जब तक स्वार्थी नेताओं को नहीं हटाएंगे किसान तब तक नहीं निकल सकता मुद्दे का हल

  •  प्रो. सुधांशु त्रिपाठी
  •  जनवरी 16, 2021   13:02
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जब तक स्वार्थी नेताओं को नहीं हटाएंगे किसान तब तक नहीं निकल सकता मुद्दे का हल

वास्तव में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में भारत शांतिपूर्ण तरीके से जिस तरह तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है उससे संपूर्ण विश्व अचंभित है परंतु देश के भीतर तथा विदेश में बैठे इन कट्टर राष्ट्रविरोधी ताकतों को अच्छा नहीं लग रहा है।

केंद्र सरकार तथा आंदोलनकारी किसान नेताओं के बीच कई दौर की वार्ता के बाद भी दोनों पक्षों को स्वीकार्य कोई हल अब तक निकल नहीं सका है। वस्तुतः संपूर्ण घटनाक्रम शाहीन बाग की याद दिला रहा है। जिस तरह से किसान आंदोलन के नाम पर चंद मुट्ठी भर अमीर से बेहद अमीर किसानों के नेतृत्व में पंजाब तथा हरियाणा के बहुसंख्य किसानों ने न केवल दिल्ली बल्कि आसपास के चतुर्दिक सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, वह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। ये प्रदर्शनकारी या तथाकथित अन्नदाता किसान दिल्ली के समीप सिंघु बॉर्डर पर पिछले पचास दिनों से डेरा डाले बैठे हुए हैं जिससे सामान्य किसानों की रोजी-रोटी पर तो कुठाराघात हो ही रहा है, साथ ही दैनिक मजदूरों और अन्य दिहाड़ी कामगारों को भी अपने जीवकोपार्जन में अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। वस्तुतः उनके इस अनवरत प्रदर्शन से दिल्ली तथा संबंधित सभी राज्यों की कानून व्यवस्था संभालने वाली पुलिस तथा प्रशासनिक मशीनरी को इन अन्नदाताओं के धरना स्थलों की सुरक्षा तथा दिल्ली के चारों ओर सभी राज्यों से यहाँ प्रतिदिन आकर काम करने वालों के लिये दैनिक आवागमन सुलभ बनाने तथा सामान्य कानून एवं व्यवस्था की स्थापना करने में भी एड़ी-चोटी एक करनी पड़ रही है। इसमें न केवल देश के करदाताओं का अमूल्य धन नष्ट हो रहा है जिसका अन्यथा सामाजिक कल्याण एवं विकास के कार्यों में उपयोग किया जा सकता था बल्कि पूरे प्रशासनिक अमले का परिश्रम नष्ट हो रहा है जिससे निश्चय ही सामान्य जनजीवन की सुरक्षा बढ़ाई जा सकती थी तथा उनका राष्ट्रहित में उपयोग किया जा सकता था।

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यद्यपि ये अन्नदाता कृषि कानून को वापस लिये जाने पर अड़े हैं तथा इसके लिए केंद्र सरकार पर अनेकों प्रकार से दबाव बना रहे हैं जिसमें देश के कुछ प्रमुख तथाकथित बुद्धिजावियों के साथ लगभग सभी प्रमुख विपक्षी राजनीतिक दल और चीन समर्थित माओवादी कम्युनिस्ट पार्टियां तथा लंदन से खालिस्तान समर्थक उग्रवादी संगठन भी भरपूर समर्थन दे रहे हैं जो अखंड भारत के भीतर एक स्वतंत्र पंजाब/खालिस्तान देश का सपना संजोए बैठे हैं। निश्चय ही इन अन्नदाताओं ने अपने निहित स्वार्थों के लिए संपूर्ण देश के बहुसंख्यक सामान्य किसानों को बुरी तरह से भ्रमित करके डरा दिया है क्योंकि इनके लिए राष्ट्रहित का कोई महत्व नहीं है, अन्यथा किसानों के आंदोलन में इन सभी विघटनकारी तत्वों का क्या काम है। यद्यपि कृषि कानून में उल्लिखित विभिन्न सकारात्मक प्रावधानों के महत्व को ये अन्नदाता मौन रूप से स्वीकार कर रहे हैं तथापि अपने संकीर्ण स्वार्थों की निर्बाध पूर्ति के लिए ये इन सभी महत्वपूर्ण किसान-हितकारी उपबंधों की उपेक्षा कर रहे हैं जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम0एस0पी0) की गारंटी के साथ ही किसानों को अपनी फसल को देश के किसी भी स्थान पर बेचे जाने की छूट दी गयी है तथा मंडियों में फैले भ्रष्टाचार से उन्हें बचाने का प्रयास भी किया गया है। संभवतः अपने इन तुच्छ स्वार्थों एवं संकीर्ण उद्देश्यों के चलते तथा इस आंदोलन के देश विरोधी और विघटनकारी-आतंकवादी तत्वों के हाथों में पड़ जाने के कारण इन आंदोलनकारी किसान नेताओं में उत्पन्न निराशा साफ दिखायी दे रही है।

