Bhikaji Cama Death Anniversary: वो वीरांगना जिसने Germany में लहराया भारत का तिरंगा और British Rule को ललकारा

स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना भीकाजी कामा का 13 अगस्त को निधन हो गया था। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय तिरंगे को गर्व के साथ फहराया। उन्होंने न सिर्फ भारत बल्कि विदेश में स्वतंत्रता की अलख जगाई थी।
आज ही के दिन यानी की 13 अगस्त को स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना भीकाजी कामा का निधन हो गया था। उन्होंने न सिर्फ भारत बल्कि विदेश में स्वतंत्रता की अलख जगाई थी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय तिरंगे को गर्व के साथ फहराया। भीकाजी कामा ने अपने साहस और बलिदान से इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर भीकाजी कामा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...
जन्म और परिवार
मुंबई में 24 सितंबर 1861 को भीकाजी कामा का जन्म हुआ था। वह एक समृद्ध पारसी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। इनके पिता का नाम सोराबजी फ्रामजी पटेल था, जोकि एक प्रसिद्ध व्यापारी थे। भीकाजी कामा ने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा में महारत हासिल की थी। भीकाजी कामा की शादी रुस्तम कामा से हुई। लेकिन यह रिश्ता सफल नहीं रहा।
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क्रांतिकारी जीवन
भीकाजी कामा का क्रांतिकारी जीवन तब शुरू हुआ, जब साल 1869 में प्लेग महामारी फैली। तब भीकाजी कामा पीड़ितों की सेवा में जुट गईं। इस दौरान अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीयों के प्रति भेदभाव को देखकर भीकाजी कामा का मन विद्रोह से भर उठा। साल 1905 में वह सेहत कारणों की वजह से लंदन चली गईं। यहां पर वह दादाभाई नौरोजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे क्रांतिकारियों से मिलीं। इसके बाद वह श्यामजी के 'इंडिया हाउस' में भारतीय संग्राम से जुड़ गईं।
अंतरराष्ट्री मंच पर फहराया तिरंगा
भीकाजी का ऐतिहासिक योगदान 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ड में हुआ। यहां पर भीकाजी ने अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भारत की तिरंगा फहराया। इस झंडे में लाल, हरा और केसरिया रंग था। उन्होंने अपने भाषण में ब्रिटिश शासन की बर्बरता का खुलासा किया। साथ ही उन्होंने भारत की आजादी की मांग को विश्व मंच पर रखा।
ब्रिटिश सरकार के लिए खतरा
भीकाजी 'वंदे मातरम' नामक पत्रिका की संपादक रहीं। जो भारतीय स्वतंत्रता के विचारों को फैलाने का माध्यम बनीं। भीकाजी के क्रांतिकारी लेख और भाषण ब्रिटिश सरकार के लिए खतरा बन चुके थे। जिस कारण उनकी गिरफ्तारी का आदेश जारी हुआ। लेकिन भीकाजी ने हार नहीं मानी और वह पेरिस चली गईं। वह पेरिस से क्रांतिकारी गतिविधियों को संचालित करती रहीं।
मृत्यु
वहीं साल 1935 में उनकी सेहत खराब रहने लगीं और वह भारत लौट आईं। वहीं 13 अगस्त 1936 को भीकाजी कामा का निधन हो गया।
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