देशभक्ति की इस उमड़ी हुई भावना को अब सही दिशा देने की जरूरत है

Independence day
ANI
अशोक मधुप । Aug 16, 2022 3:56PM
इस देश भक्ति की भावना की शुरुआत देश में कोरोना शुरू होने के समय से प्रारंभ हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर हमने कोरोना वॉरियर के सम्मान में थाली, चिमटे, घंटे और घड़ियाल बजाए। उन पर फूलों की वर्षा की। उन्हें जगह−जगह सम्मानित किया।

भारतीयों की देशभक्ति की भावना पूरे उफान पर है। देशभक्ति पूरी तरह नजर आ रही है। सब जगह नजर आ रही है। ऐसा होना बहुत अच्छा है। इससे हमारी एकजुटता, देश की एकता और अखंडता झलक रही है। विरोधियों के कान खड़े हो रहे हैं। उन्हें खतरा लगने लगा है किंतु जरूरत इसे अभी सही दिशा और देने की है। ये भावना, देशभक्ति का जज्बा यदि सही दिशा की ओर मुड़ जाए तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि देश दुनिया का सिरमौर बन जाएगा। चीन हो या अमेरिका हमें धमकाने की सोच भी नहीं सकेगा। हमला करने की बात तो संभव ही नहीं होगी। चीन या अन्य कोई देश हमारी और आंख उठाकर देखने की भी  हिम्मत नहीं करेगा।

इस देश भक्ति की भावना की शुरुआत देश में कोरोना शुरू होने के समय से प्रारंभ हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर हमने कोरोना वॉरियर के सम्मान में थाली, चिमटे, घंटे और घड़ियाल बजाए। उन पर फूलों की वर्षा की। उन्हें जगह−जगह सम्मानित किया। कुछ राजनैतिक विरोधियों और वामपंथियों ने इसका मजाक उड़ाया, किंतु उनकी आवाज कोई प्रभाव नहीं छोड़ सकी। हाल में आमिर खान की फिल्म 'लाल सिंह चड्ढा' रिलीज होनी थी। इसके रिलीज होने से पहले ही देश में फिल्म का जोर−शोर से विरोध शुरू हो गया। फिल्म रिलीज हुई। इसके बॉयकॉट के विरोध का असर ये रहा कि बॉक्स आफिस पर बुरी तरह पिट गई। ग्राहकों ने सिनेमा हाल की ओर जाना भी गंवारा नहीं किया। इससे पहले विरोध करने वाले, फिल्म चलाने वाले सिनेमा घरों पर फिल्म चलाने के विरोध में प्रदर्शन करते थे। फिल्म देखने जाने वाले दर्शकों को रोकते थे। अबकी बार इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी। दर्शक स्वयं ही सिनेमाघरों की ओर नहीं गए। इसी तरह विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' के साथ भी हुआ। आने से पहले ही इसके पक्ष में प्रचार शुरू हो गया। हालत यह हुई कि जब हमने इस फिल्म के पहली रात में टिकट बुक किए तब तक चार टिकट बुक हुए थे। अगले दिन दोपहर में जब हम फिल्म देखने गए, सिनेमा हाल की सारी सीट भरी थीं। इसके समर्थन का असर यह हुआ कि जो फिल्म नहीं देखते थे, वे भी देखने गए। परिणाम स्वरूप फिल्म ने मोटा धन कमाया।

इसे भी पढ़ें: सिर्फ तिरंगा फहराना काफी नहीं, अंग्रेजी भाषा और संस्कृति की गुलामी भी छोड़नी होगी

अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजादी के अमृत महोत्सव पर जनता से घर−घर तिरंगा फहराने का आह्वान किया। तिरंगा यात्रा निकालने की अपील की। इस बार विरोध के लिए विरोध करने वाले कसमसा कर रह गए। कुछ भी नहीं कर सके। उन्होंने भी अपने घरों पर तिरंगा फहराया। तिरंगा यात्रा में शामिल हुए। घरों पर तिरंगा फहराने के प्रति जनता में भारी जनून नजर आया। अधिकांश घरों पर तिरंगा लहराया  गया। स्कूल, काँलेज ही नहीं मदरसों में भी तिरंगा फहराया गया। हिंदू ही नहीं मुस्लिम और सिख भी तिरंगा यात्रा में जोश के साथ शामिल हुए। जिस जम्मू-कश्मीर राज्य में तिरंगा फहराने की कल्पना भी किसी ने नहीं की थी, वहां भी तिरंगा फहराया गया। तिरंगा यात्रांए निकलीं। पाकिस्तान समर्थक फरार चल रहे एक आतंकवादी के पिता ने भी अपने इलाके में तिरंगा यात्रा निकाली।

