प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का लोकतंत्र और मजबूत हुआ

  •  ललित गर्ग
  •  जनवरी 22, 2021   11:24
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का लोकतंत्र और मजबूत हुआ

मूल्यों की राजनीति करने वालों के सम्मुख बड़ा संकट है। जबकि राजनीति को सत्ता का हथियार मानने वाले समाधान के लिए कदम उठाने में भय महसूस कर रहे हैं। डर है सत्ता से विमुख हो जाने का। पर यदि दायित्व से विमुखता की स्थिति बनी तो यह लोकतंत्र के लिये ज्यादा बड़ा खतरा है।

लोकतंत्र के रूप में दुनिया में सबसे अधिक सशक्त माने जाने वाले एवं सराहे जाने वाले अमेरिका के ताजा घटनाक्रम के बाद भारत के लोकतंत्र को दुनिया अचंभे की तरह देख रही है। बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत का लोकतंत्र सशक्त हो रहा है और तमाम बाधाओं के लोकतंत्र का अस्तित्व अक्षुण्ण दिखाई दे रहा है। देश की आम-जनता को प्रधानमन्त्री के रूप में नरेन्द्र मोदी पर भरोसा है और वह भारत के भाग्यविधाता के रूप में उभर कर ईमानदारी, सेवा, समर्पण भाव से राष्ट्र को सशक्त बनाने का कार्य कर रहे हैं। गत सात वर्षों में एक भी आरोप उन पर नहीं लग सका तो अब उनके देशहित के निर्णयों की छिछालेदार करने के प्रयास हो रहे हैं, फिर भी उनके नेतृत्व में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है।

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कोई किसी का भाग्य विधाता नहीं होता। कोई किसी का निर्माता नहीं होता। भारतीय संस्कृति के इस मूलमंत्र को समझने की शक्ति भले ही वर्तमान राजनीतिज्ञों में न हो, पर इस नासमझी से सत्य एवं लोकतंत्र की अस्मिता एवं अस्तित्व का अंत तो नहीं हो सकता। अंत तो उसका होता है जो सत्य का विरोधी है, अंत तो उसका होता है जो जनभावना के साथ विश्वासघात करता है, अंत तो उसका होता है जिसने राजनीतिक मर्यादाओं को लांघा है। जनमत एवं जन विश्वास तो दिव्य शक्ति है। उसका उपयोग आदर्शों, सिद्धांतों और मर्यादाओं की रक्षा के लिए हो। तभी अपेक्षित लक्ष्यों की प्राप्ति होगी। तभी होगा राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान। तभी होगी अपनत्व और विश्वास की पुनः प्रतिष्ठा। वरना राजनीतिक मूल्यों की लक्ष्मण रेखा जिसने भी लांघी, वक्त के रावण ने उसे उठा लिया। कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक दलों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा ही प्रतीत होता है।

भारत की राजनीति के उच्च शिखर पर नेतृत्व करने वाले अभी भी जीवनदानी, घर-द्वार छोड़ने वाले ऐसे राजनेता हैं, जिन पर भारत की जनता को भरोसा है। परन्तु एक कहावत है, ’अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।’ अन्यथा ऐसा ही चलता रहा तो भारत की राजनीति में समर्पित व जीवनदानी राजनेताओं का अकाल हो जायेगा। वैसे भी लोकतंत्र में सबका साथ-सबका विकास का दर्शन निहित है। कहा जाता है कि 'अच्छे लोग’ राजनीति में आयें। प्रश्न यह है कि ’अच्छे लोग’ की परिभाषा क्या है? योग्य, कर्मठ, ईमानदार, ’न खायेंगे न खाने देंगे’ के सिद्धान्तों पर चलने वाले, क्या इन्हें अच्छे लोग कहा जायेगा? लेकिन इनके पास धन-बल और बाहुबल नहीं होगा, फलतः वे चुनाव नहीं जीत सकेंगे। इसलिये वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इन्हें अयोग्य कहा जाने लगा है। तब फिर प्रश्न उठता है कि राजनीति की दशा व दिशा सुधरेगी कैसे ? लोकतंत्र में ईमानदारी का वर्चस्व कैसे स्थापित होगा ?

