K Kamaraj Death Anniversary: भारतीय राजनीति के मंझे हुए राजनेता थे के कामराज, देश को दिए थे दो प्रधानमंत्री

K Kamaraj,
ANI

के कामराज स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने नमक सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। देश की आजादी की लड़ाई में के कामराज कई बार जेल भी गए।

स्वतंत्र भारत के पहले 'किंगमेकर' और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री के. कामराज का 02 अक्टूबर को निधन हो गया था। वह कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता माने जाते थे। वहीं के कामराज को कांग्रेस के संगठन में सुधार के फॉर्मूले का जनक माना जाता था। मद्रास के सीएम पद पर रहते हुए उन्होंने कई ऐसे कार्य किए थे, जिनकी चर्चा आज भी की जाती है। के कामराज को बिना करिश्माई भाषण के जनसमर्थन हासिल करने और बिना पद के सत्ता पर प्रभाव डालने के लिए जाना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर के कामराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

जन्म और परिवार

तमिलनाडु के विरुधुनगर में 15 जुलाई 1903 को के कामराज का जन्म हुआ था। इनका पूरा नाम कामाक्षी कुमारस्वामी नादेर था। उन्होंने गांव से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। जब के कामराज 6 साल के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया था। ऐसे में आर्थिक तंगी के कारण उनका पढ़ाई छोड़नी पड़ी और वह अपनी मां के काम में मदद करने लगे। इस दौरान वह अपने चाचा की दुकान में काम करते थे। यह वही समय था, जब के कामराज होम रूल आंदोलन से जुड़ा सार्वजनिक सभाओं और जुलूसों में हिस्सा लेने लगे थे।

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आजादी की जिद

के कामराज स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने नमक सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। देश की आजादी की लड़ाई में के कामराज कई बार जेल भी गए। फिर साल 1920 में वह 18 साल की उम्र में कांग्रेस के पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता बन गए और उन्होंने राजनीति में एंट्री ली। साल 1921 में उन्होंने विरुधुनगर में कांग्रेस के नेताओं के लिए जनसभाएं आयोजित कीं और इस दौरान वह महात्मा गांधी से पहली बार मिले थे।

पहली बार पहुंचे विधानसभा

वहीं 34 साल की उम्र में साल 1937 के प्रांतीय चुनावों में मद्रास राज्य की सत्तूर सीट पर के कामराज को जीत मिली और इस तरह से वह पहली बार विधानसभा पहुंचे। लेकिन भारत के रक्षा नियमों के तहत भाषणों के लिए उनको साल 1940 में गिरफ्तार कर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। इस दौरान वह जेल में रहते हुए विरुधुनगर के नगर पार्षद बने। साल 1946 के प्रांतीय चुनावों में वह दूसरी बाद मद्रास की सत्तूर सीट से जीते और विधानसभा पहुंचे। बाद में उनको भारतीय संविधान सभी के लिए चुना गया।

किंगमेकर बने कामराज

जब देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का निधन हुआ, तो के कामराज कांग्रेस के राष्ट्रीय अक्ष्यक्ष थे। उन्होंने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए लाल बहादुर शास्त्री के नाम को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया। फिर जब शास्त्री के निधन पर दोबारा राजनीतिक संकट खड़ा हुआ, तो कामराज के सामने प्रधानमंत्री बनने का मौका था। लेकिन हिंदी न आने के कारण उन्होंने यह पद ठुकरा दिया और कहा कि देश के प्रधानमंत्री को हिंदी आना जरूरी है।

मद्रास के सीएम

साल 1954 में के कामराज ने मद्रास स्‍टेट के मुख्‍यमंत्री का पद संभाला। वह आजाद भारत के शायद पहले ऐसे सीएम थे, जिनको अंग्रेजी नहीं आती थी। लेकिन मद्रास, वर्तमान में तमिलनाडु में अगले 9 साल के उनके कार्यकाल को बेहतरीन दौर के रूप में देखा जाता है। के कामराज के नेतृत्व में मद्रास में कृषि और औद्योगिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विकास हुआ था। इसके अलावा उन्होंने मिड-डे-मील योजना, शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति और औद्योगिकीकरण का विस्तार किया।

मृत्यु

वहीं 02 अक्टूबर 1975 में के कामराज का निधन हो गया था। मरणोपरांत के कामराज को 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया था।

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