लोकनायक एवं क्रांतिकारी संत थे विजय वल्लभ सूरीश्वरजी

  •  ललित गर्ग
  •  नवंबर 16, 2020   13:13
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लोकनायक एवं क्रांतिकारी संत थे विजय वल्लभ सूरीश्वरजी

गुरु वल्लभ का नाम और काम कालजयी है। उन्होंने एक नवीन समाज निर्माण का प्रयत्न किया। एक धर्माचार्य के रूप में उन्होंने जो पवित्र और प्रेरक रेखाएं अंकित की, उनकी उपयोगिता, प्रासंगिकता एवं आहट युग-युगों तक समाज को दिशा-दर्शन करती रहेगी।

विश्व पटल पर कतिपय ऐसे विशिष्ट व्यक्तित्व अवतरित हुए हैं जिनके अवदानों से पूरा मानव समाज उपकृत हुआ है। ऐसे महापुरुषों की परम्परा में जैन धर्मगुरुओं एवं साधकों ने अध्यात्म को समृद्ध एवं शक्तिशाली बनाया है। उनमें एक नाम है युगवीर, क्रांतिकारी आचार्य श्रीमद् विजय वल्लभ सूरीश्वरजी। वे बीसवीं सदी के शिखर आध्यात्मिक पुरुष थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी रहा है। जिन्होंने अपने त्याग, तपस्या, साहित्य-सृजन, जैन-संस्कृति-उद्धार के उपक्रमों से एक नया इतिहास बनाया है। एक सफल साहित्यकार, प्रवक्ता, साधक, समाजसुधारक एवं चैतन्य रश्मि के रूप में न केवल जैन समाज बल्कि सम्पूर्ण अध्यात्म-जगत में सुनाम अर्जित किया है। राष्ट्रव्यापी स्तर पर उनके 150वें जन्मोत्सव वर्ष आयोजित हुआ, जिसका समापन 16 नवम्बर 2020 को वर्तमान गच्छाधिपति आचार्य श्रीमद् नित्यानंद सूरीश्वरजी के सान्निध्य में हो रहा है, इस अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी प्रातः राजस्थान के जैतपुरा (जिला पाली) में 151 इंच उत्तुंग धातु निर्मित ‘गुरु वल्लभ प्रतिमा’ स्टैच्यू आफ पीस का ई-लोकार्पण करेंगे।

गुरु वल्लभ का नाम और काम कालजयी है। उन्होंने एक नवीन समाज निर्माण का प्रयत्न किया। एक धर्माचार्य के रूप में उन्होंने जो पवित्र और प्रेरक रेखाएं अंकित की, उनकी उपयोगिता, प्रासंगिकता एवं आहट युग-युगों तक समाज को दिशा-दर्शन करती रहेगी। वे एक ऋषि, देवर्षि, ब्रह्मर्षि एवं राजर्षि थे, जिन्होंने अपने पुरुषार्थ से अनेक तीर्थों की स्थापना की है। वे पुरुषार्थ की महागाथा थे, कीर्तिमानों के कीर्तिमान थे। वे अप्रतिम प्रतिभा के धनी थे। पिछली दो शताब्दियों में जैनधर्म को ऐसा महापुरुष नहीं मिला था। वह युग भारत के इतिहास में नव जागरण एवं नवनिर्माण का था। पढ़ लिखे लोगों में देशाभिमान जन्म लेने लगा था। यहीं से आधुनिक युग का प्रारंभ हुआ और इसी दौर में गुरु वल्लभ ने सरस्वती मंदिरों की स्थापना करके एक अभिनव क्रांति का सूत्रपात किया। आपका जीवन अथाह ऊर्जा, प्रेरणा एवं जिजीविषा से संचालित तथा स्वप्रकाशी रहा। वह एक ऐसा प्रभापुंज, प्रकाशगृह था जिससे निकलने वाली एक-एक रश्मि का संस्पर्श जड़ में चेतना का संचार कर मानवता के समुख उपस्थित अंधेरों में उजालों का काम कर रही है।

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आचार्य श्रीमद् विजय वल्लभ सूरीश्वरजी एक चमत्कारी एवं प्रभावकारी संत थे। गुजरात के ऐतिहासिक नगर पाटण में प्राचीन एवं आधुनिक साहित्य के लिए ‘हेमचन्द्राचार्य जैन ज्ञान भंडार’ की स्थापना की प्रेरणा देते हुए ऐसा प्रभावशाली और मार्मिक चित्र खींचा कि महिलाओं ने गहने उतार कर ढेर कर दिए। राजस्थान में बीकानेर में विजय वल्लभ के प्रवचन से यहां की रानी इतनी प्रभावित हुई कि उसने अपने बगीचे का नाम ‘‘विजय वल्लभ बाग’’ रखा। गुरु वल्लभ महान् क्रांतिकारी एवं समाज-सुधारक धर्माचार्य थे। उनका सामाजिक दृष्टिकोण सुधारवादी था। जिन रूढ़ियों से न तो कोई धर्म का लाभ होता है न समाज का जो केवल रूढ़ि बनकर रह गयी हैं, जिनके पालन एवं प्रचलन से किसी भी प्रकार का लाभ नहीं होता उन्हें अस्वीकार करते थे। वह समय था कि प्रत्येक भारतीय अपने धर्म, समाज एवं देश को आगे लाने के लिए भगीरथ प्रयत्न करता था।