वास्तव में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में भारत शांतिपूर्ण तरीके से जिस तरह तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है उससे संपूर्ण विश्व अचंभित है परंतु देश के भीतर तथा विदेश में बैठे इन कट्टर राष्ट्रविरोधी ताकतों को अच्छा नहीं लग रहा है। विश्व के सभी प्रमुख राष्ट्राध्यक्ष या शासनाध्यक्ष यथा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एवं फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रोन तथा आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एवं ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन आदि सभी प्रमुख नेतागण प्रधानमंत्री मोदी की कार्यशैली से अत्यंत प्रभावित हैं। यह प्रधानमंत्री मोदी की विश्व में बढ़ती हुई लोकप्रियता की स्वीकारोक्ति ही है कि अनेक प्रमुख देश उन्हें अपने-अपने सर्वोच्च राजकीय सम्मान से सम्मानित कर चुके हैं।

वर्तमान कोरोना की विश्वव्यापी महामारी के दौर में देश के प्रधानमंत्री ने जिस सूझ-बूझ का परिचय देते हुए सभी देशवासियों की सुरक्षा एवं उनके जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सारे व्यापक उपाय किए उसकी न केवल देश में बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी वैश्विक संस्था तथा विभिन्न देशों द्वारा कई प्रमुख मंचों पर भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। कोविड-19 के कठिन दौर में भी जब पड़ोसी देश चीन ने अत्यंत शर्मनाक विश्वासघात करते हुए भारत-चीन सीमा, (एल0ए0सी0) पर देश में अनेक स्थानों पर घुसपैठ करने की कोशिश की, उसका अत्यंत साहसपूर्वक ढंग से सामना करते हुए भारतीय सेना प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बीजिंग को जिस तरह से मुँहतोड़ जवाब दे रही है उससे चीन बेहद परेशान हो चुका है तथा उसके कारण चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को न केवल विश्व में बल्कि अपने देश में भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। समग्रतः विश्व में भारत की तेजी से उभरती सशक्त छवि देशविरोधी शक्तियों के लिए एक बहुत बड़ी परेशानी का कारण बन चुकी है। अतः ये सब, जिनमें देश के भीतर सक्रिय टुकडे-टुकड़े गैंग की प्रभावी भूमिका रहती है, केवल मौके की तलाश में रहते हैं कि कैसे भारत को एक बार पुनः अस्थिर तथा विखंडित किया जाए। किसानों के इस आंदोलन ने इन्हें पुनः एक मौका दे दिया है।

