Matrubhoomi: कहानी सियाचिन ग्लेशियर की, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र कहा जाता है

Matrubhoomi: कहानी सियाचिन ग्लेशियर की, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र कहा जाता है

सियाचिन को भारत का सबसे बड़ा जबकि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्लेशियर कहा जाता है। सियाचिन की चर्चा वैसे तो भारत-पाक युद्ध की वजह से ही होती है। लेकिन आपको यह बात भी जानना चाहिए कि इसका नाम कहां से आया। सियाचिन नाम तिब्बती भाषा बाल्टी से निकला है।

सियाचिन की चर्चा हम अक्सर सुनते रहते हैं। सियाचिन ग्लेशियर हर भारतीय के दिलो और दिमाग में बसा हुआ है। यह ऐसा इलाका है जहां से ना सिर्फ भारत की भावनाएं जुड़ी हुई हैं बल्कि यह हमारे स्वाभिमान का प्रतीक भी है। इसी सियाचिन ग्लेशियर पर भारत ने पाकिस्तान से युद्ध लड़ा। यहां की विश्वासघाती जलवायु और अमानवीय परिस्थितियों इसे विश्व के सबसे कठिन जगहों में से एक बनाती है। सियाचिन को दुनिया भर में सबसे ज्यादा ऊंचाई पर बने युद्ध स्थल के तौर पर जाना जाता है। हालांकि भारत-पाक नियंत्रण रेखा पर स्थित इस क्षेत्र का प्राकृतिक इतिहास भी है। सामरिक रूप से यह भारत और पाकिस्तान के लिए बेहद ही महत्वपूर्ण है। सियाचिन समुद्र तल से करीब 5753 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। कश्मीर के इस क्षेत्र पर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद भी है। दोनों देशों की सेनाएं यहां तैनात रहती हैं।

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सियाचिन को भारत का सबसे बड़ा जबकि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्लेशियर कहा जाता है। सियाचिन की चर्चा वैसे तो भारत-पाक युद्ध की वजह से ही होती है। लेकिन आपको यह बात भी जानना चाहिए कि इसका नाम कहां से आया। सियाचिन नाम तिब्बती भाषा बाल्टी से निकला है। इसमें सिया का मतलब है गुलाब जबकि चिन का अर्थ है बिखरा हुआ। इसे बर्फीले रेगिस्तान की तरह ही देखा जाता है। जहां जीवन जीना अब भी बेहद कठिन है। यहां चारों तरफ बर्फ ही बर्फ है। भारत और पाकिस्तान के कई सैनिक अब तक यहां बर्फ में दब कर अपनी जान भी गवां चुके हैं। इसीलिए इस बेहद ही अहम ग्लेशियर को मौत की घाटी भी कहा जाता है। सियाचिन के एक तरफ पाकिस्तान की सीमा है तो दूसरी तरफ चीन की सीमा है। भारत को इन दोनों देशों पर नजर रखने के लिए क्षेत्र में अपनी सेना को तैनात रखना बेहद जरूरी रहता है।

कहते हैं कि सियाचिन में पानी गर्म करना भी अपने आप में बेहद ही कठिन काम है। इसके अलावा यहां दृश्यता शुन्य होती है। इसका मतलब साफ है कि आप सामने की ओर स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं। खुद को सुरक्षित रखने के लिए सैनिक एक दूसरे को रस्सियों में बांध लेते हैं। यहां का तापमान माइनस में ही रहता है। यहां तैनात रहने वाले जवान अपने आप को दुनिया से अलग-थलग पाते हैं। यहां पीने के लिए पानी तक की समस्या है। तैनात रहने वाले जवानों को पानी पीने के लिए बर्फ को पिघलाना पड़ता है। इसके अलावा यहां तैनात रहने वाले जवानों को खाने के लिए सूखे मेवे दिए जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इन्हें खाने के लिए पिघलाने की जरूरत नहीं होती है। कड़ाके की ठंड और ऑक्सीजन की कमी की वजह से इंसानों पर इसका नकारात्मक असर भी पड़ता है। यहां तैनात जवान ठीक से अपनी नींद तक पूरी नहीं कर पाते जिसकी वजह से उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। नियमित इस्तेमाल के लिए हमेशा स्टोव पर पानी को रखा जाता है ताकि वह जमे नहीं।

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सियाचिन विवाद

सियाचिन में भारत और पाकिस्तान की सेना आमने-सामने रहती हैं। कुल मिलाकर देखें तो यह क्षेत्र भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए ही मूंछ का सवाल है। चीन और पाकिस्तान पर पैनी नजर रखने के लिए भारत के लिए यह क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान की इस क्षेत्र पर नजर काफी पहले से है। 1984 में तो वह इस पर कब्जा करने की तैयारी में था। हालांकि भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत लांच किया और 13 अप्रैल 1984 को सियाचिन ग्लेशियर को अपने कब्जे में कर लिया। पहले इस क्षेत्र में पर्वतारोही काफी आते थे लेकिन अब सेना के अलावा यहां किसी दूसरे के आने की इजाजत नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में कारगिल की लड़ाई के बाद सियाचिन पर भी इसका असर पड़ा। 2003 में तत्कालीन भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने बातचीत से समस्या के समाधान को निकालने की कोशिश की।

2003 में ही भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम संधि हो गई। उस समय से इस क्षेत्र में फायरिंग की घटनाएं बंद हो गई है। 1984 से पहले भारत ने इस क्षेत्र को रेगिस्तान मानते हुए छोड़ दिया था। हालांकि अब साल के 365 दिन यहां भारतीय सैनिक तैनात रहते हैं और देश की सबसे खतरनाक सरहद की रक्षा करते रहते हैं। सियाचिन की ठंड का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां कभी-कभी तापमान माइनस 70 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है। यहां जीवन जीने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। भारत और पाकिस्तान के बीच आपसी लड़ाई से जितने सैनिक के नहीं मारे गए हैं, उससे ज्यादा ऑक्सीजन की कमी और हिमस्खलन की वजह से मारे गए हैं। एक अनुमान में दावा किया जाता है कि भारत और पाकिस्तान के अब तक 2500 से ज्यादा सैनिकों को यहां अपनी जान गवानी पड़ी है। 





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