खुद को श्रेष्ठ और दूसरे को हीन मानने की भावना बलवती होती चली जा रही है

By बीपी गौतम | Publish Date: Mar 11 2019 5:35PM
खुद को श्रेष्ठ और दूसरे को हीन मानने की भावना बलवती होती चली जा रही है
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विद्वानों का ध्यान अभी तक सिर्फ हिंदुओं की जाति व्यवस्था तक ही सिमटा हुआ है, उनका मन व्यापक स्तर पर सोच ही नहीं पा रहा है। व्यक्ति में ही स्वयं को श्रेष्ठ मानने का भाव होता है, जिसे विकृति भी कह सकते हैं।

भारतीय समाज की ऊंच-नीच को लेकर आलोचना और निंदा की जाती रही है। भारत में भी हिंदुओं को निशाने पर प्रमुख रूप से लिया जाता रहा है। हिंदुओं की जाति व्यवस्था को लेकर बहुत कुछ लिखा और कहा जाता रहा है, जबकि ऊंच-नीच की समस्या सिर्फ हिदुओं की ही नहीं है। ऊंच-नीच का आशय है स्वयं को श्रेष्ठ और सामने वाले को हीन मानना। स्वयं को श्रेष्ठ मानने की विकृति हर धर्म, हर पंथ, हर संप्रदाय में ही नहीं बल्कि, हर समाज के हर क्षेत्र में गहरे तक समाई हुई है लेकिन, विद्वानों का ध्यान अभी तक सिर्फ हिंदुओं की जाति व्यवस्था तक ही सिमटा हुआ है, उनका मन व्यापक स्तर पर सोच ही नहीं पा रहा है। व्यक्ति में ही स्वयं को श्रेष्ठ मानने का भाव होता है, जिसे विकृति भी कह सकते हैं, उसी विकृति से संबंधित कई लोग एक जगह जमा हो जाते हैं तो, वह विकृति सामूहिक रूप धारण कर लेती है, जो हर क्षेत्र में व्यापक स्तर पर देखी और महसूस की जा सकती है।
 
हिंदू स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं, वहीं अन्य धर्मों के अनुयायियों को हीन। हिंदुओं में सवर्ण स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं एवं पिछड़ों और दलितों को हीन। पुरुष स्वयं को श्रेष्ठ और स्त्री को हीन मानता है। गोरे स्वयं को श्रेष्ठ और कालों को हीन मानते हैं, इस सबकी चर्चा होती रही है पर, इससे अलग भी श्रेष्ठता का भाव है, जिसकी चर्चा नहीं की जाती। साक्षर स्वयं को श्रेष्ठ और निरक्षर को हीन मानते हैं। सरकारी विद्यालय के छात्रों और शिक्षकों को निजी विद्यालय के छात्र और शिक्षक हीन ही मानते हैं। निजी क्षेत्र के स्कूल और कॉलेज में भी श्रेणी है, ब्राडेंड और महंगे स्कूल-कॉलेज के छात्र और शिक्षिक कम चर्चित और सस्ती संस्थाओं के छात्रों और शिक्षकों को हीन मानते हैं। उच्च शिक्षित स्वयं को श्रेष्ठ और साक्षर को हीन मानते हैं, इसी तरह उच्च शिक्षितों में विज्ञान के विद्वान कला के विद्वानों को हीन मानते हैं। कला में अंग्रेजी का ज्ञाता स्वयं को श्रेष्ठ और हिंदी वाले को हीन मानता है।
राजनीति की बात करें तो, ग्राम सभा सदस्य को प्रधान, प्रधान को ब्लॉक प्रमुख, ब्लॉक प्रमुख को विधायक, विधायक को सांसद, सांसद को केन्द्रीय मंत्री और केन्द्रीय मंत्री को प्रधानमंत्री हीन ही मानते हैं। प्रशासनिक व्यवस्था में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को तृतीय श्रेणी कर्मचारी और कर्मचारियों को अफसर हीन ही मानते हैं। पीडीएस अफसरों को पीसीएस अफसर और पीसीएस अफसरों को आईएएस अफसर हीन ही मानते हैं। सिपाही को दरोगा, दरोगा को इंस्पेक्टर, इंस्पेक्टर को सीओ, सीओ को एएसपी, एएसपी को एसएसपी, एसएसपी को आईजी, आईजी को एडीजी, एडीजी को डीजीपी हीन ही मानते हैं। वायु सेना वाले नौ सेना वालों से और वे थल सेना वालों से स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं।
 