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ऐसे चिंताजनक परिदृश्य में यद्यपि देश की सर्वोच्च अदालत ने इस कानून पर रोक लगा कर केंद्र सरकार और आंदोलनकारी किसानों के बीच चले आ रहे लंबे टकराव पर विराम लगाने का प्रयास तो किया है और समाधान निकालने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है परंतु एक सदस्य द्वारा समिति में शामिल न होने के फैसले से आगे की कार्यवाही प्रभावित हो सकती है और विलंब हो सकता है। इसी असमंजस के बीच इन आंदोलनकारी किसानों द्वारा देश के आगामी गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर विशाल ट्रैक्टर जुलूस निकालने की चेतावनी दोनों पक्षों के बीच तनाव को बढ़ाने का काम करेगी। अंततोगत्वा सरकार तथा आंदोलनकारी किसानों को ही इस समस्या का हल खोजना होगा जो दोनों के बीच बातचीत से ही निकल सकता है। लेकिन इसके लिए इन किसान आंदोलनकारियों को अपने बीच से स्वार्थी किस्म के छद्म नेताओं तथा विघटनकारी तत्वों को हटाना होगा क्योंकि तभी दोनों के बीच सार्थक वार्तालाप हो सकेगा और दोनों पक्षों को स्वीकार्य हल निकल सकेगा, जो अब तक की कई दौर की वार्ता के सम्पन्न होने पर भी नहीं निकल सका। साथ ही देश के संपूर्ण जनता-जर्नादन अर्थात् हम भारत के लोग को भी जाति, धर्म, भाषा, समुदाय, क्षेत्र आदि जैसे संकीर्ण विचारों से ऊपर उठना चाहिए तथा किसान आंदोलन के नाम पर अपने तुच्छ हितों की रक्षा करने वाले इन स्वार्थी और देश विरोधी किसान नेताओं एवं असामाजिक तत्वों तथा कट्टर राष्ट्रविरोधी-विघटनकारी एवं खालिस्तान समर्थक उग्रवादी संगठनों को अलग-थलग कर देना चाहिए जिससे देश की अखंडता तथा राष्ट्रहित और मानव संस्कृति की रक्षा हो सके तथा समाज में शांति एवं सुरक्षा की स्थापना के साथ ही सामाजिक समरसता भी कायम की जा सके। ऐसा हो सकता है क्योंकि मानव उद्यम से परे कुछ नहीं होता है।

-प्रो. सुधांशु त्रिपाठी

आचार्य

उप्र राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।







साक्षात्कारः योगेंद्र यादव ने कहा- कम से कम हम आंदोलनभोगी तो नहीं हैं

  •  डॉ. रमेश ठाकुर
  •  मार्च 1, 2021   13:05
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साक्षात्कारः योगेंद्र यादव ने कहा- कम से कम हम आंदोलनभोगी तो नहीं हैं

''आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार ने ऐड़ी से लेकर चोटी तक जोर लगा लिया। लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। रही बात मुझ पर एफ़आईआर होने की। आंदोलन से जब हुकूमतें डगमगाने लगती हैं तो मुक़द्दमों को हथियार बनाती हैं।''

प्रधानमंत्री का भरी संसद में कहा एक शब्द हिरण की तेज चाल की भांति ट्रेंड कर रहा है। शब्द है ‘आंदोलनजीवी’! ये किसके लिए कहा गया शायद बताने की जरूरत नहीं, सभी जानते हैं। करीब ढाई महीने से दिल्ली में चले आ रहे किसान आंदोलन पर प्रधानमंत्री कुछ नहीं बोले, बोले भी तो तंजात्मक रूप से। संसद में अपनी चुप्पी तोड़ते हुए उन्होंने ऐसा बयान दिया, जिससे देश का एक वर्ग उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गया। प्रधानमंत्री ने आंदोलनजीवी जिन लोगों के संदर्भ में कहा उनमें योगेंद्र यादव भी शामिल हैं। उनको लगता है ये शब्द स्पेशली उनको लेकर बोला गया। इसी मुद्दे पर डॉ. रमेश ठाकुर ने सामाजिक कार्यकर्ता, चुनाव विश्लेषक व स्वराज इंडिया संगठन प्रमुख और दिल्ली में जारी किसान आंदोलन के मुख्य लोगों में शामिल योगेंद्र यादव से बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश-

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प्रश्न- बीते कुछ वर्षों से विभिन्न आंदोलनों में आपकी मौजूदगी दिखी, शायद इसलिए आप पर इशारा हो?

