Bharatendu Harishchandra Death Anniversary: आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह थे भारतेंदु हरिश्चंद्र, 7 साल की उम्र में लिखी थी पहली कविता

आज ही के दिन यानी की 06 जनवरी को सामाजिक सुधार, देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम के प्रबल समर्थक भारतेंदु हरिश्चंद्र का निधन हो गया था। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने जीवन की पहली कविता महज 7 साल की उम्र में लिखी थी।
आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का 06 जनवरी को निधन हो गया था। वह सामाजिक सुधार, देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम के प्रबल समर्थक थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र के काव्य में भारतवासियों की पीड़ा और राष्ट्रीय चेतना भी दिखती है। उन्होंने अपने काव्य में भारत दुर्दशा का मार्मिक चित्रण किया है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर भारतेंदु हरिश्चंद्र के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...
जन्म और परिवार
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 09 सितंबर 1850 को भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गोपालचंद्र था, जोकि एक कवि और संगीत प्रेमी थे। भारतेंदु ने अपने पिता से साहित्य और कला का शुरूआती ज्ञान प्राप्त किया था। उन्होंने कम उम्र में ही हिंदी, संस्कृत, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं में महारत हासिल कर ली थी।
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पहली कविता
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने जीवन की पहली कविता महज 7 साल की उम्र में लिखी थी। लेकिन उनकी वास्तविक साहित्यिक यात्रा तब शुरू हुई, जब उन्होंने नाटक और साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा था। वह सामाजिक सुधार, देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम के प्रबल समर्थक थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाओं में राजनीति, तत्कालीन समाज और संस्कृति के विविध पहलुओं की झलक देखने को मिलती है।
उन्होंने अपने समय के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को अपने नाटकों, कविताओं और लेखों के जरिए उठाया था। उस दौर में जब अंग्रेजी और उर्दू का प्रभुत्व था, तब हिंदी को उन्होंने प्रचलित भाषाओं में से एक बनाया था। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी साहित्य के सभी प्रमुख विधाओं- नाटक, गद्य, पत्रिकाएं, काव्य और निबंध आदि में अहम योगदान दिया। उन्होंने भाषा और साहित्य के अलावा पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अहम योगदान दिया था।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपनी लेखनी की धार को पत्रकारिता और हिंदी भाषा के उत्थान की तरफ मोड़ा। उन्होंने 'कविवचन सुधा' नामक पत्र निकाला, इसमें उस दौर की सभी प्रतिष्ठित रचनाकारों की रचनाएं प्रकाशित की जाती थीं। फिर साल 1873 में उन्होंने 'हरिश्चंद्र मैगजीन' नामक पत्रिका निकाली। हालांकि सिर्फ 8 अंकों के प्रकाशन के बाद इस पत्रिका का नाम बदलकर 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' रख दिया।
काव्य में भारतवासियों की पीड़
भारतेंदु हरिश्चंद्र के काव्य में भारतवासियों की पीड़ा और राष्ट्रीय चेतना भी दिखती है। उन्होंने अपने काव्य में भारत दुर्दशा का मार्मिक चित्रण किया है। किस प्रकार से अंग्रेज शासक भारत का शोषण कर रहे हैं और किस तरह से भारत का धन अंग्रेजी शासन में विदेश जा रहा है, वह अपने काव्य में इस पर भी तंज सकते हैं।
काव्य रचनाएं
फूलों का गुच्छा
प्रेम सरोवर
प्रेम मालिका
प्रेम फुलवारी आदि
मृत्यु
भारतेंदु हरिश्चंद्र बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने साहित्य के सभी क्षेत्रों में कार्य किया है। लेकिन महज 35 साल की अल्पायु में 06 जनवरी 1885 को भारतेंदु हरिश्चंद्र का निधन हो गया। भले ही भारतेंदु का जीवनकाल लंबा नहीं रहा, लेकिन उन्होंने जिस भी विधा में साहित्य का सृजन किया, वह कालजयी हो गई।
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