Mahadevi Verma Death Anniversary: आधुनिक युग की मीरा थीं महादेवी वर्मा, महिला सशक्तिकरण पर दिया जोर

Mahadevi Verma
Prabhasakshi

आज ही के दिन आधुनिक युग की मीरा कही जाने वाली महादेवी वर्मा का निधन हो गया था। महादेवी वर्मा छायावादी आंदोलन की कवयित्री व लेखिका थी। महादेवी ने लोगों की भलाई व बच्चों को शिक्षा दिलाने का कार्य किया।

महादेवी वर्मा छायावादी आंदोलन की कवयित्री व लेखिका थी। उनको आधुनिक युग की मीरा भी कहा जाता है। बता दें कि कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने महादेवी वर्मा को हिन्दी साहित्य की सरस्वती की उपाधि दी। महादेवी ने 40 सालों तक निराला को राखी बांधी थी। वह उन्हें अपनी मुंहबोली बहन मानते थे। आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को महादेवी वर्मा का निधन हो गया था। आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर महादेवी वर्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

जन्म और शिक्षा

उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद शहर में एक हिंदू परिवार में 26 मार्च 1907 को महादेवी वर्मा का जन्म हुआ था। उनके पिता गोविंद प्रसाद वर्मा तथा माता हेम रानी देवी थी। महादेवी वर्मा की मां धार्मिक व आस्तिक स्त्री थी जिनकी संगीत में गहरी रुचि थी। वहीं उनके पिता एक कॉलेज में प्रोफेसर थे जो संगीत प्रेमी, नास्तिक व शांत प्रवृत्ति के इंसान थे। महादेवी वर्मा की माता उन्हें कविताएं लिखने के लिए प्रेरित करती थीं। साथ ही उनको हिंदी व संस्कृत भाषा का ज्ञान देती थीं। 

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इलाहाबाद के क्रॉस्वाइट गर्ल्स कॉलेज में महादेवी ने प्रवेश लिया। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान वह जिस हॉस्टल में रुकी थीं। उस हॉस्टल में उन्होंने अलग-अलग धर्म और समुदाय के लोगों से एकता बनाकर रहना सीखा था। महादेवी के रूम में सुभद्रा कुमारी चौहान भी रहा करती थी जो उसकी सीनियर भी थी। महादेवी शुरूआत में छिपकर कविताएं लिखा करती थीं। जब एक दिन सुभद्र को पता चला तो उन्होंने पूरे हॉस्टल में उनकी कविताओं का प्रचार किया। इसके बाद से दोनों साप्ताहिक मैगजीन व अन्य पत्रिकाओं में अपनी कविताओं को प्रकाशित करवाती थी। इसके अलावा महादेवी और सुभद्रा कवि सम्मेलन में भी जाया करती थीं। 

वैवाहिक जीवन

महादेवी वर्मा के दादाजी उन्हें हमेशा से विदुषी बनाना चाहते थे। लेकिन सामाजिक रीति-रिवाजों के मुताबिक वह महादेवी का विवाह 9 साल की आयु में करवा देना चाहते थे। हालांकि साल 1929 में उन्होंने अपने पति स्वरूप नारायण वर्मा के साथ इसलिए रहने से मना कर दिया। क्योंकि उनके पति मांस का सेवन करते थे। वहीं उनके पिता ने पति को तलाक देने और पुर्नविवाह के बारे में कहा, लेकिन वह आजीवन अकेले रही।

कॅरियर

महादेवी वर्मा ने साल 1930 में निहार, साल 1932 में रश्मि और साल 1933 में नीरजा की रचना की। वहीं साल 1935 में महादेवी की कविताओं का एक समूह प्रकाशिक किया गया। जबकि साल 1939 में उनकी कविताओं का अन्य समूह यम के नाम से प्रकाशित किया गया। उनकी फेमस कहानियां जिनमें मेरा परिवार, समृद्धि के रेहाए, पथ के साथी, अतीत के चलचित्र आदि हैं। 

महादेवी वर्मा गौतम बुद्ध के विचारों और महात्मा गांधी के कार्यों से प्रभावित थीं। महादेवी ने साल 1937 में उत्तराखंड के रामगढ़ के गांव उमागढ़ में एक घर का निर्माण किया। इस घर को उन्होंने मीरा मंदिर का नाम दिया था। इस गांव में रहने के दौरान महादेवी ने लोगों की भलाई व बच्चों को शिक्षा दिलाने का कार्य किया। इसके अलावा महादेवी ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए व आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए सबसे ज्यादा प्रयास किए।

महादेवी वर्मा की कविताएं –

निहार (1930)

रश्मी (1932)

नीरजा (1933)

संध्यागीत (1935)

प्रथम आयाम (1949)

सप्तपर्ण (1959)

दीपशिक्षा (1942)

अग्नि रेखा (1988)

कहानियां

अतीत के चलचित्र

पथ के साथी

मेरा परिवार

संस्मरण

संभाषण

स्मृति के रेहाये

विवेचमानक गद्य

स्कंध

हिमालय

पुरस्कार

पदम भूषण- 1956

साहित्य अकादमी फेलोशिप- 1979

ज्ञानपीठ अवार्ड- 1982

पदम विभूषण- 1988

मृत्यु

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में 11 सितंबर 1987 को 80 साल की उम्र में महादेवी वर्मा का निधन हो गया। महादेवी ने अपने जीवन में गुलाम भारत व आजाद भारत दोनों को देखा था।

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