सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: वोटर लिस्ट से नाम हटने का मतलब नागरिकता का अंत नहीं, चुनाव आयोग के अधिकार पर रखी शर्त

Supreme Court
ANI
रेनू तिवारी । May 27 2026 11:35AM

CJI सूर्यकांत द्वारा सुनाए गए फैसले में कहा गया, 'जब कानून खुद ही किसी भी समय, दर्ज किए जाने वाले कारणों के आधार पर और जिस भी तरीके से निर्वाचन आयोग उचित समझे, एक विशेष संशोधन की अनुमति देता है।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (27 मई 2026) को मतदाता सूची (Voter List) संशोधन मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण और राहत देने वाला स्पष्टीकरण जारी किया है। शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) प्रक्रिया के तहत वोटर लिस्ट से किसी का नाम हटाए जाने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि उसकी नागरिकता खत्म हो गई है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने SIR की कानूनी वैधता को बरकरार रखते हुए कहा कि इस प्रक्रिया के तहत की गई जांच का दायरा केवल चुनावों में भागीदारी तक ही सीमित है, इसका किसी की नागरिकता तय करने से कोई लेना-देना नहीं है।

यह फैसला इसलिए अहम है, क्योंकि याचिकाकर्ताओं और विपक्ष ने दलील दी थी कि SIR प्रक्रिया, जिसे चुनाव आयोग (EC) द्वारा चलाया जा रहा है, असल में पिछले दरवाजे से नागरिकता की जांच करने की एक कवायद है।

इस बड़े सवाल पर कि क्या चुनाव आयोग नागरिकता तय कर सकता है, सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम शर्त रखी। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग इस मामले की जांच तो कर सकता है, लेकिन सिर्फ इस सीमित मकसद से कि संबंधित व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में शामिल किया जाए या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "आयोग किसी का नाम हटा तो सकता है, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि वह व्यक्ति अब भारत का नागरिक नहीं रहा। इसका नागरिकता तय करने से कोई लेना-देना नहीं है।"

संक्षेप में, इसका मतलब यह है कि SIR प्रक्रिया के तहत वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने से किसी भी व्यक्ति की नागरिकता खत्म नहीं होती।

यह फैसला उन कई याचिकाओं पर आया, जिनमें SIR प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई थी। इस प्रक्रिया के तहत, जिन वोटरों के नाम 2002/2003 की वोटर लिस्ट में नहीं थे, उन्हें यह साबित करना ज़रूरी था कि उनका कोई पूर्वज उस लिस्ट में शामिल था।

चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा था कि वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा बनाने और नागरिकता के दावों की जांच करने के लिए यह प्रक्रिया बेहद ज़रूरी है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि SIR के ज़रिए नागरिकता तय करना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र (mandate) में नहीं आता।

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