राहुल की नागरिकता पर सवाल कितना जायज?

  •  अभिनय आकाश
  •  मई 1, 2019   17:42
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राहुल की नागरिकता पर सवाल कितना जायज?
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2003 में ब्रिटेन में एक कंपनी बनाई गई थी बैकॉप्स लिमिटेड । भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का दावा है कि राहुल गांधी इसके निदेशक मंडल में थे। कंपनी के आवेदन में राहुल की नागरिकता ब्रिटिश बताई गयी है। 2009 के डिजाल्यूशन आवेदन में भी राहुल को ब्रिटिश बताया गया था।

14-15 अगस्त 1947 की आधी रात को दुनिया सो रही थी तब हिन्दुस्तान अपनी नियति से मिलन कर रहा था। कांग्रेस आज़ादी की लड़ाई का दूसरा नाम बन चुकी थी। उस कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे पंडित जवाहर लाल नेहरू। आज़ादी के उस दौर के पांच साल के भीतर कांग्रेस का सत्ता से साक्षात्कार हुआ। लेकिन नियति से हाथ मिलाने के 72 साल बाद आज उसी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष की नागरिकता चुनावी बाजार में संदिग्ध बताई जा रही है। भाई पर उठते सवालों से झुंझलाई बहन प्रियंका को चित्रकूट से अमेठी तक बताना पड़ रहा है कि मेरा भाई हिंदुस्तानी है। राहुल गांधी की नागरिकता पर सवाल नए सिरे से तब खड़ा हो गया जब गृह मंत्रालय ने उन्हें नोटिस भेजकर 15 दिन में जवाब मांगा। गृह मंत्रालय ने भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की 27 सितंबर 2017 को लिखी चीट्ठी पर 19 महीने बाद बीच चुनाव में जागकर राहुल गांधी को यह नोटिस भेजा है।

क्या था स्वामी की चीट्ठी में ?

2003 में ब्रिटेन में एक कंपनी बनाई गई थी बैकॉप्स लिमिटेड । भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का दावा है कि राहुल गांधी इसके निदेशक मंडल में थे। कंपनी के आवेदन में राहुल की नागरिकता ब्रिटिश बताई गयी है। 2009 के डिजाल्यूशन आवेदन में भी राहुल को ब्रिटिश बताया गया था। हालांकि कांग्रेस ने उसी कंपनी का दस्तावेज पेश करते हुए बताया कि उनमें राहुल गांधी की भारतीय नागरिकता का जिक्र है। 

पहले भी लगे आरोप

अमेठी में राहुल की उम्मीदवारी के दौरान भी निर्दलीय उम्मीदवार ने आपत्ति जताई थी और दावा किया था कि राहुल ब्रिटिश नागरिक हैं। चुनाव आयोग ने राहुल के उम्मीदवारी रदद् के दावे को खारिज़ कर दिया था। अगर थोड़ा और पहले जाए तो सुप्रीम कोर्ट ने साल 2015 में राहुल की नागरिता को लेकर डाले गए याचिका को खारिज कर दिया था। मार्च 2016 में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने लोकसभा की आचार समिति को शिकायत की। समिति के सचिवालय ने राहुल गांधी को नोटिस जारी किया। राहुल ने स्वामी को अपना आरोप साबित करने की चुनौती दी। लेकिन फिर आचार समिति की कोई बैठक ही नहीं हुई। बाद में इस मामले को लेकर स्वामी गृह मंत्रालय गए। लेकिन सवाल सिर्फ राहुल की नागरिकता पर नहीं बल्कि उनकी डिग्री पर भी उठ रहे हैं। राहुल ने अपनी चुनावी हलफनामें में कहा है कि उन्होंने टिन्रटी कॉलेज कैंब्रिज से 1995 में डिवलपमेंट स्टीज में एमफिल किया है। राहुल गांधी की इस डिग्री पर भाजपा नेता अरुण जेटली सवाल उठाया है। जेटली ने ब्लॉग लिखकर कहा एक दिन फोकस भाजपा उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता पर रहता है। इस बात को पूरी तरह भूलाकर कि राहुल गांधी की शैक्षणिक साख का पब्लिक ऑडिट हो तो शायद बहुत सारे सवालों का जवाब न मिले। आखिर मास्टर डिग्री के बिना उन्होंने एमफिल कर ली है।