भारत अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहा था। नयी-नयी सामाजिक संस्थाएं सुधार का झंडा लेकर अस्तित्व में आ रही थीं। देश और समाज में हो रहे इस प्रकार के व्यापक परिवर्तन से स्वभावतः विजय वल्लभ प्रभावित हुए। जिनके विचार की खिड़कियां खुली हुई हैं। जो समाज, धर्म और देश के हित के लिए चिंतित हों। जो द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के अध्येता हों। वे इतने गहरे और व्यापक परिवेश से स्वभावतः प्रभावित होंगे ही। महात्मा गांधी की स्वतंत्रता की ज्योति जल रही थी। स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग और विदेशी चीजों का विरोध जोरों पर था। उस समय विजय वल्लभ ने मलमल के कपड़े उतार फैंके और खुरदरी खादी के मोटे कपड़े परिधान करने प्रारंभ किए। कहना न होगा कि विजय वल्लभ की पे्ररणा से हजारों लोगों ने खादी पहनना चालू कर दिया था।

महामना मदन मोहन मालवीय और आचार्य विजय वल्लभ के बीच नैकट्य संबंध था। उस समय साम्प्रदायिक दंग हो रहे थे। विजय वल्लभ ने मालवीयजी एक पत्र में लिखा था कि आजकल जो हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो रहे हैं उसके पीछे दूषित राजनीति है। विजय वल्लभ ने संकीर्ण साम्प्रदायिकता से उठकर स्नेह एवं सद्भाव के उपदेश दिए। उनके प्रवचन में हिन्दू, मुस्लिम, सिख आदि विविध धर्म के लोग समान रूप से आते रहते थे। लाहौर में जब उनका प्रवेश होने वाला था, उसके पहले दिन ही हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो गए। जिस दिन प्रवेश होने वाला था। उस दिन भी उसकी पुनरावृत्ति होने वाले थी। उसके लिए दोनों गुटों में जोरों से तैयारी हो रही थी। पर जैसे ही विजय वल्लभ का नगर प्रवेश हुआ और सार्वजनिक प्रवचन हुए तो वे आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गया। जो कल एक दूसरे के खून के प्यासे थे वे ही विजय वल्लभ के प्रवचन के बाद गले लगते हुए दिखाई दिए। कई मुसलमान उनके भक्त हो गए, कई मुस्लिम समाजों ने उन्हें अभिवंदन पत्र भेंट दिए।

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विजय वल्लभ का सामाजिक दृष्टिकोण सुधारवादी था। वे परिवर्तनशील समाज के साथ चलना धर्म मानते थे। गुरु वल्लभ अपने समय के ऐसे महापुरुष थे, जिनकी गणना रमण महर्षि, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी दयानंद, विवेकानंद, महात्मा गांधी आदि में होती हैं। उनके चमत्कारों का राज यही था कि उनमें  आत्मविश्वास था, संयम और चरित्र की प्रबल शक्ति थी, विजय वल्लभ के चमत्कारों का वर्णन सुनते हैं तो हमारा सिर उनकी विजय महिमा सुनकर नत हो जाता है। गुरु वल्लभ की प्रेरणा से देश में अनेक निर्माण कार्य हुए। मगर विशेष बात यह है कि वे मंदिरों, धर्मशालाओं, पाठशालाओं, छात्रावासों, चिकित्सालयों, मान-स्तम्भों के निर्माण के साथ-साथ, श्रावकों का भी उत्तम निर्माण कर करते रहें, कभी शिविरों के माध्यम से तो कभी अपने प्रवचनों के माध्यम से। उन्होंने न केवल श्रावकों बल्कि छात्रों, पंडितों, विद्वानों, डाक्टरों, इंजीनियरों, शिक्षाविदों, विधि-विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों आदि के शुष्क संसार में धर्मरस का सुंदर संचार किया। आप उस कोटि के निष्पृह-संत थे जिसकी परिभाषा जैनाचार्यों के अतिरिक्त, महान कवि एवं संत कबीरदासजी ने भी की है कि -साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय।।

