भाजपा के पास हासिल करने को नहीं, खोने को है बहुत कुछ

भाजपा के पास हासिल करने को नहीं, खोने को है बहुत कुछ

पलायन के बाद बात किसानों की कि जाए तो किसानों का रूख अभी अबूझ पहली बनी हुई है। जाट किसान किधर जाएगा,यह सब पता करना चाह रहे हैं। ज्ञातव्य हो कृषि कानूनों का सबसे ज्यादा असर पश्चिमी उप्र में ही नजर आया था।

उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए प्रथम चरण का मतदान 10 फरवरी को होगा। प्रथम चरण में पश्चिमी यूपी के 11 जिलों में मतदान होना है। सभी दलों ने पूरी ताकत झोंक रखी है। अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, राजनाथ सिंह, जेपी नड्डा, अखिलेश यादव, जयंत चौधरी से लेकर तमाम छोटे-बड़े नेताओं ने पूरे पश्चिमी यूपी को एक तरह से मथ दिया है। राजनैतिक पंडित और बुद्धिजीवी भली भांति जानते हैं कि पश्चिम से जिस भी राजनैतिक दल की बयार बहेगी, उसका असर दूर तक जाएगा और उसी का बेड़ा पार हो जाएगा। यही कारण है कि सभी ने अपने-अपने तरकश के तीरों को और पैना कर पश्चिमी यूपी में छोड़ दिया है। पहले चरण में 11 जिलों शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद, हापुड़, नोएडा, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा, और आगरा की 58 सीटों पर मतदान होगा। पहले चरण में शामिल 58 सीटों पर कुल 810 उम्मीदवारों ने नामांकन पत्र दाखिल किये थे, इनमें से 658 नामांकन सही पाये गये। नामांकन पत्रों की जांच में सबसे ज्यादा 19 उम्मीदवार आगरा की बाह सीट पर हैं। इसके बाद 18 उम्मीदवार मुजफ्फरनगर सीट पर तो मथुरा सीट पर 15 उम्मीदवार मैदान में हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में भाजपा की प्रचंड लहर चली थी। बस पांच सीटें ऐसी रह गई थी जिन पर भाजपा के विजयी रथ को रोक लिया गया था। पहले चरण में जिन जिलो में मतदान होना है वहां जयंत चौधरी और अखिलेश यादव के गठबंधन की भी परीक्षा होगी। जिन जिलों में मतदान होना है उसे रालोद का गढ़ माना जाता है। इन जिलों में रालोद को काफी उम्मीदें भी हैं। सपा के गठबंधन के बाद यदि जाट-मुस्लिम समीकरण कारगर हुआ तो गठबंधन का फायदा हो सकता है।

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इस बार प्रथम चरण में कई दिग्गज और बाहुबली नेताओं का भविष्य दांव पर है। दिग्गज नेताओं की बात की जाए तो इसमें मृगांका सिंह (बीजेपी) कैराना, सुरेश राणा (बीजेपी) थानाभवन, संगीत सोम(बीजेपी)सरधना, पंकज सिंह (बीजेपी) नोएडा, पंखुड़ी पाठक (कांग्रेस) नोएडा, अवतार सिंह भड़ाना (आरएलडी) जेवर, संदीप सिंह (बीजेपी) अतरौली, श्रीकांत शर्मा (बीजेपी) मथुरा, बेबी रानी मौर्या (बीजेपी) आगरा ग्रामीण शामिल हैं, वहीं बाहुबली नेताओं में मदन भैया (आरएलडी) लोनी विधानसभा क्षेत्र, अमरपाल शर्मा (सपा) साहिबाबाद विधानसभा क्षेत्र, नाहिद हसन (सपा) कैराना, योगेश वर्मा (सपा) हस्तिनापुर हैं जिनके हारने व जीतने के कई सियासी मायने होगे। 2017 के विधान सभा चुनाव में प्रथम चंरण की 58 सीटों में से जिन 05 सीटो पर गैर भाजपा नेता जीते थे, उसमें  कैराना में सपा के नाहिद हसन, मेरठ शहर सीट पर सपा के रफीक अंसारी, छपरौली पर रालोद से सहेंद्र रमाला, धौलाना पर बसपा के असलम चौधरी तथा मांट पर बसपा के श्यामसुंदर शर्मा शामिल थे। इस बार इन सीटों पर जहां भाजपा जीत के लिए पूरी ताकत लगा रही है तो अन्य सीटों पर सपा रालोद गठबंधन समेत अन्य दूसरे दलों ने भी पूरी ताकत झोंक रखी है। बीजेपी हो या फिर रालोद-सपा गठबंधन अथवा कांग्रेस और बसपा सब ने समय-समय पर इस इलाके में कई सियासी प्रयोग किए हैं। 2017 के विधान सभा चुनाव में सबसे पहले कैराना के पूर्व सांसद हुकुम सिंह अब दिवंगत ने पलायन का मुद्दा उठाया था। यह प्रयोग इस कदर रंग लाया कि भाजपा सत्ता में आ गई। हालांकि, कैराना में इस फॉर्मूले का असर उल्टा हुआ और यहां सपा के नाहिद हसन चुनाव जीत गए वह भी तब जबकि भाजपा ने हुकुम सिंह की पुत्री मृगांका सिंह को चुनावी रण में उतारा था। इस बार भी दोनों फिर से आमने-सामने हैं। भाजपा इस बार इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर चल रही है। गृहमंत्री अमित शाह और सीएम योगी आदित्यनाथ खुद पलायन वाले परिवारों से जाकर मिल चुके हैं और कह चुके हैं कि अब वे दिन नहीं रहे। इसका कितना असर हुआ, वह भी यह चुनाव तय करेगा।

पलायन के बाद बात किसानों की कि जाए तो किसानों का रूख अभी अबूझ पहली बनी हुई है। जाट किसान किधर जाएगा, यह सब पता करना चाह रहे हैं। ज्ञातव्य हो कृषि कानूनों का सबसे ज्यादा असर पश्चिमी उप्र में ही नजर आया था। पश्चिमी उप्र के किसान न केवल धरनों में शामिल हुए बल्कि सपा और रालोद गठजोड़ का जनक भी यही आंदोलन बना। अब इन जिलों में किसानों में भी अलग-अलग धड़े बन गए हैं। दोनों अपनी-अपनी बात कह रहे हैं। इस चरण में किसान मजबूती से किसके साथ खड़ा हुआ, उसका संदेश अन्य सीटों तक तेजी से जाएगा। इसे सभी दल गंभीरता से समझ रहे हैं और अपनी तैयारियों को इसी तरह से आकार दे रहे हैं।

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इस चुनाव में सभी को डैमेज कंट्रोल करने की बड़ी चुनौती है। भाजपा के पास यहां पाने को ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन खोने को बहुत कुछ है। 58 में से 53 सीटों पर बीजेपी के विधायक हैं। भाजपा के सामने किसान आंदोलन की नाराजगी को दूर करने की चुनौती है। हालांकि, भाजपा कानून-व्यवस्था के मुद्दे को बड़े स्तर पर सामने रख रही है। रालोद-सपा गठबंधन के सामने टिकटों के बंटवारे के बाद कई सीटों पर पैदा हुई रार को खत्म करने की चुनौती है। बसपा के सामने फिर से अपने अस्तित्व को खड़ा करने की चुनौती है। इस बार बसपा अकेले मैदान में जबकि सपा गठबंधन में हैं इसलिए बसपा को अतिरिक्त मेहनत करनी होगी।

- अजय कुमार