समाज में बदलाव तो होना चाहिए पर जैसा बदलाव हो रहा है वह चिंताजनक है

By विजय कुमार | Publish Date: Mar 11 2019 5:24PM
समाज में बदलाव तो होना चाहिए पर जैसा बदलाव हो रहा है वह चिंताजनक है
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बातचीत के क्रम में समाज में हो रहे परिवर्तन की चर्चा होने लगी। मैं 25 साल पहले उसके विवाह में गया था। उसने बताया कि उसकी शादी में 10,000 रुपए नकद आये थे और लगभग इतने का ही सामान।

कहते हैं कि परिवर्तन ही जीवन है। यदि देश, समाज और आसपास के वातावरण में परिवर्तन न हो, तो व्यक्ति बहुत शीघ्र ही बोर हो जाएगा। हर दिन एक ही चीज खाना संभव नहीं है, भले ही वह खीर-पूड़ी या रसगुल्ले ही क्यों न हों। हर समय एक ही रंग-रूप के वस्त्र पहनने वाले को भी अजीब निगाहों से देखा जाता है। पर परिवर्तन का अर्थ क्या केवल इतना ही है ?
 
परिवर्तन अच्छा भी हो सकता है और खराब भी। एक पीढ़ी के अंतराल में वातावरण कैसा बदला है, इसका अनुभव मुझे कुछ दिन पूर्व अपने एक घनिष्ठ मित्र से मिलने पर हुआ। उसका छोटा-सा कारोबार है। दो बेटियां, एक बेटा; पत्नी और पिताजी। मां का कुछ साल पूर्व देहांत हो गया था। उसके बाद बच्चों के भविष्य को देखते हुए वह अपना गांव छोड़कर दिल्ली आ गया। गांव का बड़ा मकान और दिल्ली में केवल तीन कमरों का फ्लैट; पर दिल्ली तो दिल्ली ही है। 
मिलने पर चर्चा होने लगी। उसकी बड़ी बेटी एम.ए. और दूसरी बी.ए. कर रही है। वह बड़ी बेटी के विवाह के लिए चिंतित था। हर जगह कितना नकद, कितना सामान और बारात की कैसी खातिरदारी जैसे प्रश्नों पर आकर गाड़ी अटक जाती थी। वह मुझसे भी इस बारे में कुछ सहायता चाहता था कि कोई अच्छा परिवार हो, जहां कुछ कम पैसे में बात बन जाये।
 
बातचीत के क्रम में समाज में हो रहे परिवर्तन की चर्चा होने लगी। मैं 25 साल पहले उसके विवाह में गया था। उसने बताया कि उसकी शादी में 10,000 रुपए नकद आये थे और लगभग इतने का ही सामान। विवाह में कन्या पक्ष के लगभग तीस हजार रु. खर्च हुए थे; पर आज जहां भी वह अपनी बेटी की शादी की बात चलाता है, वहां कम से कम दो लाख नकद, एक लाख का सामान और एक-डेढ़ लाख बारात की खातिरदारी पर खर्च करने की बात कही जाती है। अर्थात् एक बेटी के हाथ पीले करने के लिए पांच लाख रु. की आवश्यकता है। इसी व्यवस्था के लिए वह परेशान था। उसके पास दो-ढाई लाख रु. तो था; पर इतने में क्या हो सकता था। इसी चिंता में उसके बाल उड़ रहे थे। वह समाज में हो रहे इस परिवर्तन को कोस रहा था।


 
मेरा दिमाग घूमने लगा। क्या समाज में परिवर्तन केवल गलत दिशा में ही हो रहे हैं ? आसपास देखा, तो लगा कि ऐसा तो नहीं है। अनेक अच्छे परिवर्तन भी हुए हैं। पहले दसवीं या बारहवीं के बाद लड़कियों को प्रायः घर बैठा लिया जाता था। तर्क यह होता था कि हमें क्या इससे नौकरी करवानी है; पर अब लड़कियां हर क्षेत्र में अगली पंक्ति में दिखायी दे रही हैं। प्रायः मैरिट में वे ही लड़कों से आगे नजर आती हैं। यह परिवर्तन कोई कम नहीं है। 
 
चिंतन का क्रम कुछ और आगे बढ़ा। मैंने अपने और निकट संबंधियों के परिवारों पर नजर डाली। कहीं भी चार से कम बच्चे नहीं हैं; पर उसके बाद की पीढ़ी पर निगाह डालते ही ध्यान में आया कि यह संख्या कहीं भी दो से अधिक नहीं है। और सोचने पर ध्यान में आया कि हिन्दुओं के साथ-साथ मुस्लिम समाज में भी इस क्षेत्र में कुछ बदल हो रही है। उनकी पुरानी पीढ़ी जहां आठ-दस बच्चे पैदा करती थी, आज का मुसलमान चार-पांच पर आ गया है। वे भी अब बच्चों को पढ़ाने और साफ-सफाई पर ध्यान देने लगे हैं। पहले वे बच्चों को मदरसे में चार-छह साल पढ़ाकर ही संतोष कर लेते थे, अब समर्थ होने पर वे उन्हें अच्छे विद्यालयों में भेजने लगे हैं। यद्यपि मुस्लिम लड़कियां आज भी वहां बहुत कम दिखायी देती हैं; पर मुस्लिम बस्ती में स्थित विद्यालयों में वे भी पर्याप्त आने लगी हैं। इसी प्रकार समाज के निर्धन वर्ग में भी जागरूकता आयी है। वे अपना पेट काटकर भी बच्चों को अच्छे विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं।


जहां अनेक सार्थक परिवर्तन समाज में प्रत्यक्ष दिखायी दे रहे हैं, वहां यह भी सच है कि दिखावे और आडम्बर में बहुत वृद्धि हुई है। महंगे निमन्त्रण पत्र, उनके साथ मिठाई या उपहार और शादी-विवाह में खाने के 25-30 व्यंजन होना सामान्य सी बात है। विवाह, जन्मदिन या वर्षगांठ संबंधी छोटे-छोटे घरेलू कार्यक्रम भी होटलों में बड़ी टीमटाम के साथ होने लगे हैं। बच्चे जब ऐसे किसी कार्यक्रम में जाते हैं, तो वे अभिभावकों से अपने लिए भी ऐसे ही समारोह की जिद करते हैं। उपहार के पीछे की भावना के बदले उसके मूल्य का महत्व अब अधिक हो गया है। मैंने कई लोगों से बात की, अधिकांश का विचार था कि गत बीस साल में शिक्षा के अंग्रेजीकरण, दो नंबर का पैसा और दूरदर्शन का बढ़ता प्रभाव इसका मुख्य कारण हैं।  
 
क्या कोई ऐसी विधि नहीं है कि हमें इस अंग्रेजीकरण, सम्पन्नता और दूरदर्शनी वातावरण के लाभ तो मिलें; पर हानियां नहीं। समाजशास्त्रियों का मत है कि परिवार, और परिवार में भी मां की भूमिका इस दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को कैसा वातावरण देकर जाना चाहेंगे। अभी तो मेरे पास इन प्रश्नों का कोई ठीक उत्तर नहीं है और मैं अपने उस मित्र की चिंताओं में शामिल होकर परिवर्तन की मार झेलने को विवश हो गया हूं।
 
-विजय कुमार

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