आचार्य श्रीमद् विजय वल्लभ सूरीश्वरजी ‘प्रवरसंत’ थे, वे जगतगुरु थे, मनीषी-विचारक थे, प्रवचनकला मर्मज्ञ थे,। वे आत्मसाधना में लीन, लोक-कल्याण के उन्नायक, सर्वश्रेष्ठ लोकनायक थे। वे एक मुनि थे, संत थे, ऋषि थे, ज्ञानी-ध्यानी थे। उनकी दृष्टि में साहित्य-सृजन एक उत्कृष्ट तप एवं पवित्र अनुष्ठान था। दर्शन, धर्म, अध्यात्म, न्याय, गणित, भूगोल, खगोल, नीति, इतिहास, कर्मकाण्ड आदि विषयों पर उनका समान अधिकार था। बनावटी शिल्प से उन्हें लगाव नहीं था, वे आत्मा से उपजी स्वाभाविक भाषा-बोली के संकेत पर लेखनी चलाते थे। आपके विद्वत् वात्सल्य की चर्चा तो यत्र-तत्र सर्वत्र थी किन्तु विद्वानों विशेषकर युवाओं के प्रति उनका सहज वात्सल्य तथा ज्ञान प्राप्ति की लालसा सुनने को मिली। इस अलौकिक, तेजोमयी व्यक्तित्व चर्चा सुनकर लगा कि इस संत-चेतना के परिपाश्र्व में जीवन-ऊर्जा का अज्ररस्रोत प्रवहमान रहा, जीवन मूच्र्छित और परास्त नहीं था।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नारी शिक्षा को बल देने के लिये ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का उद्घोष दिया है, गुरु वल्लभ ने एक शताब्दी पूर्व ही नारी शिक्षा एवं नारी उत्कर्ष के लिये इस तरह की अभिनव क्रांति का उद्घोष करते हुए समाज को जागृत किया था। गुरु वल्लभ के व्यक्तित्व में सजीवता थी और एक विशेष प्रकार की एकाग्रता। वातावरण के प्रति उनमें ग्रहणशीलता थी और दूसरे व्यक्तियों एवं समुदायों के प्रति संवेदनशीलता। इतना लम्बा संयम जीवन, इतने व्यक्तित्वों का निर्माण, इतना आध्यात्मिक विकास, इतना साहित्य-सृजन, इतनी अधिक रचनात्मक-सृजनात्मक गतिविधियों का नेतृत्व, इतने लोगों से सम्पर्क- वस्तुतः ये सब अद्भुत था, अनूठा था, आश्चर्यकारी था। सचमुच आपकी जीवन-गाथा आश्चर्यों की वर्णमाला से आलोकित-गुंफित एक महालेख है। आपकी  प्रेरणा से संचालित होने वाली प्रवृत्तियों में इतनी विविधता रही कि जनकल्याण के साथ-साथ संस्कृति उद्धार, शिक्षा, सेवा, प्रतिभा-सम्मान, साहित्य-सृजन के अनेक आयाम उद्घाटित हुए है। देश में अहिंसा, शाकाहार, नशामुक्ति, नारी जागृति, रूढ़ि उन्मूलन एवं नैतिक मूल्यों के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। वे भौतिक वातावरण में अध्यात्म की लौ जलाकर उसे तेजस्वी बनाने का भगीरथ प्रयत्न करते हुए मोक्षगामी बने, वे अध्यात्म को परलोक से न जोड़कर वर्तमान जीवन से जोड़ रहे थे, क्योंकि उनकी दृष्टि में अध्यात्म केवल मुक्ति का पथ ही नहीं, वह शांति का मार्ग है। जीवन जीने की कला है, जागरण की दिशा है और जीवन रूपान्तरण की प्रक्रिया है। आपका संपूर्ण जीवन साधना, समाधि, शिक्षा में क्रांति एवं सामाजिक उत्थान और मनुष्य के नैतिक जागरण का उत्कृष्ट नमूना कहा जा सकता है।

- ललित गर्ग







संविधान सभा में शामिल इन 15 महिलाओं का योगदान है अतुल्यनीय

  •  रेनू तिवारी
  •  जनवरी 19, 2021   18:46
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संविधान सभा में शामिल इन 15 महिलाओं का योगदान है अतुल्यनीय

पूरी संविधान सभा ने मिलकर तर्क-वितर्क के साथ हर पहलू को ध्यान रखते हुए भारत के संविधान का निर्माण किया। किसी भी प्रकार का किसी जाति, धर्म और लिंग के साथ भेदभाव न हो इसके लिए हर सदस्य की राय की बात को महत्वपूर्ण समझा गया।

26 जनवरी 1950 के दिन भारत का संविधान लागू हुआ था। संविधान के जनक डॉ. बीआर अंबेडकर ने संविधान को बनाया। संविधान बनाने के लिए पहली 389 सदस्य की संविधान सभा में 15 महिलाओं को शामिल किया गया। इन महिलाओं ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूरी संविधान सभा ने मिलकर तर्क-वितर्क के साथ हर पहलू को ध्यान रखते हुए भारत के संविधान का निर्माण किया। किसी भी प्रकार का किसी जाति, धर्म और लिंग के साथ भेदभाव न हो इसके लिए हर सदस्य की राय की बात को महत्वपूर्ण समझा गया। भारत की कुछ सबसे प्रगतिशील और शक्तिशाली आवाज़ों के बारे में बात करें, जिनके बारे में हम शायद ही कभी बात करते हों, जिनके योगदान के बिना, हमारा संविधान समावेशी नहीं रहा होगा।

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हंसा मेहता (Hansa Mehta)

अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष के रूप में हंसा मेहता एक महत्वपूर्ण आवाज बनीं थीं। महात्मा गांधी के अनुयायी और एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता हंसा मेहता ने लैंगिक समानता की वकालत की। वह सभी के लिए शिक्षा के क्षेत्र में एक मिसाल थीं और उन्होंने समाज में महिलाओं के उत्थान के लिए जोर दिया। उन्होंने इस सामाजिक सक्रियता को संविधान के पन्नों में ले लिया, जिसने सभी नागरिकों के लिए संविधान को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हंसा मेहता ने यह सुनिश्चित किया कि मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (HR यूडीएचआर) के अनुच्छेद 1 को समावेशी बनाया गया था। मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अंतर्गत लिखी- "सभी पुरुषों को समान बनाया गया है" को परिवर्तित कर "सभी मानवों को समान बनाया गया है" करवाया था। हंसा मेहता का जन्म 3 जुलाई 1897 को गुजरात के एक नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह मनुभाई मेहता की बेटी थी जो तत्कालीन बड़ौदा राज्य के दीवान थे।

अम्मू स्वामीनाथन (Ammu Swaminathan)