मूल्यों की राजनीति करने वालों के सम्मुख बड़ा संकट है। जबकि राजनीति को सत्ता का हथियार मानने वाले समाधान के लिए कदम उठाने में भय महसूस कर रहे हैं। डर है सत्ता से विमुख हो जाने का। पर यदि दायित्व से विमुखता की स्थिति बनी तो यह देश के लोकतंत्र के लिये ज्यादा बड़ा खतरा है। इसी तरह, हरेक सफल लोकतंत्र अपने नागरिकों से भी कुछ अपेक्षाएं रखता है। उसकी सबसे बड़ी अपेक्षा यही होती है कि संवाद के जरिए हरेक विवाद सुलझाएं जाएं, ताकि कानून-व्यवस्था के लिए कोई मसला न खड़ा हो और समाज के ताने-बाने को नुकसान न पहुंचे। भारत जैसे बहुलवादी देश में तो संवादों की अहमियत और अधिक है। फिर असहमति और मुखर विरोध किस कदर प्रभावी हो सकते हैं, किसान आन्दोलन इसका ताजा सुबूत है। मगर देश के रचनात्मक माहौल को ऐसे विवादों एवं आन्दोलनों से कोई नुकसान न पहुंचे, यह सुनिश्चित करना सरकार से अधिक विभिन्न राजनीतिक दलों, विचारधाराओं एवं नागरिक समाज की जिम्मेदारी है। एक खुले और विमर्शवादी देश-समाज में ही ऐसी संभावनाएं फल-फूल सकती हैं। उदारता किसी धर्म की कमजोरी नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा संबल होती है, यह बात उससे बेजा लाभ उठाने की धृष्टता करने वालों और उसके रक्षकों, दोनों को समझने की जरूरत है।

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लोकतंत्र में अतिश्योक्तिपूर्ण विरोध और दमनचक्र जैसे उपाय किसी भी समस्या का समाधान नहीं कर सकते। इस मौलिक सत्य व सिद्धांत की जानकारी से आज का राजनीतिक वर्ग अनभिज्ञ है। सत्ता के मोह ने, वोट के मोह ने शायद उनके विवेक का अपहरण कर लिया है। कहीं कोई स्वयं शेर पर सवार हो चुका है तो कहीं किसी नेवले ने सांप को पकड़ लिया है। न शेर पर से उतरते बनता है, न सांप को छोड़ते बनता है। धरती पुत्र, जन रक्षक, पिछड़ों के मसीहा और धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर का मुखौटा लगाने वाले आज जन विश्वास का हनन करने लगे हैं। जनादेश की परिभाषा अपनी सुविधानुसार करने लगे हैं। देश के राष्ट्रवादी, चिन्तनशील, ईमानदार आम जनमानस को एकजुट होना होगा। दूरदृष्टि के साथ भारत के भविष्य की चिन्ता करनी होगी। राजनीतिक क्षेत्र के नकारात्मक व सकारात्मक सोच का भेद समझना होगा। उन्माद, अविश्वास, राजनैतिक अनैतिकता, दमन एवं संदेह का वातावरण उत्पन्न हो गया है। उसे शीघ्र कोई दूर कर सकेगा, ऐसी सम्भावना दिखाई नहीं देती। ऐसी अनिश्चय और भय की स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए संकट की परिचायक है। जिनकी भरपाई मुश्किल है। भाईचारा, सद्भाव, निष्ठा, विश्वास, करुणा यानि कि जीवन मूल्य खो रहे हैं। मूल्य अक्षर नहीं होते, संस्कार होते हैं, आचरण होते हैं, इनसे ही लोकतंत्र सशक्त बनता है।

