बीते कार्यकाल में तो कोई बड़ा काम हुआ नहीं, देखते हैं इस बार क्या कर पाते हैं मोदी

By डॉ. दीपकुमार शुक्ल | Publish Date: Jul 1 2019 12:53PM
बीते कार्यकाल में तो कोई बड़ा काम हुआ नहीं, देखते हैं इस बार क्या कर पाते हैं मोदी
Image Source: Google

राजग के बीते कार्यकाल में पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के अन्दर घुसकर आतंकियों के विरुद्ध की गई कार्रवाई को यदि छोड़ दें तो सरकार के शेष सभी निर्णयों पर आम जनता की ओर से प्रश्न-चिन्ह ही लगते रहे हैं- चाहे नोट बन्दी का मुद्दा हो या जीएसटी का।

बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को जैसा प्रचण्ड बहुमत प्राप्त हुआ उसकी कल्पना शायद किसी को भी नहीं थी। राजनीतिक विश्लेषक इस जीत का श्रेय नरेन्द्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता तथा अमित शाह की रणनीतिक कुशलता को दे रहे हैं। 2014 में भाजपा को जहां 282 सीटें मिली थीं वहीं 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 303 तक पहुंच गया। इस चुनाव में भाजपा की सीटों में ही मात्र वृद्धि नहीं हुई बल्कि 2014 के मुकाबले उसे 33 प्रतिशत अधिक मत भी प्राप्त हुए। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को कुल 17.16 करोड़ वोट मिले थे जबकि इस बार यह आंकड़ा 33.45 प्रतिशत बढ़कर 22.90 करोड़ को पार कर गया। राजग के बीते कार्यकाल में पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के अन्दर घुसकर आतंकियों के विरुद्ध की गई कार्रवाई को यदि छोड़ दें तो सरकार के शेष सभी निर्णयों पर आम जनता की ओर से प्रश्न-चिन्ह ही लगते रहे हैं- चाहे नोट बन्दी का मुद्दा हो या जीएसटी का। राफेल विमान डील हो या फिर सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देने की बात हो। बेरोजगारी की समस्या पर तो सरकार अन्त तक कोई ठोस कदम ही नहीं उठा पायी।


पुलवामा हमले के बाद पूरे देश में पाकिस्तान के प्रति जिस तरह का रोष उत्पन्न हुआ वह उचित ही था। देश के कोने-कोने से एक ही आवाज आ रही थी कि पाकिस्तान के विरुद्ध हर हाल में कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। अन्ततः सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक का निर्णय लेकर सम्पूर्ण देशवासियों का मन जीत लिया। परिणामस्वरूप आमजन ने भाजपा सरकार की अन्य सभी कमियों को दरकिनार करते हुए एक नये उत्साह और विश्वास के साथ उसे प्रचण्ड जनादेश देकर पुनः सत्ता सौंप दी। अर्थात् इस बार का पूरा चुनाव अंततोगत्वा पाकिस्तान विरोध की धुरी पर ठीक उसी प्रकार केन्द्रित हो गया जिस प्रकार पाकिस्तान का प्रत्येक चुनाव भारत विरोध की धुरी पर केन्द्रित रहता है।
 
पाकिस्तान के जन्म से लेकर अब तक वहाँ जितने भी चुनाव हुए हैं वह सभी भारत विरोध की पृष्ठभूमि पर ही जीते गए हैं। यदि किसी पाकिस्तानी हुक्मरान ने भारत के साथ मित्रता करने का प्रयास किया भी तो उसे अगले चुनाव में सत्ता से हाथ धोना पड़ा। बेनजीर भुट्टो तथा नवाज शरीफ इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। पाकिस्तानियों के मन में वहाँ के नेताओं ने भारत की जो तस्वीर प्रस्तुत की है उससे वहाँ के नागरिकों को भारत से सदैव युद्ध का खतरा दिखायी देता है। पाकिस्तानी जनता को हमेशा यही डर लगा रहता है कि भारत पता नहीं कब हमला कर दे जबकि भारत का ऐसा कोई भी इरादा कभी भी नहीं रहा। भारत विरोधी मानसिकता को और अधिक भड़का कर आतंक के आका पाकिस्तानी नवयुवकों को बड़ी आसानी से बन्दूकें थमा देते हैं। जिसका खामियाजा भारत के बेकसूर नागरिक तो भोग ही रहे हैं पाकिस्तान भी भुखमरी की कगार पर आकर खड़ा हो गया। पाकिस्तान के राजनीतिक दलों को न तो बेरोजगारी के मुद्दे पर बात करनी है, न शिक्षा के स्तर की चर्चा करनी है और न सड़क, बिजली, पानी तथा आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं पर ही ध्यान केन्द्रित करना है। वहाँ तो बस भारत को दुश्मन नम्बर एक बताकर जितना अधिक जहर उगलिए उतनी ही सरलता से सत्ता प्राप्त करिए की राजनीति वर्षों से चल रही है। तो क्या अब भारत की राजनीति भी पाकिस्तान विरोध की पृष्ठभूमि पर आधारित होती जा रही है ? पुलवामा हमले के बाद देश के अन्दर जिस तरह का राजनीतिक वातावरण बना उससे तो यही लगता है कि भारतीय राजनीति पाकिस्तानी राजनीति का अनुसरण करने की दिशा में अग्रसर है।
 