अम्मू स्वामीनाथन (22 अप्रैल 1894 - 4 जुलाई 1978) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक कार्यकर्ता थी जो बाद में भारत की संविधान सभा की सदस्य बनीं। व्यापक रूप से अम्मुकुट्टी के रूप में जाना जाता है। अम्मुकुट्टी स्वामीनाथन का जन्म पालघाट जिले, केरल में अन्नकारा के वडक्कथ परिवार में हुआ था। उनके पिता, गोविंदा मेनन एक मामूली स्थानीय अधिकारी थे। अम्मू के माता-पिता दोनों नायर जाति के थे, और वह अपने तेरह भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। तमाम संघर्षों के बाद उन्होंने अपना एक अलग व्यक्तित्व बनाया। केरल की अम्मुकुट्टी अपनी शानदार अंग्रेजी भाषा और एक राजनीतिक रूप में अपनी आवाज उठाने वाली महिला के तौर पर जानी जाती है। गांधी के अनुयायी के तौर पर भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भागीदारी थी। इस आंदोलन ने भारत को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक उच्च जाति के परिवार में जन्मीं, वह अक्सर विरोध करने और राष्ट्रीय आंदोलनों का हिस्सा बनने के लिए और सभी के समान व्यवहार की वकालत करने के लिए अपने निस्वार्थ प्रयासों के लिए जानी गई थी। अपनी शिक्षा और सक्रियता के साथ, बाद में वह भारतीय संविधान सभा की सदस्य बनीं और भारतीय संविधान को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1952 में, उन्हें मद्रास निर्वाचन क्षेत्र से राज्य सभा के सदस्य के रूप में चुना गया। अम्मुकुट्टी की बेटी कैप्टन लक्ष्मी सहगल थीं, जो आजाद हिंद फौज में थी।

ऐनी मैस्करीन (Anne Mascarene)

एनी मैस्करन एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और केरल तिरुवनंतपुरम से सांसद थीं। ऐनी मैस्करीन ने अपने कार्यों से भारत के राजनीतिक इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाया है। मैस्करेन का जन्म 6 जून 1902 को त्रिवेंद्रम में एक लैटिन कैथोलिक परिवार में हुआ था। उनके पिता, गैब्रियल मैस्करीन, त्रावणकोर राज्य के एक सरकारी अधिकारी थे। उन्होंने 1925 में महाराजा कॉलेज त्रावणकोर में इतिहास और अर्थशास्त्र में डबल एमए किया। जब भारत आजाद हुआ था तब एनी मैस्करन ने भारत के एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अक्कम्मा चेरियन और पट्टोम थानु पिल्लई जैसी रियासतों को भारत में शामिल करवाया। फरवरी 1938 में, जब राजनीतिक दल त्रावणकोर राज्य कांग्रेस का गठन हुआ, तो वह शामिल होने वाली पहली महिलाओं में से एक बन गईं। 

बेगम ऐज़ाज़ रसूल (Begam Aizaz Rasul)

बेगम ऐज़ाज़ रसूल ने भारतीय संविधान सभा में एकमात्र मुस्लिम महिला के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज की। वह मुस्लिम लीग का हिस्सा थीं और उन लोगों में से एक थीं जो संविधान सभा में चुने गए थे। बेगम ऐज़ाज़ को प्रतिनिधिमंडल के उप नेता और विपक्ष के उप नेता के रूप में चुना गया था। उन्होंने मुसलमानों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल के खिलाफ आवाज उठाकर संविधान का मसौदा तैयार करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने इस विचार को "आत्म-विनाशकारी हथियार के रूप में पाया जो अल्पसंख्यक को हर समय बहुमत से अलग करता है"। उनके प्रयासों ने आखिरकार सदस्यों के बीच आम सहमति बनाई और संविधान को सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष बनाया। बेगम रसूल का जन्म 2 अप्रैल 1909 को महमूदा सुल्ताना और सर जुल्फिकार अली खान की बेटी कुदसिया बेगम के रूप में हुआ था। उसके पिता, सर ज़ुल्फ़िकार, पंजाब में मलेरकोटला रियासत के शासक थे। उनकी माँ, महमूदा सुल्तान, लोहारू के नवाब अलाउद्दीन अहमद खान की बेटी थीं।

दक्षयनी वेलायुधन (Dakshayani Velayudhan)

भारत दलित समुदाय के अधिकारों और संविधान में उनके योगदान के लिए डॉ. बीआर अंबेडकर के संघर्ष को कभी नहीं भूल सकता, लेकिन क्या भारत को संविधान सभा में निर्वाचित पहली दलित महिला याद है? दक्षयनी वेलायुधन औपचारिक शिक्षा हासिल करने वाली पुलया समुदाय की पहली व्यक्ति थी। दलित अधिकारों से जुड़े कई सामान्य मुद्दों के खिलाफ लड़ने के लिए, वल्लुधन ने अंबेडकर के साथ हाथ मिलाया। दक्षयनी वेलायुधन एक भारतीय सांसद और दलित नेता थी। वह अपने समुदाय की पहली महिला थीं जिन्होंने वस्त्रों को धारण किया। दक्षयनी वेलायुधन के सम्मान में केरल सरकार ने उनके नाम पर पुरस्कार का ऐलान किया। यह पुरस्कार उन महिलाओं को दिया जाएगा जिन्होंने राज्य में अन्य महिलाओं को सशक्त बनाने में योगदान दिया था। बजट में पुरस्कार के लिए 2 करोड़ रुपये रखे गए। केरल के वित्त मंत्री डॉ. थॉमस इसाक ने 31 जनवरी 2019 को विधानसभा में केरल बजट 2019 की प्रस्तुति के दौरान इसकी घोषणा की।