राजनीति गिरावट का ही परिणाम है कि भारत के साथ आजादी पाने वाले अनेक देश समृद्धि के उच्च शिखरों पर आरोहण कर रहे हैं जबकि भारत गरीबी उन्मूलन और आम आदमी को संपन्न बनाने की दिशा में अभी भी संघर्ष ही कर रहा है। राजनीतिक दलों, जनप्रतिनिधियों और सरकार में महत्वपूर्ण पद संभालने वालों की गुणवत्ता को देखकर इसका स्पष्ट आभास होता है कि भारतीय लोकतंत्र के संचालन में व्यापक गिरावट आयी है। बताया जाता है कि देश में फिलहाल 36 प्रतिशत सांसद और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। पारिवारिक मिल्कियत जैसे राजनीतिक दल, धार्मिक हितों से जुड़े समूह, धनबल-बाहुबल और उत्तराधिकार की महत्ता खासी बढ़ गई है। यहां तक कि अगर कुछ विषय विशेषज्ञ पेशेवरों को भी सरकार में महत्वपूर्ण पद मिलते हैं तो अधिकांश मामलों में वे भी पद प्रदान करने वाली पार्टी के अहसान तले ही दबे रहते हैं और किसी वाजिब मसले पर एक राजनेता के रूप में अपनी आवाज बुलंद करने से हिचकते हैं। जबकि सरकार में होने का तकाजा ही यही होता है कि नेता एक राजनेता के रूप में उभरकर अधिक से अधिक लोगों की भलाई के लिए कदम उठाएं, न कि अपने राजनीतिक दल के हितों को पोषित करें।

अफसोस की बात यही है कि परिपक्व लोकतंत्रों में भी ईमानदार, चरित्र सम्पन्न एवं नैतिक राजनेताओं की प्रजाति धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। राजनीतिक दलों में संख्या-बल का बढ़ना एक सूत्री कार्यक्रम बन गया और गुणवत्ता-बल दोयम दर्जे पर हो गया है। राजनैतिक दल भी चुनाव जीतने का एक सूत्री कार्यक्रम बना चुके हैं जो उनकी मजबूरी भी है। चुनाव भी राजनीति का एक सक्रिय भाग है। विपक्ष में वे रहना ही नहीं चाहते और आदर्श विपक्ष की भूमिका का निर्वहन वे जानते ही नहीं हैं। सत्ता से पैसा तथा पैसे से सत्ता अर्जित करने का क्रम बन गया है और भ्रष्टाचार ने अपना विराट व विकृत स्वरूप बना लिया है। अहम बात तो यह है कि राजनीति में प्रवेश के पहले वे क्या थे और फिर क्या से क्या हो गये ? कितने ही राजनेता भ्रष्टाचार के कारण जेल जा चुके हैं, जो पकड़ा गया वो चोर है और जिसे नहीं पकड़ पा रहे हैं वे मौज कर रहे हैं, नीति-नियंता, भारत के भाग्य विधाता बने हैं।

-ललित गर्ग







साक्षात्कारः योगेंद्र यादव ने कहा- कम से कम हम आंदोलनभोगी तो नहीं हैं

  •  डॉ. रमेश ठाकुर
  •  मार्च 1, 2021   13:05
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साक्षात्कारः योगेंद्र यादव ने कहा- कम से कम हम आंदोलनभोगी तो नहीं हैं

''आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार ने ऐड़ी से लेकर चोटी तक जोर लगा लिया। लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। रही बात मुझ पर एफ़आईआर होने की। आंदोलन से जब हुकूमतें डगमगाने लगती हैं तो मुक़द्दमों को हथियार बनाती हैं।''

प्रधानमंत्री का भरी संसद में कहा एक शब्द हिरण की तेज चाल की भांति ट्रेंड कर रहा है। शब्द है ‘आंदोलनजीवी’! ये किसके लिए कहा गया शायद बताने की जरूरत नहीं, सभी जानते हैं। करीब ढाई महीने से दिल्ली में चले आ रहे किसान आंदोलन पर प्रधानमंत्री कुछ नहीं बोले, बोले भी तो तंजात्मक रूप से। संसद में अपनी चुप्पी तोड़ते हुए उन्होंने ऐसा बयान दिया, जिससे देश का एक वर्ग उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गया। प्रधानमंत्री ने आंदोलनजीवी जिन लोगों के संदर्भ में कहा उनमें योगेंद्र यादव भी शामिल हैं। उनको लगता है ये शब्द स्पेशली उनको लेकर बोला गया। इसी मुद्दे पर डॉ. रमेश ठाकुर ने सामाजिक कार्यकर्ता, चुनाव विश्लेषक व स्वराज इंडिया संगठन प्रमुख और दिल्ली में जारी किसान आंदोलन के मुख्य लोगों में शामिल योगेंद्र यादव से बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश-

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प्रश्न- बीते कुछ वर्षों से विभिन्न आंदोलनों में आपकी मौजूदगी दिखी, शायद इसलिए आप पर इशारा हो?