कौन हैं स्वामी

अंग्रेजी में ऐसे लोगों को ‘मैवेरिक’ कहते हैं। जिन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता, लेकिन व्यवस्था में इनका खास महत्व होता है। सुब्रमण्यम स्वामी भारत की राजनीति में ऐसा ही व्यक्तित्व हैं। भारत की न्यायप्रणाली को लोग जितना भी कोस लें लेकिन समय-समय पर उन्होंने साबित किया है की ऐसी मंद पड़ी व्यवस्था में भ्रष्टाचार पर लगाम कैसे लगायी जा सकती है। आम लोगों को इस बात की हैरानी होती है कि आखिर उन्हें इतनी गोपनीय जानकारियां मिलती कैसे हैं और उनमें ऐसा क्या है कि वह गांधी परिवार के खिलाफ मोर्चा बुलंद करने से भी नहीं कतराते हैं। टी-20 क्रिकेट के ज़माने में भी टेस्ट के मंझे हुए खिलाड़ी जैसा टेम्परामेंट रखने वाले स्वामी की चिट्टी के वजह से ही देश के सबसे बड़े राजनीतिक घराने के वारिश राहुल गांधी की नागरिकता गली कूचों में चर्चा का सबब बनी है।

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हमेशा से अलग-अलग ख़ुलासा करने की वजह से स्वामी को गणित और आर्थिक मामलों के साथ-साथ कानून का भी जानकार माना जाता है। कई लोग स्वामी को वकील समझने की भूल कर जाते हैं। लेकिन उन्होंने कानून की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली है बल्कि मशहूर वकीलों के नोट्स पढ़कर कानून की बारिकियों को सीखा है। वे कभी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी  के करीबी हुआ करते थे, तो समय-समय पर भाजपा के भी खास रहे हैं। हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी ने हमेशा उनसे दूरी रखने की कोशिश की, फिर भी भाजपा के कुछ  बड़े नेताओं का उनसे जुड़ाव रहा। सुब्रमण्यम स्वामी का सपना अपने पिता की तरह गणितज्ञ बनने का था। गौरतलब है कि उनके पिता सीताराम  सुब्रमण्यम प्रसिद्ध गणितज्ञ थे। सुब्रमण्यम स्वामी ने हिंदू कॉलेज से गणित में स्नातक की डिग्री ली। इसके बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए भारतीय  सांख्यिकी इंस्टीट्यूट कोलकाता चले गए। सुब्रमण्यम स्वामी ने महज 24  साल की उम्र में ही हॉवर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल कर ली थी। इसके बाद  27  साल में उन्होंने हॉर्वर्ड में ही गणित की टींचिंग शुरू कर दी थी। बाद में अमर्त्य सेन ने 1968 में स्वामी को दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया और स्वामी दिल्ली आ गए। साल 1969 में वे आईआईटी दिल्ली से जुड़े।

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भारत के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में से एक इंदिरा गाँधी ने 1970 के बजट के दौरान अवास्तविक विचारों वाला सांता क्लॉस करार दिया था। स्वामी ने इन टिप्पणियों को दरकिनार करते हुए अपने कार्य को जारी रखा और आपातकाल घोषित होने पर उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और इंदिरा गांधी को ललकारते हुए संसद में प्रवेश कर गए थे। जिसके बाद इंद्रा समर्थकों ने स्वामी को सीआईए एजेंट का दर्ज़ा दे दिया था। हालांकि भाजपा से सुब्रमण्यम स्वामी का रिश्ता बनता बिगड़ता रहा है और इस रिश्ते के इतिहास पर नज़र डालें तो 1999 में भारतीय जनता पार्टी की अटल बिहारी वाजपेयी  सरकार को खतरे में डालने के काम को भी स्वामी अंजाम दे चुके हैं।  जब गठबंधन सरकार की अहम सहयोगी जयललिता ने स्वामी को वित्त मंत्री बनाने की जिद पकड़ ली थी तब स्वामी ने भी सरकार गिराने की योजना पर काम करना शुरू करते हुए  जयललिता और सोनिया गांधी को करीब लाने के लिए चाय-पार्टी आयोजित। हालांकि वे सरकार गिराने की कोशिश में सफल नहीं हो पाए। 2014 के चुनावों से ठीक पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने  स्वामी को वापस भाजपा में शामिल करा लिया। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा की आने वाले समय में तरह-तरह के खुलासे करने में माहिर स्वामी के तरकश से एक-एक कर निकलते तीर किन-किन लोगों को छलनी करते हैं। लेकिन लोकसभा चुनाव के बीच अचानक से बार-बार राहुल गांधी की नागरिकता पर सवाल उठते शोर के बीच कहीं देश के प्रमुख मुद्दे गौण न हो जाए!

