सिर्फ मुस्लिमों को खुश करने की राजनीति मायावती को कितनी सफलता दिलाएगी?

By अजय कुमार | Publish Date: Jul 19 2019 10:47AM
सिर्फ मुस्लिमों को खुश करने की राजनीति मायावती को कितनी सफलता दिलाएगी?
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मुस्लिम वोट बैंक पर नजर जमाए मायावती वह सब कर रही हैं जिससे उन्हें लगता है कि मुसलमानों को खुश किया जा सकता है। मुस्लिमों से अपने आप को जोड़ने के लिए मायावती ट्विटर पर कुछ ज्यादा ही एक्टिव नजर आ रही हैं।

बसपा सुप्रीमो मायावती आजकल जब भी मुंह खोलती हैं तो साम्प्रदायिकता का जहर ही घोलती हैं। लोकसभा चुनाव में उनके तीन मुस्लिम सांसद क्या जीते। बहनजी अपने आप को मुस्लिम वोटों का लंबरदार समझने लगी हैं। उनको लगने लगा है कि सपा का मुस्लिम वोट बैंक छिटक कर उनके पास आना निश्चित है। क्योंकि यूपी में सपा के बाद बसपा सुप्रीमो सिर्फ अपने आप को मुस्लिम वोटरों का सौदागर समझती हैं। इसी एक चाहत के कारण ही तो बुआ (मायावती) ने बबुआ (अखिलेश यादव) से तीन माह के भीतर लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद गठबंधन तोड़ दिया था। दरअसल, मायावती एक बार फिर दलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे अपनी सियासी जमीन मजबूत करना चाहती हैं। दलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे ही उनके 10 उम्मीदवार सांसद चुन लिए गए, जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता भी नहीं खुल पाया था।
 
मुस्लिम वोट बैंक पर नजर जमाए मायावती वह सब कर रही हैं जिससे उन्हें लगता है कि मुसलमानों को खुश किया जा सकता है। मुस्लिमों से अपने आप को जोड़ने के लिए मायावती ट्विटर पर कुछ ज्यादा ही एक्टिव नजर आ रही हैं। कौन भूल सकता है कि लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मायावती ने मुस्लिमों से कहा था कि वह इस बात का ध्यान रखें कि मुस्लिम वोट बंटने नहीं पाए। जिस पर उन्हें चुनाव आयोग से 48 घंटे का प्रतिबंध भी झेलना पड़ा था। वहीं चुनाव के बाद मायावती ने अखिलेश पर हमलावर होते हुए कहा था कि मुस्लिम वोटर सपा से दूर जा रहे हैं। मुसलमानों का सपा से विश्वास उठ रहा है। मायावती, मुसलमानों का रहनुमा बनकर उत्तर प्रदेश की 12 विधानसभा सीटों पर होने वाले उप-चुनाव में इसका नतीजा देखना चाहती हैं।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए गत दिनों ट्वीट कर मुसलमानों से जबरन धार्मिक नारे लगवाने के मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकार को घेरा। उन्होंने ट्वीट कर लिखा है कि यूपी सहित कुछ राज्यों में जबरन धार्मिक नारे लगवाने की गलत प्रथा चल पड़ी है जो अति-निंदनीय है। मायावती ने केंद्र व राज्य सरकारों को इस हिंसक प्रवृति के विरुद्ध सख्त रवैया अपनाने की सलाह भी दी। मायावती का कहना था कि केंद्र और राज्य सरकारों को इसके खिलाफ कड़े कदम उठाने चाहिए ताकि भाईचारा व सद्भावना हर जगह बनी रहे और विकास प्रभावित न हो।
 
गौरतलब है कि पिछले दिनों उन्नाव में क्रिकेट खेलने को लेकर दो पक्षों में विवाद हो गया था। विवाद इतना बढ़ गया कि बात मारपीट तक पहुंच गई थी। विवाद के बाद मदरसा के छात्रों ने आरोप लगाया था कि वे लोग उन्हें जय श्रीराम का नारा लगाने के लिए मजबूर कर रहे थे, ऐसा नहीं करने पर मारपीट पर उतर आए। हालांकि मामला सामने आने के बाद डीएम देवेंद्र और एसपी एमपी वर्मा ने खुलासा किया था कि ‘जयश्री राम’ के नारे लगाने को लेकर मारपीट नहीं की गई थी। पिछले दिनों मथुरा और अलीगढ़ में भी इसी तरह की घटना सामने आई थी। इसी तरह बंगाल, झारखण्ड और राजस्थान में भी जय श्रीराम न बोलने पर लोगों को पीटने की खबर अक्सर चर्चा में छायी रहती है। मगर सच्चाई यह भी है कि ऐसी बातों का कभी कोई प्रमाण नहीं मिल पाया है जिसके आधार पर यह साबित हो सके कि मुलसमानों से जय श्रीराम के नारे लगवाए जाने की बात में दम है। आज के मोबाइल युग में जब हर हाथ में मोबाइल रहता है तब यदि कहीं ऐसी घटना सच में घट जाए तो इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने में देर नहीं लगती है, लेकिन जब किसी पर कोई आरोप साजिशन और अपने को बचाने के लिए लगाए जाते हैं तो फिर इसका सबूत कहीं नहीं दिखाई देता है। यह छोटी-सी बात मायावती समझने की कोशिश नहीं कर रही हैं।