उत्तर- मुझे ये तमगा हमारे प्रधानमंत्री ने दिया है इससे अच्छी और भला दूसरी बात क्या हो सकती है। मैं आंदोलनजीवी हूं, ताल ठोककर कहता हूं लेकिन चोरजीवी तो नहीं हूं, औरों की तरह आंदोलनभोगी तो नहीं हूं, मौक़ापरस्त भी नहीं हूं। आंदोलनों से मैंने कुछ हासिल तो किया नहीं, लोगों की आवाज़ उठाई है और उठाता रहूंगा? देखिए, एक सामान्य नागरिक के तौर पर धरना देना, आंदोलन करना, मौलिक अधिकार हैं। संविधान में व्यवस्था है और इजाज़त है। बावजूद इसके अगर प्रधानमंत्री को लगता है ऐसा नहीं होना चाहिए, तो उन्हें धरनों-आंदोलनों पर भी कानून बना देना चाहिए। ताकि जब तक उनकी सरकार रहे, उनकी कोई आलोचना न करे, उनका कोई विरोध न करे, उनके फैसले पर कोई उंगली न उठाए।

प्रश्न- आपको क्यों लगता है कि प्रधानमंत्री के फैसले गलत हैं?

उत्तर- सही क्या हैं आप बता दो। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं। जनादेश का बड़ा समुद्र था। लेकिन उसे पचा नहीं पाए। अब सिर्फ मुट्ठी भर लोग बचे हैं जो उनकी जयजयकार करते हैं। एक वक्त ऐसा आएगा, जब उनकी पार्टी में ही ऐसी भगदड़ मचेगी जिसे संगठित करना आसान नहीं होगा। हामेहामी मिलाने वाले समर्थक अंदर से भरे हुए हैं। ये बात लिख कर रख लो, आंदोलन अभी कृषि क़ानूनों को निरस्त करने को लेकर हो रहा है, पर अब देशवासियों ने उसकी दिशा दूसरी ओर सत्तापरिर्वन की तरफ मोड़ दी है। महापंचायतों में जुटती भारी संख्या में लोगों की भीड़ इस बात का परिणाम है।

प्रश्न- जारी आंदोलन के बीच कई राज्यों में महापंचायतें हो रही हैं, क्या है उनका मकसद?

उत्तर- अपना मुकम्मल हक मांगने वालों का जबसे प्रधानमंत्री ने मखौल उड़ाया है, तभी से देशवासी आंदोलनजीवी हो गए हैं। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और यूपी में आयोजित हुईं हालिया महापंचायतों में हजारों-लाखों का जमावड़ा क्या कहता है उसकी तस्वीर 2024 में दिखाई देगी। केंद्र के आधे से ज्यादा मंत्री प्रधानमंत्री के फ़ैसलों से नाखुश हैं। वह अलग बात है कि अभी बोल कोई नहीं रहा। जिस दिन अंदर खाने विरोध की चिंगारियां उठने लगीं, तो जनता का काम अपने आप आसान हो जाएगा। मीडिया भी आज उनकी हामेहामी मिला रही है, एकदम पलटी मारेगी देख लेना। 

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प्रश्न- 26 जनवरी हिंसा को लेकर आप पर भी एफ़आईआर दर्ज हुई है?

उत्तर- अरेस्ट करे पुलिस आकर। हमारा ठिकाना सिंघु बार्डर है वहीं मिलेंगे। हिंसा न हो, सतर्कता बरती जाए आदि को लेकर 25 जनवरी को मैंने खुद कई बड़े पुलिस अधिकारियों को आगाह किया था। हिंसा सरकार की सुनियोजित साजिश थी। उससे आंदोलनकारियों को बदनाम करना था। कुछ घंटों के लिए उन्होंने लोगों की सहानुभूति लूटी भी, लेकिन सच्चाई बहुत जल्द सामने आ गई। आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार ने ऐड़ी से लेकर चोटी तक जोर लगा लिया। लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। रही बात मुझ पर एफ़आईआर होने की। आंदोलन से जब हुकूमतें डगमगाने लगती हैं तो मुक़द्दमों को हथियार बनाती हैं। आजादी से लेकर इस आंदोलन तक मुकदमे दर्ज हुए, आगे भी होते रहेंगे।

प्रश्न- आंदोलनजीवी शब्द को आपने व्यक्तिगत क्यों लिया?