-अभिनय आकाश







थोड़ा दूर भले रह गया चारमीनार, पर तेलंगाना में सत्ता के लक्ष्य के करीब पहुँची भाजपा

  •  नीरज कुमार दुबे
  •  दिसंबर 4, 2020   18:43
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थोड़ा दूर भले रह गया चारमीनार, पर तेलंगाना में सत्ता के लक्ष्य के करीब पहुँची भाजपा
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जो लोग हैदराबाद के चुनावों में लक्ष्य हासिल नहीं कर पाने के लिए भाजपा का मजाक उड़ा रहे हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि भगवा पार्टी 2016 के चुनाव में सिर्फ चार सीटों पर जीत दर्ज कर सकी थी और वह चुनाव उसने तेलुगू देशम पार्टी (तेदपा) के साथ गठबंधन कर लड़ा था।

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम (जीएचएमसी) चुनाव के तहत भाजपा ने अब तक का शानदार प्रदर्शन किया है। हालांकि हैदराबाद में अपना मेयर बनाने का भाजपा का सपना पूरा नहीं हो सका लेकिन पार्टी ने तेलंगाना में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज करा दी है। हैदराबाद निगम चुनावों में भले टीआरएस एक बार फिर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी हो लेकिन उसकी सीटों की जो संख्या कम हुई है वह उसके लिए खतरे की घंटी है। पहले विधानसभा चुनावों में सीटें कम होना, फिर लोकसभा चुनावों में सीटें कम होना और अब ग्रेटर हैदराबाद निगम चुनावों में टीआरएस की सीटें कम होना केसीआर के लिए बड़ी चेतावनी है। मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव को यह समझ आ जाना चाहिए कि भाजपा तेजी से उभरती ताकत है और टीआरएस को सीटों का जो भी नुकसान हो रहा है वह भाजपा के लिए फायदा बनता जा रहा है। विभिन्न राज्यों में सीधी लड़ाई में कांग्रेस को चित्त करने के बाद अब भाजपा खासतौर पर दक्षिणी राज्यों में अपना आधार बढ़ाने के मिशन पर है और जिस तरह से क्षेत्रीय दलों से टक्कर ले रही है वह परिवार आधारित राजनीतिक दलों के लिए तो खुली चेतावनी ही है।

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भाजपा ने निगम चुनावों को सिर्फ स्थानीय चुनाव नहीं समझते हुए इसे पूरी गंभीरता के साथ लड़ा और जिस तरह से पार्टी का शीर्ष नेतृत्व प्रचार में जुटा उससे आगे के संकेत साफ मिल गये हैं। इन चुनावों के माध्यम से भाजपा ने उस आरोप की भी हवा निकाल दी है जिसके तहत कहा जाता है कि ओवैसी के साथ उसकी सांठगांठ है ताकि विभिन्न राज्यों में मुस्लिम मतों का बिखराव हो सके। भाजपा ने ओवैसी को उनके गढ़ में चुनौती दी और काफी नुकसान पहुँचाया। जो लोग हैदराबाद के चुनावों में लक्ष्य हासिल नहीं कर पाने के लिए भाजपा का मजाक उड़ा रहे हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि भगवा पार्टी 2016 के चुनाव में सिर्फ चार सीटों पर जीत दर्ज कर सकी थी और वह चुनाव उसने तेलुगू देशम पार्टी (तेदपा) के साथ गठबंधन कर लड़ा था। लेकिन अपने यहां एक प्रचलन है कि अपनी सीटें कम होने का राजनीतिक दल उतना दुख नहीं मनाते जितना दूसरे का लक्ष्य हासिल करने से चूकने का जश्न मनाते हैं।

