य कर्मियों और अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं का अच्छा कवरेज हासिल नहीं किया था, वे टीकाकरण की प्रक्रिया को खोलना चाहते थे और अधिक विकेंद्रीकरण चाहते थे। स्वास्थ्य राज्य का विषय है और उदारीकृत टीका नीति राज्यों द्वारा राज्यों को अधिक शक्ति देने के लिए किए जा रहे लगातार अनुरोधों का परिणाम था। तथ्य यह है कि वैश्विक टेंडर्स ने कोई परिणाम नहीं दिया है, केवल वही पुष्टि करता है जो हम राज्यों को पहले दिन से बता रहे है कि टीके की दुनिया में भी कमी हैं और उन्हें कम समय में खरीदना आसान नहीं है।

मिथक 6: राज्यों को पर्याप्त वैक्सीन नहीं दे रहा केंद्र

तथ्य: केंद्र राज्यों को सहमत दिशा-निर्देशों के अनुसार पारदर्शी तरीके से पर्याप्त टीके आवंटित कर रहा है। दरअसल, राज्यों को भी वैक्सीन की उपलब्धता के बारे में पहले से सूचित किया जा रहा है। निकट भविष्य में वैक्सीन की उपलब्धता बढ़ने वाली है और बहुत अधिक आपूर्ति संभव होगी। केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ-साथ निजी अस्पतालों को भी 25% - 25% के अनुपात में टीके दे रही है। हमारे कुछ नेताओं का व्यवहार, जो टीके की आपूर्ति पर तथ्यों की पूरी जानकारी के बावजूद, दैनिक टीवी पर दिखाई देते हैं और लोगों में दहशत पैदा करते हैं, बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह समय राजनीति करने का नहीं है। हमें इस लड़ाई में सभी को एकजुट होने की जरूरत है।

मिथक 7: बच्चों के टीकाकरण के लिए केंद्र कोई कदम नहीं उठा रहा है

तथ्य: अभी तक दुनिया का कोई भी देश बच्चों को वैक्सीन नहीं दे रहा है। साथ ही, WHO के पास बच्चों का टीकाकरण करने की कोई सिफारिश नहीं है। बच्चों में टीकों की सुरक्षा के बारे में अध्ययन हुए हैं, जो उत्साहजनक रहे हैं। भारत में भी जल्द ही बच्चों पर ट्रायल शुरू होने जा रहा है। हालांकि, बच्चों का टीकाकरण व्हाट्सएप ग्रुपों में दहशत के आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि कुछ राजनेता राजनीति करना चाहते हैं। परीक्षणों के आधार पर पर्याप्त डेटा उपलब्ध होने के बाद हमारे वैज्ञानिकों द्वारा यह निर्णय लिया जाना है।





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