जनता में इस समय जो देशभक्ति की भावना उमड़ी हुई है, अब इसे सही दिशा देने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त को आह्वान किया कि हमें आत्मनिर्भर बनना है। हम कब तक एनर्जी सेक्टर में किसी और पर निर्भर रहेंगे। सोलर का क्षेत्र, विंड एनर्जी का क्षेत्र, मिशन हाइड्रोजन, बायो फ्यूल की कोशिश, इलेक्ट्रिक व्हीकल पर जाने की बात हो, हमें आत्मनिर्भर बनकर इन व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाना होगा। प्रधानमंत्री का सीधा आह्वान है कि स्वदेशी को बढ़ावा दिया जाए। सब कुछ अपने यहां पैदा हो, किंतु हालात इसके विपरीत हैं। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय से चीन भारत को हड़पने की काशिश में है। पिछले लगभग दो साल से उनकी सेना सीमा पर हमें बरबाद करने के लिए तनी खड़ी है। हमारे बड़े दुश्मन पाकिस्तान से मिलकर वह हमें घेरने में लगा है। सीमाओं पर उसकी ओर से युद्ध की बड़ी तैयारी चल रही हैं। चीन के इरादे देख दो साल पहले चीन और चीन के सामान के बॉयकॉट का नारा लगा। देशवासियों में कुछ चेतना आई। बॉयकॉट शुरू हुआ। पर लगता है कि वह सोशल मीडिया तक ही सीमित रहा। सच्चाई कुछ और है। अलग है। भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों से यह साफ़ तौर पर ज़ाहिर होता है कि भारत की चीन के आयात पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021-22 में दोनों देशों के बीच क़रीब 115 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। ये पिछले साल की तुलना में बढ़ा है। पिछले साल यह 86 अरब डॉलर था। यह आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि हम  दिखावे के लिए बॉयकॉट करने की बात करते हैं। जबकि चीन का बना सामान हम धड़ल्ले से खरीद रहे हैं। चीन का बना सामान खरीद कर क्या हम अपने सबसे बड़े दुश्मन के हाथ मजबूत नहीं कर रहे? क्या हम दुशमन की शक्ति नहीं बढ़ा रहे?

इसे भी पढ़ें: स्वतंत्रता दिवस पर विशेषः कैसी आजादी के पक्षधर हैं हम?

1965 में पाकिस्तान से युद्ध के समय अमेरिका ने कहा था कि भारत युद्ध बन्द करे नहीं तो हम भारत को गेंहू भेजना बंद कर देंगे। उस समय हमारे यहां गेंहू का उत्पादन बहुत कम था। देश की जरूरत के लिए अमेरिका हमें लाल (घटिया) गेंहू बेचता था। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने उस समय देश को अमेरिका की इस चेतावनी से अवगत कराते हुए जय जवान-जय किसान का नारा दिया। किसानों से अपना उत्पादन बढ़ाने को कहा था। उन्होंने यह भी घोषणा की थी कि भोजन की कमी को देखते हुए देशवासी एक दिन का उपवास रखें। उस समय के जिंदा लोग आज भी उपवास रखते हैं। उनके आह्वान का परिणाम यह हुआ कि हमारा देश अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर ही नहीं हुआ, आज उसका निर्यात भी करने लगा है। 

आज जरूरत है चीन को सबक सिखाने की। चीन को सबक सिखाने के लिए क्या हम उसके उत्पाद का पूरी तरह बॉयकॉट नहीं कर सकते? क्या हम चीन के सस्ते माल की जगह देश का ही बना माल लेकर काम नहीं चला सकते? क्या हम यह तय नहीं कर सकतें कि हम एक समय भूखे रह लेंगे, पर चीन का बना सामान नहीं खरीदेंगे? जिस दिन हमने चीन का बना सामान नहीं खरीदने का संकल्प ले लिया। संकल्प को एक साल पूरा कर लिया तो चीन के होश ठिकाने आ जाएंगे। उसका व्यापार तबाह हो जाएगा। भारत से लड़ने की बात वह कभी आगे सोच भी नहीं पाएगा।

-अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

अन्य न्यूज़