यह चुनाव इस मायने में भी अहम थे कि भाजपा के शानदार प्रदर्शन के लिए अन्य दल ईवीएम को 'जिम्मेदार' नहीं बता सकते क्योंकि इस चुनाव में मतपत्रों का इस्तेमाल किया गया और पोस्टल बैलेट के अधिकांश मत हर बार की तरह भाजपा के खाते में थे। भाजपा ने जिस तरह इस चुनाव को मुख्यमंत्री के कामकाज पर जनमत का रूप दे दिया था उससे निश्चित ही मुख्यमंत्री को अब सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना होगा। भाजपा इस चुनाव परिणाम से और हालिया विधानसभा उपचुनाव परिणाम के बाद से जोश में है और उसे आगे बढ़ने से रोक पाना टीआरएस के लिए नामुमकिन नहीं तो कठिन चुनौती तो जरूर बन गया है। इन चुनाव परिणामों ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि एक समय राज्य में राज करने वाली कांग्रेस अब अपना आधार पूरी तरह खो चुकी है और मुख्य विपक्षी की भूमिका में भाजपा ही आ गयी है। पहले कांग्रेस से सत्तापक्ष की भूमिका छीनने के बाद भाजपा ने धीरे-धीरे देश की सबसे पुरानी पार्टी को मुख्य विपक्षी दल की भूमिका से भी दूर कर दिया है।

अब बात जरा अन्य राज्यों में हुए चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन की कर ली जाये। महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्यों के लिए हुए चुनावों में भाजपा को निश्चित रूप से झटका लगा है और पार्टी ने अपनी कमियों को स्वीकार कर आगे बढ़ने की बात कही है। यहाँ शिवसेना की खुशी इसलिए समझ नहीं आ रही क्योंकि वह भाजपा को मात्र एक सीट मिलने पर खुशी जता रही है लेकिन खुद एक भी सीट नहीं जीत पाई इसका गम उसे नहीं दिख रहा है। महाराष्ट्र में भाजपा को लगे झटके को लेकर पार्टी नेता देवेंद्र फडणवीस ने माना है कि उनकी पार्टी महा विकास अघाडी (एमवीए) के सहयोगियों की संयुक्त ताकत का आकलन करने में असफल रही।

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वहीं अगर उत्‍तर प्रदेश की बात करें तो विधान परिषद की शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के परिणाम मिश्रित रहे। हालाँकि सत्तारुढ़ भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन कर सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में स्थानीय खंड शिक्षक क्षेत्र से समाजवादी पार्टी की जीत तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में गोरखपुर फैजाबाद खंड शिक्षक क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी की जीत से भाजपा को सचेत हो जाना चाहिए। बहरहाल, भाजपा ने इस समय जम्मू-कश्मीर में हो रहे डीडीसी चुनावों में भी पूरी ताकत झोंक रखी है देखना होगा कि वहां के मतदाता क्या फैसला करते हैं। यह चुनाव इसलिए ज्यादा महत्व रखता है क्योंकि अनुच्छेद 370 हटाये जाने और जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश का स्वरूप मिलने के बाद वहाँ पहली बार कोई चुनाव हो रहा है।

-नीरज कुमार दुबे







कानून का विरोध करने सब आ गये, बहुसंख्यक समाज की बेटियों की चिंता किसी को नहीं

  •  अजय कुमार
  •  दिसंबर 3, 2020   13:05
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कानून का विरोध करने सब आ गये, बहुसंख्यक समाज की बेटियों की चिंता किसी को नहीं
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कांग्रेस राम मंदिर बनाने, एक बार में तीन तलाक जैसी कुरीति और नागरिकता संशोधन कानून आदि सबकी मुखालफत करने लगती है। अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए कांग्रेस नेता भारत की जगह दुश्मन देशों- चीन और पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाने से भी संकोच नहीं करते हैं।