उत्तर- किसने कहा आपको कि मैंने व्यक्तिगत लिया है, कतई नहीं? इसलिए नहीं लिया क्योंकि मैं हूं आंदोलनजीवी। मैं अन्ना आंदोलन का भी हिस्सा था, बाकी अन्य राज्यों में होते रहे छिटपुट मूवमेंटों में भी गया। लोगों ने आमंत्रित किया मैं गया। मैं जो हूं, सबके सामने हूं, जीवन खुली किताब जैसा है। जब अन्ना आंदोलन हुआ तब भाजपाईयों का पर्दे के पीछे समर्थन था, तब उन्हें अच्छा लगता था। अब आंदोलन उन्हीं के खिलाफ है तो उसे विचार धाराओं में विभाजित कर दिया। पाकिस्तानी, खालिस्तानी, वामपंथी व पता नहीं क्या-क्या तमगे दिए गए।

प्रश्न- आंदोलन का परिणाम निकलता दिखाई नहीं देता, समाप्ति के कुछ आसार हैं या नहीं?

उत्तर- देखिए, इतना तय है किसान खाली हाथ लौटने वाला नहीं? दो सौ किसानों की शहादत जाया नहीं जाएगी। मौजूदा किसान आंदोलन तो अभी झांकी है। इसके बाद केंद्र सरकार कुछ ऐसे फैसले लेने जा रही है जिससे विरोध की चिंगारियां और भड़कने वाली हैं। जनसंख्या कानून, सीएए-एनआरसी आदि मुद्दों पर भी बाजार गर्म होगा। मौजूदा आंदोलन विपक्षी दलों से प्रेरित बताया जा रहा है। हम इस बात को मानते हैं विभिन्न दलों के नेता आते हैं लेकिन मंच साझा नहीं कराते, उनको हम महँगाई जैसे बाकी मुद्दों को उठाने की सलाह देते हैं।

प्रश्न- सरकार-किसानों के बीच दूसरे दौर की वार्ता की भी संभावनाएं नहीं दिखतीं?

उत्तर- मोर्चा बातचीत को तैयार है। सरकार और सरकार के लोग सिर्फ मीडिया में बयान देते हैं। कम से कम कोई पहल तो करे। मोर्चे की ओर से बातचीत के सभी रास्ते खोले हुए हैं। मैं इस बात का पक्षधर हमेशा से रहा हूं कि बिना संवाद के हल नहीं निकलने वाला। मोर्चे की मांग है दूसरे दौर की वार्ता में खुद प्रधानमंत्री या गृहमंत्री आएं ताकि समाधान निकल सके।

-बातचीत में जैसा योगेंद्र यादव ने डॉ. रमेश ठाकुर से कहा।







मुश्किल समय में अच्छा बजट लेकर आई है राजस्थान की गहलोत सरकार

  •  डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
  •  फरवरी 27, 2021   14:58
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मुश्किल समय में अच्छा बजट लेकर आई है राजस्थान की गहलोत सरकार