कश्मीर समस्या इस देश की एक बड़ी और अति गम्भीर समस्या है लेकिन एकमात्र नहीं। रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी तथा भ्रष्टाचार से यह देश पहले भी जूझ रहा था आज भी जूझ रहा है। अब तो जमीनी स्तर के भ्रष्टाचार को आमजन ने नियति मानते हुए इससे छुटकारा पाने का विचार ही त्याग दिया है। बेरोजगारी की समस्या दिन प्रति दिन विकराल हो रही है। पिछले कार्यकाल में सरकार ने इस समस्या का कोई ठोस और स्थाई समाधान नहीं खोजा, न ही आज उसके पास कोई सही रणनीति है जिस पर वह इस दिशा में काम कर सके। कौशल विकास जैसी परियोजना भी औंधे मुँह पड़ी है। नोटबन्दी तथा कम्पनी बन्दी को भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक बड़ा कदम बताया गया था। परन्तु इससे भ्रष्टाचार कितना कम हुआ यह किसी को बताने की अवश्यकता नहीं है। दो लाख से भी अधिक कंपनियों के बन्द होने से उन कंपनियों के नाम पर हो रहे कथित घपले-घोटाले भले ही बन्द हो गए हों परन्तु करोड़ों की संख्या में बेरोजगार हुए लोग आज तक दर-दर भटक रहे हैं। जबकि उन कंपनियों के मालिक और अधिकारी आज भी ऐश-ओ-आराम का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।


विदेशी मोर्चे पर स्वयं के सफल होने का ढिंढोरा हम भले ही पीटें परन्तु असली सफलता तो आन्तरिक मोर्चे पर सफल होने की है। किसी भी देश की समृद्धता का आकलन उसके आमजन की समृद्धता से ही लगाया जाना चाहिए न कि उस देश के सर्वोच्च नेता की विश्व स्तर पर बढ़ती साख से। भारत के प्रधानमन्त्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने जितने और जिन देशों के दौरे किए हैं क्या उन देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भी भारत के उतने ही दौर किए हैं? तब फिर हम यह कैसे कह सकते हैं कि भारत की साख विदेशों में बढ़ रही है। यह सत्य है कि पाकिस्तान आज विश्व स्तर पर अलग-थलग पड़ चुका है जिसे हम भारत की कूटनीतिक सफलता मानते हुए नहीं थकते हैं। परन्तु शायद हम यह भूल जाते हैं कि कभी अमेरिका की कठपुतली रहा पाकिस्तान आज उसके किसी काम का नहीं रह गया है। अमेरिका जैसे उच्च तकनीकी सम्पन्न देश की दृष्टि में ऐसा क्या है जो उससे छुपा रहे? पाकिस्तान में छुपा बैठा ओसामा बिन लादेन आखिर अमेरिका के हाथों कैसे मारा गया? पाकिस्तान की प्रत्येक गतिविधि को अमेरिका वर्षों से जानता है। इसके बाद भी उसका रुख पाकिस्तान के प्रति इसलिए लचीला रहा क्योंकि अफगानिस्तान और इराक में अड्डा जमाये अमेरिकी सैनिकों की आपातकालीन सहायता के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को अपना स्लीपर सेल बना रखा था जबकि अब उसे इसकी आवश्यकता नहीं है।


 
चीन को अपना कॉरिडोर बनाने के लिए पाकिस्तान का सहयोग चाहिए इसलिए चीन अभी पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखाई देता है। अमेरिका और चीन पाकिस्तानियों की भारत विरोधी मानसिकता का लाभ उठाकर सदैव अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। अब अमेरिका तथा उसके सहयोगी देश भारत के अन्दर दृढ़ होती पाकिस्तान विरोधी मानसिकता को भलीभाँति पढ़ रहे हैं। इसीलिए जब भी कोई अंतर्देशीय सम्मेलन होता है तब प्रत्यक्ष परोक्ष पाकिस्तानी नीतियों के विरुद्ध चर्चा जरूर होती है और मीडिया में यही तथ्य मुख्य समाचार के रूप में प्रसारित होता है। तब भारतवासी ऐसे समाचारों को एक बड़ी कूटनीतिक सफलता मानकर स्वयं की पीठ थपथपा लेते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे राष्ट्राध्यक्षों का उक्त सम्मेलन मात्र पाकिस्तान के मुद्दे पर ही हुआ हो। इसके अतिरिक्त विश्व में अन्य कोई मुद्दा जैसे बचा ही न हो। पाकिस्तान विरोध की दृढ़ होती विचारधारा से ओतप्रोत राजनीति से देश का आखिर कितना भला होगा यह प्रश्न उत्तर की प्रतीक्षा में सदैव रहेगा।
 
-डॉ. दीपकुमार शुक्ल
(स्वतन्त्र टिप्पणीकार)
 

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप   



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

Related Story

Related Video