गैर भाजपाई दलों कांग्रेस-सपा-बसपा को लव जिहाद के खिलाफ योगी सरकार द्वारा बनाया गया धर्मांतरण सबंधी कानून रास नहीं आ रहा है। कांग्रेस ने अधिकृत रूप से कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन पार्टी के तमाम नेता अलग-अलग बयानबाजी करके लव जिहाद के खिलाफ योगी सरकार के कानून को गलत ठहराने में लगे हैं। उधर, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी कह रहे हैं कि धर्मांतरण कानून विधेयक विधानसभा में आयेगा तो सपा पूरी तरह विरोध करेगी, क्योंकि सपा ऐसे किसी कानून के पक्ष में नहीं है। वहीं बहुजन समाज पार्टी ने योगी सरकार से इस अध्यादेश पर पुनर्विचार करने की मांग की है। मायावती ने ट्वीट करके कहा कि लव जिहाद को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आपाधापी में लाया गया धर्म परिवर्तन अध्यादेश अनेक आशंकाओं से भरा है, जबकि देश में धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए पहले से ही कई कानून मौजूद हैं। वहीं कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम को लगता है कि लव जिहाद के खिलाफ योगी सरकार का कानून अदालतों में नहीं टिक पाएगा क्योंकि कानून में विभिन्न धर्मों के बीच विवाह को अनुमति दी गई है। चिदंबरम को न जाने ऐसा क्यों लगता है कि लव जिहाद पर कानून एक छलावा और बीजेपी की बहुसंख्यकों की राजनीति के एजेंडे का हिस्सा है, वह कहते हैं जबकि भारतीय कानून के तहत विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच विवाह की अनुमति है, यहां तक कि कुछ सरकारों द्वारा इसे प्रोत्साहित भी किया जाता है तो फिर इसे कोई रोक कैसे सकता है। उन्होंने कहा, 'कुछ राज्य सरकारों द्वारा इसके खिलाफ कानून लाने का प्रस्ताव देना असंवैधानिक होगा।’ कांग्रेस नेता को लगता है कि जबरन व छल से धर्मांतरण को ना तो खास मान्यता है और ना ही स्वीकार्यता है।

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वैसे कांग्रेस नेता चिदम्बरम ही नहीं पूरी पार्टी के साथ यही समस्या है कि वह हकीकत जानने-समझने की कोशिश ही नहीं करती है। जब बहुसंख्यकों के साथ कुछ गलत होता है तो वह आंखें फेर लेती है। खासकर मामला जब एक वर्ग से जुड़ा हो तो कांग्रेस को बहुसंख्यक समाज की भावनाएं आहत करने में जरा भी संकोच नहीं होता है। इसीलिए तो कांग्रेस अयोध्या में राम मंदिर बनाने, एक बार में तीन तलाक जैसी कुरीति और नागरिकता संशोधन कानून आदि सबकी मुखालफत करने लगती है। अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए कांग्रेस नेता भारत की जगह दुश्मन देशों- चीन और पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाने से भी संकोच नहीं करते हैं।

खैर, कांग्रेस हो या फिर सपा-बसपा सब के सब लव जिहाद के खिलाफ योगी सरकार द्वारा लाए गए कानून में खामियां निकालने में लगे हैं, लेकिन किसी को भी इस बात की चिंता नहीं हैं कि लव जिहाद का शिकार हो रहीं बहुसंख्यक समाज की बेटियों और लव जेहाद में बेटियों के फंस जाने के बाद परिवार वालों को कितना कष्ट और अपमान सहना पड़ता है। ‘लव जेहाद’ में फंसाकर बहुसंख्यक समाज की बेटियों के साथ कोई छलपूर्वक विवाह कर लेता है तो ऐसे जेहादियों को सजा क्यों नहीं मिलनी चाहिए। आखिर इसमें बुराई क्या है?

लव जिहाद के खिलाफ कानून बनते ही इस जिहाद से पीड़ित कई लड़कियां और उनके परिवार वालों के पुलिस की चौखट (थाना) पर पहुँचने के मामले सामने आने लगे हैं, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि लव जिहादियों की जड़ें कितनी गहरी हैं। अध्यादेश के प्रभावी होते ही बरेली जिले के देवरनियां थाना क्षेत्र में इसके तहत पहला मुकदमा दर्ज किया गया जिसमें एक युवक ने शादीशुदा युवती पर धर्म बदलकर निकाह करने के लिए दबाव बनाया और उसके पूरे परिवार को धमकी दी थी। देवरनियां थाने में उवैश अहमद के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और नए अध्यादेश के तहत मामला दर्ज किया गया। पुलिस के मुताबिक बरेली में शरीफ नगर गांव के रहने वाले एक किसान ने शिकायत दी कि पढ़ाई के दौरान उनकी बेटी से समय गांव के उवैश अहमद पुत्र रफीक अहमद ने उसकी बेटी से जान-पहचान कर ली थी। आरोप है कि इसके पश्चात उवैश अहमद उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर धर्म परविर्तन के लिए दवाब बना रहा है। इसका विरोध करने पर वह उन्हें और परिवार को जान से मारने की धमकी देता है।