कमला चौधरी (Kamla Chaudhry)

एक स्त्रीवादी हिंदी लघुकथाकार और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सक्रिय प्रतिभागी कमला चौधरी एक शानदार महिला थी जो अपने शब्दों के साथ-साथ अपने एक्शन के लिए भी जानी जाती थी। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान, चौधरी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। वह भारत की संविधान सभा की एक निर्वाचित सदस्य थीं और संविधान को अपनाए जाने के बाद उन्होंने 1952 तक भारत की प्रांतीय सरकार के सदस्य के रूप में कार्य किया। वह उत्तर प्रदेश राज्य समाज कल्याण सलाहकार बोर्ड की सदस्य भी थीं। वह 1946 में 54वीं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की उपाध्यक्ष बनीं। बाद में, वह स्वतंत्र भारत की संविधान सभा के सदस्य के रूप में चुनी गयी।

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मालती चौधरी (Malti Choudhary)

मालती चौधरी स्वतंत्रता आंदोलन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की एक सक्रिय सदस्य थीं। उन्होंने अपने पति के साथ महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह में भाग लिया और एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपना दमखम दिखाया। उन्होंने ओडिशा में कमजोर समुदायों के उत्थान के लिए बाजीराव छत्रवास जैसे कई संगठनों की स्थापना की। मालती को 1948 में संविधान सभा के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में चुना गया था। स्वतंत्रता और गणतंत्र प्राप्त होने के बाद भी, मालती ने इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल की घोषणा के खिलाफ प्रदर्शन करके असंतोष की सक्रिय आवाज जारी रखी। इसमें कोई शक नहीं, महात्मा गांधी ने अपनी अपराजेय सक्रियता के लिए उनका नाम "तूफानी" रखा।

लीला रॉय (Leela Roy)

लीला रॉय एक कट्टरपंथी भारतीय राजनीतिज्ञ, समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी, एक कट्टर नारीवादी और सुभाष चंद्र बोस की करीबी सहयोगी थीं। 1947 में, उन्होंने पश्चिम बंगाल में भारतीय महिला संगठन की स्थापना की। वह संविधान सभा के लिए चुनी जाने वाली बंगाल की पहली महिला बनीं। 1960 में, वह एक नई राजनीतिक पार्टी की अध्यक्ष बनीं, जिसका गठन भारतीय महिला संघ और फारवर्ड ब्लॉक के विलय से हुआ था। महिलाओं के विकास के लिए उनके कामों के कारण उन्हें याद किया जाता है। उन्होंने खुद को लड़कियों के लिए सामाजिक कार्य और शिक्षा के अधिकार दिलाने के लिए झोंक दिया, ढाका में गर्ल्स स्कूल की शुरुआत की। उन्होंने लड़कियों को कौशल सीखने के लिए प्रोत्साहित किया और व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त किया और लड़कियों को खुद का बचाव करने के लिए मार्शल आर्ट सीखने की आवश्यकता पर जोर दिया। इन वर्षों में, उन्होंने महिलाओं के लिए कई स्कूल और संस्थान स्थापित किए।

पूर्णिमा बनर्जी (Purnima Banerjee)

भारत की कई बहादुर महिला स्वतंत्रता सेनानियों के साथ, पूर्णिमा बनर्जी के नाम का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में विशेष उल्लेखनीय है। वह अरुणा आसफ अली की छोटी बहन थी। बनर्जी ने सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया। ऐसा कहा जाता है कि उनकी सक्रियता के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उन्होंने कला में स्नातक की डिग्री पूरी की। बाद में वह उत्तर प्रदेश विधानसभा और भारत की संविधान सभा की भी सदस्य बन गई।

रेणुका रे

रेणुका रे महिला अधिकारों और पैतृक संपत्ति में विरासत के अधिकारों की एक मजबूत वकील थीं। उन्हें अखिल भारतीय महिला सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था और उन्हें केंद्रीय विधानसभा में महिलाओं के प्रतिनिधि के रूप में नामित किया गया था। बाद में वह संविधान सभा में एक मजबूत महिला की आवाज के साथ शामिल हुई और संविधान को प्रारूपित करने में मदद की। वह अखिल बंगाल महिला संघ की स्थापना करने के लिए भी जानी जाती है। 1952-57 में उन्होंने बंगाल विधानसभा में राहत और पुनर्वास मंत्री के रूप में कार्य किया।

राजकुमारी अमृत कौर

निडर महिला स्वतंत्रता सेनानी अमृत कौर भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में एक अविस्मरणीय नाम है। मार्गरेट चचेरे भाई जो रेड क्रॉस सोसाइटीज़ की लीग के गवर्नर बोर्ड के उपाध्यक्ष थे और सेंट जॉन्स एम्बुलेंस सोसाइटी की कार्यकारी समिति के अध्यक्ष थे, के साथ, उन्होंने 1927 में महिलाओं और बच्चों की शिक्षा और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की सह-स्थापना की। यहां तक कि गांधी के नेतृत्व में दांडी मार्च और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका और संविधान के प्रारूपण के अलावा, अमृत कौर ने चिकित्सा क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने केंद्रीय क्षय रोग एवं अनुसंधान संस्थान, ट्यूबरकुलोसिस एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया की स्थापना की।

