5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का सपना तो अच्छा है पर भीड़तंत्र के रहते यह कैसे मुमकिन है?

By दीपक कुमार त्यागी | Publish Date: Jul 13 2019 12:32PM
5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का सपना तो अच्छा है पर भीड़तंत्र के रहते यह कैसे मुमकिन है?
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आजकल देश के हालातों के चलते अर्थव्यवस्था के जानकार "फाइव ट्रिलियन डॉलर इकनॉमी" के लक्ष्य के बारे में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलूओं को उठा रहे हैं। जिन पर विचार करके भविष्य में केंद्र की मोदी सरकार को इस लक्ष्य पर काम करने में आसानी होगी।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से लेकर समस्त मोदी सरकार का मंत्रिमंडल देश को आने वाले पांच वर्षों में "5 लाख करोड़ डॉलर" की अर्थव्यवस्था बनाने की बात कर रहे हैं। जिस प्रकार से बजट भाषण देते हुए केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कई बार कहा कि देश को अगले पांच वर्ष में "फाइव ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी" की अर्थव्यवस्था बनाना मोदी सरकार का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। यह सभी देशवासियों और देश की अर्थव्यवस्था के उज्ज्वल भविष्य के लिए एक बहुत अच्छा संदेश है। इसके ठीक अगले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए भी "फाइव ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी" लक्ष्य को अगले पांच वर्ष में हासिल करने के उद्देश्य के बारे में सभी को अवगत कराया था। लेकिन विचारणीय बात यह है कि इस तरह का लक्ष्य देश में अच्छे शांतिपूर्ण अमनचैन युक्त वातावरण में ही संभव है, तब ही सुचारू रूप से देश के विकास रथ का पहिया चल सकता है। उस हालात में ही मोदी सरकार का यह सपना पूरा हो सकता है, मोदी चाहते हैं जिस तरह से अमेरिका, चीन आदि कई देश काफी कम समय में इस लक्ष्य को हासिल कर चुके हैं, ठीक उसी प्रकार से भारत भी इस "फाइव ट्रिलियन" के लक्ष्य को बहुत कम समय में हासिल कर ले।


आजकल प्रधानमंत्री मोदी ऐसे नये भारत बनाने की बात कर रहे हैं जिसमें बहुत तेजी से आर्थिक ग्रोथ हो, यह देश के लिए बहुत अच्छी बात है। लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उद्योगों व उद्योगपतियों को देश में अनुकूल वातावरण देने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी केंद्र व प्रदेश सरकारों की है। इस मसले को लेकर वाराणसी में प्रधानमंत्री जी ने तो यहाँ तक कह दिया कि जो लोग भारतीय अर्थव्यवस्था को "फाइव ट्रिलियन डॉलर" की होने पर सवाल खड़ा कर रहे हैं, वे निराशावादी हैं। लेकिन हम सभी को यह भी समझना चाहिए कि हमारे देश में लोकत्रांतिक व्यवस्था लागू है और लोकतंत्र में हर व्यक्ति अपनी बात, विचार रखने और सवाल करने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र है, वैसे भी किसी व्यक्ति व व्यवस्था पर सवाल उठाने का यह मतलब नहीं होता है कि वह ठीक नहीं है, सरकार को समझना होगा कि सवाल के बाद ही समय से समस्या का निदान व उचित समाधान निकलता है, जिसके बाद अच्छे परिणाम देकर सभी लोगों को संतुष्ट किया जाता है।
 
