Supreme Court SIR Verdict Analysis: CEC Gyanesh Kumar के खिलाफ महाभियोग लाने और वोट चोरी का आरोप लगाने वाला विपक्ष क्या अब माफी मांगेगा?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि निर्वाचन आयोग की यह प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 तथा मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के विपरीत नहीं है।
विपक्षी दलों ने विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर वोट चोरी जैसे गंभीर आरोप लगाए तथा पूरे निर्वाचन तंत्र को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया। यही नहीं विपक्ष ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद में महाभियोग का प्रस्ताव तक पेश कर दिया था लेकिन उच्चतम न्यायालय के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि खामी निर्वाचन आयोग, निर्वाचन आयुक्त या एसआईआर प्रक्रिया में नहीं बल्कि विपक्षी दलों की सोच और आशंकाओं में थी। न्यायालय ने आज निर्वाचन आयोग द्वारा कराई गई विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को संवैधानिक रूप से वैध ठहराते हुए कहा कि यह कदम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है। अदालत ने साफ कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती केवल मतदान प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी आधारित होती है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि निर्वाचन आयोग की यह प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 तथा मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के विपरीत नहीं है। न्यायालय ने कहा कि यह पुनरीक्षण संविधान के उस उद्देश्य को आगे बढ़ाता है जिसका लक्ष्य निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराना है। पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए ठोस और तर्कसंगत कारण प्रस्तुत किए हैं।
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न्यायालय ने माना कि निर्वाचन आयोग को अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने के संदर्भ में नागरिकता से जुड़े सीमित पहलुओं की जांच करने का अधिकार है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी जांच किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं मानी जाएगी। यह केवल चुनावी पात्रता तक सीमित रहेगी और इसका प्रभाव केवल मतदाता सूची से संबंधित होगा।
फैसले में कहा गया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 16 के तहत आयोग मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जांच कर सकता है। लेकिन यह जांच केवल इस दृष्टि से होगी कि संबंधित व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में बना रहना चाहिए या नहीं। साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि जिन लोगों के नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज हैं, उनके पक्ष में प्रारंभिक मान्यता बनी रहेगी।
उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि पूरी पुनरीक्षण प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहेगी। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है, तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग की जांच केवल प्रथम दृष्टया और परिस्थितिजन्य आकलन होगी। इसे किसी व्यक्ति को भारत का नागरिक न मानने की अंतिम घोषणा नहीं समझा जा सकता।
अदालत ने निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार की सक्षम प्राधिकरण संस्था को भेजा जाए ताकि उनकी नागरिकता का विधिसम्मत निर्णय किया जा सके। यदि संबंधित प्राधिकरण किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक मानता है, तो उसका नाम पुनः मतदाता सूची में शामिल किया जाएगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया अगले लोकसभा, विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनाव से पहले पूरी कर ली जानी चाहिए ताकि मतदाताओं के अधिकार लंबे समय तक अनिश्चितता में न रहें।
अदालत के फैसले में यह भी कहा गया कि विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया नियम 21 ए के खिलाफ नहीं है। नोटिस देने और सुनवाई का अवसर देने जैसी सुरक्षा व्यवस्थाएं इस प्रक्रिया में बनी हुई हैं। न्यायालय ने कहा कि निर्वाचन आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया कानून और संवैधानिक सीमाओं के भीतर है।
उच्चतम न्यायालय ने माना कि विशेष गहन पुनरीक्षण का सीधा संबंध स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक उद्देश्य से है। अदालत ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया की शुचिता इस बात पर निर्भर करती है कि मतदाता सूची कितनी सही और त्रुटिरहित है। न्यायालय ने निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए कारणों को उचित ठहराते हुए कहा कि पिछले दो दशकों में तेज शहरीकरण और पलायन के कारण मतदाता सूची में बार बार नाम दर्ज होने, गलत प्रविष्टियां और अन्य त्रुटियां बढ़ी हैं। साथ ही संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत केवल भारतीय नागरिकों का नाम मतदाता सूची में होना अनिवार्य है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि केवल इसलिए इस प्रक्रिया को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता कि इसमें सामान्य पुनरीक्षण से अलग प्रक्रिया अपनाई गई है। जब तक निर्वाचन आयोग कानून की सीमाओं के भीतर रहकर अपने विशेष अधिकारों का उपयोग कर रहा है और किसी स्पष्ट कानूनी निषेध का उल्लंघन नहीं कर रहा, तब तक उसकी कार्रवाई वैध मानी जाएगी।
फैसले में दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था को भी उचित ठहराया गया। न्यायालय ने कहा कि पहचान के लिए आवश्यक दस्तावेज तय करना निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक विवेक का हिस्सा है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना है। हम आपको याद दिला दें कि इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने आयोग को आधार को पहचान के 12वें दस्तावेज के रूप में स्वीकार करने का निर्देश दिया था।
अदालत ने यह भी कहा कि बिहार में जिन लोगों के नाम गलती से अनुपस्थित, मृत, स्थानांतरित या दोहराव के आधार पर हटाए गए हैं, वे न्यायिक समीक्षा का सहारा ले सकते हैं। इस प्रकार न्यायालय ने एक ओर निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को वैध ठहराया, वहीं दूसरी ओर मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए न्यायिक निगरानी और पुनर्विचार का रास्ता भी खुला रखा।
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