निवेशकों को आकर्षित कर धरातल पर उद्यमों की स्थापना बड़ी बात है। हालांकि मुख्यमंत्री गहलोत ने बजट पेश करते हुए राजस्थान फाउण्डेशन के माध्यम से देश-विदेश में रोड़ शो आयोजित करने की बात कही है वहीं राजस्थान इंवेस्टर्स समिट के आयोजन का प्रस्ताव किया है।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सबसे लंबे बजट भाषण का रिकॉर्ड बनाते हुए कोरोना प्रभावित उद्योग जगत को बड़ी राहत देने का प्रयास किया है। कोरोना के कारण प्रभावित प्रदेश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का ठोस विजन प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बजट प्रस्तावों में एक और नई एमएसएमई पॉलिसी लाने की बात की है तो दूसरी और प्रदेश में नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के प्रस्ताव किए हैं। राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना 2019 का दायरा बढ़ाते हुए हेल्थ केयर को ट्रस्ट क्षेत्र के रूप में शामिल करने के साथ ही अनुसूचित जाति, जनजाति उद्यमियों को आगे लाने के लिए डॉ. बीआर अंबेडकर एससी-एसटी उद्यमी प्रोत्साहन योजना लागू करते हुए रिप्स, 2019 में लाभ देने के प्रावधान किए हैं। इसके अलावा आदिवासी जिलों के औद्योगिक विकास के लिए रिप्स योजना का दायरा बढ़ाया गया है तो पुरानी रिप्स योजना की अवधि बढ़ाकर लाभार्थियों को राहत दी है। भिवाड़ी औद्योगिक क्षेत्र का दायरा बढ़ाते खुशकेड़ा, भिवाड़ी, नीमराणा और टपूकड़ा को शामिल करते हुए ग्रेटर भिवाड़ी इण्डस्ट्रियल टाउनशिप विकसित करने के लिए एक हजार करोड़ का प्रावधान किया है। इसी तरह से मारवाड़ इण्डस्ट्रियल कलस्टर बनाना प्रस्तावित है। युवाओं को ऋण, बुनकरों को 3 लाख तक का ब्याज मुक्त ऋण, मेगा व मिनी फूड पार्कों को बनाने, स्टार्टअप्स को सहयोग देने के प्रावधान कर बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करने की दिशा दी है।

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दरअसल औद्योगिक निवेश की दृष्टि से राजस्थान की ओर आज निवेशक रुख कर रहे हैं। पिछले सालों में राजस्थान में निवेश भी बढ़ा है और राज्य सरकार द्वारा निरीक्षण राज खत्म कर एमएसएमई एक्ट के सरलीकरण और वन स्टॉप शॉप जैसी व्यवस्थाएं निश्चित रूप से निवेशकों को आकर्षित करने में सहायक सिद्ध हो रही हैं। इसके साथ ही राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना में विशेष रियायतें और अब उसका दायरा बढ़ाकर उद्यमियों को आकर्षित करने से नए उद्यम लगेंगे। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। कृषि के बाद सबसे अधिक रोजगार एमएसएमई उद्योग ही उपलब्ध कराते हैं। राज्य में सरकार आने के बाद जिस तरह से औद्योगिक निवेश का वातावरण का प्रयास किया गया है उसके परिणाम सामने आने लगे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि निरीक्षणों व अनुमतियों से तीन साल से मुक्त करने का सकारात्मक असर रहा है। उद्यमी एमएसएमई पोर्टल पर आगे आ भी रहे हैं।

निवेशकों को आकर्षित कर धरातल पर उद्यमों की स्थापना बड़ी बात है। हालांकि मुख्यमंत्री गहलोत ने बजट पेश करते हुए राजस्थान फाउण्डेशन के माध्यम से देश-विदेश में रोड़ शो आयोजित करने की बात कही है वहीं राजस्थान इंवेस्टर्स समिट के आयोजन का प्रस्ताव किया है। निश्चित रूप से यह अच्छी सोच है। अब देखना यह होगा की सरकारी मशीनरी इन आयोजनों को कहां तक ले जाती है और नए निवेशकों को राजस्थान की यूएसपी से प्रभावित करने में कितनी सफल होती है, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। समिट व रोड शो के आयोजन में सतर्कता भी बरतनी होगी ताकि पूर्व के आयोजनों की तरह अपने उद्देश्यों से यह आयोजन भटक नहीं जाए।