सरोजिनी नायडू

सरोजिनी नायडू को अपनी अद्भुत कविताओं के लिए साहित्य की "नाइटिंगेल ऑफ इंडिया" के रूप में जाना जाता है, सरोजिनी नायडू एक क्रांतिकारी इतिहास के साथ प्रेरणादायक नारीवादी स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में खड़ी रही। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष और पहली महिला भारतीय राज्य गवर्नर थीं। नायडू ने भारत में महिलाओं के मतदान के अधिकार को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह एनी बेसेंट के साथ महिलाओं के अधिकार के लिए संयुक्त चयन समिति को वोट देने के मामले में लंदन चली गई। यह प्रयास सफल हुआ क्योंकि 1931 में कांग्रेस ने महिलाओं के मतदान के अधिकार को स्थापित करने का वादा किया और 1947 में इसे भारत की स्वतंत्रता के साथ आधिकारिक रूप से लागू किया गया। महिलाओं के वोट और सार्वभौमिक मताधिकार में नायडू का योगदान अभी भी भारत के संविधान में प्रतिध्वनित होता है।

सुचेता कृपलानी

सुचेता कृपलानी ने दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज फॉर विमेन से स्नातक की, उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में संवैधानिक इतिहास पढ़ाया। बाद में, वह उत्तर प्रदेश में सेवारत भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री चुनी गईं। घटक विधानसभा के सदस्य के रूप में, वह उस दस्तावेज को तैयार करने के लिए जिम्मेदार थीं जो स्वतंत्र भारतीय राज्य को नियंत्रित करेगा।

विजय लक्ष्मी पंडित

विजयलक्ष्मी पंडित एक भारतीय राजनयिक और राजनीतिज्ञ थीं और संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। 1940 और 1942 में दो बार स्वतंत्रता संग्राम में उनकी अपराजेय सक्रियता ने उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। हालांकि, वह मसौदा समिति के महत्वपूर्ण सदस्य बन गए।

दुर्गाबाई देशमुख

जब वह 1920 में गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन में शामिल हुईं, तब दुर्गाबाई देशमुख 12 साल की थीं और 1936 में उन्होंने आंध्र महिला सभा की स्थापना की। उन्होंने कम उम्र में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और महत्वपूर्ण राजनीतिक आवाज बन गई। बाद में एक आपराधिक वकील बनीं। वह संचालन समिति की सदस्य थीं और संविधान सभा के वाद-विवाद में भाग लेती थीं। उनकी कानूनी पृष्ठभूमि ने संविधान की न्यायपालिका की धारा को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देशमुख ने काउंसिल राज्य में 35 से 30 वर्ष की आयु प्राप्त करने की आयु कम करके संविधान के मसौदे में एक महत्वपूर्ण संशोधन लाया।

वास्तव में, राजनीति की ये निडर महिलाएं, स्वतंत्रता सेनानी और कट्टर नारीवादी हमें भारतीय इतिहास को फिर से देखने और इन अमूल्य योगदानों को जानने के लिए परिप्रेक्ष्य देती हैं।

- रेनू तिवारी







हरिवंशराय बच्चन की कविताओं में भावुकता के साथ रस और आनंद भी दिखाई देता है

  •  देवेन्द्रराज सुथार
  •  जनवरी 18, 2021   14:52
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हरिवंशराय बच्चन की कविताओं में भावुकता के साथ रस और आनंद भी दिखाई देता है

मात्र 13 वर्ष की छोटी सी उम्र से हरिवंशराय बच्चन ने लिखना प्रारंभ किया था। एक अध्यापक, कवि, लेखक बच्चन ने अपनी कविता, कहानी, बाल साहित्य, आत्मकथा, रचनावली से बहुत लोकप्रियता हासिल की। 'तेरा हार' बच्चन का प्रथम काव्य-संग्रह है।

हिंदी साहित्य में हालावाद के प्रवर्तक एवं मूर्धन्य कवि हरिवंशराय बच्चन उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। हाला, प्याला और मधुशाला के प्रतीकों से जो बात इन्होंने कही है, वह हिंदी की सबसे अधिक लोकप्रिय कविताएं स्थापित हुईं। दरअसल उनका वास्तविक नाम हरिवंश श्रीवास्तव था। इनको बाल्यकाल में बच्चन कहा जाता था, जिसका शाब्दिक अर्थ बच्चा या संतान होता है। बाद में वे इसी नाम से मशहूर हुए। बच्चन ने सीधी, सरल भाषा मे साहित्यिक रचना की। 'आत्म परिचय' व 'दिन जल्दी जल्दी ढलता है' इनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं। 'दिन जल्दी जल्दी ढलता है' में उन्होंने मानव जीवन की नश्वरता को स्पष्ट करते हुए दर्शन तत्व को उद्घाटित करने का सार्थक प्रयास किया है। बच्चन मुख्यतः मानव भावना, अनुभूति, प्राणों की ज्वाला तथा जीवन संघर्ष के आत्मनिष्ट कवि हैं। उनकी कविताओं में भावुकता के साथ ही रस और आनंद भी दिखाई देता है। उनके गीतों में बौद्धिक संवेदन के साथ ही गहन अनुभूति भी है। साहित्य शिल्पी बच्चन की कविता सुनकर श्रोता झूमने लगते थे। वे कहा करते थे सच्चा पाठक वही है जो सहृदय हो। विषय और शैली की दृष्टि से स्वाभाविकता बच्चन की कविताओं की विशेषता है। उनकी कविताओं में रूमानियत और कसक है। वहीं गेयता, सरलता, सरसता के कारण इनके काव्य संग्रहों को काफी पसंद किया गया। बच्चन ने सन 1935 से 1940 के बीच व्यापक निराशा के दौर में मध्यम वर्ग के विक्षुब्ध और वेदनाग्रस्त मन को वाणी दी।