आजकल देश के हालातों के चलते अर्थव्यवस्था के जानकार "फाइव ट्रिलियन डॉलर इकनॉमी" के लक्ष्य के बारे में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलूओं को उठा रहे हैं। जिन पर विचार करके भविष्य में केंद्र की मोदी सरकार को इस लक्ष्य पर काम करने में आसानी होगी। अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत पिछले कुछ दशकों से जिस तेजी के साथ आर्थिक तरक्की कर रहा है उसके चलते यह लक्ष्य जल्द हासिल किया जाना संभव है। लेकिन उसके लिए मोदी सरकार को कारगर आर्थिक रणनीति व देश के माहौल को उद्योगों व उद्योगपतियों के काम करने के लिए पूर्ण रूप से सुरक्षित व सरल बनाना होगा। आज सरकार को देश के माहौल को भीड़तंत्र से मुक्त करके और अधिक सुरक्षित करके सकारात्मक ढंग से सभी के लिए काम करने के योग्य बनाना होगा, जिसमें सभी लोग जाति-धर्म से ऊपर उठकर नियम, कायदे और कानून का सम्मान करते हों। क्योंकि जब भीड़तंत्र पर अंकुश लगेगा तो देश में अपना धन लगाने वाले बिना अपनी व अपने जानमाल की सुरक्षा की चिंता किये बिना, देश की तरक्की के लिए 24×7 घंटे काम करेंगे और उसके चलते ही भारत विश्व में आर्थिक विकास के नये आयाम स्थापित करेगा। हमको व हमारी सरकार को यह ध्यान रखना होगा कि भीड़तंत्र के इस माहौल में "फाइव ट्रिलियन इकनॉमी" के सपने को हकीकत में बदलना बहुत कठिन है। इस पर तत्काल सख्ती से रोक लगाना आवश्यक है। तब ही देश वर्ष 2024-2025 तक "फाइव ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी" के क्लब में शामिल हो सकता है। मेरा मानना है कि हमारे देश के लोग बहुत परिश्रमी हैं उनमें इतनी शक्ति व दिमाग है कि वो देश को जल्द ही "फाइव ट्रिलियन डॉलर" की अर्थव्यवस्था वाला देश बना सकते हैं, लेकिन आज उसके रास्ते में सबसे बड़ी अड़चन हम स्वयं ही हैं हमारा भीडतंत्र वाला गलत व्यवहार है क्योंकि आज जिधर देखो लोगों में कानून तोड़ना फैशन बनता जा रहा है, जो देशहित व समाजहित के लिए ठीक नहीं है आज के हालातों पर मैं कहना चाहता हूँ कि
"वतन को खून पसीने से सींच कर रोशन किया है सबने,
इसको अपने स्वार्थ के लिए ऐसे ना उजाड़ों यारों।"
 


सुप्रीम कोर्ट का इस भीड़तंत्र की गम्भीर समस्या पर चिंता व्यक्त करना सरकार के लिए भविष्य में भीड़तंत्र पर काबू पाने का कारगर हथियार साबित हो सकता है। जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कोई भी नागरिक कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता, लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाजत नहीं दी जा सकती, अब राज्य व केंद्र सरकारों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह आपस में तालमेल करके देश में कानून व्यवस्था बनाए रखें और भीड़तंत्र के दोषियों पर सख्त कार्रवाई को लेकर किसी प्रकार का जाति-धर्म के नाम पर भेदभाव का नामोनिशान न रखें।''

"इस चमन को अपने हाथों से यूँ ना उजाड़ो दोस्तों,
भीड़तंत्र लागू करके नया कानून ना बनाओ दोस्तों।"
 
आज जब हम सुबह उठते हैं तो समाचार पत्र व न्यूज चैनल हमको सबसे पहले खबर सुनाते हैं कि आपसी विवाद को उन्मादी भीड़ ने धार्मिक रंग देकर दिल्ली में मंदिर में तोडफ़ोड़ कर दी है, जय श्री राम का नारा ना लगाने पर उन्मादी भीड़ ने युवक की पीट-पीट कर हत्या कर दी है, गौरक्षा के लिए उन्मादी भीड़ ने कानून हाथ में लेकर गाय के तस्करों की पीट कर हत्या कर दी, आरक्षण ना मिलने पर उन्मादी भीड़ ने राजस्थान में जमकर सार्वजनिक व निजी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया है व भीड़ हफ्तों तक सड़कों व रेल की पटरियों पर कब्जा जमाकर बैठ गयी, आरक्षण की मांग को लेकर हरियाणा में उन्मादी भीड़ ने अपने हाथों से ही अपने देश को जमकर आग लगायी गयी, आरक्षण के लिए भीड़ ने गुजरात में जमकर तोडफ़ोड़ की, पिछले कुछ वर्षों से देश में आये दिन उन्मादी भीड़ सड़क बवाल मचाती है। आज देश में हर तरफ जाति व धर्मों के ठेकेदारों के चलते अलग-अलग जाति व धर्म के चंद लोग बहुत खतरे में हैं। ये ठेकेदार समय-समय पर भीड़ को कानून हाथ में लेने के लिए उकसाते हैं और भोलीभाली जनता को मूर्ख बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं, इन तथाकथित ठेकेदारों को ना तो अपने समाज की चिंता है ना ही देश की जरा भी चिंता है। आज सरकार को सोचना होगा कि आखिर पिछले कुछ वर्षों में ऐसा क्या हो गया जो देश में इस तरह का भीड़तंत्र का माहौल बन गया। इसके लिए जिम्मेदार लोगों को चिन्हित करके उनको कठोर सजा देनी होगी। वैसे इस माहौल के लिए कहीं ना कहीं शासन-प्रशासन में बैठे लोगों का ढुलमुल रवैया भी जिम्मेदार है और देश की न्याय प्रणाली से बहुत ही देर से मिलने वाला न्याय जिम्मेदार है।
 
-दीपक कुमार त्यागी
(स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार)
 

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