Abhijeet Dipke, Saurav Das, Richa Chadha अनजाने में मर्यादा की सीमा लांघ रहे हैं या फिर जानबूझकर बदतमीजी कर रहे हैं?

Abhijeet Saurav Richa
Image Source: ChatGPT

यह भी एक बड़ा प्रश्न है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पूरी होने के बाद क्या दिपके और उनके सहयोगी इतने आत्ममुग्ध हो गए हैं कि अब देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए भी घटिया और व्यक्तिगत भाषा का इस्तेमाल सामान्य मानने लगे हैं?

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना हर नागरिक का अधिकार है और सत्ता की आलोचना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत मानी जाती है। लेकिन जब विरोध की भाषा शालीनता की सीमा लांघकर व्यक्तिगत अपमान में बदल जाए, जब तर्क और तथ्यों की जगह गाली-गलौज और कटाक्ष ले लें, और जब वरिष्ठों के सम्मान जैसी बुनियादी सामाजिक मर्यादाओं का भी मजाक उड़ाया जाने लगे, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह लोकतांत्रिक विरोध है या फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में सभ्य संवाद की संस्कृति को कमजोर करने की कोशिश है?

हाल के दिनों में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके, उसके प्रवक्ता सौरव दास और अभिनेत्री रिचा चड्ढा के बयानों ने इसी बहस को जन्म दिया है। तीनों के बयान अलग-अलग संदर्भों में आए, लेकिन उनकी भाषा और दृष्टिकोण में जो समानता दिखाई देती है वह है व्यक्तिगत कटाक्ष, वरिष्ठों के प्रति असम्मान और मर्यादा की सीमाओं को लांघने की प्रवृत्ति।

इसे भी पढ़ें: संवाद से ही सुलझेगा युवा असंतोष

अभिजीत दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छात्रों के लिए जारी वीडियो संदेश पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि "आपकी त्वचा देश के भविष्य से ज्यादा चमकदार है।" यह टिप्पणी ऐसे समय आई जब प्रधानमंत्री ने परीक्षा प्रणाली को विश्वसनीय बनाने और पेपर लीक पर अंकुश लगाने के लिए पारित कानून को विद्यार्थियों के हित में एक महत्वपूर्ण कदम बताया था। देखा जाये तो कोई भी व्यक्ति सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकता है, कानून की प्रभावशीलता पर सवाल उठा सकता है या सरकार से जवाब मांग सकता है। लेकिन किसी के व्यक्तित्व या शारीरिक स्वरूप पर टिप्पणी करना क्या स्वस्थ लोकतांत्रिक आलोचना कहलाएगी? क्या इससे छात्रों की समस्या का कोई समाधान निकलता है?

यह भी एक बड़ा प्रश्न है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पूरी होने के बाद क्या दिपके और उनके सहयोगी इतने आत्ममुग्ध हो गए हैं कि अब देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए भी घटिया और व्यक्तिगत भाषा का इस्तेमाल सामान्य मानने लगे हैं? जिस नेता को दुनिया में सबसे अधिक वोट प्राप्त कर लोकतांत्रिक जनादेश मिला हो, उसके साथ असहमति पूरी तरह स्वीकार्य हो सकती है, लेकिन क्या उसका अपमान लोकतांत्रिक अधिकार की श्रेणी में रखा जा सकता है?

सौरव दास का बयान इस बहस को और गंभीर बना देता है। जब उनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत माता के खिलाफ इस्तेमाल हुई अपमानजनक भाषा पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता और लोकतंत्र में "जोक" को स्वीकार करना चाहिए। देखा जाये तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन किसी दिवंगत व्यक्ति या किसी के परिवार के प्रति अपमानजनक टिप्पणियों का समर्थन करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संवाद के स्तर को गिराना माना जायेगा। लोकतंत्र में तीखी आलोचना की पूरी गुंजाइश है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान और विशेषकर दिवंगत परिजनों को निशाना बनाना स्वस्थ राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा नहीं माना जाता।

भारत के मतदाताओं ने बार-बार यह संकेत दिया है कि वे नीतियों पर बहस चाहते हैं, लेकिन व्यक्तिगत अभद्रता को पसंद नहीं करते। राजनीतिक इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जहां तीखी व्यक्तिगत टिप्पणियों की तुलना में मुद्दों पर आधारित राजनीति को अधिक स्वीकार्यता मिली। ऐसे में यह मान लेना कि अपमानजनक भाषा ही जनभावना का प्रतिनिधित्व करती है, वास्तविकता से दूर आकलन है।

दूसरी ओर, अभिनेत्री रिचा चड्ढा का हालिया सोशल मीडिया पोस्ट भी इसी मानसिकता की झलक देता है। उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा कि केवल उम्र के आधार पर सम्मान नहीं मिलना चाहिए और अपनी बात को स्थापित करने के लिए उन्होंने ऐसे शब्दों और उपमाओं का प्रयोग किया जोकि अपमानजनक और असंवेदनशील थीं। किसी व्यक्ति का सम्मान केवल उम्र से नहीं, उसके आचरण से भी जुड़ा हो सकता है, यह तर्क अपनी जगह है। लेकिन क्या इस विचार को व्यक्त करने के लिए पूरे वरिष्ठ वर्ग का उपहास उड़ाना, उनकी शारीरिक स्थिति पर कटाक्ष करना और उन्हें अपमानित करने वाली भाषा का प्रयोग करना उचित माना जा सकता है? रिचा चड्ढा को यह पता होना चाहिए कि भारतीय समाज में बुजुर्गों का सम्मान केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का महत्वपूर्ण आधार रहा है। हम आपको यह भी बता दें कि रिचा चड्ढा इससे पहले भी कई विवादित बयानों को लेकर सुर्खियों में रह चुकी हैं। ऐसे में यह धारणा भी मजबूत होती है कि फिल्म और मनोरंजन जगत के कुछ कलाकार अपनी नई फिल्म या वेब सीरीज के रिलीज़ से पहले चर्चा में बने रहने और लाइमलाइट हासिल करने के लिए जानबूझकर विवादित बयान देते हैं। 

देखा जाये तो सरकारों से सवाल पूछना आवश्यक है, आंदोलनों का होना भी लोकतंत्र का हिस्सा है और सार्वजनिक हस्तियों की आलोचना भी पूरी तरह वैध है। लेकिन यदि आलोचना की भाषा ही अपमान में बदल जाए, यदि असहमति की जगह व्यक्ति और उसके परिवार को निशाना बनाया जाए और यदि वरिष्ठों के प्रति सम्मान को ही पिछड़ापन बताने की कोशिश होने लगे, तो यह केवल राजनीतिक या वैचारिक बहस नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक संस्कारों के क्षरण का संकेत बन जाती है।

आखिरकार लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं चलता, बल्कि जिम्मेदारियों से भी चलता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण संवाद की मर्यादा भी है। असहमति का अधिकार लोकतंत्र को मजबूत करता है, लेकिन अभद्रता और व्यक्तिगत अपमान किसी भी लोकतांत्रिक समाज को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर ही करते हैं।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
All the updates here:

अन्य न्यूज़