उत्तर- मुझे ये तमगा हमारे प्रधानमंत्री ने दिया है इससे अच्छी और भला दूसरी बात क्या हो सकती है। मैं आंदोलनजीवी हूं, ताल ठोककर कहता हूं लेकिन चोरजीवी तो नहीं हूं, औरों की तरह आंदोलनभोगी तो नहीं हूं, मौक़ापरस्त भी नहीं हूं। आंदोलनों से मैंने कुछ हासिल तो किया नहीं, लोगों की आवाज़ उठाई है और उठाता रहूंगा? देखिए, एक सामान्य नागरिक के तौर पर धरना देना, आंदोलन करना, मौलिक अधिकार हैं। संविधान में व्यवस्था है और इजाज़त है। बावजूद इसके अगर प्रधानमंत्री को लगता है ऐसा नहीं होना चाहिए, तो उन्हें धरनों-आंदोलनों पर भी कानून बना देना चाहिए। ताकि जब तक उनकी सरकार रहे, उनकी कोई आलोचना न करे, उनका कोई विरोध न करे, उनके फैसले पर कोई उंगली न उठाए।

प्रश्न- आपको क्यों लगता है कि प्रधानमंत्री के फैसले गलत हैं?

उत्तर- सही क्या हैं आप बता दो। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं। जनादेश का बड़ा समुद्र था। लेकिन उसे पचा नहीं पाए। अब सिर्फ मुट्ठी भर लोग बचे हैं जो उनकी जयजयकार करते हैं। एक वक्त ऐसा आएगा, जब उनकी पार्टी में ही ऐसी भगदड़ मचेगी जिसे संगठित करना आसान नहीं होगा। हामेहामी मिलाने वाले समर्थक अंदर से भरे हुए हैं। ये बात लिख कर रख लो, आंदोलन अभी कृषि क़ानूनों को निरस्त करने को लेकर हो रहा है, पर अब देशवासियों ने उसकी दिशा दूसरी ओर सत्तापरिर्वन की तरफ मोड़ दी है। महापंचायतों में जुटती भारी संख्या में लोगों की भीड़ इस बात का परिणाम है।

प्रश्न- जारी आंदोलन के बीच कई राज्यों में महापंचायतें हो रही हैं, क्या है उनका मकसद?

उत्तर- अपना मुकम्मल हक मांगने वालों का जबसे प्रधानमंत्री ने मखौल उड़ाया है, तभी से देशवासी आंदोलनजीवी हो गए हैं। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और यूपी में आयोजित हुईं हालिया महापंचायतों में हजारों-लाखों का जमावड़ा क्या कहता है उसकी तस्वीर 2024 में दिखाई देगी। केंद्र के आधे से ज्यादा मंत्री प्रधानमंत्री के फ़ैसलों से नाखुश हैं। वह अलग बात है कि अभी बोल कोई नहीं रहा। जिस दिन अंदर खाने विरोध की चिंगारियां उठने लगीं, तो जनता का काम अपने आप आसान हो जाएगा। मीडिया भी आज उनकी हामेहामी मिला रही है, एकदम पलटी मारेगी देख लेना। 

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प्रश्न- 26 जनवरी हिंसा को लेकर आप पर भी एफ़आईआर दर्ज हुई है?