भिखारियों में विकलांग भिखारी को शेष भिखारी हीन ही मानते हैं। मोची किसी भी भिखारी को हीन ही मानता है। मोची को पान और चाय का खोखे का स्वामी हीन मानता है, इन्हें किराना का स्वामी हीन मानता है। किराना के स्वामी को कपड़े का शोरूम वाला हीन मानता है, उसे ज्वैलर्स हीन मानता है। सॉफ्टवेयर का जानकार स्वयं को श्रेष्ठ और हार्डवेयर के जानकर को हीन मानता है। फिल्म इंडस्ट्री को सर्वाधिक प्रगतिशील कहा जाता है, वहां की बात करें तो, टीवी से जुड़े कलाकारों को बड़े पर्दे वाले हीन ही समझते हैं। बड़े बैनर की फिल्मों में कार्य कर रहे लोग छोटे बैनर से जुड़े लोगों को हीन समझते हैं। जिसकी निरंतर कई फिल्में हिट हो चुकी हों, वह अन्य को हीन ही समझता है। राष्ट्रीय और ऑस्कर पुरस्कार पाने वालों के बीच में भी ऐसा ही भाव रहता है, दूसरा प्रगतिशील क्षेत्र क्रिकेट है, यहाँ भी प्रांतीय टीम में खेल चुके व्यक्ति को राष्ट्रीय स्तर का व्यक्ति हीन समझता है, उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी हीन समझता है, उसे विशेष रिकॉर्ड बना चुका खिलाड़ी हीन समझता है। डकैतों और जेलों में कैदियों तक के अंदर श्रेष्ठता का भाव रहता है, वे स्वयं को वरिष्ठ कह कर और बड़ी वारदातों में वांछित होने पर ही श्रेष्ठ मानते हैं।
 
पत्रकारिता क्षेत्र वैश्विक सोच रखने वाला क्षेत्र है लेकिन, यहाँ भी श्रेष्ठता और हीनता अंदर तक महसूस की जा सकती है। स्ट्रिंगर फोटोग्राफर को हीन समझता है, उसे स्टाफर हीन समझता है, उसे डेस्क इंचार्ज हीन समझता है, उसे संपादक हीन समझता है, उसे उसके ऊपर वाला हीन समझता है। कवियों को लेखक और लेखक को कवि हीन समझते हैं, उसमें भी ख्यातिलब्ध दोनों को हीन समझता है। संविधान की रक्षा करने वाला न्याय क्षेत्र भी अछूता नहीं है।


दलितों और पिछड़ों की बात करते हैं तो, उनके बीच का व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगता है, उसे सरकारी जॉब मिल जाये तो, वह स्वयं को और श्रेष्ठ मानते हुए जाति और समूह से ही स्वयं को अलग कर लेता है। सवर्णों में भी किसी पर ज्यादा जमीन है तो, वह स्वयं को अन्य से श्रेष्ठ ही समझता है, किसी के बच्चे पढ़-लिख कर स्थापित हो गये हों तो, वह इस बिंदु पर ही स्वयं को श्रेष्ठ समझता है।
 


इस्लाम में भी तमाम तरह की श्रेष्ठतायें हैं, वहां भी एक-दूसरे की मस्जिदों में जाने की पाबंदी है। ईसाइयों और यहूदियों में भी ऊंच-नीच है। ऊंच-नीच किसी खास देश, समाज, धर्म, जाति, लिंग, रंग और क्षेत्र की समस्या नहीं है, यह विकृति है, जो हर क्षेत्र में हर स्तर पर समान मात्रा में मौजूद है। विकृति कहना भी उचित नहीं होगा। संभवतः श्रेष्ठता मानवीय स्वभाव ही है, जिसे मानव किसी न किसी रूप में स्वयं में खोजता रहता है और उसके मिलते ही स्वयं ही आनंदित हो लेता है।
 
वैज्ञानिक युग में जाति और धर्म होने ही नहीं चाहिए। हालाँकि समस्या सिर्फ धार्मिक और जातिगत नहीं है, फिर भी वाहनों के रजिस्ट्रेशन की तरह ही मनुष्यों के रजिस्ट्रेशन होने चाहिए और नंबर ही सबकी पहचान होना चाहिए लेकिन, जब तक व्यवस्था नहीं बदली जा रही तब तक ऊंच-नीच की समस्या को लेकर सिर्फ हिंदुओं की जाति व्यवस्था की आलोचना और निंदा बंद होना चाहिए।
 
-बीपी गौतम

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