प्रेम और भावनाओं से भरी कविताओं की बेमिसाल कवियत्री थीं अमृता प्रीतम

  •  प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
  •  अगस्त 31, 2020   09:30
प्रेम और भावनाओं से भरी कविताओं की बेमिसाल कवियत्री थीं अमृता प्रीतम

अमृता प्रीतम की उपलब्धियों को किसी दायरे में नहीं बांधा जा सकता। उनकी उपलब्धियां बेमिसाल थी। उन्हें 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अमृता प्रीतम पहली महिला साहित्यकार थीं जिन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।

अपने कविता से लोगों के दिलों में बसने वाली अमृता प्रीतम का आज जन्मदिन है। अमृता प्रीतम का जन्म पंजाब के गुंजारवाला जिले में 1919 में हुआ था। पंजाब के मशहूर लेखकों में अमृता प्रीतम का भी नाम शामिल है। अमृता प्रीतम बेहद भावुक, संवेदशील और आजाद ख्यालों की महिला थीं। अमृता प्रीतम को हम पंजाबी की पहली कवयित्री के नाम से भी जानते है। उनका बचपन लाहौर में गुजरा था और प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा भी वहीं सम्पन्न हुई।

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आज से कई साल पहले जब समाज में कई तरह के बंधन होते थे, तब भी अमृता ने लिव-इन में रहने का क्रांतिकारी कदम भी उठाया। जब वह मात्र 16 साल की थी तभी उनकी शादी प्रीतम सिंह से हो गई थी। अमृता आम लड़की नहीं थीं। वह खूबसूरत होने के साथ ही बेहद भावुक भी थीं। उन्हें अपने रिश्तों में बेहद खूबसूरती से सामंजस्य बिठाना आता था। उनकी इस शादी से बच्चे भी हुए। लेकिन वक्त बदला और उनकी जिंदगी में साहिर आए। जिनसे वह बहुत मुहब्बत करती थीं। साहिर से इस लगाव ने उन्हें शादीशुदा जिंदगी से बाहर निकलने मजबूर कर दिया। बाद में जीवन के आखिरी वक्त में उन्हें जिस सच्चे प्यार की तलाश थी। वह इमरोज के रूप में मिली। इमरोज उनके साथ आखिरी वक्त तक रहे। अमृता की मौत के बाद भी इमरोज कहते अमृता उन्हें छोड़ कर नहीं गयी है, उन्होंने तो बस अपना जिस्म छोड़ा है। अमृता अभी भी उनसे मिलने आती है। जीवन के आखिरी वक्त में अमृता की देखभाल इमरोज ने ही की थी। 

अमृता प्रीतम की उपलब्धियों को किसी दायरे में नहीं बांधा जा सकता। उनकी उपलब्धियां बेमिसाल थीं। उन्हें 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अमृता प्रीतम पहली महिला साहित्यकार थीं जिन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उसके बाद 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग ने पुरस्कार दिया। यही नहीं 1988 में उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बल्गारिया वैरोव पुरस्कार दिया गया। भारत में सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार से 1982 में नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें पद्म विभूषण से भी पुरस्कृत किया गया था। उनको अपनी सुंदर कविताओं के लिए जाना जाता है। साथ ही उन्हें अपनी पंजाबी कविता अज्ज आखां वारिस शाह नूं बहुत पसंद की गयी। यह कविता बहुत खास किस्म की है। इसमें आजादी के बाद भारत विभाजन के समय पंजाब में हुई भयानक घटनाओं का अत्यंत दुखद चित्रण किया गया है। इस कविता को भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में सराहा गया है।

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अमृता प्रीतम की कविताएं प्रेम और भावनाओं से भरी होती थीं। उनकी लगभग 100 किताबें लिखीं। उनकी कृतियों का दूसरी भाषा में भी अनुवाद किया गया है। वह अपनी आत्म कथा रसीदी टिकट के लिए जानी जाती है। कुछ चर्चित उपन्यासों में पांच बरस लंबी सड़क, सागर और सीपियां पिंजर, कोरे कागज़, अदालत और उन्चास दिन थे। इसके अलावा उनका कहानी संग्रह कहानियां जो कहानियां नहीं हैं और कहानियों के आंगन में भी हैं। साथ ही उनके कुछ संस्मरण भी बहुत चर्चित रहे उनमें कच्चा आंगन और एक थी सारा था।

अमृता प्रीतम की रचनाओं को पढ़कर हमेशा सुकून मिलता है। शायद इसलिए कि उन्होंने भी वही लिखा जिसे उन्होंने जिया। अमृता प्रीतम ने ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को अपने शब्दों में पिरोकर रचनाओं के रूप में दुनिया के सामने रखा। उन्हें पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है। उन्होंने तक़रीबन एक सौ किताबें लिखीं, जिनमें उनकी आत्मकथा रसीदी टिकट भी शामिल है। उनकी कई रचनाओं का अनेक देशी और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। अमृता की पंजाबी कविता अज्ज आखां वारिस शाह नूं हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बहुत प्रसिद्ध हुई। इसमें उन्होंने वारिस शाह को संबोधित करते हुए उसके वक़्त के हालात बयां किए थे-

अज्ज आखां वारिस शाह नूं कित्थों क़बरां विच्चों बोल

ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरक़ा फोल

इक रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख-लिख मारे वैण

अज्ज लक्खां धीयां रोंदियां तैनू वारिस शाह नू कहिण

अमृता प्रीतम जनवरी 2002 में अपने ही घर में गिर पड़ी थीं और तब से बिस्तर से नहीं उठ पाईं। उनकी मौत 31 अक्टूबर, 2005 को नई दिल्ली में हुई।





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