उत्तर- अरेस्ट करे पुलिस आकर। हमारा ठिकाना सिंघु बार्डर है वहीं मिलेंगे। हिंसा न हो, सतर्कता बरती जाए आदि को लेकर 25 जनवरी को मैंने खुद कई बड़े पुलिस अधिकारियों को आगाह किया था। हिंसा सरकार की सुनियोजित साजिश थी। उससे आंदोलनकारियों को बदनाम करना था। कुछ घंटों के लिए उन्होंने लोगों की सहानुभूति लूटी भी, लेकिन सच्चाई बहुत जल्द सामने आ गई। आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार ने ऐड़ी से लेकर चोटी तक जोर लगा लिया। लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। रही बात मुझ पर एफ़आईआर होने की। आंदोलन से जब हुकूमतें डगमगाने लगती हैं तो मुक़द्दमों को हथियार बनाती हैं। आजादी से लेकर इस आंदोलन तक मुकदमे दर्ज हुए, आगे भी होते रहेंगे।

प्रश्न- आंदोलनजीवी शब्द को आपने व्यक्तिगत क्यों लिया?

उत्तर- किसने कहा आपको कि मैंने व्यक्तिगत लिया है, कतई नहीं? इसलिए नहीं लिया क्योंकि मैं हूं आंदोलनजीवी। मैं अन्ना आंदोलन का भी हिस्सा था, बाकी अन्य राज्यों में होते रहे छिटपुट मूवमेंटों में भी गया। लोगों ने आमंत्रित किया मैं गया। मैं जो हूं, सबके सामने हूं, जीवन खुली किताब जैसा है। जब अन्ना आंदोलन हुआ तब भाजपाईयों का पर्दे के पीछे समर्थन था, तब उन्हें अच्छा लगता था। अब आंदोलन उन्हीं के खिलाफ है तो उसे विचार धाराओं में विभाजित कर दिया। पाकिस्तानी, खालिस्तानी, वामपंथी व पता नहीं क्या-क्या तमगे दिए गए।

प्रश्न- आंदोलन का परिणाम निकलता दिखाई नहीं देता, समाप्ति के कुछ आसार हैं या नहीं?

उत्तर- देखिए, इतना तय है किसान खाली हाथ लौटने वाला नहीं? दो सौ किसानों की शहादत जाया नहीं जाएगी। मौजूदा किसान आंदोलन तो अभी झांकी है। इसके बाद केंद्र सरकार कुछ ऐसे फैसले लेने जा रही है जिससे विरोध की चिंगारियां और भड़कने वाली हैं। जनसंख्या कानून, सीएए-एनआरसी आदि मुद्दों पर भी बाजार गर्म होगा। मौजूदा आंदोलन विपक्षी दलों से प्रेरित बताया जा रहा है। हम इस बात को मानते हैं विभिन्न दलों के नेता आते हैं लेकिन मंच साझा नहीं कराते, उनको हम महँगाई जैसे बाकी मुद्दों को उठाने की सलाह देते हैं।

प्रश्न- सरकार-किसानों के बीच दूसरे दौर की वार्ता की भी संभावनाएं नहीं दिखतीं?

उत्तर- मोर्चा बातचीत को तैयार है। सरकार और सरकार के लोग सिर्फ मीडिया में बयान देते हैं। कम से कम कोई पहल तो करे। मोर्चे की ओर से बातचीत के सभी रास्ते खोले हुए हैं। मैं इस बात का पक्षधर हमेशा से रहा हूं कि बिना संवाद के हल नहीं निकलने वाला। मोर्चे की मांग है दूसरे दौर की वार्ता में खुद प्रधानमंत्री या गृहमंत्री आएं ताकि समाधान निकल सके।

-बातचीत में जैसा योगेंद्र यादव ने डॉ. रमेश ठाकुर से कहा।







मुश्किल समय में अच्छा बजट लेकर आई है राजस्थान की गहलोत सरकार

  •  डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
  •  फरवरी 27, 2021   14:58
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मुश्किल समय में अच्छा बजट लेकर आई है राजस्थान की गहलोत सरकार