 
ऐसे ही पूर्व में बसपा सुप्रीमो मायावती ने मॉब लिंचिंग के खिलाफ सख्त कानून बनाने की मांग की थी। तब मायावती ने प्रेस रिलीज जारी करते हुए कहा था कि मॉब लिंचिंग के खिलाफ केंद्र सरकार को सख्त कानून बनाना चाहिए, लेकिन सरकार उदासीन है। बसपा सुप्रीमो का कहना था की बढ़ती मॉब लिंचिंग की घटनाओं के कारण आज दलित आदिवासी, धार्मिक अल्पसंख्यक इसका शिकार बन रहे हैं। हालांकि उन्होंने अपने को विवाद से बचाने के लिए सर्वसमाज को भी मॉब लिंचिंग का शिकार बताया था। उन्होंने राज्य विधिक आयोग द्वारा सख्त कानून बनाने की सिफारिश करने का स्वागत करते हुए कहा था कि भाजपा को बसपा की तरह सख्त कानून लागू करवाने की इच्छा शक्ति लानी होगी।
 
बता दें कि उत्तर प्रदेश राज्य विधिक आयोग पिछले काफी वक्त से हिंसा रोकने के तरीकों पर रिसर्च कर रहा था। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने कहा है कि पश्चिम बंगाल, केरल, जम्मू व कश्मीर और झारखंड में हाल में घटित भीड़ तंत्र की हिंसा अब यूपी में भी अपने पैर पसारने लगी है। इसकी रोकथाम जरूरी है। आयोग का कहना है कि भीड़ हिंसा पुलिस की लापरवाही के कारण भी होती है। उन्मादी हिंसा की बढ़ती घटनाओं में पुलिस भी निशाने पर रहती है और पुलिस को जनता अपना शत्रु समझने लगती है।


बहरहाल, इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है कि समाजवादी पार्टी से गठबंधन तोड़ने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती बड़ी तेजी से समाजवादी पार्टी के परम्परागत मुस्लिम वोट बैंक की सेंधमारी में जुटी हुई हैं। साढ़े पांच माह पुराने गठबंधन को तोड़ना और लोकसभा चुनाव में हार का ठीकरा अखिलेश यादव के सिर फोड़ने की कवायद को उनकी एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा कहा जा रहा है। वे सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को घेरते हुए यह साबित करने में लगी हुई हैं कि बसपा ही मुस्लिमों की असल हितैषी व शुभचिंतक है। उसी समय लखनऊ में बसपा की ऑल इंडिया बैठक में मायावती ने अखिलेश पर मुस्लिमों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कहा था कि सपा ने ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशी उतारने से मना किया था। साथ ही यह भी जता दिया कि अखिलेश के विरोध के बावजूद उन्होंने 6 मुस्लिमों को टिकट दिया, जबकि सपा ने सिर्फ चार मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। हालांकि दोनों ही पार्टियों के 3-3 मुस्लिम उम्मीदवार विजयी रहे थे।
 
मायावती दलित-मुस्लिम सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर आगे बढ़ रही हैं। यही वजह है कि आगामी चुनावों में वे दलितों के साथ ही मुस्लिमों की भागीदारी भी बढ़ाएंगी। उनकी रणनीति दलित-मुस्लिम ताकत को धार देने की है। उनकी रणनीति स्पष्ट है कि वे अखिलेश को मुस्लिम और दलित विरोधी बताकर खुद को उनका शुभचिन्तक साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ें। मायावती ने संगठन में जो बदलाव किए हैं उससे भी उनकी रणनीति का संकेत मिल रहा है। उन्होंने अमरोहा से जीते दानिश अली को लोकसभा में पार्टी का नेता बनाया है। साथ ही उन्हें दलित-मुस्लिम भाईचारा कमेटी को मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है। दानिश अली की जिम्मेदारी नसीमुद्दीन सिद्दीकी वाली ही होगी।
 
लब्बोलुआब यह है कि मायावती अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए जिस तरह से साम्प्रदायिकता का सहारा ले रही हैं, वह उनका आखिरी ‘हथियार’ बन गया है। उनके पास और कुछ कहने या करने के लिए बचा नहीं है। कौन भूल सकता है वह दृश्य जब सत्ता में रहते मायावती ने मिलने आए मुस्लिम धर्मगुरुओं के जूते तक उतरवा दिए थे, लेकिन यह बातें मायावती भूल गई होंगी। इसीलिए तो वह एक बार फिर तुष्टिकरण के सहारे अपनी सियासत को पुनः पटरी पर लाना चाह रही होंगी।
 
-अजय कुमार
 

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