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बच्चन का जन्म 27 नवंबर, 1907 में इलाहाबाद से सटे प्रतापगढ़ जिले में एक छोटे से गांव बाबूपट्टी में कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रतापनारायण श्रीवास्तव तथा माता का नाम सरस्वती देवी था। उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया और पीएचडी की उपाधि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से प्राप्त की तथा प्रयाग विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। कुछ समय तक वे आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से भी संबद्ध रहे। उनका विवाह 19 वर्ष की अवस्था में ही श्यामा के साथ हो गया था। सन 1936 में श्यामा की क्षय रोग से अकाल मृत्यु हो गई थी। इसके पांच वर्ष पश्चात 1941 में बच्चन ने तेजी सूरी के साथ प्रेम विवाह किया। तेजी संगीत और रंगमंच से जुड़ी हुई थी। तेजी बच्चन से उन्हें दो पुत्र हुए। अमिताभ एवं अजिताभ। अमिताभ बच्चन हिंदी सिनेमा के एक ख्यातनाम अभिनेता हैं। बच्चन ने आत्मपरकता, निराशा, वेदना जैसे विषयों पर आधारित कविताएं लिखीं। मात्र 13 वर्ष की छोटी सी उम्र से बच्चन ने लिखना प्रारंभ किया था। एक अध्यापक, कवि, लेखक बच्चन ने अपनी कविता, कहानी, बाल साहित्य, आत्मकथा, रचनावली से बहुत लोकप्रियता हासिल की। 'तेरा हार' बच्चन का प्रथम काव्य-संग्रह है पर 1935 में प्रकाशित 'मधुशाला' से बच्चन का नाम एक गगनभेदी रॉकेट की तरह साहित्य जगत पर छा गया। इसी कृति से हिंदी साहित्य में 'हालावाद' का उन्मेष हुआ। यद्यपि हालावाद की उत्पत्ति, विकास और समाप्ति की कहानी बच्चन की तीन पुस्तकों मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश में ही सीमित होकर रह गई। इनका प्रकाशन एक-एक वर्ष के अंतराल से हुआ। इनमें बच्चन ने यौवन, सौन्दर्य, और मस्ती के मादक गीत गाए थे। उस समय नवयुवकों में ये अत्यंत लोकप्रिय हुई थी, किंतु हालावाद एक झौंके की तरह आया और लुप्त हो गया। कारण हालावाद का कवि जगत और समाज से तटस्थ था, उसे विश्व से कोई मतलब न था। इस तरह की अनुभूतियों का सामाजिक सरोकारों से कोई लेना-देना नहीं था। इसके बाद निशा-निमंत्रण, एकांत-संगीत, सतरंगिनी, मिलन-यामिनी आदि अनेक काव्य प्रकाशित और लोकप्रिय हुए। आकुल अंतर, हलाहल, प्रणय पत्रिका, बुद्ध और नाचघर उनके अन्य काव्य-संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने तीन खण्डों में अपनी आत्मकथा 'क्या भूलूं क्या याद करूं' लिखी। साथ ही उन्होंने अनेक समीक्षात्मक निबंध लिखें और शेक्सपियर के कई नाटकों का अनुवाद भी किया।

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नि:संदेह हिंदी में कवि सम्मेलन परंपरा को सुदृढ़, गरिमापूर्ण, जनप्रिय तथा प्रेरक बनाने में बच्चन का असाधारण योगदान रहा है। उनकी कृति 'दो चट्टानें' को 1968 में हिंदी कविता का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान हुआ। इसी वर्ष उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी नवाजा गया। आत्मकथा 'क्या भूलूं क्या याद करूं' के लिए उन्हें बिड़ला फाउंडेशन ने सरस्वती सम्मान प्रदान किया। सन 1976 में उन्हें भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में 'पद्मभूषण' से नवाजा गया। बच्चन की कविता के साहित्यिक महत्व के बारे में अनेक मत हो सकते हैं और हैं, किंतु उनके काव्य की विलक्षण लोकप्रियता को सभी स्वीकारते हैं। वे हिन्दी के लोकप्रिय कवि रहे हैं और उनकी कृति 'मधुशाला' ने लोकप्रियता के सभी रिकॉर्ड तोड़े हैं। इसका कारण है कि बच्चन ने अपनी कविता के लिए तब जमीन तलाश की, जब पाठक छायावाद की अतीन्द्रिय और अतिवैयक्तिक सूक्ष्मता से उकता रहे थे। उन्होंने सर्वग्राह्य, गेय शैली में संवेदनसिक्त अभिधा के माध्यम से अपनी बात कही तो हिंदी का काव्य रसिक सहसा चौंक पड़ा। उन्होंने सयत्न ऐसा किया हो, ऐसा नहीं है, वे अनायास ही इस राह पर निकल पड़े। उन्होंने काव्य सृजन के लिए अनुभूति से प्रेरणा प्राप्त की तथा अनुभूति को ही काव्यात्मक अभिव्यक्ति देना अपना ध्येय बनाया। उनकी प्रसिद्ध रचना अग्निपथ में वह लिखते हैं- वृक्ष हो भले खड़े, हो घने हो बड़े, एक पत्र छांह भी, मांग मत, मांग मत, मांग मत, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। छायावाद के कवि डॉ. बच्चन के व्यक्तित्व व कृतित्व को साधारण लेखक लेखनी में नहीं बांध सकता। कवि ने जीवन के उल्लास में मृत्यु के पार की कल्पना करते हुए भी खूब लिखा- इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा ! हरिवंशराय बच्चन का देहांत 18 जनवरी 2003 में सांस की बीमारी के वजह से मुंबई में हुआ था। 