उक्त मामले की गूंज थमी भी नहीं थी कि बरेली में ही एक बार फिर लव जिहाद का दूसरा सनसनीखेज मामला सामने आ गया। जहां ताहिर हुसैन नामक शख्स पर आरोप है कि उसने एक हिन्दू युवती का शादी के नाम पर यौन शोषण किया। युवती जब गर्भवती हो गई तो शादी से इंकार करते हुए ‘लव जिहाद' की साजिश का खुलासा करते हुए उसके पेट में लात मारकर उसका दो माह का गर्भ गिरा दिया। पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने चार लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर मुख्य आरोपी को जेल भेज दिया है। पीड़ित युवती का कहना था कि ताहिर ने अपना नाम कुणाल शर्मा बताया था। कुणाल के नाम से ही जालसाज ने अपना एक फर्जी फेसबुक अकाउंट भी बना रखा था, लेकिन बाद में शादी का दबाव बनाते समय उसने अपना नाम ताहिर हुसैन बताया।

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इसी प्रकार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर में लव जिहाद का एक मामला सामने आया है। एक महिला के पति की तहरीर पर पुलिस ने दो आरोपियों के खिलाफ लव जिहाद का मामला दर्ज कर लिया है। मामला अलग-अलग संप्रदाय से जुड़ा हुआ है। पुलिस ने इस मामले में दो आरोपियों के खिलाफ कई गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच पड़ताल शुरू कर दी है। निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि योगी सरकार ने लव जिहाद के खिलाफ कानून बनाकर बहुसंख्यक समाज को एक बड़ी राहत पहुंचाई है। दरअसल, बहुसंख्यक समाज में लड़़कियों के साथ उनके पहनावे को लेकर जोर जबर्दस्ती नहीं की जाती है, उनको पढ़ने-लिखने की पूरी छूट दी जाती है। बहुसंख्यक समाज में धर्म की आड़ में लड़कियों को नकाबपोश रहने को मजबूर नहीं किया जाता है। इसी का फायदा उठाकर कुछ लव जिहादी 14-15 से लेकर 18-20 साल तक की लड़कियों को छल-प्रपंच करके अपने प्रेम जाल में फांस लेते हैं। इस उम्र की लड़कियों के पास इतनी गम्भीरता नहीं होती है जो सच-झूठ में अंतर कर सकें। इसी के चलते वह लव जिहादियों के जाल में फंस जाती हैं, जब हकीकत सामने आती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है और लौटने के रास्ते भी आसान नहीं होते हैं। लव जिहादी पहले तो बहुसंख्यक समाज की छोटी उम्र की लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसाकर शादी कर लेते हैं, फिर उनको तलाक देकर छोड़ देते हैं। कई बार तो इन लड़कियों को खाड़ी देशों तक में बेच दिया जाता है।

उक्त मामले बताते हैं कि योगी सरकार जो कानून लाई है, वह काफी जरूरी था, सरकार यह कानून ले आई है तो उसको यह भी तय करना होगा कि कानून की आड़ में लोग अपनी पुरानी रंजिश न निभाएं। किसी को लव जिहाद के नाम पर परेशान नहीं किया जाना चाहिए। अच्छा होता कानून में यह प्रावधान भी साफ-साफ कर दिया जाता कि इसका दुरुपयोग करने वालों के साथ कैसे निपटा जाएगा। क्योंकि इससे पूर्व दहेज विरोधी कानून, एसटी/एससी एक्ट, गौरक्षा जैसे तमाम कानूनों का दुरुपयोग होते देखा जा चुका है। योगी सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि कांग्रेस-सपा और बसपा जैसे दल लव जिहाद की आड़ में उत्तर प्रदेश में अशांति नहीं पैदा कर सकें। कुल मिलाकर अगर कोई सरकार बहुसंख्यक समाज के हितों की रक्षा के लिए कोई कानून बनाती या कदम उठाती है तो उस पर राजनीति करने की बजाए विपक्ष को चिंतन करना चाहिए।

-अजय कुमार







ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव के जरिये बड़े सपने को पूरा करना चाहती है भाजपा

  •  संतोष पाठक
  •  दिसंबर 2, 2020   15:08
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ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव के जरिये बड़े सपने को पूरा करना चाहती है भाजपा
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भाजपा की लगातार जीत की वजह यही मानी जाती है कि वो हर चुनाव का एजेंडा अपने हिसाब से तय करने में कामयाब हो जाती है और विरोधी दलों को उसके पिच पर आकर ही खेलना पड़ता है। हैदराबाद में भी भाजपा को अपनी रणनीति में कई बार कामयाबी मिलती नजर आई।

