सीबीआई संकट में, मोदी के कार्यकाल में पहली बार PMO पर उठे सवाल

By उपेन्द्र प्रसाद | Publish Date: Oct 23 2018 3:25PM
सीबीआई संकट में, मोदी के कार्यकाल में पहली बार PMO पर उठे सवाल
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देश के पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अगले चंद महीनों के अंदर लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी। और बीच देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के अंदर घमासान छिड़ गया है।

देश के पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अगले चंद महीनों के अंदर लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी। और बीच देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के अंदर घमासान छिड़ गया है। देखने पर तो यह घमासान सीबीआई के दो वरिष्ठतम पदों पर बैठे दो अधिकारियों के बीच में है, लेकिन यह घमासान अपने जद में पूरी सीबीआई और उसकी नियंत्रक राजनैतिक प्रतिष्ठान को भी घेरे में लेने की क्षमता रखता है। सीबीआई अब सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय यानी प्रधानमंत्री के नियंत्रण में है, इसलिए सवाल देश के सर्वोच्च कार्यालय पर भी खड़े हो सकते हैं।
 
एक अभूतपूर्व घटना के तहत सीबीआई ने अपने दूसरे सबसे बड़े अधिकारी राकेश अस्थाना पर तीन करोड़ रुपये घूस लेकर मांस निर्यातक मोइन कुरेशी के मामले से जुड़े एक व्यापारी साना को क्लीन चिट देने के मामले में मुकदमा किया है। दिलचस्प है कि अस्थाना सीबीआई प्रमुख और अपने बॉस आलोक वर्मा पर उस व्यापारी से दो करोड़ रुपये घूस लेकर उसे बचाने की कोशिश करने का आरोप लगा रहे थे। यह आरोप उन्होंने लिखित रूप से लगाया था और उनके द्वारा लगाए आरोप की जांच अभी तक पूरी नहीं हुई है।
 


और इस बीच सीबीआई प्रमुख ने अपने डिपुटी अस्थाना पर ही उसी व्यापारी को गवाह बनाकर तीन करोड़ की घूस लेने के मामले मे फंसा दिया। इसमें एक और दिलचस्प बात है और वह यह है कि अस्थाना के खिलाफ मुकदमा दायर करने के पहले ऊपर से इजाजत नहीं ली गई, जबकि उस तरह की इजाजत जरूरी थी। जाहिर है, वर्मा हड़बड़ी में हैं और अपने ऊपर लगाए गए आरोप की जांच पूरी होने के पहले ही उन्होंने उसी व्यापारी की गवाही से अपने डिपुटी अस्थाना पर मुकदमा ठोंक दिया है।
 
जब बात मुकदमेबाजी की आती है, तो मामला अदालत के पास पहुंचता है और अदालतें सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला करती हैं। यह भी देखा जाता है कि वह गवाह कितना विश्वसनीय है। इस मामले में गवाह वह व्यक्ति है, जो खुद जांच के तहत गिरफ्तारी और दोषी साबित होने के खतरे का सामना कर रहा था। वर्मा का कहना है कि साना ने अस्थाना को घूस दी, तो अस्थाना का कहना है कि साना ने वर्मा को घूस दी। अब चूंकि सीबीआई की कमान वर्मा के हाथ में है, तो उन्होंने अपने बॉस होने का फायदा उठाते हुए डिपुटी पर मुकदमा ठोंक दिया और यदि अस्थाना वर्मा के बॉस होते तो यह मुकदमा वर्मा पर ठोंका जाता।
 
अब किसने घूस ली, इसका पता तो बात में चलेगा या चलेगा भी या नहीं, इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन जो कुछ सामने आ रहा है, उससे सीबीआई मजाक बनती जा रही है। सीबीआई के पास एक से एक बड़े और संवदेनशील मुकदमे हैं और इस अंदरूनी झगड़े से उसकी कार्यक्षमता निश्चय ही प्रभावित होगी और इससे देश का ही नुकसान होगा, क्योंकि विजय माल्या से लेकर, नीरव मोदी और अन्य अनेक हजारों करोड़ रूपये की लूट के मामले को सीबीआई देख रही है। खुद अस्थाना विजय माल्या और अगुस्ता हेलिकॉप्टर घोटाले के मामले को देख रहे हैं। अब वे उन मामलों को देखने की जगह अब अपना मुकदमा देखेंगे।


 
खुद भ्रष्टाचार के मुकदमे का सामना करते हुए कोई सीबीआई अधिकारी अन्य भ्रष्टाचार के मामले की जांच करने को नैतिक रूप से कितना सक्षम हैं, यह अलग सवाल है, जिस पर बहस की जा सकती है, लेकिन यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब सीबीआई को मिलजुलकर काम करना चाहिए था। 
 
राकेश अस्थाना की छवि एक ईमानदार अधिकारी की है। उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि उन पर राजनैतिक दबाव असर नहीं करता और वे अपने कॅरियर को दांव पर लगाकर वही करते हैं, जिसे वे अपना फर्ज समझते हैं। बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाले में लालू यादव को सजा दिलवाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। वे गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और नरेन्द्र मोदी के साथ काम करने का उनका लंबा अनुभव रहा है। सीबीआई में उन्हें नरेन्द्र मोदी की पसंद का आदमी कहा जाता है।


 
चूंकि सीबीआई सीधे तौर पर प्रधानमंत्री के मातहत काम करती है, इसलिए मोदीजी के लिए यह घमासान एक बहुत बड़ी चुनौती है। यदि वे इसे संभालने में विफल रहे, तो सबसे पहले तो इस संस्था की कार्यक्षमता बहुत कम हो जाएगी और सारे अधिकारी खेमेबाजी में लग जाएंगे और उससे भी बुरा तब होगा, जब यह मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चला जाएगा। एफआईआर दायर किए जाने के बाद यह मामला अदालत में चला ही गया है और अब अस्थाना अपनी निजी हैसियत से भी उस मुकदमे को निरस्त कराने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
 
दोनों के बीच संघर्ष पिछले कई महीनों से मीडिया की सुर्खियां बन रहे थे। अस्थाना ने आरोप लगाया था कि वर्मा रेलवे होटल घोटाले के मामले में लालू और उनके परिवार के खिलाफ हो रही जांच को धीमा करने की कोशिश कर रहे हैं। गौरतलब है कि यह मामला भी अस्थाना के हाथ में ही है। आरोप है कि वर्मा ने छापा मारने से मना कर दिया था और उसके बावजूद छापे पड़े और सीबीआई की कार्रवाई आगे बढ़ी। वह मामला मीडिया में आने के बाद दोनों के झगड़े और तेज हुए और मोइन कुरेशी मामले में भी अस्थाना ने वर्मा पर अनावश्यक हस्तक्षेप का आरोप लगाया। इस बीच साना को बचाने के लिए एक राजनेता का नाम भी चर्चा में आ गया।
 
सीबीआई के इस अंदरूनी संग्राम को रोकना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्हें अपने स्तर पर हस्तक्षेप कर यह पता लगाना चाहिए कि दोनों अधिकारियों में कौन सही है और कौन गलत। जो गलत है, उसे बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। यदि यह संग्राम नहीं रूका तो ऐसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं और ऐसे ऐसे खुलासे (सही या गलत) हो सकते हैं, जिससे मोदी को राजनैतिक नुकसान हो सकता है।
 
-उपेन्द्र प्रसाद

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