- देवेन्द्रराज सुथार







ज्योति बसु पुण्यतिथि विशेष: कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री जो प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गया

  •  अनुराग गुप्ता
  •  जनवरी 16, 2021   16:50
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ज्योति बसु पुण्यतिथि विशेष: कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री जो प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गया

संयुक्त मोर्चा के नेता वीपी सिंह के आवास पहुंचे और उनका सुझाव मांगा। हालांकि, वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि मैं डेढ़ साल पहले ही सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुका हूं, ऐसे में दोबारा प्रधानमंत्री बनने का सवाल ही नहीं उठता।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के जाने माने नेता ज्योति बसु 7 रेसकोर्स रोड पहुंचते-पहुंचते रह गए थे। वह उन लोगों में से हैं जिन्हें उन्हीं की पार्टी ने जाने से रोक दिया था। जबकि पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह चाहते थे कि ज्योति बसु को हिन्दुस्तान की गद्दी में बैठाया जाए और इसके लिए उन्होंने कई बार हरकिशन सिंह सुरजीत को पुनर्विचार करने के लिए कहा था।

दरअसल, साल 1996 में जब 11वीं लोकसभा के परिणाम सामने आए तो किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। ऐसे में हिन्दुस्तान की सत्ता में कौन काबिज होगा इस तरह के सवाल पूछे जाने लगे ? हालांकि, चुनाव परिणाम के बाद भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी मगर उनके पास इतनी सीटें नहीं थी कि वह अकेले अपने दम पर सरकार बना लें। 10 मई की शाम को दिल्ली की सियासी हलचलें दिखाईं दीं। शाम को सीपीएम नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने मोर्चा संभाला और जनता दल सहित बाकी की दलों के नेता एकजुट होने लगे और संयुक्त मोर्चा बनाया गया। कांग्रेस और भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं था ऐसे में आगे क्या होगा ? सभी के जहन में यही सवाल था।

लोकसभा चुनावों में जनता दल तीसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी और कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन देने की बात भी कह दी थी। यह वो दौर था जब जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव हुआ करते थे। ऐसे में हरकिशन सिंह सुरजीत के साथ हुई बैठक में वीपी सिंह के नाम पर आम सहमति बन गई।

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इसके बाद संयुक्त मोर्चा के नेता वीपी सिंह के आवास पहुंचे और उनका सुझाव मांगा। हालांकि, वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि मैं डेढ़ साल पहले ही सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुका हूं, ऐसे में दोबारा प्रधानमंत्री बनने का सवाल ही नहीं उठता। इसके बावजूद उनसे प्रधानमंत्री पद के लिए पुनर्विचार करने को कहा गया और उन्होंने फिर से इनकार कर दिया।

जब वीपी सिंह ने सुझाया ज्योति बसु का नाम

जब संयुक्त मोर्चा ने वीपी सिंह को ही प्रधानमंत्री पद के लिए नाम सुझाने को कहा तो उन्होंने ज्योति बसु का नाम सुझाया। ज्योति बसु के नाम पर भी सभी ने सहमति जता दी और फिर अगले दिन अखबारों में खबर छप गई कि ज्योति बसु अगले प्रधानमंत्री होंगे...

खबर भी छप गई, संयुक्त मोर्चा भी ज्योति बसु के नाम पर अपनी मुहर लगा चुका था और ज्योति बसु भी खुश थे इसके बावजूद वह प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। अब आप लोग सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या हुआ कि वह प्रधानमंत्री पद तक पहुंचते-पहुंचते रह गए ? दरअसल, ज्योति बसु की पार्टी सीपीएम ने सेंट्रल कमिटी की बैठक बुलाई और वहां पर ज्योति बसु के प्रधानमंत्री बनने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

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इसके बाद फिर से हरकिशन सिंह सुरजीत ने संयुक्त मोर्चा की बैठक बुलाई और नए नामों के लिए काफी विचार-विमर्श किया और अंतत: ज्योति बसु ने मुख्यमंत्री एचडी देवेगौड़ा का नाम सुझाया। जिस पर आपसी सहमति बनी।

संयुक्त मोर्चा ने एचडी देवेगौड़ा को दल का नेता चुन लिया और राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा को इसकी जानकारी देने के लिए राष्ट्रपति भवन गए हालांकि, संयुक्त मोर्चा ने कांग्रेस के समर्थन वाली चिट्ठी अभी तक सौंपी नहीं थी। कांग्रेस द्वारा देर-दराज किए जाने के बाद राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को सरकार बनाने का न्योता दे दिया और फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बन गई। हालांकि, यह सरकार महज 13 दिनों की ही थी।

- अनुराग गुप्ता







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