निवेशकों को आकर्षित कर धरातल पर उद्यमों की स्थापना बड़ी बात है। हालांकि मुख्यमंत्री गहलोत ने बजट पेश करते हुए राजस्थान फाउण्डेशन के माध्यम से देश-विदेश में रोड़ शो आयोजित करने की बात कही है वहीं राजस्थान इंवेस्टर्स समिट के आयोजन का प्रस्ताव किया है।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सबसे लंबे बजट भाषण का रिकॉर्ड बनाते हुए कोरोना प्रभावित उद्योग जगत को बड़ी राहत देने का प्रयास किया है। कोरोना के कारण प्रभावित प्रदेश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का ठोस विजन प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बजट प्रस्तावों में एक और नई एमएसएमई पॉलिसी लाने की बात की है तो दूसरी और प्रदेश में नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के प्रस्ताव किए हैं। राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना 2019 का दायरा बढ़ाते हुए हेल्थ केयर को ट्रस्ट क्षेत्र के रूप में शामिल करने के साथ ही अनुसूचित जाति, जनजाति उद्यमियों को आगे लाने के लिए डॉ. बीआर अंबेडकर एससी-एसटी उद्यमी प्रोत्साहन योजना लागू करते हुए रिप्स, 2019 में लाभ देने के प्रावधान किए हैं। इसके अलावा आदिवासी जिलों के औद्योगिक विकास के लिए रिप्स योजना का दायरा बढ़ाया गया है तो पुरानी रिप्स योजना की अवधि बढ़ाकर लाभार्थियों को राहत दी है। भिवाड़ी औद्योगिक क्षेत्र का दायरा बढ़ाते खुशकेड़ा, भिवाड़ी, नीमराणा और टपूकड़ा को शामिल करते हुए ग्रेटर भिवाड़ी इण्डस्ट्रियल टाउनशिप विकसित करने के लिए एक हजार करोड़ का प्रावधान किया है। इसी तरह से मारवाड़ इण्डस्ट्रियल कलस्टर बनाना प्रस्तावित है। युवाओं को ऋण, बुनकरों को 3 लाख तक का ब्याज मुक्त ऋण, मेगा व मिनी फूड पार्कों को बनाने, स्टार्टअप्स को सहयोग देने के प्रावधान कर बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करने की दिशा दी है।

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दरअसल औद्योगिक निवेश की दृष्टि से राजस्थान की ओर आज निवेशक रुख कर रहे हैं। पिछले सालों में राजस्थान में निवेश भी बढ़ा है और राज्य सरकार द्वारा निरीक्षण राज खत्म कर एमएसएमई एक्ट के सरलीकरण और वन स्टॉप शॉप जैसी व्यवस्थाएं निश्चित रूप से निवेशकों को आकर्षित करने में सहायक सिद्ध हो रही हैं। इसके साथ ही राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना में विशेष रियायतें और अब उसका दायरा बढ़ाकर उद्यमियों को आकर्षित करने से नए उद्यम लगेंगे। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। कृषि के बाद सबसे अधिक रोजगार एमएसएमई उद्योग ही उपलब्ध कराते हैं। राज्य में सरकार आने के बाद जिस तरह से औद्योगिक निवेश का वातावरण का प्रयास किया गया है उसके परिणाम सामने आने लगे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि निरीक्षणों व अनुमतियों से तीन साल से मुक्त करने का सकारात्मक असर रहा है। उद्यमी एमएसएमई पोर्टल पर आगे आ भी रहे हैं।

निवेशकों को आकर्षित कर धरातल पर उद्यमों की स्थापना बड़ी बात है। हालांकि मुख्यमंत्री गहलोत ने बजट पेश करते हुए राजस्थान फाउण्डेशन के माध्यम से देश-विदेश में रोड़ शो आयोजित करने की बात कही है वहीं राजस्थान इंवेस्टर्स समिट के आयोजन का प्रस्ताव किया है। निश्चित रूप से यह अच्छी सोच है। अब देखना यह होगा की सरकारी मशीनरी इन आयोजनों को कहां तक ले जाती है और नए निवेशकों को राजस्थान की यूएसपी से प्रभावित करने में कितनी सफल होती है, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। समिट व रोड शो के आयोजन में सतर्कता भी बरतनी होगी ताकि पूर्व के आयोजनों की तरह अपने उद्देश्यों से यह आयोजन भटक नहीं जाए।