देश में शायद ही कभी किसी नगर निकाय का चुनाव इतना अधिक चर्चा में रहा है जितनी चर्चा ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव की हुई है। केन्द्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी ने जिस अंदाज में इस चुनाव को लड़ा है, जिस आक्रामकता के साथ चुनाव प्रचार किया, जिस पैमाने पर भारत सरकार के मंत्रियों को उतारा, चुनाव प्रभारी की विशेष नियुक्ति की। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, यहां तक कि पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जितना समय हैदराबाद को दिया, उसने इस चुनाव को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया। 

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भाजपा की रणनीति और असदुद्दीन ओवैसी का हमला

भाजपा नेताओं की इतनी बड़ी फौज ने निश्चित तौर पर हैदराबाद शहर पर राज कर रहे राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी। वैसे तो ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी.आर की पार्टी का कब्जा है लेकिन देश-दुनिया में हैदराबाद की पहचान असदुद्दीन ओवैसी के शहर के तौर पर ज्यादा है। इसकी एक वजह शायद यह भी हो सकती है कि असदुद्दीन ओवैसी हाल के दिनों में मुस्लिम राजनीति के एक बड़े प्रतीक के तौर पर उभरे हैं। हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव में 5 सीटों पर मिली जीत से भी यही साबित होता दिख रहा है कि धीरे-धीरे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की पार्टी के रूप में उभरती जा रही है और अब इसका अगला निशाना दीदी का गढ़ पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव है। इसलिए भाजपा नेताओं ने हैदराबाद नगर निगम पर काबिज टीआरएस से ज्यादा तीखा हमला लगातार असदुद्दीन ओवैसी पर ही बोला। भाजपा नेताओं के हमले के जवाब में असदुद्दीन ओवैसी ने भी तीखा राजनीतिक हमला बोला। ओवैसी की पार्टी के स्थानीय नेताओं ने तो किसान आंदोलन के बावजूद गृह मंत्री अमित शाह के चुनावी दौरे पर निशाना साधा तो वहीं असदुद्दीन ओवैसी ने यह कह कर निशाना साधा कि यह चुनाव हैदराबाद निकाय का न होकर प्रधानमंत्री का हो गया है। ओवैसी ने कहा कि यह हैदराबाद चुनाव जैसा नहीं है, ऐसा लगता है जैसे हम नरेंद्र मोदी की जगह पीएम का चुनाव कर रहे हैं। भाजपा नेताओं की भीड़ पर कटाक्ष करते हुए ओवैसी ने कहा कि अब केवल ट्रंप को ही बुलाना बचा रह गया है। 

चुनाव का एजेंडा सेट करने में कामयाब हुई भाजपा 

भाजपा की लगातार जीत की सबसे बड़ी वजह यही मानी जाती है कि वो हर चुनाव का एजेंडा अपने हिसाब से तय करने में कामयाब हो जाती है और विरोधी दलों को उसके पिच पर आकर ही खेलना पड़ता है। हैदराबाद में भी भाजपा को अपनी रणनीति में कई बार कामयाबी मिलती नजर आई। विरोधियों ने कहा कि गली-मुहल्ले के चुनाव में भाजपा के दिग्गज नेता आ रहे हैं तो तुरंत पलटवार करते हुए अमित शाह ने कहा कि कोई चुनाव छोटा या बड़ा नहीं होता और ऐसा कह कर ओवैसी की पार्टी हैदराबाद की जनता का अपमान कर रही है।

  

इसी मुद्दे पर तीखा राजनीतिक हमला बोलते हुए भाजपा क राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने भी हैदराबाद की जनता के स्वाभिमान को छूने की कोशिश की। नड्डा ने कहा कि उनके यहां आने के पहले कहा गया कि गली के चुनाव के लिए एक राष्ट्रीय अध्यक्ष आ रहा है। क्या हैदराबाद गली है? 74 लाख वोटर, 5 लोकसभा सीट, 24 विधानसभा और करोड़ से अधिक जनसंख्या और ये इन्हें गली दिखती है।