आशा की जानी चाहिए कि लंबे समय से धरातल पर उतरने से तरस रही दिल्ली मुबई इण्डस्ट्रियल कॉरिडोर परियोजना एक हजार करोड़ रु. से विकसित होने वाला ग्रेटर भिवाड़ी इण्डस्ट्रियल टाउनशिप और 500 करोड़ रु. की लागत से विकसित होने वाला मारवाड़ इण्डस्ट्रियल कलस्टर धरातल पर आ सकेगी। देखा जाए तो डीएमआईसी परियोजना औद्योगिक विकास के लिए गेम चेंजर परियोजना है और इसके क्रियान्वयन से औद्योगिक विकास के साथ ही रोजगार के अवसरों का अंबार ही लग जाएगा। इसी तरह से एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडियंट्स से जुड़े विनिर्माण क्षेत्र को रिप्स के दायरे में लाते हुए अतिरिक्त परिलाभ देने से फार्मास्यूटिकल सेक्टर में निवेश बढ़ेगा। राज्य में उपखण्ड स्तर पर 64 औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने की घोषणा से समग्र औद्योगिक विकास संभव हो सकेगा अन्यथा कुछ क्षेत्र विशेष तक ही उद्यमों के विकास से संपूर्ण राजस्थान का संतुलित औद्योगिक विकास नहीं हो पाता है। जयपुर को फिनटेक सिटी बनाने की अच्छी पहल होगी।

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जयपुर के राजस्थान हाट को दिल्ली हाट की तर्ज पर विकसित करने का प्रस्ताव आज समय की मांग व आवश्यकता है। इसका कारण भी है। जयपुर पर्यटन की दृष्टि से प्रमुख डेस्टिनेशन होने से दस्तकारों, बुनकरों, हस्तशिल्पियों को नई पहचान मिल सकेगी। जहां तक मुख्यमंत्री लघु उद्यम प्रोत्साहन योजना को दस साल तक लागू रखने, 50 करोड़ के अनुदान का प्रावधान, स्टार्टअप्स को 5 लाख तक की सीडमनी, उनको प्राथमिकता से कार्य देने, स्ट्रीट वेंडर्स के लिए प्रावधान किए गए हैं।

देखा जाए तो पिछला लगभग एक साल कोरोना से प्रभावित रहा है। लंबे लॉकडाउन के दौर के कारण औद्योगिक गतिविधियां बुरी तरह से प्रभावित रही हैं। उद्योगों के सामने दिक्कतें आई हैं तो रोजगार के अवसर कम हुए हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जिस तरह के बजट प्रस्ताव रखे हैं उनसे निश्चित रूप से निवेश को बढ़ावा मिलेगा वहीं फार्मास्यूटिकल और बायोफार्मा सेक्टर में नए उद्योग लग सकेंगे। सबसे बड़ी बात यह कि डीएमआईसी परियोजना को राजस्थान में अमली जामा पहनाने के लिए कदम बढ़ाते हुए ग्रेटर भिवाड़ी टाउनशिप और मारवाड़ कलस्टर धरातल पर आ जाता है तो प्रदेश का औद्योगिक स्वरूप ही बदल जाएगा। स्वयं मुख्यमंत्री गहलोत ग्रेटर भिवाड़ी इण्डस्ट्रियल टाउनशिप को औद्योगिक विकास की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होना मान रहे हैं।

मुख्यमंत्री गहलोत ने समन्वित, संतुलित और समग्र औद्योगिक विकास के लिए नए निवेश और युवाओं के लिए रोजगार दोनों से जुड़े अधिकांश बिन्दुओं को अपने बजट प्रस्तावों में प्रभावी तरीके से रखा है। अब इन प्रस्तावों को अमली जामा महनाने की जिम्मेदारी सरकारी मशीनरी पर आ जाती है। यदि समयबद्ध कार्य योजना बनाकर क्रियान्विति के प्रयास किए जाते हैं तो प्रदेश के औद्योगिक विकास को दिशा मिल सकेगी। होना तो यह चाहिए कि नए वित्तीय वर्ष के शुरू होने से पहले आवश्यक सभी औपचारिकताएं पूरी कर एक अप्रैल से अमली जामा पहनाने का काम आरंभ हो जाता है तो यह घोषणा मात्र ना रह कर वास्तविकता में धरातल पर आ सकेगी।