आशा की जानी चाहिए कि लंबे समय से धरातल पर उतरने से तरस रही दिल्ली मुबई इण्डस्ट्रियल कॉरिडोर परियोजना एक हजार करोड़ रु. से विकसित होने वाला ग्रेटर भिवाड़ी इण्डस्ट्रियल टाउनशिप और 500 करोड़ रु. की लागत से विकसित होने वाला मारवाड़ इण्डस्ट्रियल कलस्टर धरातल पर आ सकेगी। देखा जाए तो डीएमआईसी परियोजना औद्योगिक विकास के लिए गेम चेंजर परियोजना है और इसके क्रियान्वयन से औद्योगिक विकास के साथ ही रोजगार के अवसरों का अंबार ही लग जाएगा। इसी तरह से एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडियंट्स से जुड़े विनिर्माण क्षेत्र को रिप्स के दायरे में लाते हुए अतिरिक्त परिलाभ देने से फार्मास्यूटिकल सेक्टर में निवेश बढ़ेगा। राज्य में उपखण्ड स्तर पर 64 औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने की घोषणा से समग्र औद्योगिक विकास संभव हो सकेगा अन्यथा कुछ क्षेत्र विशेष तक ही उद्यमों के विकास से संपूर्ण राजस्थान का संतुलित औद्योगिक विकास नहीं हो पाता है। जयपुर को फिनटेक सिटी बनाने की अच्छी पहल होगी।

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जयपुर के राजस्थान हाट को दिल्ली हाट की तर्ज पर विकसित करने का प्रस्ताव आज समय की मांग व आवश्यकता है। इसका कारण भी है। जयपुर पर्यटन की दृष्टि से प्रमुख डेस्टिनेशन होने से दस्तकारों, बुनकरों, हस्तशिल्पियों को नई पहचान मिल सकेगी। जहां तक मुख्यमंत्री लघु उद्यम प्रोत्साहन योजना को दस साल तक लागू रखने, 50 करोड़ के अनुदान का प्रावधान, स्टार्टअप्स को 5 लाख तक की सीडमनी, उनको प्राथमिकता से कार्य देने, स्ट्रीट वेंडर्स के लिए प्रावधान किए गए हैं।

देखा जाए तो पिछला लगभग एक साल कोरोना से प्रभावित रहा है। लंबे लॉकडाउन के दौर के कारण औद्योगिक गतिविधियां बुरी तरह से प्रभावित रही हैं। उद्योगों के सामने दिक्कतें आई हैं तो रोजगार के अवसर कम हुए हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जिस तरह के बजट प्रस्ताव रखे हैं उनसे निश्चित रूप से निवेश को बढ़ावा मिलेगा वहीं फार्मास्यूटिकल और बायोफार्मा सेक्टर में नए उद्योग लग सकेंगे। सबसे बड़ी बात यह कि डीएमआईसी परियोजना को राजस्थान में अमली जामा पहनाने के लिए कदम बढ़ाते हुए ग्रेटर भिवाड़ी टाउनशिप और मारवाड़ कलस्टर धरातल पर आ जाता है तो प्रदेश का औद्योगिक स्वरूप ही बदल जाएगा। स्वयं मुख्यमंत्री गहलोत ग्रेटर भिवाड़ी इण्डस्ट्रियल टाउनशिप को औद्योगिक विकास की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होना मान रहे हैं।

मुख्यमंत्री गहलोत ने समन्वित, संतुलित और समग्र औद्योगिक विकास के लिए नए निवेश और युवाओं के लिए रोजगार दोनों से जुड़े अधिकांश बिन्दुओं को अपने बजट प्रस्तावों में प्रभावी तरीके से रखा है। अब इन प्रस्तावों को अमली जामा महनाने की जिम्मेदारी सरकारी मशीनरी पर आ जाती है। यदि समयबद्ध कार्य योजना बनाकर क्रियान्विति के प्रयास किए जाते हैं तो प्रदेश के औद्योगिक विकास को दिशा मिल सकेगी। होना तो यह चाहिए कि नए वित्तीय वर्ष के शुरू होने से पहले आवश्यक सभी औपचारिकताएं पूरी कर एक अप्रैल से अमली जामा पहनाने का काम आरंभ हो जाता है तो यह घोषणा मात्र ना रह कर वास्तविकता में धरातल पर आ सकेगी।