हैदराबाद– निजाम और सरदार पटेल का इतिहास 

हैदराबाद सिर्फ एक शहर ही नहीं है। हैदराबाद प्रतीक है भाजपा की राष्ट्रवादी भावना का क्योंकि इस शहर का इतिहास भारत की आजादी के कालखंड के शिखर पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल से जुड़ा हुआ है। सरदार पटेल, जिन्हें पिछले कुछ वर्षों से लगातार भाजपा जवाहर लाल नेहरू की तुलना में एक बड़े राष्ट्रवादी और कठोर प्रशासक के तौर पर उभारने की कोशिश कर रही है। दुनिया जानती है कि 1947 में पाकिस्तान की शह पर हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय से इंकार कर दिया था जबकि वहां की बहुसंख्य आबादी हिंदुओं की थी। उस समय अपने रणनीतिक कौशल और सैन्य बल का प्रयोग करते हुए सरदार पटेल ने निजाम को भागने पर मजबूर कर दिया था। भारतीय सेना के उसी अभियान के बाद हैदराबाद का विलय भारत में हो पाया और इसलिए हैदराबाद, भाजपा के लिए सिर्फ एक शहर ही नहीं है।

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सिर्फ चुनाव नहीं भाजपा का सपना है हैदराबाद

1980 में गठन के बाद से ही भाजपा को मुख्यत: उत्तर भारत की ही पार्टी माना जाता रहा है। लेकिन उसी समय से लगातार भाजपा दक्षिण भारत में पांव जमाने की कोशिश कर रही है। सबसे पहले उसे कर्नाटक में कामयाबी मिली जहां वो आज भी सत्ता में है लेकिन केरल और अविभाजित आंध्र प्रदेश (तेलंगाना और आंध्र प्रदेश) में भाजपा को अभी तक बहुत बड़ी कामयाबी नहीं मिल पाई है। इन राज्यों को जीतने के मकसद से ही अटल-आडवाणी के युग में आंध्र प्रदेश के बंगारू लक्ष्मण और वेंकैया नायडू एवं तमिलनाडु के जन कृष्णमूर्ति को भारत सरकार में मंत्री बनाया गया, भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। वर्तमान मोदी सरकार में भी हैदराबाद के जी किशन रेड्डी गृह राज्य मंत्री के तौर पर सीधे अमित शाह के निर्देशन में काम कर रहे हैं।

आज की बात करें तो भाजपा, दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। संसद के दोनों सदनों- लोकसभा और राज्यसभा में भाजपा नंबर वन पार्टी है। देश के अधिकांश राज्यों में भी भाजपा की सरकारें हैं। लेकिन तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल जैसे राज्य अभी भी भाजपा के लिए एक सपना ही बने हुए हैं। हरियाणा ने भाजपा को यह सबक सिखाया है कि स्थानीय निकायों में मिली कामयाबी का बड़ा असर विधानसभा और लोकसभा चुनाव पर भी पड़ता है इसलिए पार्टी हैदराबाद में पूरी ताकत लगा रही है क्योंकि इस स्तर पर मिली कामयाबी का मनोवैज्ञानिक लाभ भाजपा को 2023 के तेलंगाना विधानसभा चुनाव में भी मिल सकता है और ओवैसी की पार्टी को हराने का लाभ भाजपा को देशभर में मिल सकता है।

आपको बता दें कि ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम में राज्य के 4 जिले- हैदराबाद, रंगारेड्डी, मेडचल-मलकजगिरी और संगारेड्डी आते हैं। इस पूरे इलाके में 24 विधानसभा क्षेत्र और 5 लोकससभा की सीटें आती हैं। तेलंगाना की जीडीपी का बड़ा हिस्सा यहीं से आता है और इस नगर निगम का सालाना बजट लगभग साढ़े पांच हजार करोड़ का है। हैदराबाद नगर निगम में कुल 150 सीटें हैं। पिछले चुनाव में सबसे ज्यादा दो तिहाई सीट 99 तेलंगाना राष्ट्र समिति को मिली थीं। असदुद्दीन औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम ने 44 सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि भाजपा को महज चार सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। वर्तमान की बात करें तो तेलंगाना में कुल 119 विधायकों में से भाजपा के पास केवल 2 ही विधायक हैं हालांकि लोकसभा चुनाव में भाजपा को इस राज्य की कुल 17 लोकसभा सीटों में से 4 पर जीत हासिल हुई थी।

-संतोष पाठक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवँ स्तम्भकार हैं)