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा







भारत को नेपाल में चल रहे आंतरिक दंगल में दूरदर्शक बने रहना चाहिए

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  फरवरी 26, 2021   14:49
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भारत को नेपाल में चल रहे आंतरिक दंगल में दूरदर्शक बने रहना चाहिए

हो सकता है कि ओली लालच और भय का इस्तेमाल करें और अपनी सरकार बचा ले जाएं। वैसे उन्होंने पिछले दो माह में जितनी भी नई नियुक्तियां की हैं, अदालत ने उन्हें भी रद्द कर दिया है। अदालत के इस फैसले से ओली की छवि पर काफी बुरा असर पड़ेगा।

नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला दे दिया है। उसने संसद को बहाल कर दिया है। दो माह पहले 20 दिसंबर को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने नेपाली संसद के निम्न सदन को भंग कर दिया था और अप्रैल 2021 में नए चुनावों की घोषणा कर दी थी। ऐसा उन्होंने सिर्फ एक कारण से किया था। सत्तारुढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में उनके खिलाफ बगावत फूट पड़ी थी। पार्टी के सह-अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ ने मांग की कि पार्टी के सत्तारुढ़ होते समय 2017 में जो समझौता हुआ था, उसे लागू किया जाए। समझौता यह था कि ढाई साल ओली राज करेंगे और ढाई साल प्रचंड ! लेकिन वे सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं थे। पार्टी की कार्यकारिणी में भी उनका बहुमत नहीं था। इसीलिए उन्होंने राष्ट्रपति विद्या देवी से संसद भंग करवा दी।

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नेपाली संविधान में इस तरह संसद भंग करवाने का कोई प्रावधान नहीं है। ओली ने अपनी राष्ट्रवादी छवि चमकाने के लिए कई पैंतरे अपनाए। उन्होंने लिपुलेख-विवाद को लेकर भारत-विरोधी अभियान चला दिया। नेपाली संसद में हिंदी में बोलने और धोती-कुर्त्ता पहन कर आने पर रोक लगवा दी। (लगभग 30 साल पहले लोकसभा-अध्यक्ष दमननाथ ढुंगाना और गजेंद्र बाबू से कहकर इसकी अनुमति मैंने दिलवाई थी।) ओली ने नेपाल का नया नक्शा भी संसद से पास करवा लिया, जिसमें भारतीय क्षेत्रों को नेपाल में दिखा दिया गया था लेकिन अपनी राष्ट्रवादी छवि मजबूत बनाने के बाद ओली ने भारत की खुशामद भी शुरू कर दी। भारतीय विदेश सचिव और सेनापति का उन्होंने काठमांडो में स्वागत भी किया और चीन की महिला राजदूत हाउ यांकी से कुछ दूरी भी बनाई।

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उधर प्रचंड ने भी, जो चीनभक्त समझे जाते हैं, भारतप्रेमी बयान दिए। इसके बावजूद ओली ने यही सोचकर संसद भंग कर दी थी कि अविश्वास प्रस्ताव में हार कर चुनाव लड़ने की बजाय संसद भंग कर देना बेहतर है लेकिन मैंने उस समय भी लिखा था कि सर्वोच्च न्यायालय ओली के इस कदम को असंवैधानिक घोषित कर सकता है। अब उसने ओली से कहा है कि अगले 13 दिनों में वे संसद का सत्र बुलाएं। जाहिर है कि तब अविश्वास प्रस्ताव फिर से आएगा। हो सकता है कि ओली लालच और भय का इस्तेमाल करें और अपनी सरकार बचा ले जाएं। वैसे उन्होंने पिछले दो माह में जितनी भी नई नियुक्तियां की हैं, अदालत ने उन्हें भी रद्द कर दिया है। अदालत के इस फैसले से ओली की छवि पर काफी बुरा असर पड़ेगा। फिर भी यदि उनकी सरकार बच गई तो भी उसका चलना काफी मुश्किल होगा। भारत के लिए बेहतर यही होगा कि नेपाल के इस आंतरिक दंगल का वह दूरदर्शक बना रहे।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक







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