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा







भारत को नेपाल में चल रहे आंतरिक दंगल में दूरदर्शक बने रहना चाहिए

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  फरवरी 26, 2021   14:49
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भारत को नेपाल में चल रहे आंतरिक दंगल में दूरदर्शक बने रहना चाहिए

हो सकता है कि ओली लालच और भय का इस्तेमाल करें और अपनी सरकार बचा ले जाएं। वैसे उन्होंने पिछले दो माह में जितनी भी नई नियुक्तियां की हैं, अदालत ने उन्हें भी रद्द कर दिया है। अदालत के इस फैसले से ओली की छवि पर काफी बुरा असर पड़ेगा।

नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला दे दिया है। उसने संसद को बहाल कर दिया है। दो माह पहले 20 दिसंबर को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने नेपाली संसद के निम्न सदन को भंग कर दिया था और अप्रैल 2021 में नए चुनावों की घोषणा कर दी थी। ऐसा उन्होंने सिर्फ एक कारण से किया था। सत्तारुढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में उनके खिलाफ बगावत फूट पड़ी थी। पार्टी के सह-अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ ने मांग की कि पार्टी के सत्तारुढ़ होते समय 2017 में जो समझौता हुआ था, उसे लागू किया जाए। समझौता यह था कि ढाई साल ओली राज करेंगे और ढाई साल प्रचंड ! लेकिन वे सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं थे। पार्टी की कार्यकारिणी में भी उनका बहुमत नहीं था। इसीलिए उन्होंने राष्ट्रपति विद्या देवी से संसद भंग करवा दी।

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नेपाली संविधान में इस तरह संसद भंग करवाने का कोई प्रावधान नहीं है। ओली ने अपनी राष्ट्रवादी छवि चमकाने के लिए कई पैंतरे अपनाए। उन्होंने लिपुलेख-विवाद को लेकर भारत-विरोधी अभियान चला दिया। नेपाली संसद में हिंदी में बोलने और धोती-कुर्त्ता पहन कर आने पर रोक लगवा दी। (लगभग 30 साल पहले लोकसभा-अध्यक्ष दमननाथ ढुंगाना और गजेंद्र बाबू से कहकर इसकी अनुमति मैंने दिलवाई थी।) ओली ने नेपाल का नया नक्शा भी संसद से पास करवा लिया, जिसमें भारतीय क्षेत्रों को नेपाल में दिखा दिया गया था लेकिन अपनी राष्ट्रवादी छवि मजबूत बनाने के बाद ओली ने भारत की खुशामद भी शुरू कर दी। भारतीय विदेश सचिव और सेनापति का उन्होंने काठमांडो में स्वागत भी किया और चीन की महिला राजदूत हाउ यांकी से कुछ दूरी भी बनाई।

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उधर प्रचंड ने भी, जो चीनभक्त समझे जाते हैं, भारतप्रेमी बयान दिए। इसके बावजूद ओली ने यही सोचकर संसद भंग कर दी थी कि अविश्वास प्रस्ताव में हार कर चुनाव लड़ने की बजाय संसद भंग कर देना बेहतर है लेकिन मैंने उस समय भी लिखा था कि सर्वोच्च न्यायालय ओली के इस कदम को असंवैधानिक घोषित कर सकता है। अब उसने ओली से कहा है कि अगले 13 दिनों में वे संसद का सत्र बुलाएं। जाहिर है कि तब अविश्वास प्रस्ताव फिर से आएगा। हो सकता है कि ओली लालच और भय का इस्तेमाल करें और अपनी सरकार बचा ले जाएं। वैसे उन्होंने पिछले दो माह में जितनी भी नई नियुक्तियां की हैं, अदालत ने उन्हें भी रद्द कर दिया है। अदालत के इस फैसले से ओली की छवि पर काफी बुरा असर पड़ेगा। फिर भी यदि उनकी सरकार बच गई तो भी उसका चलना काफी मुश्किल होगा। भारत के लिए बेहतर यही होगा कि नेपाल के इस आंतरिक दंगल का वह दूरदर्शक बना रहे।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक







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